दोस्ती दो कदम आगे: पुतिन के भारत दौरे में 3 हथियार, जिन्हें और मिलेगी धार
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे में रक्षा सहयोग को नया आयाम मिल सकता है। मोदी-पुतिन वार्ता में Su-57 विमान की तकनीक, ब्रह्मोस को ज्यादा ताकतवर बनाने और S-400 की बची डिलीवरी पर चर्चा संभव है।
दोस्ती दो कदम आगे: पुतिन के भारत दौरे में 3 हथियार, जिन्हें और मिलेगी धार
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रूस और भारत की दशकों पुरानी दोस्ती अब रक्षा सहयोग का नया अध्याय लिखने जा रही है। यह रिश्ता अब केवल रूस से तैयार हथियार खरीदने तक सीमित नहीं है। दोनों देश मिलकर हथियार बनाने, पुरानी प्रणालियों को ज्यादा ताकतवर करने और अहम तकनीक साझा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे में इसी बदलती साझेदारी की झलक दिख सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बातचीत में Su-57 लड़ाकू विमान की तकनीक, ब्रह्मोस का नया और ज्यादा ताकतवर रूप तथा S-400 की बची हुई डिलीवरी तीन बड़े मुद्दे रह सकते हैं।

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भारतीय पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि रूस Su-57 की संभावित बिक्री और उसकी तकनीक भारत को देने पर चर्चा कर रहा है। दोनों देश ब्रह्मोस मिसाइल को पहले से अधिक ताकतवर बनाने पर भी विचार कर रहे हैं। इसके साथ ही रूस ने S-400 की बची हुई डिलीवरी पूरी करने का भरोसा दिया है। ऐसे में आइए समझते हैं कि ये रक्षा सौदे भारत के लिए इतने अहम क्यों हैं?

S-57, ब्रह्मोस और S-400RT

1. Su-57: क्या भारत को विमान के साथ उसकी तकनीक भी मिलेगी?

पेस्कोव ने कहा कि रूस Su-57 लड़ाकू विमान की संभावित बिक्री को लेकर भारत से बातचीत कर रहा है। इस बातचीत में विमान बनाने की तकनीक भारत को देने का मुद्दा भी शामिल है। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अब केवल तैयार हथियार खरीदने के बजाय उन्हें देश में बनाने और उनकी तकनीक हासिल करने पर जोर दे रहा है। अगर दोनों देशों में समझौता होता है तो भारत के सामने केवल रूस से तैयार विमान खरीदने का विकल्प नहीं होगा। इसके कुछ हिस्से देश में बनाने, मरम्मत करने और भविष्य में सुधार करने पर भी बात हो सकती है। हालांकि, रूस कितनी तकनीक देने को तैयार है और विमान का कितना हिस्सा भारत में बन सकता है, यह अभी साफ नहीं किया गया है।

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Su-57 की खासियत क्या है?

Su-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है। इसे दुश्मन के विमान से लड़ने के साथ जमीन और समुद्र पर मौजूद ठिकानों पर हमला करने के लिए भी बनाया गया है। इस विमान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि दुश्मन के रडार के लिए इसे जल्दी पहचानना मुश्किल होता है। विमान की बनावट ऐसी रखी गई है कि रडार से निकलने वाली तरंगें इससे टकराकर सीधे वापस न लौटें। इसके ऊपर और कॉकपिट के शीशे पर भी खास परत लगाई गई है। इससे विमान को दूर से पकड़ना और उस पर निशाना लगाना मुश्किल हो जाता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि Su-57 रडार पर पूरी तरह गायब हो जाता है। आसान शब्दों में कहें तो इसे सामान्य लड़ाकू विमानों के मुकाबले पहचानना अधिक कठिन होता है। 

Su-57 अपनी मिसाइलों और बमों को विमान के भीतर बने हिस्से में रख सकता है। हथियार बाहर न लटकने से रडार के लिए विमान को पहचानना और मुश्किल हो जाता है। यह विमान बिना ज्यादा ईंधन खर्च किए लंबे समय तक आवाज की रफ्तार से तेज उड़ सकता है। यह बहुत तेजी से दिशा बदल सकता है और हवा में मुश्किल मोड़ ले सकता है। इसके कैमरे, रडार और दूसरी मशीनें मिलकर पायलट को आसपास के खतरे की जानकारी देती हैं।

विमान जमीन पर बने नियंत्रण केंद्र और दूसरे लड़ाकू विमानों के साथ तुरंत जानकारी साझा कर सकता है। इसे दिन-रात, खराब मौसम और ऐसे माहौल में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां दुश्मन संपर्क और रडार को बाधित करने की कोशिश कर रहा हो।

भारत को पेश किए जाने वाले मॉडल को Su-57E कहा जाता है। ‘E’ का अर्थ है कि यह दूसरे देशों को बेचने के लिए तैयार किया गया मॉडल है।

Su-57E की क्षमता

कितना सक्षम

अधिकतम रफ्तारआवाज की गति से करीब दोगुनी
एक बार में उड़ान की दूरी2,800 किलोमीटर
लड़ाई के दौरान प्रभावी दायरा1,250 किलोमीटर
अधिकतम ऊंचाई18,800 मीटर
अधिकतम हथियार और दूसरा भार7,500 किलोग्राम
पूरा वजन लेकर उड़ान की सीमा34,000 किलोग्राम

ये आंकड़े रूस की सरकारी हथियार निर्यात कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट ने जारी किए हैं।

जानकारी के लिए बता दें कि Su-57 ने पहली उड़ान 29 जनवरी 2010 को भरी थी। इसका उत्पादन शुरू हो चुका है और पहला विमान 2020 में रूसी रक्षा मंत्रालय को दिया गया था।

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2. ब्रह्मोस को और ताकतवर बनाने की तैयारी

भारत और रूस अब ब्रह्मोस मिसाइल में नई खूबियां जोड़ने पर विचार कर रहे हैं। पेस्कोव ने कहा, 'हम मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल बनाते हैं। अब इन मिसाइलों को बेहतर बनाने, उनमें नई खूबियां जोड़ने और उन्हें बाजार में ज्यादा प्रभावी बनाने के बारे में सोचने का समय आ गया है।' बता दें कि ब्रह्मोस को भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया (NPO Mashinostroyeniya) ने मिलकर तैयार किया है। दोनों देशों ने इसके लिए 1998 में समझौता किया था।

इस मिसाइल को जमीन, युद्धपोत और लड़ाकू विमान से दागा जा सकता है। पनडुब्बी से छोड़े जाने वाला मॉडल भी विकसित किया गया है। इसकी रफ्तार आवाज की गति से करीब तीन गुना है। इस वजह से दुश्मन के पास मिसाइल को पहचानने और रोकने के लिए बहुत कम समय बचता है।

ब्रह्मोस मिसाइल का नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा (Moskva) नदी के नामों को मिलाकर रखा गया है।

नए ब्रह्मोस में क्या बदल सकता है?

पेस्कोव ने यह नहीं बताया कि दोनों देश ब्रह्मोस के किस मॉडल में सुधार करने वाले हैं। यह भी साफ नहीं किया गया कि नई मिसाइल की रफ्तार बढ़ाई जाएगी, दूरी बढ़ेगी या उसका आकार छोटा किया जाएगा। ब्रह्मोस एयरोस्पेस अभी भविष्य के दो मॉडलों पर काम करने की बात कहता है:

ब्रह्मोस-एनजी: यह मौजूदा ब्रह्मोस से छोटा और हल्का होगा। कंपनी का कहना है कि इसकी रफ्तार ज्यादा होगी और दुश्मन के रडार के लिए इसे पहचानना मुश्किल होगा। कम वजन के कारण एक लड़ाकू विमान पर ज्यादा मिसाइलें लगाई जा सकेंगी। 

ब्रह्मोस-II: यह भविष्य का बेहद तेज मॉडल होगा। कंपनी का लक्ष्य इसे आवाज की गति से कम से कम पांच गुना तेज बनाने का है। 

ब्रह्मोस के भावी मॉडल

हालांकि, अभी यह कहना सही नहीं होगा कि मोदी-पुतिन की बातचीत इन्हीं दोनों में से किसी मॉडल पर होगी। पेस्कोव ने केवल इतना कहा है कि ब्रह्मोस में नई खूबियां जोड़ने पर विचार किया जा रहा है। इसका सही रूप समझौते या दोनों देशों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही सामने आएगा।

3. S-400 की बची डिलीवरी पूरी करेगा रूस

पेस्कोव ने S-400 की डिलीवरी में हुई देरी पर भी रूस का रुख साफ किया। उन्होंने कहा कि रूस भारत से किए गए अपने वादे पूरे करने में सक्षम है और इन्हें पूरा किया जाएगा। भारत ने अक्टूबर 2018 में रूस से पांच S-400 प्रणालियां खरीदने का समझौता किया था। रूस की सरकारी कंपनी रोस्टेक ने इसे दोनों देशों के रक्षा सहयोग के इतिहास का सबसे बड़ा सौदा बताया था। इसकी कुछ इकाइयां भारत को मिल चुकी हैं, जबकि बाकी की डिलीवरी अभी पूरी होनी है। 

S-400 करता क्या है?

S-400 हमला करने वाला हथियार नहीं, बल्कि आसमान से आने वाले हमलों से बचाने वाली प्रणाली है। यह दूर से आ रहे लड़ाकू विमानों, मिसाइलों और दूसरे हवाई खतरों का पता लगाकर उन्हें रास्ते में ही नष्ट कर सकती है। रूस की सरकारी कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के मुताबिक S-400 अलग-अलग मिसाइलों का इस्तेमाल करता है। यह लड़ाकू विमानों जैसे लक्ष्यों को अधिकतम 380 किलोमीटर दूर तक निशाना बना सकता है। मिसाइल से आने वाले खतरे को 60 किलोमीटर तक की दूरी पर रोका जा सकता है।

एक पूरी S-400 प्रणाली एक साथ 80 लक्ष्यों पर हमला कर सकती है और उनकी ओर 160 मिसाइलें भेज सकती है। हालांकि इसकी असली क्षमता इस्तेमाल की गई मिसाइल, लक्ष्य की ऊंचाई और तैनाती की स्थिति पर निर्भर करती है।

भारत अतिरिक्त S-400 खरीदने की तैयारी में

भारत की रक्षा खरीद परिषद ने 27 मार्च 2026 को अतिरिक्त S-400 खरीदने की शुरुआती मंजूरी भी दी थी। रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि यह प्रणाली भारत के महत्वपूर्ण इलाकों की ओर आने वाले लंबी दूरी के हवाई खतरों को रोकेगी। यह अंतिम खरीद समझौता नहीं है। शुरुआती मंजूरी के बाद संख्या, कीमत, डिलीवरी और दूसरी शर्तों पर बातचीत होती है।

इस बातचीत की सबसे बड़ी बात क्या है?

भारत और रूस के रक्षा संबंध पहले मुख्य रूप से हथियार खरीदने और बेचने पर टिके थे। अब जोर भारत में हथियार बनाने, उनकी तकनीक साझा करने और पुराने हथियारों को मिलकर बेहतर बनाने पर बढ़ रहा है। Su-57 में भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल तकनीक का है। ब्रह्मोस में सवाल यह है कि उसका अगला रूप कितना तेज, हल्का और ज्यादा दूरी तक मार करने वाला होगा। वहीं S-400 में रूस के सामने पहले से हुए समझौते की बची डिलीवरी समय पर पूरी करने की चुनौती है। मोदी-पुतिन मुलाकात में इन तीनों मुद्दों पर बात हो सकती है, लेकिन किसी नई खरीद या तकनीक देने का अंतिम फैसला आधिकारिक समझौते के बाद ही माना जाएगा।

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