
भारत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों के नेता जुटेंगे। यह सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था व्यापारिक तनाव, सप्लाई चेन में रुकावट, भू-राजनीतिक संघर्ष और तेजी से बदलती तकनीक जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। इससे ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा मैसेज दिया है। मुंबई में ग्लोबल फिनटेक फेस्ट में पीएम ने कहा कि भारत का UPI कई देशों तक पहुंच चुका है। अब दूसरे देशों के पेमेंट सिस्टम से जुड़ने का लक्ष्य है। उन्होंने ये बात ऐसे ही नहीं कही है। दरअसल, ब्रिक्स के देश लेनदेन का आसान और सस्ता तरीका ढूंढ रहे हैं।
भारत की अध्यक्षता में होने वाले इस सम्मेलन में सीमा-पार भुगतान (क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट) को आसान बनाने और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने पर जोर रहने की उम्मीद है। इसके तहत सदस्य देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम और केंद्रीय बैंक की डिजिटल करेंसी (CBDC) के बीच कनेक्टिविटी की संभावनाओं पर चर्चा हो सकती है।
भुगतान की मौजूदा सीमा-पार व्यवस्था कैसे काम करती है?
लेकिन सवाल है कि आखिर मौजूदा व्यवस्था में दिक्कत क्या है? और ब्रिक्स इसमें बदलाव क्यों चाहता है? इसका जवाब समझने से पहले दो देशों के बीच भुगतान की मौजूदा व्यवस्था को समझना जरूरी है। इसके दो अहम हिस्से हैं:
- SWIFT
- कॉरेस्पॉन्डेंट बैंकिंग
दो देशों के बीच व्यापार होने पर भुगतान आमतौर पर सीधे खरीदार के बैंक से विक्रेता के बैंक तक नहीं पहुंचता। इसके बीच कई बैंक और वित्तीय संस्थान शामिल हो सकते हैं। इसे कॉरेस्पॉन्डेंट बैंकिंग व्यवस्था कहा जाता है।
मान लीजिए, भारत की एक कंपनी ब्राजील की कंपनी से मशीनरी खरीदती है। भारतीय कंपनी अपने बैंक को भुगतान करने का निर्देश देगी। लेकिन अगर भारतीय बैंक का ब्राजील के बैंक में सीधा खाता या बैंकिंग संबंध नहीं है, तो भुगतान को आगे पहुंचाने के लिए किसी दूसरे बैंक की मदद लेनी पड़ सकती है, जिसके भारतीय और ब्राजीलियाई दोनों बैंकों के साथ बैंकिंग संबंध हों। यही बैंक भुगतान को एक बैंक से दूसरे बैंक तक पहुंचाने में मदद करता है। ऐसे बैंकों को कॉरेस्पॉन्डेंट बैंक कहा जाता है।
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रुपये से डॉलर और फिर डॉलर से ब्राजीलियाई रियल
भारतीय कंपनी की बैंकिंग व्यवस्था के हिसाब से भुगतान रुपये में हो सकता है, जबकि ब्राजील की कंपनी को ब्राजीलियाई रियल में रकम चाहिए। अगर दोनों मुद्राओं के बीच सीधे लेनदेन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, तो रकम को पहले रुपये से डॉलर और फिर डॉलर से रियल में बदला जा सकता है।
इस तरह डॉलर दोनों देशों के बीच व्यापार में पुल का काम कर सकता है, भले ही इस कारोबार में कोई अमेरिकी कंपनी शामिल न हो।
SWIFT की भूमिका क्या है?
इस पूरी प्रक्रिया में भुगतान से जुड़े निर्देश बेहद अहम होते हैं। इन्हें भेजने के लिए SWIFT (Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunication) नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है।
SWIFT बेल्जियम स्थित एक सहकारी संस्था है। इसकी निगरानी बेल्जियम के नेशनल बैंक के साथ G-10 देशों के केंद्रीय बैंक करते हैं, जिनमें अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी शामिल है।
SWIFT का इस्तेमाल दुनिया के 200 से ज्यादा देशों में 11 हजार से अधिक वित्तीय संस्थान सीधे करते हैं।
लेकिन ब्रिक्स मौजूदा व्यवस्था में क्यों बदलाव चाहता है?
अंतरराष्ट्रीय कारोबार अमेरिकी डॉलर, यूरो और जापानी येन जैसी कुछ प्रमुख मुद्राओं पर निर्भर है। ऐसे में विकासशील देशों को यह चिंता रहती है कि इन मुद्राओं को जारी करने वाले देशों की मौद्रिक नीतियों का असर उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, मौजूदा भुगतान व्यवस्था में बदलाव की तीन बड़ी वजहें हैं:
- लागत
- समय
- निर्भरता
रावल बताते हैं, “अंतरराष्ट्रीय भुगतान में कई बार एक मुद्रा को दूसरी और फिर तीसरी मुद्रा में बदलना पड़ता है। हर कन्वर्जन पर लागत जुड़ती है और बैंक भी अपना चार्ज लेते हैं। कुल मिलाकर यह लागत ट्रांजैक्शन की रकम का करीब 3 से 6 फीसदी तक हो सकती है।”
इसके साथ ही वे कहते हैं, “मौजूदा अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में बीच के बैंक अपनी फीस और कंप्लायंस कॉस्ट लेते हैं। किसी ट्रांजैक्शन में समस्या होने पर पैसा कुछ समय के लिए अटक भी सकता है। अलग-अलग टाइम जोन और बैंकों के कामकाजी घंटे भी सेटलमेंट में देरी की वजह बनते हैं।”
तीसरा बड़ा कारण है—निर्भरता।
2024 की BRICS चेयरमैनशिप रिसर्च में मौजूदा अंतरराष्ट्रीय सीमा-पार भुगतान व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा की कमी पर सवाल उठाया गया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय व्यवस्था (IMFS) के इस हिस्से पर एक संस्था का प्रभावी एकाधिकार है, जिससे देशों के पास कोई व्यवहारिक विकल्प नहीं बचता।
ब्रिक्स ने इसके विकल्प के तौर पर ऐसी भुगतान व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया था, जिसमें दो अहम हिस्से हों:
- भुगतान से जुड़ी सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था
- अलग-अलग देशों के बीच भुगतान का नेटवर्क
बात कहां पहुंची?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पिछले महीने कहा था कि ब्रिक्स देश अपने फास्ट पेमेंट सिस्टम और CBDC को आपस में जोड़ने के विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं। इससे सदस्य देशों के बीच सीमा-पार डिजिटल भुगतान को तेज और आसान बनाने में मदद मिल सकती है।
ब्रिक्स देशों के पास पहले से ही अपने-अपने मजबूत घरेलू पेमेंट सिस्टम हैं, जिन्हें आपस में जोड़ा जा सकता है। भारत में UPI, RuPay और Structured Financial Messaging System हैं। चीन में युआन में लेनदेन के लिए CIPS है। रूस SPFS और Mir नेटवर्क का इस्तेमाल करता है, जबकि ब्राजील का अपना Pix इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम है।
अगर इन सिस्टम को आपस में जोड़ने में कामयाबी मिलती है, तो ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में भुगतान करना आसान और तेज हो सकता है।
ब्रिक्स बिजनेस काउंसिल के सहयोग से BRICS Pay पर भी काम हो रहा है। इसका मकसद ब्रिक्स देशों के बीच सीमा-पार भुगतान को तेज, सुरक्षित और आसान बनाना है।
भारत की डिजिटल करेंसी के बारे में प्रो. अग्रवाल बताते हैं, “यह अभी टेस्टिंग स्टेज में है। फिलहाल इसका इस्तेमाल कुछ चुनिंदा बैंक और संस्थाएं कर रही हैं। इसलिए डिजिटल करेंसी के आधार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक लेनदेन की बात अभी कुछ दूर की संभावना है।”
दो देशों के बीच अपनी मुद्रा में लेनदेन कैसे होता है?
स्थानीय मुद्रा में व्यापार का मतलब है कि दो देश आपस में तय करते हैं कि उनका कारोबार किस मुद्रा में होगा। उदाहरण के लिए, भारत और रूस रुपये और रूबल में व्यापार कर सकते हैं। दोनों देश एक एक्सचेंज रेट तय करते हैं और लेनदेन को आपसी खातों में दर्ज किया जा सकता है। बाद में इन खातों का सेटलमेंट किया जाता है।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार का फायदा बताते हुए प्रो. अग्रवाल कहते हैं,
डी-डॉलराइजेशन उद्देश्य नहीं
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि रूस में ब्रिक्स देशों के साथ होने वाले 90 फीसदी से अधिक भुगतान और लेनदेन अब राष्ट्रीय मुद्राओं में किए जा रहे हैं।
पेस्कोव ने साफ किया कि इसका उद्देश्य डी-डॉलराइजेशन नहीं है। उन्होंने कहा,
स्थानीय मुद्रा में व्यापार और वैकल्पिक क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम को सीधे तौर पर डॉलर के खिलाफ कदम नहीं माना जाना चाहिए। प्रो. अग्रवाल कहते हैं, “कई मामलों में इसकी वजह व्यावहारिक है। अगर किसी देश के साथ डॉलर में लेनदेन करना मुश्किल हो जाता है, तो कारोबार रोकना संभव नहीं है। ऐसे में व्यापार जारी रखने के लिए दूसरे पेमेंट सिस्टम की जरूरत होती है।”
वहीं, रावल के मुताबिक, स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल से हर लेनदेन में डॉलर के जरिए करेंसी कन्वर्जन की जरूरत कम हो सकती है। वे कहते हैं, “लक्ष्य डॉलर को पूरी तरह हटाना नहीं, बल्कि भुगतान की प्रक्रिया में डॉलर की भूमिका और उस पर निर्भरता को कम करना हो सकता है।”
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