
यूरोप लंबे समय से भारत का रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर सवाल उठाता रहा है। यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने कई बार भारत से रूसी तेल की खरीद कम करने की अपील की है। भारत का तर्क रहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों, कीमत और उपलब्धता के आधार पर तेल खरीदता है। लेकिन अब वैश्विक तेल बाजार की बदलती तस्वीर में एक दिलचस्प स्थिति सामने आई है। जिस भारत के रूस से तेल खरीदने पर यूरोप सवाल उठाता रहा, वही भारत अब यूरोप की डीजल जरूरतों के एक अहम स्रोत के तौर पर उभर रहा है।
यूरोप में 60% डीजल सप्लाई भारत से
रियल-टाइम ऊर्जा और शिपिंग डेटा एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म वॉर्टेक्सा (Vortexa) के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में बाब-अल-मंदेब के रास्ते यूरोप पहुंचने वाले डीजल में करीब 60 फीसदी हिस्सा भारत का था। इस रूट के जरिए यूरोप को करीब 2 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल की सप्लाई हुई। यानी यूरोप के लिए भारत की रिफाइनरियां अब सिर्फ एक वैकल्पिक स्रोत नहीं, बल्कि पूर्वी सप्लाई रूट पर एक महत्वपूर्ण सहारा बनती जा रही हैं।

आरटी इंडिया से बातचीत में जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमित पाल चौधरी ने कहा, “यूरोप हाइड्रोकार्बन के आयात पर काफी निर्भर है। उसके तेल आयात का करीब 50 फीसदी हिस्सा अमेरिका से आता है। वहीं, करीब 25 फीसदी तेल बाब-अल-मंदेब के रास्ते लाल सागर के जरिए यूरोप पहुंचता है। इसमें से करीब 60 फीसदी हिस्सा मूल रूप से भारत से आने वाले रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का है।”
पश्चिमी एशिया संकट के बीच भारत-रूस तेल कारोबार बढ़ा
इस बीच, भारत और रूस के बीच तेल कारोबार में भी भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है। भारत की ऊर्जा जरूरतों में रूस से आने वाले कच्चे तेल की बड़ी हिस्सेदारी है। एनर्जी और कमोडिटी इंटेलिजेंस फर्म केप्लर (Kpler) के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त 2026 में भारत ने रूस से करीब 20.8 लाख बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन आयात किया। यह भारत के कुल क्रूड आयात का करीब 45 फीसदी था।
इससे पहले जुलाई 2026 में भारत का रूसी क्रूड आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। केप्लर के मुताबिक, जुलाई में भारत ने करीब 28 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी क्रूड खरीदा, जो भारत के कुल क्रूड आयात का करीब 56 फीसदी था। यह रूस से भारत के क्रूड आयात का अब तक का सबसे ऊंचा मासिक स्तर था।

भारत की रिफाइनिंग क्षमता बनी यूरोप के लिए मददगार
भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनिंग केंद्र है। देश की स्थापित रिफाइनिंग क्षमता करीब 258.1 मिलियन टन प्रति वर्ष है, जो घरेलू ईंधन मांग से अधिक है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 6.15 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया। यानी भारत के पास न सिर्फ बड़ी रिफाइनिंग क्षमता है, बल्कि अतिरिक्त रिफाइंड ईंधन को वैश्विक बाजार में भेजने की भी पर्याप्त क्षमता है। अब इन उत्पादों के लिए यूरोप एक महत्वपूर्ण बाजार बनता जा रहा है।
भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के पूर्व सचिव और वरिष्ठ अर्थशास्त्री अजय दुआ कहते हैं, “रूस लंबे समय से यूरोप के लिए प्राकृतिक गैस का एक बड़ा सप्लायर रहा है। इसकी सप्लाई जर्मनी तक जाती रही है, जहां खासकर सर्दियों के महीनों में गैस की खपत काफी ज्यादा होती है। लेकिन अब रूस खुद रिफाइनिंग से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहा है। ऐसे में उसे रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने पड़ रहे हैं। यह उसके लिए शायद सस्ता विकल्प है और अपनी रिफाइनिंग क्षमता में आई बड़ी कमी के चलते संभवतः यही उपलब्ध विकल्प भी है।”
रूसी तेल पर यूरोप की आपत्ति, भारत का सख्त संदेश
यूरोपीय देश लंबे समय से भारत पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वह रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर पश्चिमी प्रतिबंधों के प्रभाव को कमजोर कर रहा है। यूरोपीय संघ के प्रतिबंध दूत डेविड ओ'सुलीवन ने 13 जनवरी 2026 को कहा था कि “ईयू उन सभी तत्वों पर शिकंजा कसना जारी रखेगा जो रूसी तेल की बिक्री को मुमकिन बना रहे हैं, जिनमें तीसरे देशों की रिफाइनरियां और बंदरगाह भी शामिल हैं।”
हालांकि, भारत यूरोप के इस रुख के बीच लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए सस्ती और निर्बाध ऊर्जा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है।
#WATCH | Finland: On US President EAM Dr S Jaishankar says, "... We didn't buy significant amount of Russian oil till 2022. Circumstances compelled us to get into that market and I must say the Russians have been steady suppliers because they put the cargoes out there and you go… pic.twitter.com/WYcq4ZkQhr
— ANI (@ANI) June 12, 2026
जून 2026 में फिनलैंड के कुलतारंता वार्ता में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था कि भारत तेल की खरीद “कीमत और उपलब्धता” के आधार पर करता है। उन्होंने कहा कि "2022 तक भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल नहीं खरीदता था। लेकिन बदलती परिस्थितियों के कारण भारत को रूसी तेल बाजार में उतरना पड़ा। इसके बाद रूस लगातार तेल की आपूर्ति करता रहा और भारत कीमत व उपलब्धता के आधार पर सबसे उचित विकल्प से तेल खरीदता रहा।"
जयशंकर ने यह भी कहा कि 2022 में अमेरिका ने खुद भारत से रूसी तेल खरीदने को कहा था, ताकि वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने में मदद मिल सके।
इसी महीने यूक्रेन दौरे के दौरान रूसी तेल की खरीद को लेकर यूक्रेनी पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा,
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमित पाल चौधरी कहते हैं, “अब आप देख सकते हैं कि रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत की आलोचना करने वाले पश्चिमी देशों के तेवर कुछ नरम पड़े हैं। खासकर अमेरिका के मामले में हम देख रहे हैं कि भारत अपने लिए एक विशेष रास्ता निकालने के लिए बातचीत कर रहा है। भारत अमेरिका से कह रहा है कि अगर आप ऐसा कोई फैसला लेते हैं, तो इस बात को ध्यान में रखें कि इसका असर आपके देश में डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है और वे बढ़ सकती हैं।”

डीजल संकट के बीच भारत क्यों अहम?
दरअसल, अमेरिका में भी डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। वहीं, कई रिपोर्टों के मुताबिक यूरोप सर्दियों के करीब आने के साथ डीजल संकट की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में भारत की बड़ी रिफाइनिंग क्षमता और रूसी कच्चे तेल तक उसकी पहुंच यूरोप के लिए एक महत्वपूर्ण सप्लाई चैनल बनती जा रही है।
इसकी एक वजह यूरोप को मिलने वाली अमेरिकी डीजल सप्लाई में हालिया गिरावट भी है। वॉर्टेक्सा (Vortexa) के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में यूरोप के बाहर से आने वाले समुद्री डीजल आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब आधी रही और उसकी सप्लाई करीब 5.2 लाख बैरल प्रतिदिन थी। लेकिन अगस्त के पहले हिस्से में अमेरिका से यूरोप की सप्लाई करीब 5.4 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने के बाद महीने के दूसरे हिस्से में घटकर करीब 3.5 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई। यानी कुछ ही हफ्तों में अमेरिकी सप्लाई में करीब 35 फीसदी की गिरावट आई।
ऐसे समय में जब अमेरिका से आने वाली सप्लाई कमजोर हो रही है और रूस से डीजल निर्यात भी दबाव में है, यूरोप के लिए भारत जैसे वैकल्पिक सप्लायरों की अहमियत बढ़ जाती है।
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