
भारत में 12-13 सितंबर को BRICS शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। इससे पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के प्रेस सचिव दिमित्री पेस्कोव ने बताया कि 11 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की मुलाकात होगी। पेस्कोव ने BRICS के नए एजेंडे की उन अहम प्राथमिकताओं के भी संकेत दिए, जो सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि पूरे ग्लोबल साउथ में बड़े बदलाव ला सकती हैं।
BRICS अब महज एक क्षेत्रीय मंच नहीं रह गया है। यह तेजी से एक बड़े वैश्विक शक्ति-केंद्र के रूप में उभर रहा है। इसकी अर्थव्यवस्था का आकार अमेरिका और यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था को भी चुनौती दे रहा है। भारत, रूस और चीन की तिकड़ी BRICS को एक नए ग्लोबल पावर सेंटर के तौर पर स्थापित करने में अहम भूमिका निभा रही है।
इस संगठन में अभी भले ही सिर्फ 11 देश हैं, लेकिन इसके फैसलों का असर ग्लोबल साउथ समेत पूरी दुनिया पर होता है। आइए बताते हैं ब्रिक्स 2026 के वो 3 गेमचेंजर पॉइंट, जो इस समिट की प्राथमिकता में हैं और जो गैर-पश्चिमी दुनिया में विकास और उम्मीदों की नई रोशनी ला सकते हैं।
1. अनाज का लेनदेन (Grain exchange)
किसी देश की आर्थिक स्थिति और मजबूती का पहला आधार खाद्य सुरक्षा होता है। ग्लोबल साउथ समेत दक्षिण-पूर्व एशिया में कई देश ऐसे हैं, जहां आज के दौर में भी बड़ी तादाद में लोग भुखमरी के शिकार होते हैं। इसीलिए रूस, भारत और चीन जैसे देशों ने इस बार ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज प्लेटफॉर्म शुरू करने का फैसला किया है। ग्रेन एक्सचेंज मतलब अनाज का लेनदेन। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के प्रेस सेक्रेटरी दिमित्री पेस्कोव ने नई दिल्ली में एक कार्यक्रम में बताया कि यह पहल सिर्फ ब्रिक्स देशों में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाएगी। संबंधित देशों से इस महत्वपूर्ण पहल को लेकर बातचीत की जा रही है।
BRICS ग्रेन एक्सचेंज क्या है?
- ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज रूस की पहल है, जिसे भारत का सबसे मजबूत समर्थन है।
- रूस के अनाज निर्यातक संघ ने 2023 में इसका प्रस्ताव दिया था।
- राष्ट्रपति पुतिन ने मार्च 2024 में इस प्रस्ताव का समर्थन किया।
- कजान में अक्टूबर 2024 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पहली बार यह प्रस्ताव सामने आया।
- ब्रिक्स देशों ने भी इसे अपना आधिकारिक समर्थन दिया।
- इसके बाद 2025 के ब्रिक्स सम्मेलन में सदस्य देशों के कृषि मंत्रियों ने भी इसे सपोर्ट किया।
- भारत की अध्यक्षता में जयपुर में पिछले महीने जयपुर में हुई ब्रिक्स बैठक में इसका ढांचा पेश किया गया।
ये कैसे काम करेगा, फायदा क्या होगा?
- BRICS ग्रेन एक्सचेंज एक डिजिटल ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म है।
- इससे ब्रिक्स देशों के किसान और ग्राहक सीधे एक दूसरे से व्यापार कर सकेंगे।
- पश्चिमी बिचौलियों की वजह से होने वाले नुकसान से बचा जा सकेगा।
- अनाज की कीमतें ब्रिक्स देशों के अंदर आपूर्ति और मांग के अनुसार तय की जाएंगी।
- इसमें गेहूं, मक्का, चावल और अन्य अनाज पर फोकस रहेगा।
- बाद में तेल बीज, फलियां आदि का भी व्यापार शुरू हो सकेगा।
- ये भविष्य का पूरा कमोडिटी एक्सचेंज बनाने का आधार होगा।
- इससे खाद्य सुरक्षा चेन और आपूर्ति को मजबूती मिलेगी।
- कीमतों को स्थिर रखने और महंगाई रोकने में मददगार होगा।
- यह ब्रिक्स देशों को अनाज व्यापार में आत्मनिर्भर बना सकता है।
इससे ब्रिक्स को कैसे मिलेगी मजबूती?
- दुनिया के कुल अनाज उत्पादन की 40-44 फीसदी क्षमता ब्रिक्स देशों के पास है।
- रूस दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक है।
- भारत चावल का बड़ा निर्यातकर्ता है।
- ब्राजील सोयाबीन और मक्का उत्पादन में आगे है।
- चीन इन अनाजों का बड़ा खरीदार है।
2. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)
ब्रिक्स की नई दिल्ली समिट में इस बार एआई को लेकर चर्चा गर्म रहेगी। क्रेमलिन के प्रेस सेक्रेटरी दिमित्री पेस्कोव ने इसके साफ संकेत दिए हैं। शिखर सम्मेलन के सबसे टॉप एजेंडे में इसे शामिल किया जाएगा। यह रूस की महत्वपूर्ण प्राथमिकता में है। भारत और चीन का मुख्य फोकस भी एआई की तरफ है। पूरी दुनिया में एआई को लेकर कंपटीशन बढ़ रहा है। एक तरफ भारत, चीन और रूस जैसे देश खड़े हैं तो दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोप और पश्चिमी देश एआई लीडर बनने की कोशिश में हैं।
एआई भविष्य की जरूरत
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रोफेसर और फॉरेन मामलों के एक्सपर्ट शांतेश कुमार सिंह कहते हैं कि ब्रिक्स में एआई को बढ़ावा देना एक शानदार पहल होगी। यह ब्रिक्स देशों की जरूरत है, क्योंकि अब तक टेक्नोलॉजी या एआई सेक्टर में पश्चिम का ही दबदबा रहा है। मगर चीन, रूस और भारत अब टेक्नोलॉजी के साथ एआई में भी तेजी से विकास कर रहे हैं। तीनों देश मिलकर इसका फायदा ब्रिक्स को दे सकते हैं। इसका फायदा केवल ब्रिक्स देशों को ही नहीं, बल्कि पूरे साउथ को होगा। अब भविष्य एआई का है, जो देश इसमें आगे होगा, वही लीडर बनेगा। ग्लोबल साउथ के सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी हैं। भारत, रूस और चीन अगर एक हो गए तो इससे ब्रिक्स टेक्नोलॉजी में भी ताकतवर हो सकेगा।
AI ब्रिक्स देशों में क्या बदलाव ला सकता है?
- उद्योगों का तेज विकास
- स्मार्ट सिटी को रफ्तार
- कृषि और स्वास्थ्य क्षेत्र को गति
- फाइनेंस, ट्रांसपोर्ट क्षेत्र में बढ़त
- मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा
- सेमीकंडक्टर मैन्यूफैक्चरिंग
- न्यूक्लियर डेटा सेंटर
- स्मार्ट ग्रिड बनाने में
- सटीक पूर्वानुमान के लिए
- स्किल्स बढ़ाने के लिए
- AI चिप्स, सॉफ्टवेयर पर पश्चिमी निर्भरता घटाने में
- एडवांस कंप्यूटिंग के लिए
- एनर्जी टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने में
- न्यूक्लियर एनर्जी में प्लाज्मा कंट्रोल के लिए
- डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती
- टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए
- निर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए
3. न्यूक्लियर एनर्जी
न्यूक्लियर एनर्जी ब्रिक्स का तीसरा गेमचेंजर पॉइंट्स हो सकता है, क्योंकि ऊर्जा मौजूदा समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में छिड़े वैश्विक संघर्षों ने पूरे विश्व में खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा का भारी संकट पैदा किया है। ऐसे में न्यूक्लियर एनर्जी एक अच्छा विकल्प बनकर उभर रहा है। पुतिन के प्रेस सेक्रेटरी पेस्कोव ने कहा कि रूस न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में वर्ल्ड लीडर्स में से एक है और दुनिया भर में नई परमाणु इकाइयों के निर्माण व संचालन में सहयोग कर रहा है। भारत के साथ भी रूस कुडनकुलम में शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। भारत में एक नये परमाणु ऊर्जा केंद्र की स्थापना भी इसमें शामिल है।
परमाणु ऊर्जा से ब्रिक्स को कितना बड़ा फायदा?
प्रोफेसर शांतेश कुमार सिंह कहते हैं कि पूरी दुनिया में ऊर्जा का भारी संकट है। डैम भी अब कई देशों के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। हाल ही में नेपाल बॉर्डर पर सबने देखा कि कितना बड़ा नुकसान हुआ। ऐसे में न्यूक्लियर एनर्जी आगे चलकर सबसे अच्छा, सस्ता और सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
ब्रिक्स देशों को एक वैकल्पिक ऊर्जा की जरूरत महसूस हो रही है, उसमें न्यूक्लियर एनर्जी सबसे ज्यादा फिट बैठती है। इसकी वजह है कि पूरे एशिया में भारत, रूस और चीन जैसे देश न्यूक्लियर एनर्जी में बहुत आगे हैं। यह तीनों देश इसका फायदा ब्रिक्स को भी दे सकते हैं।
रूस को तो न्यूक्लियर एनर्जी का लीडर कहा जाता है। उसकी टेक्नोलॉजी बहुत आगे है। रूस ने दुनिया के कई देशों में न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में बड़ा काम किया है। तमाम देशों को सहयोग किया है। अगर ब्रिक्स देश न्यूक्लियर एनर्जी में भी आत्मनिर्भर हो गए तो उन्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। यह ब्रिक्स के भविष्य की जरूरत है। इससे पश्चिम का दबदबा ब्रिक्स देशों से कम होगा।
न्यूक्लियर एनर्जी ब्रिक्स के लिए क्यों जरूरी?
भारत, रूस, चीन, ब्राजील बड़े ऊर्जा उत्पादक हैं। अब दक्षिण अफ्रीका भी ऊर्जा के क्षेत्र में नये मुकाम हासिल कर रहा है। ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्था के अलावा शहरीकरण व औद्योगिकीकरण को रफ्तार देने के लिए अधिक से अधिक ऊर्जा की जरूरत है। एआई डेटा सेंटरों की संख्या में लगातार बढ़ रही है। उन्हें भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होगी। उनकी ऊर्जा जरूरतों को न्यूक्लियर एनर्जी से पूरा किया जा सकता है। एआई को रफ्तार देने के लिए न्यूक्लियर एनर्जी का होना सबसे ज्यादा जरूरी है।
न्यूक्लियर एनर्जी की खासियत
- कम कार्बन उत्सर्जन
- पर्यावरण के लिए लाभदायक
- सस्ता और सुरक्षित ऊर्जा विकल्प
- इसकी एनर्जी डेंसिटी बहुत हाई होती है।
- थोड़ा सा यूरेनियम भी 1 टन कोयले के बराबर ऊर्जा देता है।
- न्यूक्लियर एनर्जी को लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है।
- एआई के लिए न्यूक्लियर एनर्जी सुरक्षित विकल्प है।
BRICS दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था
ब्रिक्स दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाला संगठन बन गया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स देशों की कुल इकोनॉमी 35.18 ट्रिलियन डॉलर तक है। यह यूरोप से भी बड़ी अर्थव्यवस्था है क्योंकि यूरोप के 50 देशों की अर्थव्यवस्था केवल 32.3 ट्रिलियन डॉलर है। वहीं यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था महज 23 ट्रिलियन डॉलर है। यह अमेरिका की 32.38 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी से भी बड़ी है। इससे ब्रिक्स की ताकत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

BRICS मल्टीपोलर वर्ल्ड का पावर सेंटर
ब्रिक्स को मल्टीपोलर वर्ल्ड का पावर सेंटर भी कहा जा रहा है। रूसी राष्ट्रपति के प्रेस सचिव पेस्कोव ने कहा कि भारत की अध्यक्षता में मल्टीपोलटर वर्ल्ड को ताकत मिल रही है। मल्टीपोलर वर्ल्ड का मतलब बहुध्रुवीय दुनिया से है, जहां किसी एक देश की दादागिरी नहीं चलती, बल्कि कई देश मिलकर काम करते हैं। रूस ने भारत को मल्टीपोलर वर्ल्ड का आधार कहा है। भारत, रूस और चीन मल्टीपोलर वर्ल्ड की सबसे अहम धुरी हैं। इसकी वजह साफ है कि यह तीनों देश अर्थव्यवस्था से लेकर टेक्नोलॉजी और मिलिट्री पावर व न्यूक्लियर क्षेत्र में बहुत आगे हैं।
एक देश की ताकत का दौर खत्म
पेस्कोव ने कहा कि अब सिर्फ एक देश के दबदबे वाली पुरानी व्यवस्था खत्म हो रही है। ऐसे देश अपनी ताकत खो रहे हैं। बावजूद वो पुरानी व्यवस्था, अपनी ताकत वापस पाने के लिए कभी-कभी बहुत गलत तरीके अपना रहे हैं। ऐसे देश की मानसिकता दुनिया की अर्थव्यवस्था, राजनीति, पर्यावरण और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को नुकसान पहुंचा रही है, जो पूरे विश्व के लिए घातक है।
परिवर्तन में भारत का बड़ा रोल
अब दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है, जिसका लीडर ब्रिक्स है। यहां हर देश दूसरे के बराबर है और सभी को अपनी बात कहने का हक है। यहां व्यापार में भी बराबरी का मौका मिलता है। यहां किसी देश पर कोई गैरकानूनी प्रतिबंध या दबाव नहीं लागू किया जा सकता। रूस ने कहा कि हम भारत को ग्लोबल मेजॉरिटी का बड़ा अहम हिस्सा मानते हैं। भारत दुनिया के बड़े बदलावों में योगदान दे रहा है। उम्मीद है, आगे भी ऐसा करता रहेगा और ब्रिक्स को मजबूती देगा।




