
छह महीने के टकराव, अमेरिकी धमकियों और आर्थिक दबाव के बावजूद ईरान को दुनिया से अलग करने की कोशिश कामयाब होती नहीं दिख रही। बिश्केक में SCO ने ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों की निंदा की। रूस खुलकर ईरान के साथ खड़ा है, चीन और BRICS के दूसरे देश अमेरिकी दबाव के बावजूद उससे रिश्ते बनाए हुए हैं और भारत बातचीत के साथ-साथ व्यापार तथा चाबहार बंदरगाह पर सहयोग आगे बढ़ाना चाहता है।
अब राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन में पहुंच रहे हैं। यानी युद्ध ने ईरान की अर्थव्यवस्था को चोट जरूर पहुंचाई, लेकिन अमेरिका उसे कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने में सफल तो नहीं हो सका है। ऐसे में सवाल है कि इस पूरी लड़ाई में भारी कीमत चुकाने के बाद ईरान ने वैश्विक मंच पर आखिर क्या हासिल किया है?
Esmail Baghaei, @IRIMFA_SPOX Spokesperson for the Ministry of Foreign Affairs of the I.R. #Iran:
— Iran in India (@Iran_in_India) September 7, 2026
One of the meetings that President Masoud Pezeshkian held in Bishkek was with the Prime Minister of #India. Our relationship with India is a long-standing, historic and… pic.twitter.com/To8UVIbCGz
SCO में मिला समर्थन, अब BRICS पर नजर
बिश्केक में हुए SCO शिखर सम्मेलन में ईरान को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक समर्थन मिला। सम्मेलन के घोषणापत्र में ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों की स्पष्ट निंदा की गई।
हालांकि उन्होंने ईरान को हुए आर्थिक नुकसान की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके मुताबिक, 'अगर भू-आर्थिक स्थिति को देखें तो युद्ध का ईरान और उसकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ा है।'
अब पेजेश्कियान BRICS के मंच पर पहुंच रहे हैं। यहां ईरान की कोशिश केवल राजनीतिक समर्थन जुटाने की नहीं, बल्कि व्यापार, भुगतान व्यवस्था और संपर्क परियोजनाओं में ठोस सहयोग हासिल करने की होगी।
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ईरानी लोगों के साथ खड़े हैं- रूस
❗️Putin Tells Iran President Pezeshkian That Russians 'Stand In Solidarity' With His People & 'Admire Their Courage & Steadfastness' pic.twitter.com/SHoem25rIJ
— RT_India (@RT_India_news) September 1, 2026
SCO सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पेजेश्कियान से मुलाकात में कहा कि रूस ईरान के लोगों के साथ मजबूती और एकजुटता से खड़ा है। उन्होंने ईरानी जनता के साहस और दृढ़ता की भी तारीफ की। यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि अमेरिका ईरान पर दबाव बढ़ाकर उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग करना चाहता था। इसके उलट रूस और चीन जैसे बड़े देश उसके साथ संवाद और सहयोग बनाए हुए हैं।
अर्थशास्त्री राजीव कुमार ने RT इंडिया से कहा था, 'रूस, चीन और BRICS के दूसरे देश अमेरिकी दबाव में आने के बजाय अपने गठबंधनों और संगठनों के तय दायरे में काम जारी रखेंगे।'
Despite Washington’s Threats, It Will Remain 'Very Limited Scenario’ - Economist @RajivKumar1 on US Message to Back Iran Isolation Campaign
— RT_India (@RT_India_news) August 21, 2026
Russia, China, and other countries within BRICS are likely to ‘continue working through their own alliances and organisational mandates… pic.twitter.com/Vi2x0S0SiY
उनके मुताबिक अमेरिका की धमकियों के बावजूद ईरान को अलग-थलग करने के अभियान का असर बहुत सीमित रहने की संभावना है।
उनके मुताबिक अमेरिका की धमकियों के बावजूद ईरान को अलग-थलग करने के अभियान का असर “बहुत सीमित” रहने की संभावना है।
भारत ने भी अमेरिकी दबाव से अलग रास्ता चुना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने बिश्केक में पश्चिम एशिया के टकराव पर चर्चा की थी। मोदी ने भारत का रुख दोहराते हुए कहा कि सभी मुद्दों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए। भारत ने ईरान से दूरी बनाने के बजाय उसे BRICS और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग का भरोसा दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने पेजेश्कियान से कहा कि वह नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के लिए उनका स्वागत करने को उत्सुक हैं।
❗🇮🇳🤝🇮🇷 PM Modi Looks Forward To Welcoming Iran’s Pezeshkian For BRICS India
— RT_India (@RT_India_news) August 31, 2026
The two leaders also discussed the escalating West Asia conflict, with PM Modi reiterating India’s position that all issues must be resolved through “dialogue and diplomacy.” https://t.co/9H6YPq40anpic.twitter.com/zvK9pyDdOz
राजीव कुमार ने भारत के रुख पर कहा, 'चाहे कुछ भी हो, भारत अपने राष्ट्रीय हित में रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखेगा।' इसका अर्थ है कि भारत ईरान के साथ अपने संबंधों का फैसला अमेरिकी दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और अपने आर्थिक हितों के अनुसार करेगा।
ईरान के लिए भारत क्यों अहम?
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने BRICS सम्मेलन से पहले भारत को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक केंद्र बताया है। ईरानी दूतावास के अनुसार बघाई ने कहा, 'भारत के साथ हमारे संबंध पुराने, ऐतिहासिक और सभ्यतागत हैं। हम इन संबंधों को बहुत महत्व देते हैं।' उन्होंने कहा कि ईरान BRICS सम्मेलन से मिले अवसर का इस्तेमाल भारत के साथ साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाने में करेगा।
ईरान की नजर खास तौर पर तीन क्षेत्रों पर है-
- भारत के साथ व्यापार और आर्थिक सहयोग बढ़ाना
- स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन के रास्ते मजबूत करना
- चाबहार बंदरगाह और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं को आगे बढ़ाना
बघाई ने चाबहार बंदरगाह को दोनों देशों के लिए जरूरी बताया। ईरान चाहता है कि BRICS सम्मेलन के दौरान इस परियोजना और व्यापार से जुड़े दूसरे मुद्दों पर ठोस प्रगति हो।
डॉलर के दबाव का विकल्प खोज रहा BRICS
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के मुताबिक रूस का BRICS, SCO और यूरेशियन आर्थिक परिषद के देशों के साथ 97 प्रतिशत व्यापार अब राष्ट्रीय मुद्राओं में होता है।
ईरान के लिए यह व्यवस्था बेहद अहम हो सकती है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण डॉलर आधारित भुगतान और वैश्विक बैंकिंग प्रणाली तक उसकी पहुंच सीमित है। राष्ट्रीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ने से ईरान को प्रतिबंधों के असर को कुछ हद तक कम करने का रास्ता मिल सकता है।
लेकिन BRICS में ईरान पर पूरी सहमति नहीं
ईरान को BRICS से समर्थन मिल सकता है, लेकिन संगठन के सभी सदस्य उसके रुख से सहमत नहीं हैं। रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने TASS से कहा कि BRICS के भीतर कुछ देश ईरान की हालिया गतिविधियों को लेकर कड़ा आलोचनात्मक रुख रखते हैं।
रयाबकोव के मुताबिक, 'खाड़ी क्षेत्र की स्थिति इस समय BRICS सदस्यों के सामने सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा है।'
उन्होंने माना कि नेताओं की बैठक और संयुक्त घोषणापत्र तैयार करते समय ईरान के सवाल पर लंबी चर्चा हो सकती है। अंतिम दस्तावेज में ईरान को कितना और किस तरह का समर्थन मिलेगा, इसका अनुमान अभी नहीं लगाया जा सकता।
आखिर ईरान को क्या हासिल हुआ?
ईरान को अभी युद्ध से राहत या प्रतिबंधों से मुक्ति नहीं मिली है। उसकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव बना हुआ है और होर्मुज क्षेत्र की बुनियादी स्थिति में भी कोई निर्णायक बदलाव नहीं आया। लेकिन कूटनीतिक स्तर पर वह तीन बड़ी उपलब्धियां जरूर दिखा सकता है।
पहली, अमेरिका उसे वैश्विक मंचों से बाहर नहीं कर पाया। दूसरी, SCO ने उस पर हुए हमलों की निंदा की और रूस ने खुलकर एकजुटता दिखाई। तीसरी, BRICS उसे व्यापार, राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान और भारत के साथ चाबहार जैसे रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने का मंच दे रहा है।
इसलिए नई दिल्ली में पेजेश्कियान की मौजूदगी केवल एक सम्मेलन में भागीदारी नहीं होगी। यह संदेश भी होगा कि सैन्य और आर्थिक दबाव के बावजूद ईरान के लिए दुनिया के बड़े गैर-पश्चिमी मंचों के दरवाजे अभी बंद नहीं हुए हैं।




