SCO के बाद BRICS में आ रहे पेजेश्कियान: अमेरिका ने पूरा जोर लगाया फिर भी ईरान को अलग-थलग क्यों न कर सका?
अमेरिकी दबाव और आर्थिक नुकसान के बावजूद ईरान वैश्विक मंच पर अलग-थलग नहीं पड़ा है। SCO से समर्थन मिलने के बाद राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान अब BRICS सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आ रहे हैं। इसका मतलब साफ है कि अमेरिका के हमले भी ईरान को दुनिया से काटने में नाकाम ही रहे हैं।
SCO के बाद BRICS में आ रहे पेजेश्कियान: अमेरिका ने पूरा जोर लगाया फिर भी ईरान को अलग-थलग क्यों न कर सका?
ईरान पर अमेरिकी दबाव का कोई असर होता नहीं दिख रहा है।RT

छह महीने के टकराव, अमेरिकी धमकियों और आर्थिक दबाव के बावजूद ईरान को दुनिया से अलग करने की कोशिश कामयाब होती नहीं दिख रही। बिश्केक में SCO ने ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों की निंदा की। रूस खुलकर ईरान के साथ खड़ा है, चीन और BRICS के दूसरे देश अमेरिकी दबाव के बावजूद उससे रिश्ते बनाए हुए हैं और भारत बातचीत के साथ-साथ व्यापार तथा चाबहार बंदरगाह पर सहयोग आगे बढ़ाना चाहता है।

अब राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन में पहुंच रहे हैं। यानी युद्ध ने ईरान की अर्थव्यवस्था को चोट जरूर पहुंचाई, लेकिन अमेरिका उसे कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने में सफल तो नहीं हो सका है। ऐसे में सवाल है कि इस पूरी लड़ाई में भारी कीमत चुकाने के बाद ईरान ने वैश्विक मंच पर आखिर क्या हासिल किया है?

SCO में मिला समर्थन, अब BRICS पर नजर

बिश्केक में हुए SCO शिखर सम्मेलन में ईरान को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक समर्थन मिला। सम्मेलन के घोषणापत्र में ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों की स्पष्ट निंदा की गई।

डॉ. मोहम्मद मुद्दस्सिर कमर
बिश्केक घोषणापत्र में ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों की बेहद स्पष्ट शब्दों में निंदा की गई। इससे साफ है कि ईरान दुनिया में अकेला नहीं पड़ा है।
डॉ. मोहम्मद मुद्दस्सिर कमर
डॉ. मोहम्मद मुद्दस्सिर कमर
पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ

हालांकि उन्होंने ईरान को हुए आर्थिक नुकसान की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके मुताबिक, 'अगर भू-आर्थिक स्थिति को देखें तो युद्ध का ईरान और उसकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ा है।'

अब पेजेश्कियान BRICS के मंच पर पहुंच रहे हैं। यहां ईरान की कोशिश केवल राजनीतिक समर्थन जुटाने की नहीं, बल्कि व्यापार, भुगतान व्यवस्था और संपर्क परियोजनाओं में ठोस सहयोग हासिल करने की होगी।

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ईरानी लोगों के साथ खड़े हैं- रूस

SCO सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पेजेश्कियान से मुलाकात में कहा कि रूस ईरान के लोगों के साथ मजबूती और एकजुटता से खड़ा है। उन्होंने ईरानी जनता के साहस और दृढ़ता की भी तारीफ की। यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि अमेरिका ईरान पर दबाव बढ़ाकर उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग करना चाहता था। इसके उलट रूस और चीन जैसे बड़े देश उसके साथ संवाद और सहयोग बनाए हुए हैं।

अर्थशास्त्री राजीव कुमार ने RT इंडिया से कहा था, 'रूस, चीन और BRICS के दूसरे देश अमेरिकी दबाव में आने के बजाय अपने गठबंधनों और संगठनों के तय दायरे में काम जारी रखेंगे।'

उनके मुताबिक अमेरिका की धमकियों के बावजूद ईरान को अलग-थलग करने के अभियान का असर बहुत सीमित रहने की संभावना है।

उनके मुताबिक अमेरिका की धमकियों के बावजूद ईरान को अलग-थलग करने के अभियान का असर “बहुत सीमित” रहने की संभावना है।

भारत ने भी अमेरिकी दबाव से अलग रास्ता चुना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने बिश्केक में पश्चिम एशिया के टकराव पर चर्चा की थी। मोदी ने भारत का रुख दोहराते हुए कहा कि सभी मुद्दों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए। भारत ने ईरान से दूरी बनाने के बजाय उसे BRICS और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग का भरोसा दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने पेजेश्कियान से कहा कि वह नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के लिए उनका स्वागत करने को उत्सुक हैं।

राजीव कुमार ने भारत के रुख पर कहा, 'चाहे कुछ भी हो, भारत अपने राष्ट्रीय हित में रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखेगा।' इसका अर्थ है कि भारत ईरान के साथ अपने संबंधों का फैसला अमेरिकी दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और अपने आर्थिक हितों के अनुसार करेगा।

ईरान के लिए भारत क्यों अहम?

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने BRICS सम्मेलन से पहले भारत को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक केंद्र बताया है। ईरानी दूतावास के अनुसार बघाई ने कहा, 'भारत के साथ हमारे संबंध पुराने, ऐतिहासिक और सभ्यतागत हैं। हम इन संबंधों को बहुत महत्व देते हैं।' उन्होंने कहा कि ईरान BRICS सम्मेलन से मिले अवसर का इस्तेमाल भारत के साथ साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाने में करेगा।

ईरान की नजर खास तौर पर तीन क्षेत्रों पर है-

  • भारत के साथ व्यापार और आर्थिक सहयोग बढ़ाना
  • स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन के रास्ते मजबूत करना
  • चाबहार बंदरगाह और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं को आगे बढ़ाना

बघाई ने चाबहार बंदरगाह को दोनों देशों के लिए जरूरी बताया। ईरान चाहता है कि BRICS सम्मेलन के दौरान इस परियोजना और व्यापार से जुड़े दूसरे मुद्दों पर ठोस प्रगति हो।

डॉलर के दबाव का विकल्प खोज रहा BRICS

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के मुताबिक रूस का BRICS, SCO और यूरेशियन आर्थिक परिषद के देशों के साथ 97 प्रतिशत व्यापार अब राष्ट्रीय मुद्राओं में होता है।

रूस के विदेश मंत्री
डॉलर को दबाव और ब्लैकमेल के हथियार के रूप में इस्तेमाल होने से रोकने के कई विकल्प मौजूद हैं।
सर्गेई लावरोव
सर्गेई लावरोव
रूस के विदेश मंत्री

ईरान के लिए यह व्यवस्था बेहद अहम हो सकती है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण डॉलर आधारित भुगतान और वैश्विक बैंकिंग प्रणाली तक उसकी पहुंच सीमित है। राष्ट्रीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ने से ईरान को प्रतिबंधों के असर को कुछ हद तक कम करने का रास्ता मिल सकता है।

लेकिन BRICS में ईरान पर पूरी सहमति नहीं

ईरान को BRICS से समर्थन मिल सकता है, लेकिन संगठन के सभी सदस्य उसके रुख से सहमत नहीं हैं। रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने TASS से कहा कि BRICS के भीतर कुछ देश ईरान की हालिया गतिविधियों को लेकर कड़ा आलोचनात्मक रुख रखते हैं।

रयाबकोव के मुताबिक, 'खाड़ी क्षेत्र की स्थिति इस समय BRICS सदस्यों के सामने सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा है।'

उन्होंने माना कि नेताओं की बैठक और संयुक्त घोषणापत्र तैयार करते समय ईरान के सवाल पर लंबी चर्चा हो सकती है। अंतिम दस्तावेज में ईरान को कितना और किस तरह का समर्थन मिलेगा, इसका अनुमान अभी नहीं लगाया जा सकता।

आखिर ईरान को क्या हासिल हुआ?

ईरान को अभी युद्ध से राहत या प्रतिबंधों से मुक्ति नहीं मिली है। उसकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव बना हुआ है और होर्मुज क्षेत्र की बुनियादी स्थिति में भी कोई निर्णायक बदलाव नहीं आया। लेकिन कूटनीतिक स्तर पर वह तीन बड़ी उपलब्धियां जरूर दिखा सकता है।

पहली, अमेरिका उसे वैश्विक मंचों से बाहर नहीं कर पाया। दूसरी, SCO ने उस पर हुए हमलों की निंदा की और रूस ने खुलकर एकजुटता दिखाई। तीसरी, BRICS उसे व्यापार, राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान और भारत के साथ चाबहार जैसे रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने का मंच दे रहा है।

इसलिए नई दिल्ली में पेजेश्कियान की मौजूदगी केवल एक सम्मेलन में भागीदारी नहीं होगी। यह संदेश भी होगा कि सैन्य और आर्थिक दबाव के बावजूद ईरान के लिए दुनिया के बड़े गैर-पश्चिमी मंचों के दरवाजे अभी बंद नहीं हुए हैं।

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