
भारत ने ओलंपिक के हॉकी इवेंट में आखिरी बार गोल्ड कब जीता था? शायद 5 साल पहले या 10 साल पहले...कईयों का अनुमान यही होगा, पर जवाब है ना…
ओलंपिक में भारत को हॉकी में अपना आखिरी गोल्ड मेडल 1980 मॉस्को ओलंपिक में मिला था। तब से भारतीय हॉकी टीम के खिलाड़ी बदले, ड्रेस बदली, कई खिलाड़ियों ने संन्यास लिया तो कई नए जुड़े पर इन 46 सालों में भारत के हाथ ओलंपिक में गोल्ड मेडल नहीं आया।
2024 पेरिस ओलंपिक और 2020 टोक्यो ओलंपिक में टीम को ब्रॉन्ज से ही संतोष करना पड़ा है। पर बात आज 1980 में रूस की राजधानी मॉस्को में हुए ओलंपिक गेम्स की होगी। तब आज का रूस और उसकी राजधानी मॉस्को USSR यानी सोवियत संघ का हिस्सा थे। अफगानिस्तान में USSR की सैन्य कार्रवाई के चलते अमेरिका के साथ 60 से अधिक देशों ने बहिष्कार किया था। ध्यान देने वाली बात ये है कि पाकिस्तान ने भी इस ओलंपिक में हिस्सा नहीं लिया था।

1928 में अपना पहला गोल्ड जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के लिए यूं तो इतने देशों के गेम से बाहर होने के बाद जीतने की राह आसान थी पर एक रोड़ा था। मॉस्को ओलंपिक में जिस ग्राउंड पर भारत को खेलना था, टीम उसके लिए बहुत कम अभ्यस्त थी। ऐसे में मॉस्को में न सिर्फ टीम ने इस नए तरीके के टर्फ पर प्रैक्टिस की बल्कि गोल्ड मेडल भी जीता। तब टीम के पास कई होनहार खिलाड़ी थे, लेकिन उनके पास अंतरराष्ट्रीय मैचों का अनुभव कम था। ऐसे में खिलाफ होती परिस्थितियों के बीच भारत के दोस्त देश रूस में कैसे टीम इंडिया ने तिंरगा झंडा फहराया, आज उसी की कहानी बताते हैं।

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ओलंपिक 1980 से पहले भारतीय टीम कितनी मजबूत थी?
- आजादी के बाद के शुरुआती सालों में भारतीय हॉकी टीम का ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतना लगभग तय माना जाता था
- भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने 1948(स्वतंत्र भारत का पहला गोल्ड), 1952 और 1956 में लगातार तीन गोल्ड मेडल जीते थे
- इसके बाद 1960 के ओलंपिक फाइनल में पाकिस्तान ने भारत के इस सिलसिले को तोड़ दिया
- 1964 में भारत ने अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान को हराकर फिर से खिताब अपने नाम कर लिया था
- 1968 और 1972 के ओलंपिक में भारत को सिर्फ ब्रॉन्ज मेडल से ही संतोष करना पड़ा
- 1976 में तो टीम सातवें नंबर पर आ गई, जो उस समय उसका सबसे खराब प्रदर्शन था

भारत के सामने एक मुश्किल थी
भारत के सामने बड़ी मुश्किल थी वहां के हॉकी के लिए तैयार किया गया मैदान। भारतीय टीम जिस पारंपरिक घास वाले ग्राउंड पर खेलती थी, ये उससे अलग एस्ट्रोटर्फ था जिसे सिंथेटिक टर्फ भी कहते हैं। 1976 के ओलंपिक में ये पहली बार प्रयोग में लाई गई और तब न्यूजीलैंड विजेता बना था।
इस बारे में हमने 1980 मॉस्को ओलंपिक्स में उस विजेता टीम का अहम हिस्सा रहे जफर इकबाल से खास बातचीत की।

RT हिंदी से बातचीत में एस्ट्रो टर्फ की चुनौती पर जफर इकबाल ने बताया,
’हिंदुस्तान में ऐसे एस्ट्रो टर्फ या कहें सिंथेटिक टर्फ के चलते हमारे लिए ये चुनौती ही थी। हम सिर्फ ये सोचकर गए थे कि बड़ा तेज ग्राउंड होगा। ओलंपिक्स से पहले पंजाब के पटियाला में कैंप लगा था, जहां ये सलाह दी गई कि फील्ड को चिकना कर दें और घास को एकदम साफ करके गोबर लीप दें। जब हम मॉस्को पहुंचे तो पता लगा कि ये तो कुछ अलग है हालांकि बाद में हम इसपर खेलने के आदी हो गए।’
‘USSR हमारे साथ और मैच खेलना चाहता था’
पूर्व हॉकी प्लेयर जफर इकबाल ने बताया,
'मॉस्को ओलंपिक्स से पहले तब के USSR और भारत के बीच कई मैच हुए थे। मुझे याद है कि वो हमारे साथ और मैच खेलना चाहते थे। उनकी टीम बहुत अच्छी थी पर वो हमसे सीखना चाहते थे। हमें रूस जाना ऐसा लगता था जैसे हम किसी पड़ोसी से मिलने जा रहे हों। हमें प्री ओलंपिक्स का फायदा मिला क्योंकि इसी एस्ट्रो टर्फ पर हमें पहले थोड़ा ही सही प्रैक्टिस करने को मिल गया था।'

सोवियत संघ का मैदान और भारत के हिस्से आया गोल्ड
1976 के बाद ऐसे टर्फ पर भारतीय हॉकी टीम को प्रैक्टिस करनी पड़ी थी। कमाल की बात ये है कि भारतीय टीम ने जिस सोवियत संघ के मैदान में एस्ट्रोटर्फ पर अभ्यास किया, उसी USSR को उसने हराकर ओलंपिक्स से बाहर कर दिया था। तब कह सकते हैं कि जिस सोवियत संघ की एस्ट्रोटर्फ पर भारत ने खुद को तपाया, अपने अभियान की शुरुआत की, वहीं से टीम इंडिया गोल्ड लेकर लौटी।

हॉकी कप्तान ने भरा था जोश
1980 के समर ओलंपिक के लिए चुनी गई भारतीय हॉकी टीम के पास कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय मैचों का बहुत ज्यादा अनुभव नहीं था। टीम में केवल जफर इकबाल, मर्विन फर्नांडीस, एम.एम.सोमाया, बीर बहादुर छेत्री और कप्तान वासुदेवन भास्करन ही ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने विदेशी टीमों के खिलाफ मुकाबले खेले थे।

टीम में कई युवा खिलाड़ी शामिल थे इसलिए कप्तान भास्करन को लगा कि भारत से रवाना होने से पहले टीम का हौसला और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उन्हें कुछ अलग प्रेरणा की जरूरत है। उन्होंने ये बात खुद एक निजी चैनल से बताई थी।

मॉस्को ओलंपिक में भारत के कप्तान वासुदेव भास्करन ने निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में बताया था,
'हमारी टीम बहुत भाग्यशाली थी कि फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ खुद हमसे बात करने आए थे। वह दो बार हमसे मिलने आए और उन्होंने ओलंपिक के लक्ष्य पर बात की। यहीं से इस प्रेरणा की शुरुआत हुई।'
मानेकशॉ की बातों का टीम पर गहरा असर दिखा। इसके बाद भारतीय कप्तान ने पूर्व ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट और चयनकर्ता लेस्ली क्लॉडियस और मुनिस्वामी राजगोपाल से भी गुजारिश की कि वे खिलाड़ियों को अपनी पुरानी जीतों के किस्से सुनाए। इन मुलाकातों और बातचीत ने सचमुच टीम के मनोबल पर बहुत गहरा और पॉजिटिव असर डाला।

मॉस्को ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम की प्लेइंग स्क्वॉड
- वासुदेवन भास्करन (कप्तान)
- बीर बहादुर छेत्री
- एलन स्कोफील्ड
- सिल्वेनस डुंग डुंग
- राजिंदर सिंह
- दविंदर सिंह
- गुरमेल सिंह
- रविंदर पाल सिंह
- एम.एम.सोमाया
- महाराज कृष्ण कौशिक
- चरणजीत कुमार
- मर्विन फर्नांडीस
- अमरजीत सिंह राणा
- मोहम्मद शाहिद
- जफर इकबाल
- सुरिंदर सिंह सोढ़ी

मॉस्को ओलंपिक में भारत की जीत का सफर
- 1980 के ओलंपिक में हॉकी खेलने वाली सिर्फ छह टीमें थीं
- पहले 12 टीमों को दो ग्रुपों में बांटकर मैच कराने की योजना थी
- सोवियत संघ से नाराज देशों ने नाम वापस ले लिया, जिस वजह से इसे रद्द करना पड़ा
- टूर्नामेंट में भारत, स्पेन, पोलैंड, क्यूबा, तंजानिया और मेजबान सोवियत संघ ने ही हिस्सा लिया था
- अपने पहले मैच में भारत ने तंजानिया को एकतरफा मुकाबले में 18-0 से करारी शिकस्त दी
- इसके बाद अगले दो मैचों में भारत ने पोलैंड और स्पेन दोनों के खिलाफ 2-2 से ड्रॉ खेला
- पोलैंड के खिलाफ मैच भारत के लिए एक तरह से बड़ा झटका था, क्योंकि आखिरी पलों में भारतीय टीम ने ढेरों मौके गंवाए, खुद कप्तान भास्करन भी पेनल्टी स्ट्रोक चूक गए थे
- यूरोपीय चैंपियन स्पेन के खिलाफ हुए ड्रॉ मुकाबले ने टीम के खोए हुए आत्मविश्वास को फिर से जगा दिया

- इसके बाद भारत ने कमजोर मानी जा रही क्यूबा की टीम को 13-0 से हराकर सेमीफाइनल में अपनी जगह पक्की की।
- अंतिम चार के लिए मेजबान सोवियत संघ के खिलाफ मुकाबले की तैयारी के लिए भारतीय टीम ने अपनी रणनीति बदलने का फैसला किया।
- टीम ने इनडायरेक्ट पेनल्टी कॉर्नर आजमाने का फैसला किया। इसे समझने किए खूब सारे वीडियोज देखे।
- टीम की यह रणनीति पूरी तरह काम कर गई। भारत ने मेजबान टीम को 4-2 से मात दी और पूरे आत्मविश्वास के साथ फाइनल में कदम रखा।
29 जुलाई 1980: फाइनल में टीम ने रचा इतिहास
- फाइनल मैच भारत और स्पेन के बीच था। भारत ने शानदार शुरुआत की और सुरिंदर सिंह सोढ़ी के दो गोलों व एम. के. कौशिक के एक गोल की मदद से 3-0 की मजबूत बढ़त बना ली। स्पेन के दिग्गज खिलाड़ी जुआन अमात ने लगातार गोल दागकर वापसी की और स्कोर 3-2 कर दिया।
- खेल के 58वें मिनट में मोहम्मद शाहिद ने एक शानदार फील्ड गोल दागकर भारत की बढ़त 4-2 कर दी। मैच समाप्त होने से कुछ मिनट पहले जुआन अमात ने अपनी हैट्रिक पूरी की और स्कोर 4-3 हो गया। अंतिम मिनटों में स्पेन को पेनल्टी कॉर्नर मिला, लेकिन भारतीय डिफेंस विशेषकर सिल्वानस डुंगडुंग और गोलकीपर बीर बहादुर छेत्री ने गेंद को रोककर 4-3 की जीत पर मुहर लगा दी।
- इस तरह 1964 के बाद भारत के हिस्से 1980 में हॉकी में गोल्ड मेडल आया। ये उसका अंतिम गोल्ड मेडल था,तब से 4 दशक बीत चुके हैं पर भारतीय हॉकी टीम सिर्फ कांस्य पदक से संतोष करती आ रही है।
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