
YouTube के सर्च बॉक्स में जाइए, और टाइप कीजिए- Women’s Pole Vault या Women’s Long Jump, Women’s Gymnastics, Women’s Tennis…
सर्च रिजल्ट में आपको सबसे पहले किसी महान एथलेटिक उपलब्धियों के वीडियो नहीं मिलेंगे। इसके बजाय, सर्च रिजल्ट्स में ऐसे सैकड़ों वीडियो दिखाई देंगे, जिसमें स्लो-मोशन, चेंजओवर (गेम के बीच ब्रेक) के दौरान बार-बार खिलाड़ियों के क्लोज-अप, ड्रेस, अलग-अलग बॉडी पार्ट्स के जूम-इन शॉट्स की बाढ़ दिखेगी। जो चटपटे गानों के साथ अपलोड किए गए हैं, और इन पर मिलियन व्यूज हैं।
ये सर्च रिजल्ट मात्र वीडियो नहीं हैं, ये महिला खिलाड़ियों को इवेंट के दौरान कैसे दिखाया जाता है, उस सोच का नतीजा है।
यहां बहस अब महिला खिलाड़ियों के कपड़ों पर नहीं, बल्कि कैमरे के एंगल, एडिटिंग के फैसलों और उस नजरिए पर है, जिसके जरिए महिला खिलाड़ियों को दुनिया के सामने पेश किया जाता है।
ग्राउंड पर लगे इन्हीं कैमरों में कैद की गई ये फुटेज, एडिटिंग टेबल से गुजरकर आपकी टीवी स्क्रीन, फिर सोशल मीडिया और ऑनलाइन दुनिया तक पहुंच जाती है।
इसके बाद एक अलग चर्चा शुरू हो जाती है। अलग-अलग टिप्पणियां, अलग-अलग नजरिया और अलग-अलग इमेज बन जाती है।
ये पूरी प्रॉसेस मॉडर्न स्पोर्ट्स मीडिया ब्रॉडकास्ट का एक भद्दा और असहज करने वाला सच है।
यह चर्चा उस समय फिर तेज हो गई, जब कुछ समय पहले यूरोपियन एथलेटिक्स और यूरोपियन ब्रॉडकास्टिंग यूनियन (EBU) ने महिला खिलाड़ियों के मैचों के प्रसारण के दौरान कैमरा एंगल और रिप्ले के इस्तेमाल से होने वाले सेक्सुअलाइजेशन को रोकने के लिए गाइडलाइन्स जारी कीं।
दरअसल, दशकों से महिला एथलीट एक ऐसी हकीकत के साथ मैदान में उतरती रही हैं, जहां उन्हें सिर्फ प्रतिद्वंद्वियों का ही नहीं, बल्कि कैमरों का भी सामना करना पड़ता है। उन्हें यह एहसास रहता है कि किसी कैमरा ऑपरेटर का लेंस उनके गेम पर नहीं, बल्कि उनके शरीर के किसी हिस्से पर टिका हो सकता है।
EBU के नए नियम चर्चा में क्यों?
EBU ने इस फैसले से पहले, कई महिला ओलंपियन खिलाड़ियों से भी बात की और कैमरा कवरेज को लेकर उनके अनुभव इकट्ठा किए।
ओलंपिक पदक विजेता और पोल वॉल्टर होली ब्रैडशॉ (Holly Bradshaw) ने खुलकर कहा कि कई बार कैमरों की अनुचित पोजिशनिंग उनके प्रदर्शन को सीधे प्रभावित करती है।

सालों तक खेल प्रसारण में कुछ कैमरा एंगल लगभग “डिफॉल्ट” बन गए। पोल वॉल्ट से ठीक पहले पीछे से लिया गया लो-एंगल शॉट, स्ट्रेचिंग या अपनी बारी का इंतजार कर रही खिलाड़ी के शरीर पर लॉन्ग क्लोज-अप, या फिर लॉन्ग जंप के बाद रेत में उतरने के स्लो-मोशन रिप्ले, जिनमें कैमरा बार-बार शरीर के एक ही हिस्से पर टिका रहता है।
जब मैदान पर महिला खिलाड़ियों की कवरेज और उनके विजुअल सेक्सुअलाइजेशन की बात आती है, तो भारतीय एथलीटों की चिंताएं भी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से अलग नहीं हैं। RT हिंदी ने विश्व जूनियर एथलेटिक्स चैम्पियनशिप 2022 की प्रतिभागी और 6 बार की नेशनल मेडलिस्ट भारतीय एथलीट रचना से बात की। रचना ने बातचीत में खेल मीडिया और सोशल मीडिया के उस कड़वे सच को उजागर किया, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
रचना बताती हैं कि प्रतिस्पर्धा के मैदान पर ही नहीं, ट्रेनिंग के दौरान भी महिला एथलीटों को असहज नजरों का सामना करना पड़ता है।

रचना ने लाइव टीवी ब्रॉडकास्ट से फुटेज काटकर सोशल मीडिया पर घटिया मीम्स और रील्स बनाने के चलन पर भी चिंता जताई।
“मैं खुद सोशल मीडिया पर कम सक्रिय रहती हूं, लेकिन जब अन्य महिला खिलाड़ियों की क्लिप्स को गलत संदर्भ में इस्तेमाल करके उन्हें ट्रोल होते देखती हूं, तो बहुत अनकंफर्टेबल फील होता है। यह बात मन में डर पैदा करती है कि कल को अगर मुझे अपने खेल की जरूरत के हिसाब से शॉर्ट ड्रेसेज पहनकर वर्कआउट करना है, तो मेरी फुटेज का किस तरह गलत इस्तेमाल किया जाएगा।”

विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ट्रैक एंड फील्ड जैसे खेलों में खिलाड़ियों के आउटफिट फैशन के लिए नहीं, बल्कि परफॉरमेंस के लिए बनाए जाते हैं। ये कपड़े बेहतर एयरोडायनामिक क्षमता, शरीर को ठंडा रखने और पूरी फ्रीडम के साथ मूवमेंट सुनिश्चित करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं इसलिए किसी खिलाड़ी के आउटफिट को उसकी अनावश्यक कैमरा कवरेज का आधार नहीं बनाया जा सकता।
महिला खिलाड़ियों की चिंता सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं रहती। कैमरे में कैद कुछ शॉट्स बाद में सोशल मीडिया पर अलग संदर्भ में वायरल हो जाते हैं, जिससे उन्हें आपत्तिजनक टिप्पणियों, ट्रोल और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है। इस पर होली ब्रैडशॉ कहती हैं-
"मैंने खुद सोशल मीडिया पर अभद्र टिप्पणियों का सामना किया है। मैंने अपने और साथी खिलाड़ियों के ऐसे वीडियो भी इंटरनेट पर देखे हैं, जिन्हें प्रतियोगिता के दौरान रिकॉर्ड किए गए स्लो-मोशन फुटेज से निकालकर गलत तरीके से शेयर किया गया।"
खिलाड़ी सिर्फ उस खेल का आनंद लेना चाहते हैं, जिससे वे प्यार करते हैं। उन्हें यह चिंता या असहजता नहीं होनी चाहिए कि लाइव ब्राडकास्टिंग में दिखाया जा रहा फुटेज बाद में किस तरह इस्तेमाल किया जाएगा।’
EBU ने कैमरा नियमों में क्या बदलाव किए?
EBU की ताजा गाइडलाइंस के तहत प्रसारण टीमों को तुरंत ये कदम उठाने की सलाह दी गई है-
1. कैमरे की पोजिशनिंग
प्रतियोगिता शुरू होने से पहले कैमरों की लोकेशन इस तरह तय की जाए कि उन्हें लैंडिंग पिट, स्टार्टिंग ब्लॉक या हाई जंप बार के ठीक पीछे और जमीन के स्तर पर न लगाया जाए। जरूरत पड़ने पर कैमरों को ऊंचाई पर या साइड एंगल पर सेट किया जाए।
2. ‘वाइड-फर्स्ट’ कैमरा अप्रोच
खिलाड़ी की गतिविधि को रिकॉर्ड करते समय ऐसे शॉट्स को प्राथमिकता दी जाए, जो पूरे मूवमेंट और तकनीक को दिखाए। शरीर के किसी विशेष हिस्से पर अनावश्यक क्लोज-अप या टाइट जूम से बचा जाए।
3. स्लो-मोशन रिप्ले की सख्त नीति
कंट्रोल रूम के डायरेक्टर हर स्लो-मोशन रिप्ले की तुरंत समीक्षा करें। अगर कोई रिप्ले खिलाड़ी की तकनीक, छलांग, थ्रो या दौड़ को समझाने में मदद नहीं करता, तो उसे प्रसारित न किया जाए।
4. सभी खिलाड़ियों से समान व्यवहार
महिला खिलाड़ियों की कवरेज भी उसी नजरिए से की जाए, जैसे पुरुष खिलाड़ियों की- यानी फोकस उनकी ताकत, गति, तकनीक और प्रदर्शन पर हो, न कि उनके शरीर या पहनावे पर।

कैमरा एंगल की बहस सिर्फ एक देश की नहीं
महिला खिलाड़ियों की फिल्मिंग को लेकर कैमरा एंगल की बहस सिर्फ यूरोप या पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है। भारत में भी समय-समय पर यह मुद्दा चर्चा में रहा है। क्रिकेट मैचों के दौरान स्टैंड्स में बैठी महिला दर्शकों पर कैमरे का बार-बार फोकस करना फिर उन वीडियो का सोशल मीडिया पर वायरल होना अब आम बात हो गई है। लगभग हर बड़े मैच के बाद कोई न कोई ‘मिस्ट्री गर्ल’ इंटरनेट पर चर्चा का विषय बन जाती है।
लेकिन इससे भी गंभीर सवाल तब खड़ा होता है, जब कैमरे का फोकस मैदान में खेल रही महिला खिलाड़ियों पर होता है। विदेशी खिलाड़ी हों या भारतीय, कई महिला एथलीटों का कहना है कि उनका प्रदर्शन नहीं, बल्कि उनके शरीर के कुछ हिस्सों को अनावश्यक रूप से दिखाने वाले कैमरा एंगल और रिप्ले उन्हें असहज करते हैं। उनकी चिंता एक ही है- खेल की कवरेज का केंद्र उनका प्रदर्शन और तकनीक हो, न कि उनका शरीर।
दुनियाभर में महिला खिलाड़ियों की सम्मानजनक कवरेज सुनिश्चित करने के लिए कैमरा नियमों में बदलाव किए जा रहे हैं। लेकिन सवाल है कि भारत में इस मुद्दे पर स्थिति क्या है?
भारत में कवरेज पर क्या हैं नियम?
भारत में फिलहाल महिला खिलाड़ियों की फिल्मिंग या कैमरा एंगल को लेकर यूरोपियन एथलेटिक्स और EBU जैसी कोई औपचारिक या सार्वजनिक ब्रॉडकास्टिंग गाइडलाइन मौजूद नहीं है। खेलों के प्रसारण के लिए सामान्य प्रसारण मानक और प्रसारकों की अपनी संपादकीय नीतियां लागू होती हैं, लेकिन महिला खिलाड़ियों की कवरेज में कैमरा एंगल, क्लोज-अप या स्लो-मोशन रिप्ले को लेकर कोई अलग राष्ट्रीय प्रोटोकॉल सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया गया है। हालांकि, भारत में कुछ सामान्य नियम हैं:
1. प्रसार भारती का ब्रॉडकास्ट कोड
दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए प्रसारण सामग्री अश्लील, अभद्र या सार्वजनिक शालीनता के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसमें यह नहीं लिखा है कि खेल प्रसारण में कौन-से कैमरा एंगल इस्तेमाल किए जाएं या नहीं किए जाएं।
2. केबल टेलीविजन और प्रोग्राम कोड
भारत में टीवी चैनलों पर प्रसारित कार्यक्रमों के लिए अश्लील, अभद्र या महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली सामग्री पर सामान्य प्रतिबंध हैं। लेकिन खेलों में कैमरा प्लेसमेंट, स्लो-मोशन रिप्ले या क्लोज-अप शॉट्स को लेकर कोई अलग तकनीकी गाइडलाइन नहीं है।
3. BCCI, SAI और राष्ट्रीय खेल महासंघ
भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI), भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) या एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (AFI) ने सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई विस्तृत ब्रॉडकास्टिंग नीति जारी नहीं की है, जिसमें महिला खिलाड़ियों के लिए कैमरा एंगल या विजुअल कवरेज के मानक तय किए गए हों।
भारत में खेलों के प्रसारण में महिला खिलाड़ियों की फिल्मिंग को लेकर स्पष्ट गाइडलाइंस होने को लेकर भारतीय एथलीट रचना भी जोर देती हैं।
कैमरे के एंगल का मुद्दा महज तकनीकी गलती या संयोग नहीं है। ये कंट्रोल रूम में सोच-समझकर लिए गए संपादकीय फैसले होते हैं, जो तय करते हैं कि दर्शक खिलाड़ी को एक एथलीट के रूप में देखेंगे या एक अट्रैक्शन सिंबल के रूप में।




