
इतिहास के पन्नों को पलटने पर आपको कौन सी ऐसी स्पीच याद आती है, जिसने किसी आंदोलन, किसी देश की दिशा या पूरी दुनिया की तस्वीर बदल दी हो? शायद जेहन में 1963 में नस्लवाद के खिलाफ सबसे बड़ी आवाज बना मार्टिन लूथर किंग का भाषण आएगा, या उससे भी पहले 1942 में गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारत में जोश जगाने वाला महात्मा गांधी का ‘करो या मरो’ से निकला आंदोलन, या फिर 1863 में लोकतंत्र को परिभाषित करता अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान दिया गया अब्राहम लिंकन की 272 शब्दों की छोटी सी स्पीच। इन भाषणों में एक चीज कॉमन है और वो ये कि इन हस्तियों ने किसी बेहतरी के लिए ही ऐसी स्पीच या आंदोलन का सहारा लिया ताकि चीजें सही हो जाएं।
लेकिन आज से 80 साल पहले यानी साल 1946 में एक ऐसा भाषण दिया गया था, जो आज भी कई लोगों में सिहरन पैदा कर देता है। इस एक स्पीच ने ऐसी आग लगाई कि उसके बाद दुनिया दशकों तक चले खतरनाक ‘शीत युद्ध’ (Cold War) मे घिर गई। ये स्पीच थी- विंस्टन चर्चिल की। आइए जानते हैं कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल की इस स्पीच में ऐसा क्या था, जिसने इतिहास का रुख मोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई थी, और 80 साल बीतने के बाद भी कुछ लोगों के लिए यह क्यों किसी डरावने सपने से कम नहीं है।
चर्चिल की फुल्टन स्पीच
द्वितीय विश्व युद्ध के सबसे चर्चित चेहरों में से एक, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने ये भाषण 5 मार्च 1946 को दिया था। ये ‘फुल्टन स्पीच’ (Fulton Speech) नाम से चर्चित है। इसे फुल्टन स्पीच क्यों कहते हैं? क्योंकि यह भाषण अमेरिका के एक छोटे से शहर फुल्टन में दिया गया था। यह अमेरिका के ऐसे सुदूर इलाके में है, जिसे आज भी लोग ‘फ्लाई-ओवर कंट्री’ कहते हैं, यानी ऐसी साधारण जगह जहां से सिर्फ हवाई जहाज गुजरते हैं। इस भाषण को ‘आयरन कर्टेन’ स्पीच (Iron Curtain Speech) के नाम से भी जाना जाता है।

स्पीच में ऐसा कहा क्या था?
चर्चिल ने अपने संबोधन में दलील दी थी कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद का यूरोप एक बहुत बड़ी राजनीतिक, वैचारिक और सबसे जरूरी बात कि एक सैन्य विभाजन की वजह से आपस में बंट चुका है। उन्होंने इसका पूरा दोष सोवियत संघ की नीतियों पर मढ़ा था।
चर्चिल ने चेताया था कि सोवियत प्रभाव वाले क्षेत्रों के विस्तार से पश्चिमी देशों की ताकत को संतुलित करने की नीति बेअसर हो सकती है। उन्होंने जोर देकर कहा था कि पश्चिमी लोकतंत्रों को एक साथ मिलकर खड़े होने की जरूरत है। चर्चिल का साफ इशारा था कि वे मिलकर सोवियत संघ को रोकें, क्योंकि चर्चिल की नजर में सोवियत संघ सिर्फ ताकत का सम्मान करता था, खासकर सैन्य ताकत का।

अमेरिकी राष्ट्रपति भी सुनने आए थे स्पीच
अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन भी इस भाषण को सुनने के लिए काफी दूर से आए थे और उन्होंने इस भाषण को आयोजित करने में मदद भी की थी। इस भाषण में अमेरिका की खुलकर तारीफ की गई थी। साथ ही, फुलटन भाषण ने चर्चिल के अपने देश ब्रिटेन को जिसकी ताकत उस समय बहुत तेजी से घट रही थी अमेरिका के इस प्रभाव में एक छोटे लेकिन बेहद खास जोड़ीदार के रूप में पेश किया। दुर्भाग्य से, आगे चलकर ऐसा ही हुआ।
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छोटा भाषण, बड़ा असर
चर्चिल का यह भाषण काफी छोटा था और इसमें जो सुझाव दिए गए थे, वे बहुत ही साधारण थे। पश्चिमी देशों के शीत युद्ध के इतिहास को जो लोग सीधे-सादे ढंग से देखते हैं, उनके बीच इस भाषण का बहुत सम्मानित स्थान है। वो लोग आज भी इसे एक ऐसे उदाहरण के रूप में सराहते हैं जिसमें कड़वी हकीकत का बिना डरे सामना किया गया था। यहां तक कि जो लोग इस मामले में कम भावुक हैं, वे भी इस भाषण को जरूरी मानते हैं।
लेकिन ऐसा सोचना असल में एक अलग सोच है। इसके एक नहीं, कई कारण हैं। सबसे साफ कारण तो यह है कि इस युद्ध के बाद शीत युद्ध का जो दौर शुरू हुआ, वो बहुत ही खर्चीला और हद से ज्यादा खतरनाक था। शीत युद्ध चार दशक से ज्यादा समय तक चला था और फिर 1980 के दशक के आखिर में सोवियत संघ की पहल पर आपसी समझौते के साथ खत्म हुआ।
कई गंभीर विश्लेषक लंबे समय से कहते रहे हैं कि शीत युद्ध का पुराना दौर ऐसा था, जो किसी भी वक्त तीसरे विश्व युद्ध में बदल सकता था। तब युद्ध होता तो परमाणु हथियारों का भी संभवतः इस्तेमाल शामिल होता। और अगर ऐसा होता तो ये दुनिया वैसी नहीं होती, जैसी कि आज है।
कोल्ड वॉर में हुआ क्या था?
- शीत युद्ध मुख्य रूप से अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) के बीच हुआ था।
- शीत युद्ध की शुरुआत में कभी सीधा सैन्य युद्ध नहीं हुआ, ये विचारधाराओं की लड़ाई थी।
- अमेरिका लोकतंत्र-पूंजीवाद समर्थक था। सोवियत संघ कम्युनिज्म और साम्यवाद का समर्थक था।
- 50-60 के दशक में कोरियाई युद्ध, वियतनाम युद्ध हुए, जिनमें दोनों देश अलग-अलग पक्षों के साथ थे।
- दोनों गुटों ने अपनी ताकत बढ़ाने और एकदूसरे को घेरने के लिए मिलिट्री गठबंधन बनाए।
- अमेरिका और उसके सहयोगियों ने 1949 में नाटो बनाया। जवाब में सोवियत और उसके साथियों ने वॉरसॉ पैक्ट किया।
- उस दौर में दोनों के बीच परमाणु हथियार बनाने की जबर्दस्त होड़ थी। अंतरिक्ष पर पहले कदम रखने की रेस भी तभी शुरू हुई थी।
कई बार आई तीसरे विश्व युद्ध की नौबत
इतिहास में ऐसे कई पल आए जब तीसरा विश्व युद्ध बिल्कुल सामने दिख रहा था, और कई ऐसे पल हैं, जब एक अदने से अधिकारी की वजह से विनाश आखिरी पल में टल गया था। ऐसा ही एक उदाहरण कोरियाई युद्ध के दौरान मिलता है। ये युद्ध 1950 से 1953 के दौरान हुई था। उस वक्त अमेरिकी सेना के कमांडर-इन-चीफ डगलस मैकार्थर चीन के खिलाफ दर्जनों “डर्टी” बमो का इस्तेमाल करना चाहते थे। अगर उनकी नौकरी नहीं जाती और उनकी बात मान ली गई होती तो एक बहुत बड़ा इलाका परमाणु कचरे का बंजर मैदान बन सकता था। वैश्विक युद्ध भी छिड़ सकता था।
जब छोटे अफसरों ने विनाश से बचाया
इसके करीब दस साल बाद ऐसा मौका आया था, जब सोवियत संघ के एक छोटे से सबमरीन अधिकारी ने परमाणु युद्ध भड़कने से रुकवा दिया था, और इस तरह एक और विश्व युद्ध टल गया था। ये घटना क्यूबा मिसाइल संकट के चरम काल में हुई थी।
साल 1983 को शीत युद्ध का एक बेहद भयानक साल माना जाता है। उस साल नाटो (NATO) देशों के सेनाएं अपना सालाना सैन्य अभ्यास ‘एबल आर्चर’ (Able Archer) कर रही थीं। इस दौरान एक गलतफहमी से तीसरे विश्व युद्ध की आशंका गहरा गई थी। फिर एक अमेरिकी अधिकारी ने समझदारी दिखाई और प्रोटोकॉल तोड़कर तनाव बढ़ने से रोका।
इसके बाद, फिर से सोवियत संघ के एक बहुत ही छोटे रैंक के अधिकारी ने दुनिया को बर्बाद होने से बचाया था। शीत युद्ध का पहला दौर सचमुच बहुत खतरनाक था। भले ही इसका मुख्य केंद्र यूरोप के बीचों-बीच बसा बर्लिन शहर था, लेकिन यह भयानक रूप से पूरी दुनिया में फैला, खासकर ‘ग्लोबल साउथ’ यानी एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका के विकासशील देशों में।
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इस शीत युद्ध के दौरान लाखों मासूमों की बलि चढ़ी। वो तख्तापलट, गृहयुद्ध, प्रॉक्सी वॉर और राजनीतिक कत्लेआम की भेंट चढ़े। इस कोल्ड वॉर में कितने लोग मारे गए, इसके सटीक आंकड़े शायद कभी सामने नहीं आ पाए। लेकिन इतना तय है कि मरने वालों की कुल संख्या लाखों में थी। कुछ जानकार तो 2 से 4 करोड़ तक का आंकड़ा बताते हैं। गनीमत ये रही कि यह तीसरे विश्व युद्ध में नहीं बदला।
(यह लेख जर्मनी के इतिहासकार तारिक सिरिल अमर ने लिखा है। इस्तांबुल की कोच यूनिवर्सिटी (Koç University) में कार्यरत तारिक रूस, यूक्रेन, पूर्वी यूरोप, दूसरे विश्व युद्ध के इतिहास, सांस्कृतिक शीत युद्ध आदि के जानकार हैं।)




