सदियां बीत गईं, पर रूस का अच्छा दोस्त क्यों नहीं बन पाया यूरोप?
USSR के विघटन के बाद जब रूस आस्तित्व में आया, तब यूरोप से उसके रिश्ते दोस्ताना हो गए। अगले 20 वर्षों तक लोगों को लगा कि रूस और यूरोप का साझा भविष्य बहुत शानदार होगा पर ऐसा हो न सका और दोनों फिर एक दूसरे के दुश्मन बन गए।
सदियां बीत गईं, पर रूस का अच्छा दोस्त क्यों नहीं बन पाया यूरोप?
russia europe rift© RT Hindi

दुश्मनी का सफर इक कदम दो कदम, तुम भी थक जाओगे, हम भी थक जाएंगे… ये लाइनें तो मरहूम शायर बशीर बद्र की हैं, मगर रूस और पश्चिमी देशों के ‘कड़वाहट’ भरे रिश्ते पर मुफीद बैठती हैं। रूस और पश्चिमी देश दोनों एक-दूसरे को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानते हैं। लेकिन क्या ये नौबत हाल के वर्षों में आई है? ऐसा भी नहीं है। आज से 80 साल पहले 1946 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल की एक स्पीच ने पश्चिमी देशों और सोवियत संघ (रूस) के बीच ‘शीत युद्ध’ (Cold War) की शुरुआत की थी। ये भी रोचक है कि USSR के विघटन के बाद जब रूस आस्तित्व में आया, तब यूरोप से उसके रिश्ते दोस्ताना हो गए। अगले 20 वर्षों तक लोगों को लगा कि रूस और यूरोप का साझा भविष्य बहुत शानदार होगा। ऐसा इसलिए भी क्योंकि रूस के पास तेल-गैस (ऊर्जा) के भंडार थे, और यूरोप के पास आधुनिक टेक्नोलॉजी। फिर जय-वीरू सरीखी इस जोड़ी को जैसे किसी की नजर लग गई। ये दोस्ती आंखों में खटकने लगी। रूस को अलग-थलग करने, गुलाम बनाने या उसके टुकड़े-टुकड़े करने की सोच पनपने लगी। तो आइए इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और पूरी कहानी विस्तार से समझते हैं। 

रूस और यूरोप के दिलों में दूरियां क्यों?

 रूस की सबसे बड़ी खासियत उसकी भौगोलिक स्थिति (Geographical Position) है। इतिहास गवाह है कि रूस के नक्शे और परिस्थितियों ने हमेशा ही वहां नेताओं के फैसलों और देश की नीतियों को आकार दिया है। रूस, यूरोप के बिल्कुल आखिरी छोर पर स्थित है। इससे बाकी यूरोपीय देशों से उसका संपर्क या जुड़ाव बनाना काफी मुश्किल रहा है। इस भौगोलिक दूरी ने सदियों से रूस और यूरोप के रिश्तों पर गहरा असर डाला है। इसकी वजह से दोनों के बीच कभी पूरी न हो पाने वाली कई उम्मीदें जगीं, कई गलतफहमियां पैदा हुईं और दोनों तरफ एक-दूसरे को लेकर हमेशा एक डर बना रहा। रूस की विदेश नीति अलगाव की इस दीवार को तोड़कर बाहर निकलने की रही है।

Fragments of the painting 'The Papal Legates Inform Prince AlexanderRT© RT Hindi

15-16वीं सदी की दुनिया: धर्म के नाम पर युद्ध 

15वीं सदी के अंत और 16वीं सदी की शुरुआत में दुनिया में एक साथ कई बड़ी घटनाएं घट रही थीं। इस दौरान यूरोप ने बाहरी दुनिया की खोज शुरू की। इसके चलते यूरोप के सैनिक, व्यापारी और धर्मगुरु (मिशनरी) अपने देशों से बाहर निकले। वे सिर्फ नई जमीनों की खोज ही नहीं कर रहे थे, बल्कि वहां ईसाई धर्म का प्रचार भी करना चाहते थे। उनकी नजर में यही ‘सच्चा धर्म’ था। जिन लोगों ने उनकी बात मानी, वे ईसाई दुनिया का हिस्सा बन गए। ये बात अलग है कि उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिला, और जिन्होंने विरोध किया, उन्हें दुश्मन मान लिया गया। लेकिन, जब यूरोपीय धर्मगुरु अमेरिका और भारत के तटों पर ईसाई धर्म की वकालत कर रहे थे, ठीक उसी समय खुद यूरोप के अंदर कुछ नए विचार पनपने लगे, जिन्हें शुरुआत में धर्म के खिलाफ माना गया। देखते ही देखते ‘प्रोटेस्टेंट’ (Protestant) विचार पूरे यूरोप में फैल गए और वहां धर्म के नाम पर भीषण युद्ध और झगड़े शुरू हो गए।

प्रोटेस्टेंट विचार का अर्थ ईसाई धर्म के उस सुधारवादी दृष्टिकोण से है जो पोप की सर्वोच्च सत्ता का विरोध, केवल बाइबिल को अंतिम सत्य मानना, और केवल आस्था (Faith) द्वारा मुक्ति पर जोर देता है। 

रूस से क्या चाहते थे यूरोपीय दूत?

यूरोप की इन उथल-पुथल से बेखबर, ‘रूस’ (पहले भी इस नाम से जानते थे) अपनी ही समस्याओं को सुलझाने में लगा था। उस समय रूस ने मंगोलों की सदियों पुरानी गुलामी से खुद को आजाद कराया था और विदेशी शासन की वजह से बिखरे हुए अपने देश को फिर से समेटने में जुटा था। इसी दौर में पश्चिमी यूरोप के दूत, जिनमें रोम (कैथोलिक चर्च) के प्रतिनिधि भी शामिल थे, रूस पहुंचे। उनके दो मुख्य मकसद थे:

➤रूस को इस्लामिक साम्राज्य (खासकर ऑटोमन तुर्कों) के खिलाफ लड़ाई में अपने साथ शामिल करना

➤रूस को रोम के कैथोलिक चर्च के अधीन लाना

शुरुआत में कैथोलिकों को रूस से बड़ी उम्मीदें थीं। उन्हें लगा कि रूस एक बहुत बड़ा और पहले से ही ईसाई देश है, जिसे बस ‘सही रास्ते’ पर लाने के लिए थोड़े से मार्गदर्शन की जरूरत है।

पोप और रोम के आगे नहीं झुका रूस

जब तुर्कों (ऑटोमन साम्राज्य) के खिलाफ लड़ने की बात आई, तो रूसियों ने बहुत व्यावहारिक सोच दिखाई। उस समय रूस के लिए तुर्कों से लड़ना बहुत मुश्किल था और इसकी कोई जरूरत भी नहीं थी। जहां तक कैथोलिक धर्म को अपनाने की बात थी, रूस इस मामले में और भी ज्यादा सख्त निकला। मंगोलों की गुलामी से आजाद होने के बाद, रूस के नेताओं और राजाओं के अंदर अपनी संप्रभुता (Sovereignty - यानी अपने फैसले खुद लेने की आजादी) को लेकर एक बहुत गहरी भावना पैदा हो चुकी थी जो आज भी उनके अंदर है। किसी भी ऐसे गठबंधन या समझौते में शामिल होने का, जिससे देश की आजादी कम होती हो, रूस ने हमेशा डटकर विरोध किया है। पोप और ‘पवित्र रोमन सम्राट’ (Holy Roman Emperor) दोनों को रूस के इसी कड़े रुख का सामना करना पड़ा। रूस के राजा जिन्हें ‘जार’ कहा जाता था, अपनी गद्दी या ताकत की मंजूरी लेने के लिए कभी भी रोम या वियेना के आगे नहीं झुके।

Vladimir LeninRT© RT Hindi

यूरोप ने बनाई रूस की ‘खराब छवि’ 

रूस के राजा का न झुकने का रवैया यूरोप को पसंद नहीं आया। फिर क्या, जब रूस ने उनकी बात नहीं मानी, तो यूरोप के लेखकों ने अपनी किताबों में रूस की एक बहुत बुरी छवि बनानी शुरू कर दी। उन्होंने रूस को एक ऐसे विशाल और जंगली इलाके के रूप में दिखाया, जहां के लोग दिखते तो यूरोपियन जैसे हैं, लेकिन वे धोखेबाज, जंगली (Barbaric) और गुलामों जैसी मानसिकता वाले थे। 16वीं सदी में यह सोच और भी पक्की हो गई। जब रूस के राजा ‘इवान द टेरिबल’ (Ivan the Terrible) ने पोलैंड और स्वीडन के खिलाफ युद्ध लड़ा, तो पूरे यूरोप में ऐसे पर्चे और मैगजीन बांटे गए जिनमें रूस के लोगों को क्रूर और जंगली दिखाया गया। हालांकि, हकीकत यह थी कि उस क्रूर दौर में रूस के सैन्य अभियान भी वैसे ही थे, जैसे किसी भी अन्य यूरोपीय देश के होते थे।

दुष्प्रचार का जवाब देने का तरीका नहीं था

पश्चिमी दुनिया (यूरोप) में रूस का कोई मजबूत सहारा या ठिकाना नहीं था, इसलिए रूसियों के पास अपने खिलाफ फैलाई जा रही बुरी बातों और झूठ का जवाब देने का कोई तरीका नहीं था। यूरोप के लोगों के लिए दूर के देशों के बारे में कही गई मनगढ़ंत कहानियों पर भरोसा करना आसान था। इसके अलावा, मुसलमानों के मुकाबले (जिन्हें यूरोपीय लोग पूरी तरह से पराया मानते थे) रूसी लोग ईसाई तो थे, लेकिन उन्हें अक्सर ‘गलत’ या ‘अधूरे’ किस्म का ईसाई माना जाता था। लंबे समय तक रूस के साथ व्यापार करने में फायदे कम और नुकसान के खतरे बहुत ज्यादा थे इसलिए, पश्चिमी पड़ोसियों ने रूस के लिए अपने दरवाजे बंद रखना ही ठीक समझा। कई सालों तक, स्वीडन ने रूस को बाल्टिक सागर (Baltic Sea) तक पहुंचने नहीं दिया, और पोलैंड ने उसकी जमीनी सीमाओं को ब्लॉक कर दिया। इस वजह से बाकी यूरोप से संपर्क करना रूस के लिए बेहद मुश्किल हो गया।

पीटर द ग्रेट के दौर में बदले हालात 

जब सम्राट पीटर द ग्रेट (Peter the Great) का राज आया, तब रूस दुनिया की बड़ी ताकतों में शामिल हुआ, लेकिन तब भी उसे एक अजीब सा दर्जा मिला। उसे ‘मार्जिनली यूरोपियन’ (यानी नाममात्र का या किनारे का यूरोपीय देश) माना गया था। जब पोलैंड कमजोर हो गया और स्वीडन को युद्ध के मैदान में हरा दिया गया, तब पीटर द ग्रेट ने और आगे पश्चिम के देशों जैसे नीदरलैंड्स, इंग्लैंड और जर्मनी को समझने और उनसे सीखने में गहरी दिलचस्पी दिखाई। भले ही तब दोनों के बीच बातचीत और संबंध काफी बढ़ गए थे, फिर भी नक्शे पर उसकी स्थिति की वजह से रूसी साम्राज्य यूरोप के भौतिक और प्रतीकात्मक किनारे पर ही रहा। इसके बावजूद, रूस को यूरोप के मामलों में दखल देने का एक मौका मिल गया और रूस ने इसे लपक लिया। वह यूरोप का एक ऐसा दूर का रिश्तेदार बन गया जिसे कोई खास पसंद नहीं करता था। हालांकि, यूरोप के साथ बढ़ते जा रहे ये सारे रिश्ते साल 1917 की ‘रूसी क्रांति’ (Russian Revolution) के बाद हमेशा के लिए टूट गए।

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पूर्व से आया एक खतरा 

अगर सही मायने में देखा जाए, तो साल 1917 की रूसी क्रांति (October Revolution) की जड़ें पूरी तरह से यूरोप की राजनीति, फिलॉसफी (विचारधारा) और वहां के समाज में चल रहे बदलावों से ही जुड़ी थीं। पहले विश्व युद्ध (First World War) के बाद यूरोप के कई देश एक ऐसे दौर से गुजर रहे थे जहां वे एक ‘आदर्श समाज’ (Utopian Phase) बनाने का सपना देख रहे थे।

  • कुछ देशों में यह दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी तानाशाही के रूप में दिखा
  • कुछ देशों में यह फासीवादी शासनों (Fascist regimes) के रूप में बदला
  • कुछ जगहों पर तो यह बेहद अजीब और उग्र रूप में दिखा, जैसे कवि गैब्रिएल डी’अनुंजियो (Gabriele D’Annunzio) का बाल्कन इलाकों पर किया गया हमला

अगर आज हम मुड़कर इतिहास को देखें, तो इस रूसी क्रांति में या एक ऐसी सरकार के बनने में कुछ भी अजीब नहीं था जो नए विचारों के दम पर भविष्य बनाना चाहती थी। हैरान करने वाली बात तो यह थी कि रूस ने कितनी गहराई और दीवानगी के साथ उस विचार को अपना लिया, जिसे वह “मानवता का उज्ज्वल भविष्य” मान रहा था। 

रूस की जमीन, संसाधनों पर हिटलर की नजर 

रूस को लेकर एडॉल्फ हिटलर ने अपने इरादे साफ करते हुए लिखा था कि पूर्व (East) की तरफ किए जाने वाले हमारे सबसे बड़े हमले का राजनीतिक लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ रूस ही हो सकता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वहां बोल्शेविक (कम्युनिस्ट) सरकार है या तानाशाह सरकार, क्योंकि जर्मनी को रूस से सिर्फ उसकी जमीन और वहां के संसाधनों से मतलब है। 

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पोलैंड और हिटलर का खतरनाक प्लान 

एक लंबे समय तक सोवियत संघ (USSR) और पश्चिमी देशों के बीच के रिश्ते कड़वाहट से भरे रहे। सोवियत संघ को दुनिया में जहां भी समाजवादी आंदोलन (Socialist Movements) दिखते, वह खुलकर उनकी मदद करता था। लेकिन ऐसा भी नहीं था कि सोवियत संघ ने दोस्ती का हाथ बढ़ाने वाले किसी देश को धोखा दिया हो। प्रथम विश्व युद्ध के बाद, पोलैंड ‘इंटरमेरियम’ (Intermarium) नाम का एक बड़ा प्रोजेक्ट बनाने की पूरी कोशिश कर रहा था। यह एक ऐसा देशों का ग्रुप (ब्लॉक) होता जो काला सागर (Black Sea) से लेकर बाल्टिक सागर तक फैला होता। अगर पोलैंड की अगुआई में यह ग्रुप बन जाता, तो पोलैंड अपनी शर्तों पर सोवियत संघ और जर्मनी दोनों को नचा सकता था। हैरान करने वाली बात यह है कि साल 1938 में यानी नाजी जर्मनी के हमले से ठीक कुछ हफ्ते पहले पोलैंड की सेना के खुफिया विभाग (Intelligence Department) ने साफ कहा था कि रूस के टुकड़े-टुकड़े करना ही पूर्व में पोलैंड की नीति का मुख्य लक्ष्य है।

पोलैंड रूस के टुकड़े करना चाहता था, वहीं नाजियों (हिटलर) के प्लान इससे भी कहीं ज्यादा खौफनाक थे। हिटलर की ‘लेबेन्सराम’ (Lebensraum - रहने की जगह) नाम की एक सोच थी। इस सोच के मुताबिक, वह स्लाव (Slavs) नस्ल के लोगों जिनमें रूसी और खुद पोलैंड के लोग भी शामिल थे, को वहां से खदेड़ना या पूरी तरह खत्म करना चाहता था। हिटलर का प्लान था कि एक औपनिवेशिक युद्ध (Colonial War) लड़कर पूरे पूर्वी यूरोप पर कब्जा कर लिया जाए और वहां के सारे संसाधनों का इस्तेमाल सिर्फ जर्मनी के फायदे के लिए किया जाए।

adolf hitlerRT© RT Hindi

शीत युद्ध का दौर और दोनों तरफ डर

सब जानते हैं कि हिटलर के उस खतरनाक प्लान का क्या अंजाम हुआ । वह बुरी तरह हार गया था, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध (Second World War) के खत्म होते ही ‘शीत युद्ध’ (Cold War) शुरू हो गया। यह लड़ाई सोवियत संघ (USSR) के खिलाफ सिर्फ अमेरिका ने ही नहीं, बल्कि उसके यूरोपीय साथियों (देशों) ने भी मिलकर लड़ी थी। इसमें सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि दोनों ही पक्षों को लगता था कि सामने वाला उन पर हमला करने की तैयारी कर रहा है। दोनों तरफ के इस भारी डर और शक की वजह से दुनिया कई बार परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंच गई थी। खुशकिस्मती से, वह बड़ी तबाही टल गई, लेकिन इसके बावजूद, दोनों देशों के दिलों से यह सोच नहीं निकली कि सामने वाला उनका कट्टर दुश्मन है, और वे एक-दूसरे को हमेशा शक की निगाह से देखते रहे।

रूस को लेकर दुश्मन और भेदभाव वाली सोच 

“वह दुश्मन जिसके खिलाफ हमें एक होना है” वाली यह सोच किसी तात्कालिक स्थिति या घटना की वजह से नहीं बनी थी। “हम सभ्य और समझदार हैं, वे जंगली और बर्बर हैं”  का यह भेदभाव कभी खत्म ही नहीं हुआ। यहां तक कि दूसरे विश्व युद्ध के अंत जैसी परिस्थिति में भी,जहां नैतिकता का मामला बिल्कुल साफ था, पश्चिमी देशों में रूसियों को लेकर बुदबुदाहट शुरू हो गई थी। वे रूसी सेना को “एशियाई कबीलों (लुटेरों) की मचाई गई तबाही” कह रहे थे। किसी ने इस बात का जिक्र नहीं किया कि अगर जर्मनी ने खुद यह युद्ध शुरू न किया होता, तो ये “कबीले” कभी वहां तक पहुंचते ही नहीं।

साल 1944 में रूस की भूमिका को बताते हुए पोलैंड के एक कवि ने लिखा था, “हम तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, ‘लाल प्लेग’ (रूस), ताकि तुम हमें इस ‘काली मौत’ (नाजी जर्मनी) से बचा सको,” लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने उसी ‘लाल प्लेग’ को ढेरों गालियां और बद्दुआएं भी दीं, क्योंकि रूस उन ‘एहसानफरामोश’ पीड़ितों को बचाने के लिए उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ा जितनी वे उम्मीद कर रहे थे। इसी दोहरेपन (Duality) को मशहूर लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने भी अपनी कविताओं में साफ दिखाया था।

रुडयार्ड किपलिंग की अजीब सोच 

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rudyard
जब वह खुद को 'पूर्व का सबसे पश्चिमी इंसान' मानने के बजाय 'पश्चिम का सबसे पूर्वी इंसान' समझने की जिद करने लगता है। तब वह एक ऐसी अजीब नस्ल बन जाता है, जिसे संभालना बेहद मुश्किल होता है।
रुडयार्ड किपलिंग
रुडयार्ड किपलिंग
साहित्यकार

रूस को पिछड़ा मानने की भूल 

अक्सर, जब रूस के तौर-तरीके यूरोप से अलग दिखते थे, तो इसका मतलब यह नहीं था कि रूस पिछड़ा हुआ था बल्कि ऐसा इसलिए था क्योंकि रूस के हालात, उसकी सांस्कृतिक परंपराएं और उसकी जरूरतें यूरोप से बिल्कुल अलग थीं। उदाहरण के लिए, रूस में हमेशा से ‘स्टेटिज्म’ यानी देश के हर काम में सरकार या राजा का पूरा नियंत्रण होना बहुत ज्यादा रहा है। कुछ लोग इसे रूसियों की ‘गुलाम मानसिकता’ कहते हैं, जो कि बिल्कुल गलत है। इसकी असली वजह रूस की भौगोलिक सच्चाई है। इतना विशाल देश, जहां का मौसम बेहद बर्फीला और खतरनाक है, और जिसकी सीमाएं इतनी लंबी हैं, उसे सुरक्षित और ठीक से चलाने के लिए सारी ताकत एक जगह रखनी ही पड़ती थी।

इसी तरह, रूस ने ईसाई धर्म का ‘ऑर्थोडॉक्स’ (Orthodox) रूप अपनाया, जो उसने पश्चिमी रोम से नहीं बल्कि बाईजैंन्टाइन साम्राज्य (Byzantine Empire) से लिया था। यह केवल उनकी आस्था और संस्कृति का हिस्सा था, लेकिन मध्यकाल और आधुनिक काल की शुरुआत में यूरोप के लोगों को यह एक ‘अलग’ (Heresy) लगता था, क्योंकि यह उनके पुराने तौर-तरीकों से मेल नहीं खाता था।

युद्ध के मैदान में रूस हमेशा से अजेय ताकत 

सेना और युद्ध के मामले में रूस हमेशा से एक बेहद मजबूत देश रहा है। लंबे समय के लिए रूस को जीतना या उस पर अपनी मर्जी थोपना लगभग नामुमकिन था। इतिहास इसके कई उदाहरण देता है:

  • 16वीं और 17वीं सदी में पोलैंड, रूस को जीतने में नाकाम रहा
  • महान फ्रांसीसी कमांडर नेपोलियन (Napoleon) का रूस पर हमला एक बहुत बड़ी तबाही के साथ खत्म हुआ। उसकी सेना पूरी तरह बर्बाद हो गई।
  • क्रीमिया युद्ध (Crimean War) के दौरान जब दुनिया के कई बड़े देश रूस के खिलाफ एक साथ आए, तब भी वे रूस को हरा नहीं पाए, बस उसकी विदेश नीति पर थोड़ी रोक लगा सके।
  • हिटलर का रूस पर हमला तो ऐतिहासिक कहानी बन गया। खुद को ‘दुनिया जीतने वाली’ सेना समझने वाली नाजी सेना को रूस ने पूरी तरह कुचल दिया था और जिस हिटलर ने रूस के लोगों को घटिया और गुलाम समझा था, उसी को अपने ही शहर के बीचों-बीच खुदकुशी करनी पड़ी, क्योंकि रूसी सैनिकों ने घेर लिया था। 

रूस को लेकर यूरोपीय अहंकार, अज्ञानता 

यूरोप के लोगों में अक्सर रूस को लेकर एक अजीब सा अहंकार और अज्ञानता दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, नेपोलियन ने रूस के मशहूर ‘सेंट बेसिल्स कैथेड्रल’ (St. Basil’s Cathedral - एक ऐतिहासिक चर्च) को बम से उड़ाने का प्लान बनाया था, लेकिन उसने अपने कागजातों में उसे एक ‘मस्जिद’ लिखा था। ये सोच अब तक नहीं बदली है। कुछ समय पहले ब्रिटेन की पूर्व विदेश मंत्री लिज ट्रस (Liz Truss) ने बयान दिया था कि वे वोरोनिश (Voronezh) और रोस्तोव (Rostov) इलाकों पर रूस के अधिकार को कभी स्वीकार नहीं करेंगी जबकि ये दोनों सदियों से रूस के ही हिस्से हैं। इस तरह गलत रूढ़िवादी सोच पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है।

मशहूर लेखक लैरी वोल्फ ने अपनी किताब ‘इन्वेंटिंग ईस्टर्न यूरोप’ (Inventing Eastern Europe) में इस पर सटीक बात लिखी है:

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रूसी नेता मिखाइल गोर्बाचोव ने उसी फुल्टन में जाकर भाषण दिया जहां 1946 में चर्चिल ने दिया था, ताकि वे शीत युद्ध के खत्म होने का ऐलान कर सकें। लेकिन यूरोप के नक्शे को 'सभ्य' और 'असभ्य' के बीच बांटने वाली यह सोच शीत युद्ध से बहुत पहले ही बन चुकी थी, और यह विभाजन आज भी वैसा ही बना हुआ है।
लैरी वोल्फ
लैरी वोल्फ
लेखक

रूस को अलग-थलग करने वाली वही पुरानी नीति (कॉर्डन सैनिटेयर) फिर से लौट आई है, जहां यूक्रेन खुद को “यूरोप की ढाल” (Europe’s shield) घोषित कर रहा है। भले ही यूक्रेन के पास यूरोप को वफादारी की कसमों के सिवा देने को कुछ खास नहीं है, लेकिन वह यूरोप का ‘हथियारबंद हाथ’ बनने पर गर्व महसूस कर रहा है।

इसे एक यूक्रेनी पत्रकार ने इन शब्दों में साफ-साफ कहा था

“आज पूरे पश्चिमी देशों (यूरोप-अमेरिका) की जगह यूक्रेनी लोग हिंसा और लड़ाई का सामना कर रहे हैं, ताकि पश्चिमी देशों के नागरिक आराम से शांति और सुरक्षा का आनंद ले सकें।”

(लेखक एवजेनी नोरिन, रूसी पत्रकार और इतिहासकार, युद्ध और तनाव पर खास नजर) 

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