
क्या आपको पता है कि दक्षिण अमेरिका मिसाइलों के मामले में सुपरपावर क्यों नहीं बन पाया? आप अमेरिका शब्द को लेकर कंफ्यूज हों, उससे पहले बता दें कि हम बात दक्षिण अमेरिका की कर रहे हैं, जो एक स्वतंत्र महाद्वीप है, जिसमें ब्राजील, अर्जेंटीना, पेरू और चिली जैसे 12 संप्रभु देश शामिल हैं। ये उत्तरी अमेरिका यानी जिसे हम-आप US कहते हैं, उससे भाषा और संस्कृति में भी काफी अलग है। दक्षिण अमेरिका के मिसाइल पावर न बन पाने की जड़ें शीत युद्ध तक जाती हैं। तब लग रहा था कि दक्षिण अमेरिका भी खुद की मिसाइल टेक्नोलॉजी विकसित करने वाले दुनिया के चुनिंदा देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा। अर्जेंटीना और ब्राजील जैसे देशों ने बड़े-बड़े प्रोग्राम शुरू कर दिए थे। फिर ‘अंकल सैम’ यानी अमेरिका ने ऐसा गेम किया कि दक्षिण अमेरिका की ये हसरत इतिहास के पन्नों में गुम हो गई। क्या थी पूरी कहानी, आइए विस्तार से बताते हैं।
अर्जेंटीना, ब्राजील ने बना ली थीं मिसाइलें
1970-80 के दशक की बात है। दक्षिण अमेरिकी देशों के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च और विदेशी मदद को मिलाकर ऐसी मिसाइलें बनाने की सोची, जिससे उन्हें हथियारों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर न रहना पड़े और उनका अपना डिफेंस सिस्टम मजबूत हो सके। अर्जेंटीना का ‘कॉन्डोर’ (Condor) प्रोग्राम और ब्राजील की बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की कोशिशें इतनी आगे बढ़ चुकी थीं कि दुनिया की महाशक्तियों के कान खड़े हो गए। उन्हें लगने लगा कि अगर ये देश मिसाइलें बनाने में कामयाब हो गए तो दुनिया में मिसाइलों की होड़ मच जाएगी। अर्जेंटीना और ब्राजील पर भारी राजनीतिक दबाव बनाया गया। पैसों की तंगी झेल रह ये देश ज्यादा देर टिक नहीं पाए। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं बदल लीं। नतीजा ये हुआ कि मिसाइल प्रोग्राम बंद करने पड़े। कई प्रोजेक्ट पूरी तरह खत्म हो गए। मिसाइल फैक्ट्रियों और इन्फ्रास्ट्रक्चर को या तो तोड़ दिया गया या वहां कुछ और काम शुरू कर दिया गया। देखते ही देखते दक्षिण अमेरिका का मिसाइल किंग बनने का सपना भरभराकर टूट गया।
क्या इन देशों की मिसाइल टेक्नोलॉजी भी पूरी तरह खत्म हो गई? ऐसा भी नहीं है कि जो मेहनत इन देशों ने दशकों तक की, वो पूरी तरह बेकार चली गई। उस दौर की टेक्नोलॉजी का असर आज भी वहां नजर आता है। लेकिन इस वक्त इलाके के देश फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं और धीरे-धीरे अपनी मिसाइल क्षमता को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, इस बार उनका मकसद बहुत लंबी दूरी तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें बनाना नहीं है। इसके बजाय, वो अपने देश की सुरक्षा के लिए व्यावहारिक और काम के हथियारों पर फोकस कर रहे हैं, जैसे:
- एंटी-शिप मिसाइलें (Anti-Ship Missiles): जो समुद्री जहाजों को निशाना बना सकें।
- सटीक निशाना लगाने वाले हथियार (Precision-Guided Munitions): जो सीधे टारगेट पर वार करें।
- रॉकेट (MLRS): मल्टीपल-लॉन्च रॉकेट सिस्टम के लिए बेहतरीन रॉकेट्स।
अर्जेंटीना में मिसाइल निर्माण कैसे शुरू हुआ?
1980 के दशक का दौर था। अर्जेंटीना पूरे दक्षिण अमेरिका में मिसाइल टेक्नोलॉजी का किंग बनने के सपने पर आगे बढ़ रहा था। दरअसल, 1982 में अर्जेंटीना ‘फॉकलैंड्स युद्ध’ (Falklands War) में ब्रिटेन से हार गया था। उस समय वहां मिलिट्री (Military Junta) का राज था। इस हार के बाद अर्जेंटीना ने ठान लिया कि अब वो अपनी मिसाइलें खुद बनाएगा। इस सोच को फ्रांस ने बढ़ावा दिया। उसने अर्जेंटीना पर ‘एक्सोसेट’ (Exocet) जैसी खतरनाक एंटी-शिप मिसाइलों को लेकर हथियारों का प्रतिबंध लगा दिया। इस मजबूरी और गुस्से से पैदा हुआ अर्जेंटीना का सबसे बड़ा और सीक्रेट प्रोजेक्ट, जिसका नाम था- कॉन्डोर (Condor) मिसाइल प्रोग्राम।
फॉकलैंड की हार ने दिया मिशन

क्या था कॉन्डोर मिसाइल प्रोजेक्ट?
लंबी दूरी की Condor-1 मिसाइल बनाने की तैयारी वैसे तो 1970 के दशक के आखिरी सालों में ही शुरू हो गई थी। शुरुआत में दुनिया को बताया गया कि यह सिर्फ अंतरिक्ष और पर्यावरण की पढ़ाई करने वाला एक रिसर्च रॉकेट (Geophysical Rocket) है, लेकिन असल मकसद मिलिट्री इस्तेमाल ही था। इस मिसाइल की मारक क्षमता करीब 100 से 115 किलोमीटर थी। यह 500 किलोग्राम तक के भारी-भरकम बम (Warhead) ले जा सकती थी। अर्जेंटीना का प्लान था कि वो ऐसी खतरनाक टैक्टिकल मिसाइल तैयार करें, जो जरूरत पड़ने पर दुश्मन के इलाके में अंदर तक घुसकर उसके जरूरी ठिकानों को तबाह कर सके।
अर्जेंटीना यह सब अकेले नहीं कर रहा था। उसे चोरी-छिपे कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों का साथ मिला हुआ था-
- जर्मन कंपनी MBB ने इस मिसाइल का इंजन डिजाइन करने में बड़ी मदद की।
- इटली और फ्रांस की कुछ कंपनियों ने भी इस प्रोजेक्ट में अपनी टेक्नोलॉजी लगाई।
- इसी टेक्नोलॉजी और अनुभव को अर्जेंटीना ने आगे चलकर ‘कॉन्डोर-2’ प्रोजेक्ट में इस्तेमाल किया।
1982 की हार और कॉन्डोर-2
‘कॉन्डोर-1’ के बाद अर्जेंटीना ने और भी खतरनाक दांव खेला। 1982 के युद्ध में मिली हार के बाद उसने ‘कॉन्डोर-2’ (Condor II) प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। वहां नेताओं को शायद उम्मीद थी कि अगर उनके पास यह एडवांस मिसाइल टेक्नोलॉजी होगी तो वो ब्रिटेन से फॉकलैंड्स द्वीप वापस छीन लेंगे। इसी इरादे से 1984 में अर्जेंटीना ने मिस्र (Egypt) से हाथ मिलाया। मिस्र भी उस वक्त ऐसा ही सीक्रेट मिसाइल प्रोजेक्ट चला रहा था, जिसका नाम था ‘बद्र-2000’ (Badr-2000)। दोनों मिलकर ऐसी दो स्टेज वाली बैलिस्टिक मिसाइल बनाना चाहते थे, जो दुश्मन के दांत खट्टे कर दे।

बैलिस्टिक मिसाइल में चाहते थे ये खूबियां

जब अमेरिका की उड़ गई थी नींद
1989 के मार्च महीने में इस मिसाइल के प्रोटोटाइप (शुरुआती मॉडल) का टेस्ट होना तय हुआ। कुछ खबरों के मुताबिक, करीब 504 किलोमीटर दूर तक मार करने वाला एक टेस्ट कर भी लिया गया। इसकी हालांकि ऑफिशियल पुष्टि नहीं हुई। इस प्रोजेक्ट में सिर्फ अर्जेंटीना और मिस्र ही नहीं थे, पर्दे के पीछे यूरोप की कई टेक कंपनियां, मिस्र और इराक भी शामिल हो चुका था। सबने मिलकर जो टेक्नोलॉजी विकसित की, उसने इन देशों के पास पहले से मौजूद स्कड (SCUD) जैसी मिसाइलों को और भी ज्यादा आधुनिक और खतरनाक बना दिया।
उत्तरी अमेरिका को जब भनक लगी कि अर्जेंटीना, मिस्र और इराक जैसे देश मिलकर खतरनाक मिसाइल बना रहे हैं तो उसकी नींद उड़ गई। अमेरिका के लिए यह बड़ी चिंता का विषय था। इससे ग्लोबल बैलेंस बिगड़ने का खतरा था। हड़कंप की एक वजह ये भी थी कि यह मिसाइल दिखने में हूबहू अमेरिका की ‘परशिंग-2’ (Pershing-2) मिसाइल जैसी थी। इससे अमेरिका को शक हुआ कि उसके लिए काम करने वाले वेस्टर्न यूरोप के ठेकेदारों ने ही चुपके से वो टेक्नोलॉजी मिस्र-इराक जैसे देशों को दे दी है। अमेरिका ने कॉन्डोर-2 प्रोजेक्ट को रोकने में पूरी ताकत लगा दी। उसने मिसाइल के पीछे काम कर रहे विदेशी सप्लायर्स के नेटवर्क पर नजर रखनी शुरू कर दी।
अमेरिकी दबाव में अर्जेंटीना का प्रोग्राम बंद
इस मिसाइल प्रोजेक्ट को रोकने के लिए अमेरिका ने कानूनी डंडा चलाया। 1988 में उसने मिस्र में जन्मे वैज्ञानिक डॉ. अब्देलकादर हेल्मी (Dr. Abdelkader Helmy) पर ‘कॉन्डोर-2’ प्रोग्राम के लिए मिसाइल से जुड़ा सामान गैर-कानूनी तरीके से देश से बाहर भेजने का आरोप लगाया। साल 1991 में डॉ. हेल्मी ने अपना गुनाह कबूल भी कर लिया। उन्होंने माना कि वह MX-4926 थर्मल प्रोटेक्शन मटेरियल को अवैध रूप से अमेरिका से बाहर भेज रहे थे। यह खास मटेरियल मिसाइल के नोजल को अत्यधिक गर्मी से जलने से बचाता है।
अमेरिका के भारी दबाव के आगे अर्जेंटीना टिक नहीं पाया। 1990 में अर्जेंटीना के तत्कालीन राष्ट्रपति कार्लोस मेनेम (Carlos Menem) ने पूरे मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम को हमेशा के लिए बंद करने का आदेश दे दिया। वह अमेरिका की ‘परमाणु एवं मिसाइल अप्रसार नीति’ (Nonproliferation Policies) के पक्ष में खडे़ हो गए। 1993 तक आते-आते अर्जेंटीना के इस महात्वाकांक्षी मिसाइल प्रोग्राम के बचे-कुचे काम और सबूतों को भी अमेरिकी निगरानी में पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया।
ब्राजील की प्रैक्टिकल मिसाइल नीति
अर्जेंटीना ही नहीं, उसके पड़ोसी देश ब्राजील (Brazil) ने भी खुद अपनी मिसाइल बनाने का बड़ा प्रयास किया था। हालांकि ब्राजील का मामला थोड़ा प्रैक्टिकल (Pragmatic) माना जाता है। इस वक्त पूरे दक्षिण अमेरिका में ब्राजील इकलौता देश है, जो अभी भी लॉन्ग-रेंज मिसाइल प्रोग्राम पर काम कर रहा है। ब्राजील जमीन, समंदर और आसमान तीनों जगहों से सटीक निशाना लगाने वाली (Precision-Guided) मिसाइलें बना रहा है। वह स्पेस टेक्नोलॉजी के लिए चीन के साथ मिलकर भी काम कर रहा है। इसकी शुरुआत 1980 के दशक में पर्यावरण और अंतरिक्ष की पढ़ाई करने वाले रॉकेट बनाने से हुई थी।
क्या था SS-300 मिसाइल प्रोजेक्ट?

ब्राजील की दो बड़ी कंपनियों ‘एविब्रास’ (Avibras) और ‘ऑर्बिता’ (Orbita) ने इस पर काम शुरू किया। उनका इरादा सिर्फ यहीं रुकने का नहीं था, बल्कि वो इसके बाद SS-600 (600 किमी रेंज) और SS-1000 (1,000 किमी रेंज) जैसी और भी घातक मिसाइलें बनाना चाहते थे।
ब्राजील ने मिसाइल बनाना क्यों रोका?
अर्जेंटीना की तरह ब्राजील का प्रोजेक्ट पूरी तरह तबाह तो नहीं किया गया, लेकिन साल 1991 तक आते-आते खेल यहां भी बदल गया। अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने ब्राजील पर भारी दबाव डाला। इस दबाब में ब्राजील टूट गया। मिसाइल प्रोग्राम रोकने के पीछे ब्राजील को ये भी लगा कि उसके पड़ोस में ऐसा कोई बड़ा दुश्मन या खतरा नहीं है, जिसके लिए इतनी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें रखी जाएं। नतीजा यह हुआ कि 1991 में ब्राजील भी मिसाइल अप्रसार (Missile Nonproliferation) का समर्थन करने वाले देशों में शामिल हो गया। उसने अपने बैलिस्टिक मिसाइल डेवलपमेंट को रोक दिया।
पाकिस्तान को बेचीं मिसाइलें
ब्राजील ने दबाव में आकर बैलिस्टिक मिसाइलें बनाना भले ही रोक दिया, लेकिन अपनी काबिलियत और अनुभव को खत्म नहीं होने दिया। 1997 में ब्राजील की सरकारी एजेंसी DCTA ने खुफिया तरीके से MAR-1 नाम की एक एंटी-रेडिएशन मिसाइल (Anti-Radiation Missile) बनानी शुरू की। यह ऐसी मिसाइल होती है जो दुश्मन के रडार से निकलने वाले सिग्नल्स को पकड़कर उसी को उड़ा देती है। ब्राजील की कंपनियों के लिए यह बड़ी कामयाबी तब बनी, जब उन्होंने पाकिस्तान को ये मिसाइल बेची। पाकिस्तान ने अपने ‘मिराज III/V’ विमानों के लिए ब्राजील से करीब 100 MAR-1 मिसाइलें खरीदीं।
MAR-1 में क्या खास

‘MAR-1’ से ‘MANSUP’ तक
साल 2000 के दशक में ब्राजील ने इसी MAR-1 टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके एक नई मिसाइल तैयार की, जिसका नाम MANSUP रखा गया। यह समुद्री जहाजों को उड़ाने वाली मिसाइल है। इसे पानी के जहाजों, लड़ाकू विमानों और ज़मीन पर घूमने वाले मोबाइल लॉन्चर, कहीं से भी चलाया जा सकता है। इस वक्त ब्राजील ने अपनी समुद्री सीमा की रक्षा के लिए इसे तैनात कर रखा है। अब वह इसका ज्यादा दूरी तक मार करने वाला मॉडल बनाने में जुटा है।
ब्राजील ने खुद पर लगाई लिमिट
पूरे दक्षिण अमेरिका में ब्राजील का तरीका सबसे अलग और अनोखा है। उसने किसी पर निर्भर न रहकर धीरे-धीरे ही सही, खुद के दम पर अपना मिसाइल प्रोग्राम खड़ा किया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय नियमों का भी पूरी तरह पालन किया। उसने अपने ऊपर 300 किलोमीटर की लिमिट लगा रखी है। यानी वह अपनी किसी भी लड़ाकू मिसाइल की रेंज 300 किलोमीटर से ज्यादा नहीं रखता, ताकि दुनिया की महाशक्तियां उस पर उंगली न उठा सकें।

दक्षिण अमेरिका के बाकी देशों का हाल
दक्षिण अमेरिका के बाकी देशों की बात करें तो ज्यादातर देश अपनी मिसाइलें खुद बनाने के बजाय दूसरे देशों से हथियार खरीदने पर निर्भर रहते हैं।
चिली की सरकारी डिफेंस कंपनी FAMAE अपने SLM मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम के लिए 306-mm के रॉकेट बनाती है। ये रॉकेट 150 किलोमीटर दूर तक जा सकते हैं, लेकिन ये प्रिसिजन-गाइडेड हथियार नहीं हैं। ये एक बार में भारी गोलाबारी करने के काम आते हैं।
चिली और कोलंबिया की सेनाएं अमेरिका की M270 MLRS और HIMARS (हायमार्स) सिस्टम का इस्तेमाल करती हैं, जिनकी मिसाइलें 70 से लेकर 300 किलोमीटर तक मार कर सकती हैं। वेनेजुएला ने पिछले दो दशकों में रूस से काफी संख्या में भारी और ताकतवर हथियार खरीदे हैं। रूस से ‘स्मर्च’ (Smerch) MLRS जैसा खतरनाक रॉकेट सिस्टम लिया है। साथ ही कई ऐसी मिसाइलें भी ली हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर सतह से आसमान और धरती पर मौजूद ठिकानों को उड़ाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। रक्षा बाजारों में ऐसी भी अफवाह उड़ी थी कि वेनेजुएला रूस से उसकी सबसे घातक ‘इस्कंदर’ (9K720E Iskander-E) बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम मांग रहा है, लेकिन यह सिर्फ हवा-हवाई बात थी।
(लेखक- दिमित्री कोर्नेव, मिलिट्री एक्सपर्ट हैं और MilitaryRussia प्रोजेक्ट के संस्थापक हैं)




