
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, ऊर्जा कीमतों में उथल-पुथल और वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 फीसदी की विकास दर दर्ज की है। एक साल पहले अप्रैल-जून तिमाही में विकास दर 6.9 फीसदी थी।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 तिमाही में वास्तविक GDP 7.8 फीसदी बढ़ी, जबकि मौजूदा कीमतों पर यानी नॉमिनल GDP में 10.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। वास्तविक GVA की वृद्धि 8.2 फीसदी रही।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रदर्शन को देश की सामूहिक ताकत का नतीजा बताया। प्रधानमंत्री ने 7.8 फीसदी की GDP वृद्धि को “असाधारण उपलब्धि” करार देते हुए कहा कि यह भारतीयों की सामूहिक शक्ति को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शन देश की आर्थिक मजबूती और बढ़ते आत्मविश्वास को दिखाता है।
7.8% growth.
— Narendra Modi (@narendramodi) September 1, 2026
Strong numbers.
Even stronger confidence. pic.twitter.com/ZVPpnAXrVU
जानकारों की मानें तो भारत ने जो विकास दर हासिल की है, उसमें डिमांड और कंजम्पशन, मैन्युफैक्चरिंग और इन्वेस्टमेंट का बड़ा हाथ रहा है।
घरेलू मांग और खर्च ने संभाली अर्थव्यवस्था
सीनियर इकोनॉमिस्ट और पॉलिसी एक्सपर्ट आकाश जिंदल के मुताबिक, पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था की मजबूत विकास दर के पीछे घरेलू मांग और खपत की अहम भूमिका रही। इसका असर सिर्फ GDP के आंकड़ों में ही नहीं, बल्कि GST कलेक्शन, डिजिटल पेमेंट और ऑटोमोबाइल बिक्री जैसे दूसरे आर्थिक इंडिकेटर्स में भी दिखाई दिया।
जिंदल कहते हैं, “भारत ने जो विकास दर हासिल की है, उसमें घरेलू डिमांड और कंजम्पशन का बहुत बड़ा रोल है। GST, डिजिटल पेमेंट और दूसरे संकेतक बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में लेन-देन और खपत की गतिविधियां बढ़ रही हैं।”
सरकारी GDP आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) 7.1 फीसदी बढ़ा। यानी लोगों की ओर से वस्तुओं और सेवाओं पर किया जाने वाला खर्च पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले तेज रहा। इसी अवधि में सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF), यानी निवेश, 11.9 फीसदी बढ़ा, जो एक साल पहले की 5.8 फीसदी वृद्धि से काफी अधिक है।

निवेश और मैन्युफैक्चरिंग ने दिया सहारा
जिंदल का दूसरा बड़ा तर्क निवेश और मैन्युफैक्चरिंग को लेकर है और सरकारी आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि इन दोनों क्षेत्रों ने विकास दर में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
अप्रैल-जून तिमाही में Gross Fixed Capital Formation (GFCF) यानी स्थायी परिसंपत्तियों में निवेश 11.9 फीसदी बढ़ा। एक साल पहले इसी तिमाही में इसकी वृद्धि 5.8 फीसदी थी।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर 9.2 फीसदी बढ़ा, जबकि सर्विस सेक्टर की वृद्धि दर 10 फीसदी रही। वित्तीय सेवाओं, रियल एस्टेट, IT और प्रोफेशनल सर्विसेज में 12.1 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
जिंदल कहते हैं, “मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने अच्छा प्रदर्शन किया है और निवेश भी मजबूत रहा है। सरकार की नीतियों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च ने आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया है।”
एक्सपोर्ट भी अर्थव्यवस्था के लिए सहारा बने। अप्रैल-जून तिमाही में वस्तुओं और सेवाओं का कुल निर्यात 12 फीसदी बढ़ा। वहीं, वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, पेट्रोलियम और रत्न-आभूषण को छोड़कर अन्य वस्तुओं का निर्यात इस दौरान 87.88 अरब डॉलर से बढ़कर 99.04 अरब डॉलर हो गया।

एक्सपर्ट भी एकमत नहीं
हां, पॉलिटिकल इकोनॉमिस्ट और कॉलमिस्ट ऑनिंद्यो चक्रवर्ती GDP के आंकड़ों में इस्तेमाल किए गए महंगाई समायोजन यानी GDP Deflator पर सवाल उठाते हैं।
उनका तर्क है कि मौजूदा कीमतों पर GDP 10.3 फीसदी बढ़ी, जबकि महंगाई समायोजित यानी वास्तविक GDP वृद्धि 7.8 फीसदी बताई गई है। इन दोनों आंकड़ों के अंतर से GDP डिफ्लेटर करीब 2.3 फीसदी निकलता है।
चक्रवर्ती सवाल उठाते हैं कि जब उसी अवधि में उपभोक्ता और थोक कीमतों में अधिक वृद्धि दर्ज की गई, तो GDP की गणना में इस्तेमाल होने वाला महंगाई समायोजन इतना कम कैसे हो सकता है।
चक्रवर्ती एक अनुमान के आधार पर CPI और WPI को मिलाकर अर्थव्यवस्था की एक ‘प्रभावी महंगाई’ निकालने की कोशिश करते हैं। उनके अनुमान के अनुसार, अगर दो-तिहाई हिस्से पर खुदरा और एक-तिहाई पर थोक महंगाई का प्रभाव माना जाए, तो प्रभावी महंगाई करीब 5.7 फीसदी बैठती है।
उनके मुताबिक, इस आधार पर वास्तविक GDP वृद्धि आधिकारिक 7.8 फीसदी से कम हो सकती है और इसे करीब 6.3 से 6.5 फीसदी के आसपास माना जा सकता है। जिसे दूसरे देशों की तुलना में बहुत अच्छा कहा जा सकता है।
हालांकि, आकाश जिंदल इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं। वह कहते हैं,
पश्चिम एशिया युद्ध का असर नहीं हुआ?
7.8 फीसदी की GDP वृद्धि का यह मतलब नहीं है कि पश्चिम एशिया में युद्ध और बढ़ते तेल के दामों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ा। अप्रैल-जून तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि इस संघर्ष ने भारत के आयात खर्च और महंगाई के जोखिम को बढ़ाया है।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल सालाना आधार पर 26 फीसदी बढ़कर 49 अरब डॉलर हो गया। एक साल पहले अप्रैल-जून 2025 में यह 39 अरब डॉलर था।
दिलचस्प बात यह है कि भारत ने इस दौरान तेल की मात्रा कम आयात की, लेकिन फिर भी ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ा। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 में भारत ने 5.97 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 7.30 करोड़ टन था। यानी आयात की मात्रा करीब 18 फीसदी कम रही, लेकिन वैश्विक कीमतें बढ़ने के कारण कुल आयात बिल बढ़ गया।
पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण आपूर्ति बाधित हुई और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा। भारत अपनी सालाना कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88 फीसदी आयात करता है। ऐसे में तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का सीधा असर भारत के आयात बिल और विदेशी मुद्रा की जरूरत पर पड़ता है।
आम आदमी को क्या मिला?
GDP की तेज रफ्तार का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि इसका फायदा आम आदमी तक कितना पहुंच रहा है। जिंदल का तर्क है कि मजबूत आर्थिक गतिविधि से रोजगार और आय का एक सकारात्मक चक्र बन सकता है।
वह कहते हैं, “जब अर्थव्यवस्था बढ़ती है, तो आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं और रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। एक व्यक्ति का खर्च दूसरे व्यक्ति या कारोबार की आय बनता है। इससे खर्च, उत्पादन और आय का एक चक्र बनता है।”
वहीं, चक्रवर्ती इस बात पर सवाल उठाते हैं कि GDP की ऊंची दर आम लोगों के जीवन स्तर में कितनी दिखाई दे रही है। उनका कहना है,
गोल्ड पर पीएम की फिर वो अपील
PM ने एक बार फिर लोगों से गैर-जरूरी सोने की खरीदारी से बचने की अपील की। उन्होंने कहा, “अगर जरूरत न हो तो सोना नहीं खरीदना चाहिए।” इससे पहले 10 मई को भी PM ने देशवासियों से सोना नहीं खरीदने की अपील की थी। इसके साथ ही उन्होंने गैर-जरूरी विदेशी खर्चों में कटौती और देश के भीतर ही पर्यटन को बढ़ावा देने की भी अपील की है।
विदेशी यात्रा और सोने के आयात पर बात करते हुए जिंदल कहते हैं कि भारत के लिए विदेशी मुद्रा भंडार और डॉलर का प्रबंधन महत्वपूर्ण है।
”भारत में सोना खरीदना शुभ माना जाता है और शादियों में इसकी एक अलग सामाजिक अहमियत है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि सोने का एक बड़ा हिस्सा आयात किया जाता है। इसलिए बहुत ज्यादा आयात का असर विदेशी मुद्रा पर पड़ सकता है। प्रधानमंत्री ने सोने के आयात और घरेलू बचत को लेकर जो बात कही है, उसे इसी व्यापक आर्थिक संदर्भ में देखना चाहिए।”
जानकारों की मानें तो भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है, लेकिन बाहरी जोखिम खत्म नहीं हुए हैं। डॉलर की ऊंची कीमत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा जोखिम है। कमजोर रुपया आयात को महंगा कर सकता है और इससे महंगाई बढ़ सकती है।
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