
यूरेनियम का नाम सुनते ही सबसे पहले आपके मन में क्या तस्वीर उभरती है? परमाणु बम… न्यूक्लियर एनर्जी… यह एक ऐसी चीज है, जिसमें इतनी ताकत है कि वह पूरे शहर को महीनों तक बिजली दे सकता है। और वही ताकत अगर गलत दिशा में मुड़ जाए, तो पलक झपकते ही दुनिया का नक्शा बदल सकती है। लेकिन अब यही यूरेनियम चोरी-छिपे हमारे आपके पानी के गिलास और थालियों तक पहुंच रहा है। भारत के कई राज्यों के भूजल में ये खतरनाक केमिकल घुल रहा है।
पानी में इसकी मौजूदगी अब केवल पंजाब या राजस्थान के इलाकों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली तक इसने पहुंच बना ली है। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर कमीशन (CGWC) की ताजा रिपोर्ट चौंकाने वाली है। चेतावनी इतनी बड़ी है कि दिल्ली के पानी में यूरेनियम की रिपोर्ट पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी खुद संज्ञान लिया है। सवाल ये है कि आखिर पानी में घुल रहा ये ‘जहर’ कितना खतरनाक है और इससे किस तरह बचा जा सकता है? आइए समझते हैं।
दिल्ली के पानी में कितना यूरेनियम?
सेंट्रल ग्राउंड वॉटर कमीशन (CGWC) केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अधीन देश भर में भूजल संसाधनों के वैज्ञानिक मूल्यांकन, निगरानी और प्रबंधन की मुख्य राष्ट्रीय एजेंसी है। कुछ समय पहले बिहार के कुछ इलाकों में ब्रेस्ट मिल्क में यूरेनियम मिलने की रिपोर्ट भी आई थी। अब CGWC की ‘ग्राउंड वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट- 2025’ में दिल्ली के पानी में घुल रहे यूरेनियम को लेकर जानकारी दी गई है।
- भारत में 151 जिलों और 18 राज्यों में ग्राउंडवॉटर में यूरेनियम प्रदूषण मिला है।
- दिल्ली में लिए गए एक-तिहाई से ज्यादा ग्राउंड वॉटर सैंपल्स में यूरेनियम तय लिमिट से अधिक पाया गया है।
- दिल्ली में लिए गए 83 सैंपल में से 24 में यूरेनियम की मात्रा CPCB की सेफ लिमिट से अधिक पाई गई।
- सीमा से अधिक यूरेनियम सैंपल के लिहाज से पंजाब, हरियाणा के बाद दिल्ली तीसरे स्थान पर है।
- बिहार में ग्राउंड वॉटर के लगभग 1.7% सोर्स इससे प्रभावित बताए गए हैं।
स्टडी से पता चलता है कि भारत में अधिकतर जगहों पर ग्राउंड वाटर सेफ है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में यूरेनियम का स्तर बढ़ रहा है। भूजल में यूरेनियम की अधिक मात्रा मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत के ग्राउंड वॉटर में पाई गई है। खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात व मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में। तेलंगाना, कर्नाटक और झारखंड के कुछ हिस्सों में भी इसके कुछ मामले सामने आए हैं। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में कहीं-कहीं तो यूरेनियम की बढ़ी हुई मात्रा 30 ppb (Parts Per Billion) से अधिक पाई गई।

मॉनसून के बाद बढ़ जाता है यूरेनियम
साल 2024 में मॉनसून से पहले और बाद में, पानी में यूरेनियम की मात्रा जांचने के लिए 27 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 3,754 ग्राउंडवाटर सैंपल का टेस्ट किया गया। मॉनसून से पहले 6.71% और मॉनसून के बाद 7.91% सैंपल में यूरेनियम का लेवल सेफ लिमिट (30 ppb) से अधिक पाया गया। मतलब, बारिश के बाद जमीन के अंदर पानी में यूरेनियम का लेवल थोड़ा बढ़ जाता है।
CGWC की रिपोर्ट के मुताबिक, भौगोलिक दृष्टि से उत्तर-पश्चिमी भारत (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से) यूरेनियम प्रदूषण के मुख्य हॉटस्पॉट के रूप में उभरे। सबसे अधिक यूरेनियम प्रदूषण पंजाब के सैंपलों में मिला है।
उत्तर-पश्चिमी राज्यों में ज्यादा यूरेनियम की वजहों में संभवतः भू-वैज्ञानिक कारणों के अलावा भूजल स्तर में गिरावट और एक्विफर (Aquifer - जमीन के नीचे मौजूद चट्टानों, रेत या कंकड़ की परत) की अलग विशेषताओं को माना गया।
राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मीडियम लेवल का प्रदूषण देखा गया। पूर्वी और दक्षिणी भारत में प्रदूषण का स्तर बहुत कम दर्ज किया गया। अधिकतर अन्य राज्यों में यूरेनियम का लेवल सेफ लिमिट के भीतर था।
- टोटल ग्राउंड वॉटर सैंपल- 3754
- स्टेट/केंद्र शासित प्रदेश-27
- यूरेनियम सेफ लिमिट- 30 ppb (Part Per Billion)
- प्री-मॉनसून सैंपल हाई यूरेनियम-6.71%
- पोस्ट-मॉनसून सैंपल हाई यूरेनियम-7.91%

पानी में कैसे घुलता है यूरेनियम?
यूरेनियम जमीन के नीचे के पानी और सतह के पानी में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। एक रेडियोएक्टिव मिनरल होने के कारण, यूरेनियम की अधिक मात्रा पानी, मिट्टी और हेल्थ पर असर डाल सकती है। यूरेनियम के प्राकृतिक और इंसानी, दोनों तरह के स्रोत होते हैं जिनसे यह एक्विफर (जमीन के नीचे पानी को रोकने वाली चट्टानी परत) तक पहुंच सकता है। प्राकृतिक भंडारों से रिसकर, यूरेनियम मिल व न्यूक्लियर इंडस्ट्री के कचरे से निकलकर, फ्यूल जलाने से और फॉस्फेट फर्टिलाइजर के इस्तेमाल से भी ये पानी को दूषित कर सकता है।
किन चट्टानों में कितना यूरेनियम?
| चट्टान | रेंज(mg/kg) |
| ग्रेनाइट | 3.4 |
| चूना पत्थर/डोलोमाइट | 2.2 |
| आर्गिलेसियस शेल | 3.7 |
| सेडिमेंट्स | 1.4-53 |
| फॉस्फेट्स | 30-100 |
यूरेनियम इंसानी शरीर में कैसे पहुंचता है?
यूरेनियम मुख्य रूप से पीने के पानी, खाने-पीने की चीजों, हवा और काम-काज या दुर्घटना के दौरान संपर्क में आने से इंसानी शरीर के टिश्यूज में पहुंचता है। हवा और पानी के जरिए यूरेनियम का शरीर में पहुंचना आम तौर पर कम होता है। हालांकि, अगर पीने के पानी के स्रोत में यूरेनियम मौजूद हो, तो ये पीने के पानी के जरिए शरीर में जा सकता है।
पानी में यूरेनियम कितना खतरनाक?
पीने के पानी में यूरेनियम के लिए 30 ppb की सीमा सुरक्षित मानी जाती है। BIS, 10500:2012 के इस पैरामीटर का मतलब पानी के एक अरब कणों में अगर 30 कण यूरेनियम के घुले हों तो वो खतरनाक नहीं होते। एक लीटर पानी में 0.03 मिलीग्राम से ज्यादा यूरेनियम कण हों तो उसे पीना सुरक्षित नहीं है।
यूरेनियम की अधिकता वाला पानी लगातार पीने से ये नुकसान हो सकते हैं-
- यूरिनरी ट्रैक्ट कैंसर- शरीर में पेशाब बनने और उसे शरीर से निकालने वाले अंगों में कैंसर का खतरा
- किडनी टॉक्सिसिटी- गुर्दे में जहरीले तत्व बढ़ने से किडनी को नुकसान हो सकता है
- आर्सेनिक, लेड और यूरेनियम जैसी जहरीली धातुएं न्यूरोलॉजिकल, हड्डियों, किडनी और कैंसर से जुड़ी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती हैं
- आयरन और मैंगनीज का बढ़ा हुआ स्तर खास तौर से शिशुओं और बच्चों के लिए रिस्क पैदा करता है।
यूरेनियम की अधिकता ग्राउंडवाटर की पीने लायक क्वालिटी को खराब कर देती है। इससे यह पीने और घरेलू इस्तेमाल के लिए कम उपयुक्त हो जाता है। इससे मिट्टी और फसलों में मेटल जमा हो सकते हैं, जिससे खेती और फूड सिक्योरिटी पर असर पड़ता है। इसके अलावा, ट्रेस मेटल का बढ़ा हुआ लेवल एक्विफर सिस्टम से रिसाव या इंसानी गतिविधियों (जैसे इंडस्ट्रीयल कचरा, माइनिंग और फर्टिलाइजर) से होने वाले प्रदूषण का संकेत देता है।
पानी में यूरेनियम से कैसे करें बचाव?
यूरेनियम के प्रदूषण के मामले में कई तरह की ट्रीटमेंट तकनीकें उपलब्ध हैं। इनमें जिनमें एडसॉर्प्शन, कोएगुलेशन, एक्सट्रैक्शन, रिवर्स ऑस्मोसिस और इवैपोरेशन शामिल हैं। सही तरीके का चुनाव लागत, क्षमता और स्थानीय स्थितियों पर निर्भर करता है। बेहतर नतीजों के लिए मिले-जुले या जरूरत के हिसाब से तरीकों का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।
हड्डिया देती हैं यूरेनियम का संकेत
केंद्रीय भूजल बोर्ड CGWB की आकलन रिपोर्ट और ग्लोबल टॉक्सिकोलॉजी अध्ययनों स्टडी में हड्डियों को लंबे समय तक यूरेनियम युक्त पानी के यूज का एक प्रमुख बायोइंडिकेटर माना गया है। इसमें पीने के पानी में यूरेनियम की मात्रा और हड्डियों में यूरेनियम के बीच गहरा संबंध पाया गया है। पता चला कि पेयजल के ज़रिए शरीर में यूरेनियम का पता लगाने के लिए हड्डियां एक अच्छा जरिया हैं। ऐसे में जिन देशों में पीने के पानी में यूरेनियम का लेवल अधिक है, वहां इंसानों और पर्यावरण पर इसके दुष्प्रभाव की जांच एक अच्छा कदम हो सकता है।




