EXPLAINED: 7000 किमी लंबी लाइन और 6 देश... मॉस्को से घूमते हुए दिल्ली कैसे पहुंचेगी रेल!
रूस के उप प्रधानमंत्री ने भारत-रूस के बीच डायरेक्ट ट्रेन नेटवर्क की चर्चा छेड़ी है। लेकिन सवाल कई हैं- ये प्रोजेक्ट जमीन पर कैसे उतरेगा? रास्ते में पड़ने वाले देशों में क्या-क्या चुनौतियां आ सकती हैं? और इन चुनौतियों का समाधान कैसे होगा? पढ़िए ये रिपोर्ट।

रूस से भारत का हजारों किलोमीटर का सफर, बीच में कई देश और एक ऐसा रेल रूट, जो दोनों देशों के व्यापार की तस्वीर बदल सकता है।

रूस के डिप्टी प्राइम मिनिस्टर मरात खुस्नुलिन ने हाल ही में भारत तक सीधे रेल संपर्क का आइडिया दिया। यानी मॉस्को से भारत तक जमीन के रास्ते, ज्यादा सीधी और लगातार रेल कनेक्टिविटी। अभी ये प्लानिंग की स्टेज में है, लेकिन इस प्लान की एक दिलचस्प कड़ी है। 

दरअसल रूस और भारत को जमीन के रास्ते जोड़ने का प्लान नया नहीं है। करीब 25 साल पहले भारत, रूस और ईरान ने INSTC यानी इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर की शुरुआत की थी। इसके जरिए भी रूस और भारत के बीच सामान की आवाजाही होती है। 

तो सवाल है- जब रूस और भारत के बीच ट्रेड के लिए INSTC पहले से मौजूद है, तो फिर अब नई रेल कनेक्टिविटी की बात क्यों? ये नया प्लान पुराने INSTC से कितना अलग है?

पहले समझिए INSTC है क्या

इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर की शुरुआत साल 2000 में हुई, लेकिन INSTC कोई एक सीधी रेलवे लाइन नहीं है। यह एक मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क है जिसमें रेल, सड़क और समुद्री रास्ते शामिल हैं। यानी रूस से निकला माल एक ही ट्रेन में लदकर भारत नहीं पहुंचता। माल अलग-अलग चरणों में रेल → सड़क→ पोर्ट → के जरिए भारत तक पहुंचता है।

इसके कई रूट हैं, लेकिन एक अहम रूट रूस → कजाखस्तान → तुर्कमेनिस्तान → ईरान → भारत है।

यानी जिस तरह की भारत-रूस रेल कनेक्टिविटी की आज चर्चा हो रही है, उसका एक हिस्सा INSTC के अंदर पहले से मौजूद है। लेकिन ये आंशिक रूप से ही चालू है।

फिर रूस का नया प्लान है क्या?

यहीं से रूस के नए प्रस्ताव की असली कहानी शुरू होती है। रूसी डिप्टी पीएम के नए विचार में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रूस से भारत तक माल कैसे पहुंचाया जाए।

सवाल यह है कि क्या दोनों देशों के बीच ज्यादा सीधा और लगातार ओवरलैंड रेल कनेक्शन बनाया जा सकता है? 

उप प्रधानमंत्री खुस्नुलिन ने रूस की प्रमुख सरकारी न्यूज एजेंसी TASS से बातचीत में कहा-

"हिंद महासागर तक रेल कनेक्टिविटी के नए विकल्प तलाशे जाने चाहिए, क्योंकि बोस्फोरस और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े जोखिमों के चलते वैकल्पिक रास्तों की जरूरत हो सकती है।" 

उन्होंने तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते संभावित रूट तलाशने की बात कही और साफ किया कि भारत तक पहुंच देने वाला कोई भी व्यवहार्य विकल्प स्वीकार्य होगा।

डिप्टी पीएम के बयान से साफ है कि फिलहाल रूस ने कोई एक तय रूट घोषित नहीं किया है, बल्कि इन देशों के जरिए भारत तक पहुंचने वाले अलग-अलग विकल्पों की संभावना तलाशने की बात कही है। 

संभावित रूट क्या हो सकता है? 

रूस→तुर्कमेनिस्तान → ईरान → अफगानिस्तान→पाकिस्तान→भारत

खुस्नुलिन ने जिन देशों का जिक्र किया है, उसके मुताबिक ये संभावित रूट हो सकता है, हालांकि ये अभी फाइनल नहीं है, संभावित विकल्प है।

तो INSTC और नए प्लान में फर्क क्या है?

सीधे शब्दों में- INSTC एक मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क है। यानी INSTC कोई एक रेल लाइन नहीं, बल्कि रेल, सड़क और समुद्री रास्तों को जोड़ने वाला परिवहन नेटवर्क है। 

वहीं रूस का नया प्लान ज्यादा डायरेक्ट और रेल केंद्रित कनेक्टिविटी की संभावना तलाशने की दिशा में कदम है।

इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर का रूट मैपRT

रेल प्रोजेक्ट बेहतरीन पहलः एक्सपर्ट

RT हिंदी ने इस प्रस्तावित रेल परियोजना को लेकर जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट और JNU की प्रोफेसर राज यादव से बात की। 

Raj on Project
मौजूदा जियो पॉलिटिक्स और माहौल को देखते हुए, खुस्नुलिन द्वारा भारत तक सीधे रेल कनेक्शन की जो संभावना जताई गई है, वह एक बेहद महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट साबित हो सकता है। हालांकि INSTC पहले से मौजूद है, पर वह अभी आंशिक रूप से ही चालू है। हमें केवल एक ही व्यापारिक मार्ग पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अन्य वैकल्पिक मार्गों पर भी काम करना चाहिए। इस लिहाज से यह रेल परियोजना एक बेहतरीन पहल होगी।
राज यादव
राज यादव
प्रोफेसर, JNU

रूस-भारत रेल लाइन बिछाना कितना आसान? 

नक्शे पर रूस और भारत के बीच एक लाइन खींचना आसान है। लेकिन जमीन पर उस लाइन के बीच कई देश, कई सीमाएं और कई जियो पॉलिटिकल समीकरण मौजूद हैं। सिलसिलेवार तरीके से इन चुनौतियों को समझते हैं- 

पहली चुनौती- जियोग्राफी

रूस से भारत तक का रास्ता हजारों किलोमीटर लंबा है। बीच में सेंट्रल एशिया, ईरान और संभावित रूप से अफगानिस्तान और पाकिस्तान भी अगर इस रेल रूट में आए तो लंबी दूरी, पहाड़ी इलाके और रेगिस्तान- ये चुनौतियां पार करनी होंगी।

दूसरी चुनौती- इन्फ्रास्ट्रक्चर

ट्रेन सिर्फ ट्रैक से नहीं चलती। इस रूट के लिए संबंधित देशों में कई तरह की जरूरतें पूरी करनी होंगी- टर्मिनल, सिग्नलिंग, माल ढुलाई की व्यवस्था, कस्टम सुविधाएं, सीमा पर बुनियादी ढांचा और एक-दूसरे के अनुकूल रेलवे सिस्टम। 

Raj on Infra
रूस से भारत तक रेल नेटवर्क बिछाने के लिए एक बहुत बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होगी। लेकिन चुनौतियां तो हर काम में होती हैं। जब अलग-अलग देशों के बीच बेहतर सहयोग होगा, तो ये चुनौतियां एक बड़े अवसर के रूप में बदल जाएंगी।
राज यादव
राज यादव
प्रोफेसर, JNU

तीसरी चुनौती- जियो पॉलिटिक्स

अगर रूट अफगानिस्तान-पाकिस्तान से होते हुए भारत तक निकलता है, तो कुछ पेचीदगियां सुलझानी होंगी, जैसे-

  • पाकिस्तान की ट्रांजिट पॉलिसी

  • अफगानिस्तान में सिक्योरिटी

  • भारत-पाकिस्तान के संबंध 

अफगान तालिबान ने किया समर्थन 

तालिबान के अर्थव्यवस्था मंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुल रहमान हबीब ने RT इंडिया की न्यूज हेड रुनझुन शर्मा से हाल में एक इंटरव्यू में कहा था कि रूस और भारत के बीच प्रस्तावित रेल कनेक्टिविटी के लिए सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराने का अफगानिस्तान समर्थन करता है। हबीब ने कहा, ‘अफगानिस्तान एक महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति में है। यह परियोजना रोजगार के कई अवसर पैदा करेगी।’

क्या पाकिस्तान पर फंसेगा पेच? 

इंटरनेशनल अफेयर्स एक्सपर्ट प्रो. अनुराधा चिनॉय ने आरटी इंडिया से विशेष बातचीत में, प्रस्तावित भारत-रूस रेल लिंक प्रोजेक्ट पर कहा कि-

“यह एक बेहद सरहनीय और रणनीतिक प्रस्ताव है, जो कई साल पुरानी तापी (TAPI) पाइपलाइन परियोजना की याद दिलाता है। इस परियोजना से भारत की तेल की कमी और निर्भरता जैसे कई मुद्दों का समाधान हो सकता था। लेकिन, जिन क्षेत्रों से यह पाइपलाइन गुजर रही थी, वहां के संघर्षों के स्वरूप के कारण कोई भी उन इलाकों की सुरक्षा की गारंटी लेने को तैयार नहीं था।”

दरअसल कई साल पहले TAPI गैस पाइपलाइन का प्रस्ताव आया था, जिसमें तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत शामिल थे। लेकिन ये ठंडे बस्ते में चला गया। 

Raj on TAPI
पाकिस्तान और अफगानिस्तान को इस परियोजना में साथ लाना और सहमत करना रूस के लिए एक बड़ी भूमिका हो सकती है। यदि रूस के जरिए भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और चीन के बीच क्षेत्रीय और सीमा संबंधी तनाव कम होते हैं, तो यह एक बहुत बड़ा कूटनीतिक ब्रेकथ्रू होगा।
राज यादव
राज यादव
प्रोफेसर, JNU

प्रस्तावित रेल प्रोजेक्ट की जमीनी चुनौतियों पर बात करते हुए प्रोफेसर चिनॉय ने कहा कि-

“मुझे डर है कि इस प्लान (प्रस्तावित भारत-रूस सीधे रेल नेटवर्क / कॉरिडोर) के साथ भी ऐसा ही कुछ हो सकता है, क्योंकि पाकिस्तान से होकर गुजरने वाले किसी भी प्रोजेक्ट पर भारत दो बार सोचेगा। भारत इस मार्ग की सुरक्षा को लेकर सतर्क रहेगा, जिसके समाधान के लिए रूस को इस गलियारे की सुरक्षा की गारंटी खुद लेनी होगी और संवेदनशील क्षेत्रों में इसका स्वामित्व अपने पास रखते हुए पाकिस्तान को केवल ट्रांजिट शुल्क देना होगा, ताकि भारत सरकार सुरक्षा जोखिमों से परे हटकर इस आर्थिक अवसर पर सकारात्मक पुनर्विचार कर सके।”

ये प्रोजेक्ट कितना फायदेमंद रहेगा?

इस पर प्रोफेसर राज यादव कहती हैं कि यह रेल नेटवर्क व्यापार के लिए बहुत किफायती होगा और माल ढुलाई को आसान बनाएगा। मार्ग में पड़ने वाले देशों में ट्रांजिट कॉरिडोर बनेंगे। भारत और रूस के अलावा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और कजाकिस्तान भी अपने व्यापार को बढ़ावा दे सकेंगे। ये प्रोजेक्ट सभी संबंधित देशों के लिए एक ‘विन-विन’ स्थिति पैदा करेगी, क्योंकि व्यापार और परिवहन ही आर्थिक विकास की कुंजी हैं।”

इसलिए भारत-रूस के इस नए प्रोजेक्ट की कहानी सिर्फ “एक नई रेल लाइन” की कहानी नहीं है।

यह कहानी है- पुराने INSTC को कितना मजबूत बनाया जा सकता है... और क्या उसके आगे एक ज्यादा डायरेक्ट रूस–इंडिया लैंड कॉरिडोर की नई संभावना बनाई जा सकती है? क्योंकि मॉस्को से दिल्ली के बीच दूरी सिर्फ किलोमीटर की नहीं है। बीच में जियोग्राफी है, इन्फ्रास्ट्रक्चर है, और सबसे बढ़कर-कई देशों की जियो पॉलिटिक्स है।

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