23 सेकंड का 360° Analysis : मोदी-जिनपिंग हैंडशेक के एक्सपर्ट्स से मायने समझिए
भारत और चीन के विशेषज्ञों ने मोदी-जिनपिंग की मुलाकात को विश्वास बहाली का नया दौर बताया है। उनके मुताबिक, सीमा पर शांति और मतभेदों को विवाद बनने से रोककर दोनों देश व्यापार, तकनीक और ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर सहयोग बढ़ा सकते हैं।

कूटनीति में कई बार कुछ सेकंड की तस्वीर लंबे बयानों से ज्यादा बड़ा संदेश दे जाती है। दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का करीब 23 सेकंड तक हाथ मिलाना भी ऐसा ही पल था।

दोनों नेता न केवल देर तक हाथ मिलाते रहे, बल्कि इस दौरान मुस्कुराते हुए बातचीत करते भी दिखाई दिए। सीमा विवाद और तनाव से गुजरे दो पड़ोसी देशों के नेताओं की इस सहजता को भारत और चीन के रिश्तों में एक नए दौर की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

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चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने विशेषज्ञों के हवाले से इसे भारत-चीन के बीच विश्वास बहाली का नया दौर बताया। इधर, विदेश मामलों के विशेषज्ञ डॉ. वाइल अव्वाद ने ANI से कहा कि सीमा विवाद और दूसरे मतभेदों के बावजूद दोनों देशों का बातचीत की मेज पर बैठना दुनिया के लिए एक उदाहरण है। दोनों पक्षों के विशेषज्ञों की राय में एक बात समान है कि भारत और चीन अपने मतभेदों को विवाद में बदलने से रोकें तो व्यापार से लेकर तकनीक और वैश्विक राजनीति तक साथ मिलकर बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

ग्लोबल टाइम्स ने भी अपनी रिपोर्ट में 'करीब आधे मिनट तक चले हैंडशेक' का जिक्र किया है।

रिश्तों में सुधार के सिलसिले की नई कड़ी

पीएम मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच लगातार तीसरे साल शीर्ष स्तर पर मुलाकात हुई है। दोनों नेता 2024 में रूस के कजान और 2025 में चीन के तियानजिन में मिले थे। हाल में SCO सम्मेलन के दौरान हुई बातचीत के बाद अब दिल्ली में BRICS के मंच पर दोनों नेताओं की मुलाकात ने रिश्तों में सुधार के इसी सिलसिले को आगे बढ़ाया है।

पेकिंग यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज के कार्यकारी उपनिदेशक वांग शू ने ग्लोबल टाइम्स से कहा कि कजान की मुलाकात भारत-चीन संबंधों में बदलाव का मोड़ थी। तियानजिन ने रिश्तों को दोबारा स्थिर रास्ते पर लाने में मदद की और अब दिल्ली की बैठक को विश्वास बहाली के नए चरण के रूप में देखा जा सकता है।

Wang Xu
इस नए चरण में दोनों देशों के बीच बनी सहमति को ठोस व्यवस्था और वास्तविक नतीजों में बदलने पर जोर रहेगा।
वांग शू
वांग शू
पेकिंग यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज के एग्जीक्यूटिव डिप्टी डायरेक्टर

‘भारत और चीन ने दुनिया के सामने उदाहरण रखा’

डॉ. वाइल अव्वाद ने ANI से कहा कि भारत और चीन ने दुनिया के सामने इसका सबसे अच्छा उदाहरण पेश किया है कि मतभेदों के बावजूद बातचीत कैसे जारी रखी जा सकती है।

उन्होंने कहा, 'एशिया की इन दो बड़ी ताकतों के बीच मतभेद और सीमा विवाद हैं। इसके बावजूद दोनों देश बातचीत की मेज पर बैठकर अपने रिश्तों और बढ़ते द्विपक्षीय व्यापार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर पा रहे हैं।'

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अव्वाद के मुताबिक, यही संदेश BRICS के लिए भी अहम है। समूह के सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद और विरोधाभास थे, फिर भी वे नई दिल्ली घोषणापत्र पर सहमति बनाने में सफल रहे।

उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने स्पष्ट संदेश दिया है कि मतभेदों को विवाद में नहीं बदलने देना चाहिए। भारत में BRICS सम्मेलन के बाद अगला सम्मेलन चीन में होना है। ऐसे में भारत और चीन के विचारों का तालमेल बहुध्रुवीय दुनिया को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता।© ANI

रिश्तों पर हावी न हों मतभेद

भारत और चीन के बीच सीमा सहित कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इनका तुरंत समाधान भले ही संभव न हो, लेकिन इन्हें पूरे द्विपक्षीय संबंध को नियंत्रित करने से रोका जा सकता है।

वांग शू ने कहा कि शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे दोनों देशों के रिश्ते सही दिशा में बने रहते हैं। संवाद के जरिए मतभेदों को संभाला जा सकता है और किसी गलत आकलन के कारण तनाव बढ़ने का खतरा कम किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, 'सहयोग का दायरा जितना व्यापक होगा, मतभेदों का बोझ उतना ही कम होगा।' इससे दोनों देशों के संबंध अधिक स्थिर होंगे और मुश्किल परिस्थितियों का सामना बेहतर तरीके से कर सकेंगे।

डॉ. अव्वाद ने भी कहा कि मोदी-जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक ने दोनों देशों के अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया है कि रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए दोनों तरफ से भरोसा बढ़ाने वाले कदम उठाए जाने चाहिए।

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सीमा पर शांति के बिना रिश्तों में मजबूती मुश्किल

पीएम मोदी ने द्विपक्षीय बातचीत के दौरान कहा कि रिश्तों के विकास के लिए सीमा पर शांति जरूरी है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि दोनों देशों के मतभेदों को विवाद नहीं बनने देना चाहिए।

डॉ. अव्वाद के मुताबिक, भारत अपनी संप्रभुता और अखंडता को लेकर अपने रुख पर कायम है। सीमा के मामले में समझौता नहीं करने का भारत का संदेश भी चीन तक पहुंच चुका है।

उन्होंने कहा कि गलवान की घटना गंभीर थी, लेकिन भारत-चीन संबंधों को केवल उसी एक घटना के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। पिछले दशकों में दोनों देशों की सेनाओं के बीच बातचीत के कई दौर हुए और लंबे समय तक सीमा पर शांति भी बनी रही।

उनके मुताबिक, भारत ने चीन को साफ कर दिया है कि वह अपनी सीमा, जमीन, संप्रभुता और अखंडता पर समझौता नहीं कर सकता। इसके साथ ही भारत अच्छे पड़ोसी संबंध, बेहतर व्यापार और विवाद का शांतिपूर्ण समाधान भी चाहता है।

सीमा व्यापार से सीधी उड़ानों तक दिखा सुधार

ग्लोबल टाइम्स ने बॉर्डर मैनेजमेंट पर बनी सहमति, सीमा व्यापार की बहाली, सीधी उड़ानों की वापसी और लोगों के बीच बढ़ते संपर्क को रिश्तों में सुधार के ठोस संकेत बताया है।

वांग शू ने कहा कि दो बड़े देशों के बीच राजनीतिक विश्वास केवल बयानों से नहीं बनता, बल्कि उसके लिए ठोस कदम उठाने पड़ते हैं। सीमा विवाद को संभालने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत करना, लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना और व्यापार एवं निवेश को जरूरत से ज्यादा सुरक्षा के नजरिए से देखने से बचना ऐसे ही कदम हो सकते हैं।

’भारत और चीन एक-दूसरे के पूरक’

इंडिया चाइना इकोनॉमिक एंड कल्चरल काउंसिल के सीईओ मोहम्मद साकिब ने ग्लोबल टाइम्स से कहा कि चीन भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है और दोनों देशों के पास सहयोग की काफी गुंजाइश है।

उन्होंने कहा कि चीन हार्डवेयर और उत्पादन के क्षेत्र में मजबूत है, जबकि भारत की ताकत सॉफ्टवेयर और बड़ी संख्या में मौजूद युवा प्रतिभाएं हैं। ये क्षमताएं दोनों देशों को आर्थिक और सामाजिक विकास में एक-दूसरे का पूरक बनाती हैं।

डॉ. अव्वाद ने भी कहा कि भारत और चीन के हित कई जगह एक-दूसरे से जुड़े हैं। दोनों एक-दूसरे के बिना आगे नहीं बढ़ सकते और बातचीत के जरिए अपनी समस्याएं सुलझा सकते हैं।

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बात याद करते हुए कहा कि दुनिया में भारत और चीन, दोनों के लिए पर्याप्त जगह है।

ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत कर सकते हैं दोनों देश

भारत और चीन के संबंधों का असर केवल द्विपक्षीय व्यापार या सीमा तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक, दोनों देश BRICS, SCO और G20 जैसे मंचों पर वैश्विक व्यवस्था में सुधार, जलवायु परिवर्तन और विकास के लिए फंड जैसे मुद्दों पर साथ काम कर सकते हैं।

डॉ. अव्वाद ने कहा कि एशिया की इन दो बड़ी शक्तियों के बीच समानता और विचारों का तालमेल बहुध्रुवीय दुनिया को आकार दे सकता है। BRICS आर्थिक समूह से आगे बढ़कर ऐसी राजनीतिक और आर्थिक ताकत बन सकता है, जो दुनिया के सामने ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूती से रखे।

उन्होंने नई दिल्ली घोषणापत्र को भारतीय कूटनीति की बड़ी सफलता बताया। उनके मुताबिक, सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद पहलगाम आतंकी हमले, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, वैश्विक शासन और एकतरफा फैसलों जैसे मुद्दों पर सहमति बनना अहम है।

चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एशिया-प्रशांत अध्ययन विभाग के निदेशक लैन जियानशुए ने भी कहा कि भारत और चीन में लगातार BRICS सम्मेलन होने से पहले बनी सहमति को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा। इससे विस्तारित BRICS की व्यवस्था को भी मजबूत किया जा सकता है।

उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नए उद्योगों, मजबूत सप्लाई चेन, लोगों के बीच संपर्क और दक्षिण-दक्षिण सहयोग को ऐसे क्षेत्र बताया, जिनमें व्यावहारिक सहयोग बढ़ सकता है।

23 सेकंड के हैंडशेक का क्या मैसेज है?

मोदी और जिनपिंग का लंबा हैंडशेक अपने आप में किसी विवाद के समाधान की गारंटी नहीं है। सीमा का मुद्दा अभी भी दोनों देशों के रिश्तों का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। हालांकि, भारतीय और चीनी विशेषज्ञों की राय बताती है कि दोनों पक्ष अब तनाव को बढ़ने से रोकने और बातचीत के जरिए संबंधों को सामान्य बनाने पर जोर दे रहे हैं।

चीनी विशेषज्ञ इसे विश्वास बहाली के नए चरण के रूप में देख रहे हैं। वहीं, डॉ. अव्वाद के मुताबिक यह मुलाकात दिखाती है कि सीमा पर मतभेद और गलवान जैसी गंभीर घटना के बावजूद बातचीत, व्यापार और व्यापक सहयोग का रास्ता खुला रखा जा सकता है।

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