40 साल पहले का दिल्ली डिक्लेरेशन, भारत-रूस ने रखी न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की नींव, अब BRICS बढ़ा रहा आगे
BRICS दुनिया की करीब 50 फीसदी आबादी, 40 फीसदी GDP और 25 फीसदी से ज्यादा ग्लोबल ट्रेड का प्रतिनिधित्व करता है। मौजूदा वैश्विक जंगी हालात और बढ़ते तनाव के बीच BRICS दुनिया के एक नए पावर सेंटर के तौर पर उभरा है।
40 साल पहले का दिल्ली डिक्लेरेशन, भारत-रूस ने रखी न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की नींव, अब BRICS बढ़ा रहा आगे
BRICS 2026

नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन में भारत, रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब और UAE समेत 10 देशों ने हिस्सा लिया, जबकि 11 देश पार्टनर रहे। इस बार के BRICS डिक्लेरेशन में ग्लोबल गवर्नेंस और UNSC में सुधार, एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध, आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख और पहलगाम आतंकी हमले की निंदा जैसे मुद्दे शामिल रहे।

देश-दुनिया के विशेषज्ञ ब्रिक्स के इस डिक्लेरेशन को 'न्यू वर्ल्ड ऑर्डर' का आधार बता रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 'नये वर्ल्ड ऑर्डर की नींव' 40 साल पहले ही दिल्ली डिक्लेरेशन में भारत और रूस की तरफ से रखी जा चुकी थी। आइए आपको 40 साल पहले का वो दिल्ली डिक्लेरेशन बताते हैं, जिसने दुनिया को बहुध्रुवीय बना दिया।

क्या था 40 साल पहले का दिल्ली डिक्लेरेशन

भारत और रूस 80-90 के दशक में वैश्विक बदलावों के दौरान नई ताकत के तौर पर उभर रहे थे। दुनिया का भरोसा रूस और भारत पर बढ़ रहा था। साल 1986 में तत्कालीन रूसी नेता मिखाइल गोर्बाचेव भारत आए थे और उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ गहन वार्ता की थी। इसके बाद सोवियत संघ और भारत का 'दिल्ली डिक्लेरेशन' सामने आया था। वह कोल्ड वॉर यानी शीतकालीन युद्ध का दौर था। कोल्ड वॉर युग के दौरान नए वर्ल्ड ऑर्डर की जरूरत दुनिया के तमाम देशों को महसूस हो रही थी। इस पर खुली वार्ता के दौरान के सभी प्रमुख दस्तावेज मौजूद हैं।

उस समय सोवियत लीडरशिप का मानना था कि यह नई व्यवस्था नए राजनीतिक चिंतन के जरिये उभरेगी। विचार यह था कि पुराने विरोधी टकराव के रास्ते को छोड़ देंगे और अपने-अपने सिस्टम के सबसे उत्तम तत्वों को मिलाकर एक अधिक स्थिर और न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तैयार करेंगे। यह दिल्ली डिक्लेरेशन सोवियत की वैचारिक प्रतिद्वंद्विता के खंडहरों से वैश्विक राजनीतिक को दोबारा गढ़ने के संयुक्त प्रयासों को लेकर एक महत्वाकांक्षी दृष्टि थी। लिहाजा तभी नये वर्ल्ड ऑर्डर का एक खाका बनाकर इसकी नींव रख दी गई। मगर इतिहास की अपनी अलग योजनाएं थीं।

न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की जरूरत क्यों पड़ी ?

रूस के अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति के सबसे प्रमुख विशेषज्ञों में से एक Russia in Global Affairs के एडिटर इन चीफ फ्योदोर लुक्यानोव कहते हैं कि मौजूदा वैश्विक संघर्षों के दौर में संयुक्त राष्ट्र (UN) के अधिकारों का दायरा भी सिमट चुका है। हालांकि अभी भी कुछ न कुछ चुनिंदा देश अपने हित में फैसले की चाहत में यूएन से कुछ न कुछ अपील करते रहते हैं। पिछले समय में यह माना जाता था कि विश्व में अराजकता का दौर खत्म होने के बाद एक नया संतुलन उभरता है, लेकिन असली अनिश्चितता कहीं और है।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग।

हमेशा किसी नई ताकत का जन्म पुरानी अव्यवस्थाओं के बाद ही होता है। क्योंकि जब नई और पुरानी व्यवस्थाओं में टकराव होता है तो एक नया ढांचा, नया स्वरूप या नई ताकत का जन्म होता है या यूं कहें कि जब किसी एक ताकत की तानाशाही या जबरन प्रभाव से तंग आकर दुनिया किसी दूसरे भरोसेमंद देश या संगठन पर भरोसा करती है तो नये वर्ल्ड ऑर्डर का जन्म होता है।

मगर आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था खाली निर्माण स्थली नहीं है, जो नए डिजाइन के इंतजार में हो। जबकि पहले के समय में बड़े विश्व युद्धों के बाद पुरानी संरचनाएं बड़े पैमाने पर खत्म हो जाती थीं और इसके बाद नई चीजों के उभरने की जगह बनती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। इसकी वजह है कि अब दुनिया पुराने दौर से विरासत में मिली संस्थाओं और आदतों से भरी है। इसमें से कई संस्थाएं बदनाम और निष्क्रिय हो चुकी हैं, लेकिन वे फिर भी मौजूद हैं। उदारवादी वैश्वीकरण के दौर में बनीं संरचनाएं भी लोगों की उम्मीद से ज्यादा लचीली साबित हुई हैं।”

दिल्ली डिक्लेरेशन के बाद दुनिया को नई व्यवस्था की तलाश

फ्योदोर लुक्यानोव कहते हैं कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था ढह गई है। अब इसका खतरनाक दौर आने वाला है। वह कहते हैं कि दिल्ली डिक्लेरेशन के 40 साल बाद दुनिया एक बार फिर नई विश्व व्यवस्था की तलाश में है, लेकिन इस बार उसके सामने कोई साझा नियम या उपयोगी ब्लूप्रिंट नहीं है। वह कहते हैं कि नये वर्ल्ड ऑर्डर का निर्माण सभी देशों के लिए आर्थिक न्याय और समान राजनीतिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए और हथियारों की दौड़ का अंत इस व्यवस्था की स्थापना के लिए एक अनिवार्य शर्त होनी चाहिए।

तेजी से बदल रही इन भू-राजनीतिक परिस्थितियों और वैश्विक संघर्षों के कारण मौजूदा वर्ल्ड ऑर्डर ढहने के कगार पर पहुंच चुका है। इसलिए अब विश्व की बहुध्रुवीय व्यवस्था पर भरोसा बढ़ रहा है और वह एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की तलाश में है। ऐसे में रूस, चीन और भारत जैसे देशों को नये वर्ल्ड ऑर्डर के प्रमुख विकल्पों के तौर पर देखा जा रहा है।

दुनिया भारत, रूस, चीन की ओर देख रही

रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा कहते हैं कि 'न्यू ग्लोबल वर्ल्ड ऑर्डर' बन चुका है। अब दुनिया कुछ भी कर ले, लेकिन इसे अब कोई रोक नहीं सकता।

Foreign Expert
भारत, रूस और चीन दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में से एक हैं। इनके एक मंच पर आने से विश्व में एक नई व्यवस्था का निर्माण हुआ है। अब पूरी दुनिया भारत, रूस और चीन की ओर देख रही है।
कमर आगा
कमर आगा
रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ

पश्चिम का दबदबा खत्म होने का दौर

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शांतेश कुमार कहते हैं कि अब तक दुनिया के प्रमुख संस्थाओं और संगठनों पर पश्चिम का कब्जा रहा है। इसकी एक वजह टेक्नोलॉजी में उनका दबदबा होना भी था, लेकिन अब वह रूस, चीन और भारत की ओर शिफ्ट हो गई है।

Foreign Expert
भारत, रूस और चीन टेक्नोलॉजी से लेकर ट्रेड तक में और एआई के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जो बहुध्रुवीय दुनिया को आकार दे रहे हैं। अब यही देश नये ग्लोबल पावर सेंटर हैं।
शांतेश कुमार सिंह, प्रोफेसर जेएनयू
शांतेश कुमार सिंह, प्रोफेसर जेएनयू
विदेश मामलों के एक्सपर्ट

भारत-रूस 40 साल पहले क्यों नहीं बना सके न्यू वर्ल्ड ऑर्डर?

रूसी लेखक फ्योदोर लुक्यानोव कहते हैं कि इन महत्वाकांक्षाओं के बीच सोवियत संघ (रूस) आंतरिक संकटों के भंवरजाल में फंस गया था। वहीं दूसरी तरफ नई विश्व व्यवस्था की जरूरतों को अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन ने अपने हिसाब से इस्तेमाल कर लिया। फिर यह अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा राजनीतिक और सैन्य रूप से हावी एक उदारवादी व्यवस्था का पर्याय बन गई, जो कि यह पूरी तरह और बिल्कुल नई व्यवस्था नहीं थी, बल्कि यह 1945 के बाद वाले वर्ल्ड ऑर्डर का ही विस्तार था। 

2010 से ही दरकने लगी थी मौजूदा व्यवस्था की नींव

रूसी लेखक फ्योदोर लुक्यानोव कहते हैं कि अमेरिकी प्रशासन की अगुवाई में जो नई व्यवस्था बनी थी, उसकी नींव 2010 के दशक के आगाज से ही दरकने लगी थी। हालांकि कुछ समय तक लोगों को भरोसा था कि यह नई व्यवस्था इतिहास का अंतिम बिंदु है, लेकिन उन अपेक्षाओं के विपरीत शीतयुद्ध खत्म हो जाने के बाद भी वैश्विक स्थिरता में गहराई नहीं लाई जा सकी और तनाव का स्तर लगातार बढ़ने लगा। अब जैसे-जैसे मानवता 21वीं सदी के दूसरे चतुर्थांश में प्रवेश कर रही है, ऐसे वक्त में यह कह पाना मुश्किल होता जा रहा है कि पिछली विश्व व्यवस्था प्रभावी रूप से अस्तित्व में नहीं रही। जो संदेह बचे रह गए थे, वे भी 2026 के शुरुआती महीनों में ही दूर हो गए। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि ताकतवर देश उन कानूनों और परंपराओं को नजरअंदाज कर रहे हैं जो कभी मजबूती से स्थापित दिखते थे, बल्कि राजनीतिक संचालन का तरीका इससे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।

फैसले आवेगी और विरोधाभासी

फ्योदोर ने आगे कहा कि फैसले आवेगी और अक्सर खुल्लम-खुल्ला विरोधाभासी होते हैं। इसकी वजह यह है कि सरकारें पहले कार्रवाई करती हैं और बाद में संशोधन करती हैं। राजनीतिक जानकार और लीडर मानते हैं कि पुरानी व्यवस्थाएं और बाधाएं ढह गई हैं और मौजूदा वक्त एक नया ऐतिहासिक अवसर है। यानी यह नए वर्ल्ड ऑर्डर के निर्माण का समय है। वह कहते हैं कि अभी इसकी प्रवृत्ति सहज और सरल है, हालात दोबारा सख्त होने से पहले अभी जितना संभव हो, उतना इसका फायदा उठा लो।

कमर आगा कहते हैं कि BRICS बहुत ताकतवर संगठन हो चुका है। दुनिया के 10 महत्वपूर्ण देश इसके सदस्य हैं और लगभग इतने ही देश पार्टनर बने हैं। ब्रिक्स में आने वाले समय में और भी देश तेजी से जुड़ रहे हैं। इसमें ज्यादातर वही देश शामिल हैं, जिन्हें लंबे समय से पश्चिमी देशों की ओर से नजरअंदाज किया गया था। अब यह व्यापार, निवेश और ऊर्जा के नए पावर सेंटर बन चुके हैं। ब्रिक्स की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी हो चुकी है। इसलिए ब्रिक्स अब नये वर्ल्ड ऑर्डर को आकार दे रहा है।

दुनिया के रि-डिस्ट्रीब्यूशन का समय

फ्योदोर लुक्यानोव कहते हैं कि मौजूदा वक्त दुनिया के रि-डिस्ट्रीब्यूशन का है। इसका आगाज हो चुका है। परिवहन गलियारे से लेकर संसाधन, फाइनेंशियल फ्लो, टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम और सांस्कृतिक धार्मिक क्षेत्र तक विवादित हो चुके हैं। इन सब पर राजनीतिक प्रभाव है। दुनिया की प्रमुख शक्तियां (ताकतवर देश) अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं को अलग ढंग से परिभाषित कर रही हैं और उसे हासिल करने के तरीकों की खुद ही परीक्षा भी ले रही हैं। बेशक ये गलतियां उन देशों को महंगी पड़ेंगी, लेकिन जियोपॉलिटिक्स में यह कोई नई बात नहीं है।

अमेरिका-ईरान युद्ध से महाशक्तियों को क्या सीख लेनी चाहिए?

फ्योदोर लुक्यानोव कहते हैं कि ट्रेड वार से लेकर प्रतिबंधों, जियोपोलिटिकल फ्रेगमेंटेशंस और प्रमुख ताकतवर देशों के बीच खुला कंपटीशन बढ़ने के बावजूद वैश्विक आर्थिक नेटवर्क पूर्ण विघटन का विरोध कर रहा है। ऐसे हालातों में सप्लाई चेन मुड़ रही हैं, मगर वह पूरी तरह टूटी नहीं है और बाजार उनसे किसी तरह जुड़े हुए हैं। इसे ऐसे में समझा जा सकता है कि राजनीतिक टकराव में शामिल देश भी एक दूसरे के साथ अप्रत्यक्ष रूप से व्यापार जारी रखते हैं। यही लचीलापन उन महाशक्तियों को निराशा के गर्त में धकेलता दिखता है, जो व्यवस्था को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि एक वास्तविक नए अंतरराष्ट्रीय ढांचे का निर्माण अत्यंत दर्दनाक प्रक्रिया होगी। इसलिए सभी महाशक्तियों को मौजूदा वैश्विक संघर्षों से सीख लेनी चाहिए।

दबाव और धमकी से नहीं आएगी स्थिरता

फ्योदोर लुक्यानोव कहते हैं कि दबाव और धमकी से स्थिरता नहीं आएगी, बल्कि इससे और ज्यादा बिखराव पैदा होगा। इशारा संभवतः ईरान पर अमेरिका की ओर से दी जाने वाली धमकियों और दबाव की ओर है। वह कहते हैं कि आगे क्या होगा, इसका असली खाका किसी के पास नहीं है। पहले के संक्रमणकाल में दृष्टियां कितनी भी त्रुटिपूर्ण रही हों, लेकिन नेताओं को कम से कम यह भरोसा था कि उन्हें आगे की मंजिल पता है। मगर आज के दौर में ऐसी कोई स्पष्टता नहीं है।

क्या होता है डिक्लेरेशन

डिक्लेरेशन सभी देशों का एक संयुक्त घोषणापत्र होता है। ब्रिक्स भी हर बार अपना घोषणापत्र जारी करता है। इस बार भी शिखर सम्मेलन के अंत में ब्रिक्स का जॉइंट स्टेटमेंट यानी डिक्लेरेशन जारी किया गया। इस पर पूरी दुनिया की नजर है। डिक्लेरेशन एक ऐसा दस्तावेज होता है, जिसे सभी सदस्य देशों की सहमति से तैयार किया जाता है। यह क्षेत्रीय, वैश्विक मुद्दों और भविष्य की प्राथमिकताओं और सहयोगों का एक साझा दृष्टिकोण होता है। डिक्लेरेशन बाध्यकारी नहीं होता, लेकिन यह सभी देशों की राजनीतिक प्रतिबद्धता का बड़ा संकेत होता है।

BRICS के पिछले 5 डिक्लेरेशन क्या थे?

1. 2025 का रियो डी जेनेरियो डिक्लेरेशन

इसमें इंडोनेशिया को BRICS का पूर्ण सदस्य बनाए जाने का स्वागत किया गया। बेलारूस, बोलीविया, कजाखस्तान, क्यूबा, नाइजीरिया, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, युगांडा और उज्बेकिस्तान पार्टनर देश बने। बहुध्रुवीय व्यवस्था और ग्लोबल ऑर्डर में सुधार के साथ UN, IMF और World Bank में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने पर फोकस किया गया।
COP30 के लिए Global South के लिए 1.3 ट्रिलियन डॉलर जुटाने का समर्थन किया गया। AI ग्लोबल गवर्नेंस पर अलग डिक्लेरेशन जारी किया गया। पॉलिटिकल सिक्योरिटी, इकोनॉमिक-फाइनेंशियल, कल्चरल और पीपल-टू-पीपल क्षेत्रों में BRICS कोऑपरेशन पर जोर दिया गया। गाजा समेत पश्चिम एशिया में देशों पर हमलों की निंदा की गई।

2. कजान (रूस) डिक्लेरेशन, 2024

एकजुटता और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना।
यूक्रेन संघर्ष पर शांतिपूर्ण समाधान के लिए संवाद और मध्यस्थता का समर्थन।
गाजा और वेस्ट बैंक में मानवीय संकट पर गहरी चिंता।
एकतरफा प्रतिबंधों के खिलाफ चिंता।
अपनी करेंसी में ट्रेड क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम पर जोर।
BRICS ग्रेन एक्सचेंज की शुरुआत का स्वागत।
UNSC और IMF जैसे संस्थानों में सुधार की मांग।
परमाणु अप्रसार और मध्य-पूर्व में परमाणु-मुक्त क्षेत्र का समर्थन।

3. जोहान्सबर्ग डिक्लेरेशन-2023

6 नए देशों (अर्जेंटीना, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, UAE) को 2024 से पूर्ण सदस्य बनाने का निमंत्रण।
UNSC में व्यापक सुधार का समर्थन
इन्क्लूसिव बहुपक्षवाद और UN चार्टर का पालन।
एकतरफा प्रतिबंधों के नकारात्मक प्रभाव पर चिंता।
खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद विरोधी सहयोग पर फोकस।
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वित्तीय लेन-देन को बढ़ावा आदि।
अफ्रीका एजेंडा 2063 को समर्थन

4. बीजिंग डिक्लेरेशन- 2022

ब्रिक्स साझेदारी और वैश्विक विकास के नये युग की शुरुआत
COVID-19 से निपटने में एकजुटता
इकोनॉमिक रिकवरी और सप्लाई चेन व डिजिटल इकोनॉमी में सहयोग।
आर्थिक रिकवरी, सप्लाई चेन सहयोग और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर जोर।
जलवायु परिवर्तन पर उच्च-स्तरीय बैठक और खाद्य सुरक्षा रणनीति।

5. नई दिल्ली डिक्लेरेशन -2021

BRICS के 15 साल पूरे होने पर निरंतरता, मजबूती और सहमति पर जोर।
बहुपक्षीय प्रणाली के सुधार और UN-केंद्रित विश्व व्यवस्था का समर्थन।
कोविड-19 सहयोग पर फोकस
आतंकवाद विरोधी एक्शन प्लान
कृषि सहयोग एक्शन प्लान और इनोवेशन सहयोग।
रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट कंस्टेलेशन और कस्टम्स सहयोग समझौता।
WTO सुधार और BRICS इकोनॉमिक पार्टनरशिप 2021-25 को लागू करना।
डिजिटल पब्लिक गुड्स प्लेटफॉर्म और ग्रीन टूरिज्म अलायंस।

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