भारत में आयोजित 18वें BRICS समिट का समापन हो चुका है। दो दिनों तक नई दिल्ली में दुनिया की बड़ी ताकतें एक ही मंच पर थीं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत BRICS देशों के नेता भारत मंडपम पहुंचे। यहां सिर्फ मीटिंग्स नहीं हुईं, बल्कि कैमरों के सामने और पर्दे के पीछे ऐसी तस्वीरें भी बनीं, जिनमें बदलती ग्लोबल डिप्लोमेसी की झलक दिख रही थी।
RT India की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा ने BRICS समिट को बेहद करीब से कवर किया। भारत मंडपम के गलियारों में नेताओं की मुलाकातों से लेकर कैमरों के सामने बनी खास तस्वीरों तक, उन्होंने कूटनीति कि बदलती तस्वीरों को अपनी नजर से देखा। अब उन्हीं की जुबानी पढ़िए कि इन दो दिनों में भारत मंडपम में क्या-क्या देखने को मिला और उन तस्वीरों के पीछे की कहानी क्या थी।
वो तीन तस्वीरें, जिन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा
दिल्ली के BRICS समिट से सामने आई तीन तस्वीरें खास हैं। ये सिर्फ तस्वीरें नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे भारत की उस डिप्लोमेसी की कहानी है, जिसे लेकर समिट शुरू होने से पहले ही कई सवाल उठाए जा रहे थे।
भारत, रूस और चीन जब भी एक फ्रेम में आते हैं, तो पूरी दुनिया की नजरें वहीं टिक जाती हैं। इस बार भी इस तस्वीर ने काफी ध्यान खींचा।

दूसरी सबसे असरदार तस्वीर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की मुलाकात की थी। मैं खुद राष्ट्रपति पुतिन के मीडिया पूल में थी और नई दिल्ली में उनके दो दिनों के दौरान मैंने उन्हें कई बैठकों में देखा। आमतौर पर राष्ट्राध्यक्षों की बैठकों में हैंडशेक होता है, गंभीर चेहरे होते हैं। लेकिन जब राष्ट्रपति पुतिन पीएम मोदी से मिलते हैं, तो माहौल पूरी तरह बदल जाता है।
तीसरी तस्वीर प्रधानमंत्री मोदी का ईरान के राष्ट्रपति का हाथ थामना है। मुझे यह तस्वीर वाकई बेहद दिलचस्प लगी। हाल के दिनों में हम देख रहे हैं कि ईरान खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले कर रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ईरान के राष्ट्रपति का हाथ थामना मेरे लिए बेहद अहम तस्वीर थी।

नई दिल्ली ने क्रैक किया 'जॉइंट डिक्लेरेशन का कोड'
न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन का सर्वसम्मति से पास होना भारत की बड़ी डिप्लोमैटिक सफलता रही। जब भारत को 2026 की BRICS प्रेसिडेंसी मिली थी, तब चारों तरफ यही चर्चा थी कि भारत इसे कैसे संभालेगा। वेस्टर्न मीडिया ने तो इसे पहले ही फ्लॉप करार देना शुरू कर दिया था, क्योंकि भारत को ऐसे देशों की मेजबानी करनी थी, जो एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं और जिनके बीच गंभीर मतभेद हैं।
ऐसा लगता है कि नई दिल्ली ने जॉइंट डिक्लेरेशन तैयार कराने का कोई सीक्रेट कोड क्रैक कर लिया है। दो साल पहले G20 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था, जब यूक्रेन के मुद्दे पर रूस और वेस्ट आमने-सामने थे और भारत ने साझा घोषणापत्र पर सहमति बना ली थी।
यूक्रेन संकट: भारत-चीन की पहल और अबू धाबी का 'त्रिपक्षीय' ऑफर
ट्रेड, इन्वेस्टमेंट और सिक्योरिटी के अलावा समिट में यूक्रेन का मुद्दा भी चर्चा के केंद्र में रहा। BRICS के दो बड़े हैवीवेट्स, भारत और चीन ने तीसरे बड़े साथी रूस से साफ कहा कि वे यूक्रेन के हालात को सुलझाने और शांति लाने में मदद करने को तैयार हैं।
पीएम मोदी पहले भी कह चुके हैं कि भारत मीडिएशन के लिए तैयार है और इस समिट में भी भारत का वही रुख दिखाई दिया। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भी इस पहल का जिक्र किया।
यह इसलिए भी अहम है क्योंकि यूक्रेन संघर्ष का असर सिर्फ रूस, यूक्रेन या वेस्टर्न देशों तक सीमित नहीं है। इसका खामियाजा ग्लोबल साउथ के देशों को भी भुगतना पड़ रहा है। एनर्जी क्राइसिस से लेकर फूड क्राइसिस तक, इस संघर्ष के असर ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

'रूल टेकर' नहीं, 'रूल मेकर' बनेगा BRICS
दुनिया में लंबे समय से एक पिरामिड सिस्टम चला आ रहा है। सबसे ऊपर एलीट देश बैठे हैं और नीचे भारत जैसी उभरती हुई इकोनॉमी और मिडिल पावर्स। BRICS देशों में अब यह समझ मजबूत हो रही है कि इस पुराने ढांचे को बदलना चाहिए।
यही बात प्रधानमंत्री मोदी ने भी कही, जो मुझे बहुत दमदार लगी। उन्होंने कहा कि BRICS देशों को अब सिर्फ 'नियम मानने वाले' बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें दुनिया के 'नियम बनाने वाले' बनना होगा।
पश्चिमी देशों में जिन नाकामियों की आशंका जताई जा रही थी, नई दिल्ली ने उन सभी आशंकाओं को गलत साबित कर दिया। भारत ने एक बेहद कामयाब और ऐतिहासिक BRICS समिट की मेजबानी की है।





