दिन में 'शेर' पर काम, शाम को अवधी स्वाद और भोजपुरी तान... अमेठी के रंग में रंगे रूसी इंजीनियर
भारत में हथियार बनाने आए रूसी इंजीनियर अब अवधी खाने और भोजपुरी गानों के रंग में कैसे रंग गए?
दिन में 'शेर' पर काम, शाम को अवधी स्वाद और भोजपुरी तान... अमेठी के रंग में रंगे रूसी इंजीनियर
इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड के CEO और MD मेजर जनरल एसके शर्मा।RT

अमेठी की शाम… आसपास के गांवों में कहीं शादी-ब्याह का कार्यक्रम चल रहा है, कहीं भोजपुरी गाने बज रहे हैं। सड़क किनारे से गुजरते हुए अगर आपको इन धुनों पर कुछ रूसी चेहरे झूमते नजर आएं, तो हैरान मत होइएगा। उत्तर प्रदेश के इस छोटे से शहर में नजर आने वाले ये वही रूसी इंजीनियर हैं, जो दिन में भारत की एक बेहद खास राइफल को तैयार करने में जुटे रहते हैं और शाम होते-होते अवधी खाने और भोजपुरी संगीत के रंग में रंग जाते हैं।

अमेठी में भारत और रूस की साझेदारी सिर्फ एक फैक्ट्री की असेंबली लाइन तक सीमित नहीं है। यहां रूसी इंजीनियर भारतीय कर्मचारियों के साथ मिलकर एके सीरीज की नई पीढ़ी की AK-203 राइफल तैयार कर रहे हैं। इसे नाम मिला है- ’शेर’।

RT इंडिया की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा के टॉक शो ‘‘इंडिया, रशिया एंड द वर्ल्ड विद रुनझुन शर्मा’ में इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड (IRRPL) के CEO और MD मेजर जनरल एसके शर्मा ने AK-203 की खासियतों का तो जिक्र किया ही, साथ ही इस प्रोजेक्ट में शामिल रूसी टीम को लेकर कुछ दिलचस्प किस्से भी साझा किए। 

इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड के CEO और MD मेजर जनरल एसके शर्मा की RT इंडिया से खास बातचीत।RT

कैसे अमेठी के रंग में रंगते गए रूसी इंजीनियर

दरअसल उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के कोरवा स्थित ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में इस शेर राइफल का निर्माण हो रहा है। मेजर जनरल एसके शर्मा बताते हैं कि करीब तीन साल पहले जब रूसी इंजीनियर अमेठी पहुंचे थे, तो उनके लिए यह जगह बिल्कुल नई थी। छोटे से अस्थायी आवास में रहना, नया माहौल और भाषा-संस्कृति का फर्क-शुरुआत आसान नहीं थी। लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

SK Sharma
दिन की शुरुआत अक्सर तकनीक, काम और राइफल से जुड़ी समस्याओं पर गर्मागर्म चर्चा से होती है। लेकिन शाम होते-होते माहौल बदल जाता है- अवधी खाना, भोजपुरी संगीत और कभी-कभी रूसी वोदका के साथ महफिल।
मेजर जनरल एसके शर्मा
मेजर जनरल एसके शर्मा
IRRPL के CEO और MD

भोजपुरी गानों से प्रभावित रूसी 

शर्मा बताते हैं कि आसपास के गांवों में होने वाले कार्यक्रमों और देर रात तक बजने वाले भोजपुरी गानों ने इन रूसी इंजीनियरों को इतना प्रभावित किया कि वे खुद भी वहां पहुंचकर लोगों के साथ नाचने-गाने लगते हैं। यानी अमेठी में AK-203 बनाने आए रूसी लोगों ने धीरे-धीरे अमेठी को ही अपना लिया।

और गर्मी? रूस जैसे ठंडे देश के रहने वाले जब उत्तर भारत की मई-जून के महीने की गर्मी का सामने करते हैं तो क्या होता है? जिस 45 डिग्री तापमान में आम लोगों का हाल बेहाल हो जाता है, शर्मा के मुताबिक उनके रूसी सहयोगी उसी मौसम का इंतजार करते हैं। बनियान पहनकर अमेठी की सड़कों पर घूमना उन्हें पसंद है।

लेकिन इस दिलचस्प सांस्कृतिक कहानी के पीछे भारत और रूस की एक बेहद गंभीर डिफेंस पार्टनरशिप भी है।

AK-203 आखिर किसकी राइफल है?

मेजर जनरल एसके शर्मा इसे सिर्फ मेड इन इंडिया या रूसी राइफल मानने से इनकार करते हैं। उनके मुताबिक यह असल मायने में इंडो-रशियन राइफल है।

वह कहते हैं कि इसका DNA रूस और क्लाश्निकोव का है। भारतीय सेना का AK-47 के साथ लंबा और सफल अनुभव रहा है और इसी वजह से क्लाश्निकोव परिवार की अगली पीढ़ी की राइफल में उसकी खास दिलचस्पी रही।

मेजर जनरल एसके शर्माRT

शर्मा AK-203 को AK-47 की ‘Gen-Z’ राइफल बताते हैं। यानी वही भरोसेमंद क्लाश्निकोव विचारधारा, लेकिन नई पीढ़ी की जरूरतों के हिसाब से तैयार राइफल।

रूस ने क्लाश्निकोव की तकनीकी विरासत दी, लेकिन अब इस राइफल की कहानी का अगला अध्याय भारत में लिखा जा रहा है। अमेठी के कोरवा स्थित ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में इसका निर्माण हो रहा है और कंपनी के मुताबिक आगे इसके हर कंपोनेंट और हर छोटे पार्ट को भारतीय बनाने की दिशा में काम हो रहा है।

अमेठी के आसपास के इलाकों में भी पैदा हो रहा रोजगार

इस साझेदारी का असर सिर्फ राइफल तक सीमित नहीं है। फैक्ट्री में कुल 247 कर्मचारी हैं, जिनमें करीब 240 भारतीय और 7 रूसी हैं। भारतीय कर्मचारियों में बड़ी संख्या अमेठी क्षेत्र के ITI-प्रशिक्षित युवाओं की है।

मेजर जनरल शर्मा के मुताबिक, AK-203 के इर्द-गिर्द करीब 100 MSME (छोटे उद्योगों) को जोड़ने का काम हो रहा है और इससे लखनऊ, कानपुर और अमेठी समेत आसपास के इलाकों में करीब 8 से 10 हजार रोजगार पैदा हुए हैं।

यानी एक तरफ रूस से आई तकनीक, दूसरी तरफ अमेठी के ITI से निकले युवा- और इनके बीच तैयार हो रही है भारत-रूस की वह साझेदारी, जिसका नाम है ‘शेर’। लेकिन भारत-रूस का ये ‘शेर’ फैक्ट्री की टेस्टिंग रेंज से आगे निकलकर मिलिट्री ऑपरेशन का भी हिस्सा बन चुका है।

क्या ऑपरेशन सिंदूर में हुआ AK-203 का इस्तेमाल? 

जब RT इंडिया की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा ने मेजर जनरल एसके शर्मा से पूछा कि क्या AK-203 का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुआ था, तो उनका जवाब था- हां।

उनके मुताबिक, मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के समय तक भारतीय सेना को करीब 45 हजार AK-203 राइफलें दी जा चुकी थीं। इनमें से बड़ी संख्या उत्तरी कमान की यूनिट्स के पास थी और ऑपरेशन सिंदूर भी इसी क्षेत्र में हुआ।

इसी आधार पर शर्मा ने कहा कि AK-203 का इस्तेमाल ऑपरेशन में हुआ था। और फिर उन्होंने ‘शेर’ को लेकर एक बेहद दिलचस्प लाइन कही- 

'मैं आपको भरोसे के साथ कह सकता हूं कि ‘शेर’ ने खून का स्वाद चख लिया है।'

यहां देखें पूरा इंटरव्यू

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