
'BRICS पिछले 20 साल में एक सफल संगठन के रूप में उभरा है। इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि कई देश इसकी सदस्यता लेना चाहते हैं...' BRICS की उपलब्धियों पर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज के प्रोफेसर संजय कुमार पांडे कहते हैं कि अब इसका दायरा काफी बढ़ चुका है।
साल 2006 में जब भारत, रूस, चीन और ब्राजील ने मिलकर BRIC (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) बनाया था, तब इसका बड़ा सवाल यही था कि पश्चिमी देशों के दबदबे वाली वैश्विक व्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपनी आवाज और प्रभाव को कैसे मजबूत करें।
20 साल बाद BRICS सिर्फ चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के लिए सहयोग और सामूहिक सौदेबाजी का एक बड़ा मंच बन चुका है। BRICS ने अपने सदस्य देशों को सबसे बड़ी ताकत सामूहिक रूप से अपनी आवाज रखने की दी है।
आर्थिक सहयोग, न्यू डेवलपमेंट बैंक, वित्तीय तंत्र और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार जैसी कोशिशों ने इन देशों को पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था और डॉलर पर पूरी निर्भरता से बाहर निकलने के कुछ विकल्प भी दिए हैं।

कितना पावरफुल हुआ ब्रिक्स
आंकड़े बताते हैं कि ब्रिक्स की सबसे बड़ी उपलब्धि सामूहिक सौदेबाजी की ताकत है। 2024 में BRICS का विस्तार हुआ और 2025 में इंडोनेशिया भी इसका सदस्य बन गया। अब BRICS में 11 देश हैं।

ब्रिक्स के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, ये देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5% आबादी और PPP (Purchasing Power Parity यानी लोगों के खरीदने की क्षमता) के हिसाब से दुनिया की करीब 40% अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं। ब्रिक्स के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सदस्य देश दुनिया के कुल भूभाग का करीब 36% हिस्सा रखते हैं।
जून 2026 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सेंट पीटर्सबर्ग इकोनॉमिक फोरम में कहा था कि पिछले पांच सालों (2021-25) में हुई वैश्विक आर्थिक वृद्धि में BRICS का योगदान 49% रहा, जबकि G7 का योगदान सिर्फ 18% था।

लेकिन आर्थिक आंकड़ों से आगे, BRICS ने सदस्य देशों को एक वैकल्पिक वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर भी दिया है। 2014 में बने न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) और कंटिनजेंट रिजर्व अरेंजमेंट (CRA) ने विकासशील देशों को जरूरत के समय विश्व बैंक और IMF के अलावा भी वित्तीय मदद का विकल्प दिया।
सामरिक मामलों के एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने लिखा है कि ब्रिक्स ने एक ऐसे आइडिया को नॉर्मल बना दिया है जो कभी असंभव लगता था।
एक लेख में उन्होंने कहा-
उनका कहना है कि आज BRICS अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक बेहद महत्वपूर्ण प्रयोग बन चुका है। यह पश्चिम से धीरे-धीरे ग्लोबल पावर बैलेंस के खिसकने और एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उभरने को दिखाता है। वो कहते हैं कि ब्रिक्स का सबसे बड़ा हासिल रणनीतिक स्वायत्तता है।
अपने लेख में डॉ. चेलानी लिखते हैं, 'अगर ब्रिक्स का वादा एक कॉमन करेंसी सिस्टम, एक साझा बाजार या मजबूत राजनीतिक गठबंधन बनाना था, तो वह अभी पूरा नहीं हुआ है। लेकिन अगर इसका उद्देश्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं को सहयोग के लिए एक ऐसा मंच देना था, जहां वे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को भी आगे बढ़ा सकें, तो BRICS उम्मीदों से कहीं आगे निकल गया है।'
'ब्रिक्स और भारत की चाहत एक जैसी'
भारत के पूर्व राजदूत प्रो. संजय कुमार भट्टाचार्य आरटी इंडिया से बात करते हुए कहते हैं जब ब्रिक्स की शुरुआत हुई थी तब सेंट पीटर्सबर्ग (रूस का दूसरा सबसे बड़ा शहर) में चार देश साथ आए थे और उन्होंने इस संगठन को बनाने का फैसला किया था। इसका उद्देश्य किसी खास समूह या देश के खिलाफ जाना नहीं था।
वो कहते हैं, 'तब समूह का मकसद इन देशों के आर्थिक विकास को बढ़ावा देना और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार लाना था। मेरा मानना है कि ब्रिक्स ने इस दिशा में काफी सोच-समझकर काम किया है।'
प्रो. भट्टाचार्य आगे कहते हैं, 'जैसे-जैसे ब्रिक्स की क्षमता और प्रभाव बढ़ा, उसने मौजूदा बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार की कोशिशों के साथ-साथ नए संस्थान और तंत्र भी बनाए। इसका मकसद न सिर्फ ब्रिक्स के लिए कामकाज को ज्यादा प्रभावी बनाना था, बल्कि वैश्विक शासन व्यवस्था के लिए भी एक उदाहरण और दिशा देना था।'
वो कहते हैं कि इस मामले में भारत और ब्रिक्स की चाहत काफी हद तक एक जैसी है और समूह उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ब्रिक्स का बहुध्रुवीय दुनिया बनाने पर जोर
मेजबान भारत ने इस बार 'रेजिलिएंट मल्टीपोलैरिटी' यानी व्यावहारिक और जमीनी मुद्दों पर जोर दिया है, जैसे क्लाइमेट फाइनेंस और सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (MSMEs) को अंतरराष्ट्रीय मंच देना।
जेएनयू में चाइनीज स्टडीज के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली के अनुसार, भारत अब बड़े संस्थानों और सरकारी कंपनियों पर ज्यादा जोर देने के बजाय छोटे कारोबार और उद्यमों को बढ़ावा देने पर ध्यान दे रहा है।
समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चर्चा इस बात पर है कि ऐसी बहुध्रुवीय दुनिया कैसे बनाई जाए, जो मजबूत और टिकाऊ हो। इसका मतलब यह है कि हमारा ध्यान ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों पर हो। हम दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच शक्ति संतुलन जैसे मुद्दों पर चर्चा नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन व्यावहारिक मुद्दों पर बात कर रहे हैं, जिनका सीधा असर ग्लोबल साउथ के देशों पर पड़ता है, जैसे जलवायु के लिए वित्तीय मदद।'
वो आगे कहते हैं, 'पहले ब्रिक्स की चर्चाओं में बड़े बैंक, बड़ी सरकारी कंपनियां और सरकारी उपक्रम अहम भूमिका निभाते थे। लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जोर दे रहे हैं कि MSMEs को मुख्य फोकस बनाया जाए। इनमें से कुछ उद्यमों को आगे बढ़ाया जाए और उन्हें वित्तीय मदद दी जाए, ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना कारोबार बढ़ा सकें। रोजगार का बड़ा हिस्सा भी इन्हीं छोटे और मध्यम उद्यमों से पैदा होता है।'
अंतरराष्ट्रीय सहयोग का बड़ा मंच बन चुका है BRICS
इस साल की शुरुआत में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लोगो, थीम और वेबसाइट लॉन्च के मौके पर कहा था कि ब्रिक्स अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है। उन्होंने कहा था कि समूह ने बदलती दुनिया के साथ अपने एजेंडे और सदस्यता का विस्तार किया, साथ ही सहयोग पर अपना ध्यान बनाए रखा।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ब्रिक्स अपनी स्थापना के 20 सालों में बहुत मजबूत हुआ है। यह दिखाता है कि दुनिया का पावर बैलेंस पश्चिम के हाथ से धीरे-धीरे निकल रहा है और अब एक बहुध्रुवीय वर्ल्ड ऑर्डर का निर्माण हो रहा है।
प्रो. संजय कुमार पांडे RT हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, 'शुरुआत में BRICS का एक बड़ा लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र, IMF और दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार लाना था। लेकिन इन संस्थाओं में अभी तक कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है। इस लिहाज से BRICS के सामने अभी बहुत कुछ करने की गुंजाइश है।'
वो आगे कहते हैं, 'हालांकि कई दूसरे क्षेत्रों में इसे सफलता मिली है। BRICS का अपना न्यू डेवलपमेंट बैंक इसकी बड़ी उपलब्धियों में से एक है और उसने पिछले वर्षों में कई अरब डॉलर के प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है।'




