एक चूक और 1000 से ज्यादा बच्चों की मौत, बांग्लादेश में क्या गड़बड़ हुई?
एक ऐसी बीमारी, जिसे दुनिया लंबे समय से वैक्सीन के जरिए रोकने की कोशिश करती रही है, बांग्लादेश में अचानक बड़ा संकट बन गई। समझिए बांग्लादेश में संकट क्यों गहराया?
एक चूक और 1000 से ज्यादा बच्चों की मौत, बांग्लादेश में क्या गड़बड़ हुई?
बांग्लादेश में खसरे से बिगड़े हालात।RT

बांग्लादेश में खसरे का मौजूदा संकट सिर्फ एक बीमारी के फैलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि टीकाकरण में कुछ समय का गैप भी वर्षों की स्वास्थ्य उपलब्धियों को कितनी तेजी से पीछे धकेल सकता है। बांग्लादेश के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 9 सितंबर तक खसरे या खसरे जैसे लक्षणों से 1,002 मौतें दर्ज हो चुकी थीं। इनमें 100 मौतें लैब/क्लिनिकल तौर पर खसरे की पुष्टि वाली थीं, जबकि 902 संदिग्ध मामले थे। इसी अवधि में करीब 1.87 लाख suspected और confirmed infections दर्ज किए गए। लेकिन खसरा (measles) एक ऐसी बीमारी है, जिसे वैक्सीन से रोका जा सकता है, फिर भी 1,000 से ज्यादा मौतें क्यों? 

बांग्लादेश में जानलेवा हुआ खसरा (फाइल फोटो)

तो बांग्लादेश में हालात बिगड़े कैसे? 

बांग्लादेश में मौजूदा आउटब्रेक की शुरुआत 15 मार्च 2026 के आसपास हुई। कुछ ही महीनों में संक्रमण देश के सभी 64 जिलों तक पहुंच गया। WHO के मुताबिक खसरा दुनिया की सबसे संक्रामक बीमारियों में से एक है और आबादी की इम्युनिटी में छोटा-सा गैप भी ऑउटब्रेक को जन्म दे सकता है।

बांग्लादेश में इस संकट की सबसे बड़ी वजह जो सामने आ रही है वो है- वैक्सीनेशन कवरेज में गिरावट और रूटीन इम्यूनाइजेशन में आया व्यवधान।

राजनीतिक उथल-पुथल के बीच हुई वो एक चूक

WHO और UNICEF ने इस संकट की बड़ी वजह 2024 और 2025 के दौरान बांग्लादेश के नियमित टीकाकरण कार्यक्रम में आए गैप को बताया है। यह वह दौर था जब प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद देश राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। इसी दौरान वैक्सीन की खरीद से जुड़ी नीतियों में बदलाव हुआ, जिससे वैक्सीन की कमी पैदा हो गई। 

सोमवार को बांग्लादेश के स्वास्थ्य मंत्री सरदार हुसैन ने संसद में भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि प्रोक्योरमेंट पॉलिसी (खरीद नीति) में बदलाव के कारण वैक्सीन की सप्लाई प्रभावित हुई।

हालात बिगड़ने के बाद अप्रैल में देशव्यापी इमरजेंसी वक्सीनशन कैंपेन शुरू किया गया। इस अभियान के तहत करीब 1.8 करोड़ बच्चों को वैक्सीन दी गई, लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि करीब 40 लाख बच्चे फिर भी इस अभियान की पहुंच से बाहर रह गए। यानी बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन के बावजूद इम्युनिटी गैप पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया।

वैक्सीनेशन में गैप से गहराया संकट (फाइल फोटो)© unicef

वैक्सीनेशन में 7 फीसदी की गिरावट का क्या मतलब है? 

WHO-UNICEF के आंकड़ों के मुताबिक बच्चों में दूसरी खसरा वैक्सीन डोज की कवरेज 2024 के करीब 93% से घटकर 2025 में 86% रह गई। खसरे को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए करीब 95% पॉपुलेशन कवरेज का लक्ष्य महत्वपूर्ण माना जाता है। यानी 93 से 86 फीसदी की गिरावट सिर्फ कुछ प्रतिशत की कमी नहीं है, इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे आबादी में मौजूद हो गए जिनमें पर्याप्त इम्युनिटी नहीं थी।

इसके पीछे 2024-25 में राजनीतिक उथल-पुथल, रूटीन इम्यूनाइजेशन में व्यवधान और वैक्सीनेशन कैंपेन के टलने के साथ खरीद और सप्लाई से जुड़ी समस्याएं भी बताई गई हैं। नतीजा यह हुआ कि कई बच्चे समय पर अपनी वैक्सीन की डोज नहीं ले पाए। खासकर वे बच्चे ज्यादा खतरे में आ गए जो अभी रूटीन वैक्सीनेशन की उम्र तक नहीं पहुंचे थे।

खसरा इतना खतरनाक क्यों है?

खसरा सिर्फ शरीर पर दाने और बुखार वाली बीमारी नहीं है। वायरस बेहद आसानी से फैलता है और संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से हवा में मौजूद ड्रॉप्लेट्स के जरिए दूसरे लोगों तक पहुंच सकता है।

और कई बार मौत सीधे खसरे से नहीं, बल्कि उसकी कॉम्प्लीकेशन्स से होती है- जैसे गंभीर निमोनिया, डिहाइड्रेशन/ डायरिया और इन्सेफेलाइटिस यानी दिमाग में सूजन। छोटे बच्चों में इसका खतरा और बढ़ जाता है।

WHO के अनुसार, खसरे से होने वाली मौतों को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका वैक्सीनेशन ही है। पिछले दो साल में वैक्सीनेशन में गैप आने के बाद इस साल जब इमरजेंसी वैक्सीनेशन कैंपेन शुरू किया गया तो फिर इसका कितना असर दिखा?

बांग्लादेश में नियमित टीकाकरण कार्यक्रम में आए गैप से गहराया संकट (फाइल फोटो)© WHO

पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया इम्युनिटी गैप 

बांग्लादेश सरकार ने अप्रैल में WHO, UNICEF और Gavi के सहयोग से emergency measles-rubella वैक्सीनेशन कैंपेन शुरू किया। शुरुआत हाई रिस्क इलाकों से हुई और फिर इसे देशभर में किया गया। अभियान का मकसद खास तौर पर उन बच्चों तक पहुंचना था जो रूटीन इम्यूनाइजेशन से छूट गए थे।

करीब 2 करोड़ बच्चों तक वैक्सीन पहुंचाने के बावजूद इम्युनिटी गैप पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया। यही वजह है कि कैंपेन के बाद भी नए मामले और मौतें सामने आती रहीं। WHO ने भी साफ किया है कि इमरजेंसी कैंपेन जरूरी है, लेकिन लंबे समय तक आउटब्रेक रोकने के लिए मजबूत रूटीन इम्यूनाइजेशन सिस्टम जरूरी है।

अस्पताल पहुंचने में देरी से बढ़ रहा मौत का आंकड़ा

यही वह हिस्सा है जो इस आउटब्रेक को और डेडली बना रहा है।
बांग्लादेशी मीडिया डाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक कई गंभीर बच्चे अस्पताल तब पहुंच रहे हैं जब निमोनिया या दूसरी दिक्कतें काफी बढ़ चुकी होती हैं। यानी सिर्फ वैक्सीनेशन गैप ही समस्या नहीं है- अर्ली डिटेक्शन, कम्युनिटी सर्विलांस और समय इलाज मिलने में भी गैप हैं।

अस्पतालों पर दोहरा दबाव

खसरे के कारण बांग्लादेश के अस्पताल पहले ही दबाव में हैं। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DGHS) के अनुसार आउटब्रेक शुरू होने के बाद से 1.47 लाख से ज्यादा खसरे के संदिग्ध मरीज भर्ती हो चुके हैं। 9 सितंबर तक करीब 5,574 मरीज अस्पतालों में भर्ती थे।

इसके साथ ही देश में डेंगू आउटब्रेक भी चल रहा है। यानी अस्पतालों को एक तरफ खसरे से गंभीर रूप से बीमार बच्चों को संभालना है और दूसरी तरफ डेंगू मरीजों की बढ़ती संख्या का इलाज करना है। 

क्या यह आउटब्रेक रोका जा सकता था?

खसरा उन बीमारियों में है जिनके खिलाफ प्रभावी वैक्सीन दशकों से उपलब्ध है। WHO का कहना है कि रूटीन मजबूत हो और दो डोज का पर्याप्त कवरेज हासिल किया जाए तो लोगों में इम्यूनिटी इतनी बढ़ाई जा सकती है कि वायरस के लिए तेजी से फैलना मुश्किल हो जाए।

बांग्लादेश के खसरा आउटब्रेक की सबसे बड़ी सीख यही समझ आती है कि आज छूटी हुई एक वैक्सीन डोज कल के आउटब्रेक की वजह बन सकती है।

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