
नई दिल्ली : पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने यमन के हूती विद्रोही ग्रुप अंसारल्लाह को चेतावनी दी है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का कहना है कि यमन के हूती विद्रोहियों के सऊदी अरब पर हमलों से संयुक्त रक्षा समझौते को लागू करने की स्थिति बन जाएगी। साथ ही, इस समझौते के तहत पाकिस्तान मदद देने के लिए बाध्य है। 8 सितंबर को, यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी सऊदी अरब पर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए।
हमले के बाद यमन की हूती विद्रोहियों ने सोमवार को दावा किया कि उसने मोचा तट के पास लाल सागर में सऊदी-नेतृत्व वाले गठबंधन के एक लैंडिंग शिप और उसके साथ चल रहे चार युद्धपोतों को कई बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया है।
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री के बयान के बाद अब सवाल उठ रहा है कि क्या मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट एक्टिव हो गया है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री के बयान के बाद मक्का जॉइंट डिफेंस में शामिल देशों पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी की तरफ से हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्या संयुक्त कार्रवाई की जाएगी। पाकिस्तानी मंत्री के बयान के बाद यह मक्का डिफेंस समझौते के लिए यह पहली परीक्षा भी मानी जा रही है। अगर सऊदी अरब पर लगातार हमले होते हैं, तो इन प्रतिबद्धताओं को सही मायने में कैसे निभाएंगे।
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने क्या कहा?
पाकिस्तान ने हूती विद्रोहियों की तरफ से सऊदी पर हमले की निंदा की है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने ख्वाजा आसिफ ने एक पाकिस्तानी चैनल पर इंटरव्यू के दौरान कहा कि कहा कि सऊदी अरब पर हूती हमलों से पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच संयुक्त रक्षा समझौता लागू हो सकता है।
टेलीविजन पर बोलते हुए आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान 'सऊदी अरब की मदद करने के लिए बाध्य है क्योंकि मक्का में हुए तीन देशों के समझौते के अनुसार, तीनों देशों में से किसी एक पर भी हमला तीनों पर हमला माना जाएगा।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी हूती हमलों की निंदा करते हुए कहा कि आर्थिक ठिकानों और रिहायशी इलाकों पर हमले क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं। साथ ही, इनसे आम नागरिकों की जान को भी खतरा है।
क्या है मक्का एग्रीमेंट
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 7 अगस्त, 2026 को पवित्र शहर मक्का में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत, तीनों देशों में से किसी एक के खिलाफ होने वाले किसी भी सशस्त्र हमले को उन सभी के खिलाफ हमला माना जाता है। इस समझौते का उद्देश्य सामूहिक रक्षा और सैन्य सहयोग को मजबूत करना है। मक्का समझौते को ‘इस्लामिक नाटो’ की तरह माना जा रहा है।
यह समझौता मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। इसकी वजह है कि क्षेत्रीय ताकतें अब पारंपरिक अमेरिकी सुरक्षा घेरे से आगे देख रही हैं। NATO के आर्टिकल 5 की तर्ज पर बना यह समझौता इस मुख्य सिद्धांत पर काम करता है कि तीनों देशों में से किसी एक पर भी सशस्त्र हमला होने पर उसे उन सभी पर हमला माना जाएगा।

अमेरिका ने भी मक्का समझौते के बाद खुशी व्यक्त की थी। अमेरिकी राष्ट्रपति का कहना था कि यह समझौता दिखाता है कि मध्य-पूर्व कैसे एक साथ आ रहा है। उनका कहना था कि मिडिल ईस्ट के देश इससे अधिक सार्थक तरीके से अपनी रक्षा करने में सक्षम होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तीनों देशों की महान लीडरशिप को बधाई दी थी। ट्रंप ने इस समझौते का यह एक बड़ा, साहसिक और महत्वपूर्ण पहला कदम बताया था।
पाकिस्तान की चेतावनी हवा-हवाई
मक्का जॉइंट एग्रीमेंट के एक्टिव होने को लेकर विदेश नीति को जानकार पूरी तरह से अभी आश्वस्त नहीं है। वहीं, अरब पर हूति हमले को लेकर तुर्की विदेश मामले में ने सिर्फ निंदा की है। तुर्की विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट का कुछ भी जिक्र नहीं किया गया है।
दूसरी तरफ, सऊदी ने जिस तरह से जवाबी कार्रवाई की बात कही है उसमें भी उसने पाकिस्तान का जिक्र नहीं है। ऐसे में मक्का जॉइंट एग्रीमेंट के तुरंत एक्टिव होने को लेकर संशय है। ऐसे में पाकिस्तान की चेतावनी
पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी साथ क्यों आए? ‘इस्लामिक NATO’ की इनसाइड स्टोरी
इस संबंध में डिफेंस और विदेश मामलों के एक्सपर्ट कमर आगा का कहना है कि अमेरिका के साथ चल युद्ध में ईरान ने मिडिल-ईस्ट के देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बड़ा नुकसान पहुंचाया। इसमें अरब खाड़ी देशों को भी भारी नुकसान हुआ। इससे उनको लगता है कि अमेरिका तो उनकी मदद कर नहीं पाया, इसलिए अब एक क्षेत्रीय सुरक्षा संगठन बनाना चाहिए।
ऐसे में सऊदी अरब ने इसमें पाकिस्तान और तुर्की को शामिल किया है। कमर आगा कहते हैं कि फिलहाल तीनों के पास कोई ऐसा स्ट्रक्चर नहीं है कि वे नाटो जैसा संगठन बना सकें। नाटो बड़ी ताकत है। उसके आगे यह कुछ इस्लामिक देशों का गठबंधन कहीं नहीं ठहरता।
सऊदी ने कहा-जवाबी कार्रवाई करेंगे
मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध का दायरा अब काफी बढ़ता दिख रहा है। 8 सितंबर को हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के शहरों पर हमले किए। इन हमलों में दर्जनों ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। ईरान समर्थित यमनी समूह की तरफ से सऊदी के दक्षिणी हिस्से में तेल ठिकानों पर किए गए हमले के बाद अब रियाद ने जवाबी कार्रवाई करने की बात कही है।
विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया है कि देश “अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा”। साथ ही, सऊदी अरब ने मांग की है कि सऊदी इलाके और लाल सागर में तेल टैंकरों पर हूतियों के हमले रोके जाएं।
सऊदी पर हुए हूती हमले को लेकर तुर्की ने भी निंदा की है। तुर्की ने लाल सागर में कमर्शियल जहाजों को लगातार निशाना बनाए जाने का भी बात कही। तुर्की के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि हम सऊदी अरब को निशाना बनाने वाले हूती हमलों की कड़ी निंदा करते हैं।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि ये हमले इलाके में तनाव बढ़ाते हैं। मंत्रालय ने आगे कहा कि हम किंगडम की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए अपना समर्थन दोहराते हैं। मंत्रालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि ये हमले यमन में संघर्ष को स्थायी राजनीतिक समाधान के जरिए खत्म करने की कूटनीतिक कोशिशों को कमजोर करते हैं।




