
7 अगस्त 2026। जगह- सऊदी अरब का मक्का शहर। तीन सुन्नी देशों पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी के बीच मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट (संयुक्त रक्षा समझौता) हुआ। इस मक्का समझौते को ‘इस्लामिक नाटो’ की तरह पेश किया गया। 9 दिन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर इस संगठन पर प्रतिक्रिया देते हुए खुशी जाहिर की। ट्रंप के रिएक्शन के बाद इस संगठन के मकसद पर कई तरह के सवाल उठने लगे। ऐसे में समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस नए संगठन की ताकत और मकसद क्या हैं? ‘इस्लामिक नाटो’ कहे जाने वाले इस संगठन को लेकर अमेरिका की क्या रुचि है?
मक्का रक्षा समझौता देखकर खुशी: ट्रंप
डोनाल्ड ट्रंप ने पोस्ट किया, “मुझे यह देखकर बहुत खुशी हो रही है कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने हाल ही में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह दिखाता है कि मध्य-पूर्व कैसे एक साथ आ रहा है। इससे वे अधिक सार्थक तरीके से अपनी रक्षा करने में सक्षम होंगे। तीनों देशों की महान लीडरशिप को बधाई। यह एक बड़ा, साहसिक और महत्वपूर्ण पहला कदम है। वाउ! -
— Rapid Response 47 (@RapidResponse47) August 16, 2026
क्या अमेरिका के इशारे पर बना ‘इस्लामिक NATO’?
ट्रंप के बयान के बाद सवाल उठने लगे कि क्या इस रक्षा गठबंधन के पीछे अमेरिका है? इस सवाल के जवाब में जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के असिस्टेंट प्रोफेसर और विदेशी मामलों के जानकार डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव ने कहा कि तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब तीनों ही देश अमेरिका के बेहद करीबी हैं। वह अमेरिकी हितों के अनुसार ही काम करेंगे। अमेरिका के अफगानिस्तान ऑपरेशन में पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है। सऊदी ने भी ऐसे मौकों पर अमेरिका की मदद की है। वहीं तुर्की नाटो का सदस्य है। वह ईरान के युद्ध मामले में चुप रहकर एक तरीके से अमेरिका की मदद कर रहा है।
अमेरिका का मिडिल ईस्ट से निकलने का फॉर्मूला?
इस मक्का समझौते को कुछ एक्सपर्ट मिडिल ईस्ट से निकलने के लिए अमेरिका के फॉर्मूले के तौर पर देख रहे हैं। रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा कहते हैं, अमेरिका अब खुद मिडिल ईस्ट समेत ऐसे देशों से निकलना चाहता है, जहां उसे लगता है कि उसकी आर्मी होने का कोई फायदा नहीं हो रहा। वह अपना खर्च कम करना चाहते हैं। मगर इस वक्त वह ईरान युद्ध में बुरी तरह फंस गया है। मिडिल ईस्ट में उसके लगभग सभी सैन्य बेस तबाह हो गए हैं। ऐसे में वह अब वहां से बाहर जाना चाहता है।
कमर आगा ने कहा कि ट्रंप मिडिल-ईस्ट की सुरक्षा के लिए पहले इजरायल को लाना चाहते थे, मगर जब सऊदी अरब समेत अन्य मुस्लिम देश अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने को तैयार नहीं हुए तो उन्होंने अब पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब को आगे किया है। ये ऐसे देश हैं जो अमेरिका के भी भरोसेमंद हैं और जिन पर मिडिल ईस्ट के देश भी भरोसा करते हैं। एक तरीके से अब पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब अमेरिकी हित को मिडिल-ईस्ट में आगे बढ़ाने का काम करेंगे।
“अभी इस एलायंस में कतर, इजिप्ट समेत कई और देश शामिल हो सकते हैं। सीरिया और बांग्लादेश को भी इसमें शामिल कराने के प्रयास किए जा सकते हैं। अमेरिका अब अप्रत्यक्ष रूप से मिडिल-ईस्ट में अपना प्रभाव बनाए रखेगा और धीरे-धीरे अपनी सैन्य मौजूदगी घटाएगा।”
क्या मक्का समझौता ‘नाटो’ की तरह काम कर पाएगा?
मक्का समझौते के पीछे क्या मकसद है इसकी चर्चा तो हो गई, लेकिन क्या तीनों देश मिलकर अपना मकसद पूरा कर पाएंगे? इस सवाल के जवाब में कमर आगा कहते हैं, “सऊदी अरब के पास सेना नहीं है। अभी तक सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका को दे रखी थी। मगर युद्ध में ईरान ने मिडिल-ईस्ट के देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बड़ा नुकसान पहुंचाया। इसमें अरब खाड़ी देशों को भी भारी नुकसान हुआ। इससे उनको लगता है कि अमेरिका तो उनकी मदद कर नहीं पाया, इसलिए अब एक क्षेत्रीय सुरक्षा संगठन बनाना चाहिए। ऐसे में सऊदी अरब ने इसमें पाकिस्तान और तुर्की को शामिल किया है। मगर मुश्किल यहां ये है कि सऊदी अरब समझता है कि पाकिस्तान और तुर्की बचा लेंगे। लेकिन ये सऊदी की गलतफहमी है।”
पहले बने गठबंधन जो हमला होने पर नहीं आए काम
अरब लीग का संयुक्त रक्षा समझौता : 1950 में अरब लीग देशों ने संयुक्त रक्षा और आर्थिक सहयोग संधि की। इसके आर्टिकल 2 में लिखा गया कि किसी भी एक अरब देश पर सशस्त्र हमला सभी अरब देशों पर हमला माना जाएगा। तब सभी देश मिलकर सैन्य जवाब देंगे। मगर 2003 में अरब लीग के संस्थापक सदस्य इराक पर अमेरिका और उसके सहयोगियों ने हमला किया। तब किसी भी अरब देश ने इराक के बचाव में कोई जवाबी हमला नहीं किया। इसके उलट कई अरब देशों ने तो अमेरिका की सेना को अपने एयरबेस और नौसेना बेस भी इराक पर हमले में के लिए दे दिया।
1990 में कुवैत पर हमला: इराक और कुवैत दोनों ही अरब लीग के सदस्य थे। जब इराक ने कुवैत पर कब्जा कर लिया तो कोई भी अरब लीग सदस्य देश उसकी मदद के लिए नहीं आया। लिहाजा कुवैत को आजाद कराने के लिए अमेरिका की लीडरशिप में गठबंधन बनाना पड़ा।
इजरायल-लेबनान युद्ध: लेबनान अरब लीग देशों का पूर्ण सदस्य है। मगर जब भी इजरायल ने लेबनान पर हमला किया तो किसी भी अरब लीग देश ने मिलकर इजरायल पर कोई संयुक्त हमला करने नहीं आया। इस तरह यह गठबंधन केवल कागजों और कूटनीतिक बयानों तक सीमित रहा। इजरायल अभी भी लेबनान पर हमले कर रहा है, लेकिन कोई देश उसकी मदद नहीं कर पा रहा है।
सेंटो बगदाद पैक्ट: इस पैक्ट को 1955 में पाकिस्तान, ईरान, तुर्की और इराक ने ब्रिटेन के साथ मिलकर अपनी रक्षा के लिए बनाया था। मगर 1965 और 1971 में भारत से युद्ध हुआ तो पाकिस्तान ने सेंट से सामूहिक रक्षा समझौते के तहत सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ गुहार लगाई। तुर्की और ईरान ने पाकिस्तान को कुछ हथियार देकर भले मदद की हो, लेकिन सीधे भारत के खिलाफ जंग में भाग नहीं लिया।
जीसीसी की ‘पेनिनसुला शील्ड फोर्स’: यह साल 2000 में बना खाड़ी देशों का गठबंधन था। इसमें सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, कतर, बहरीन, ओमान ने ‘पेनिनसुला शील्ड फोर्स’ बनाई थी। इसमें भी एक पर हमला सब पर हमला माना गया। मगर 2019-22 के दौरान जब यमन के हूतियों ने सऊदी अरब की अरामको तेल रिफाइनरी और यूएई के हवाई अड्डे पर हमले किए तो जीसीसी के किसी भी सदस्य देश ने हूतियों पर जवाबी हमला नहीं किया।
अब अगर रक्षा के नाम पर बने संगठन के इतिहास को भूल भी जाएं, तो भी सवाल उठता है कि ये तीनों देश एक-दूसरे की रक्षा करने में कितने सक्षम हैं? इसे इन तीनों देशों की ताकत से समझते हैं।

पाकिस्तान परमाणु हथियार रखने वाला देश है। तुर्की NATO का सदस्य और मजबूत रक्षा उद्योग वाला देश है, जबकि सऊदी अरब के पास बड़ी वित्तीय क्षमता और आधुनिक पश्चिमी हथियारों का विशाल बेड़ा है। तीनों की सैन्य ताकत एक-दूसरे को अलग-अलग क्षेत्रों में पूरक करती है।

तीनों देशों पर कमर आगा कहते हैं, तीनों के पास कोई ऐसा स्ट्रक्चर नहीं है तो वे नाटो जैसा संगठन बना सकें। नाटो बड़ी ताकत है। उसके आगे यह कुछ इस्लामिक देशों का गठबंधन कहीं नहीं ठहरता। उन्होंने तीन पॉइंट गिनाए।
सऊदी अरब, यूएई जैसे देश जो संपन्न हैं, वे भी सुरक्षा के लिए दूसरे पर निर्भर हैं।
तुर्की खुद नाटो का सदस्य है। उसे इसकी जरूरत नहीं है।
पाकिस्तान के अमेरिका से घनिष्ठ संबंध हैं। तुर्की के भी अमेरिका से संबंध अच्छे हैं।
“फिर इन देशों को इस्लामिक नाटो की जरूरत किसके खिलाफ है? इनको धमकी कहां से आ रही है? ये किसके लिए इस्लामिक नाटो बनाएंगे? क्या ये ईरान के खिलाफ बना रहे हैं? उसके खिलाफ ये बना नहीं सकते।”
कमर आगा कहते हैं, इस क्षेत्रीय गठबंधन में ऐसे ही देशों को लाया जा रहा है, जो प्रो-अमेरिका हैं। ताकि अमेरिका को दिक्कत न हो। अगर सऊदी अरब में आंतरिक समस्या आएगी, तो पाकिस्तान ज्यादा मदद कर पाएगा। अमेरिका बाहरी मदद के लिए है। ईरान युद्ध के बाद सऊदी अरब चाहता है कि उसका एक क्षेत्रीय गठबंधन बने। उन्हें सबसे ज्यादा दिक्कत हूती से है और उसके बाद ईरान से। मगर वह ईरान के खिलाफ नहीं है। इससे ज्यादा कुछ नहीं है। मिडिल-ईस्ट में नया सुरक्षा संगठन बनाने का यह पहला कदम है। बाकी वाह्य सुरक्षा के लिए ये सभी देश अभी भी अमेरिका पर निर्भर हैं। ये अपनी रक्षा के लिए डील कर रहे हैं। सऊदी अरब को इसमें सबसे ज्यादा दिक्कत यमन के हूतियों से है। यह गठबंधन उसके खिलाफ है। यह डील ईरान के खिलाफ नहीं है। यह सिर्फ एक नया सिक्योरिटी आर्किटेक्चर बनाने की कोशिश है। ताकि हूतियों से सुरक्षा हो सके। मगर यह उसे भी रोक नहीं पाएगा।
क्या भारत के लिए चिंता का विषय है मक्का समझौता?
इस सवाल के जवाब में कमर आगा कहते हैं, पाकिस्तान और तुर्की का इस डील में शामिल होना और सैन्य गठबंधन बनाना भारत के लिए स्ट्रैटेजिक चिंता का विषय है। तुर्की पहले भी कई मौकों पर भारत के खिलाफ जहर उगलता रहा है। ऑपरेशन सिंदूर में भी तुर्की ने पाकिस्तान को सैन्य मदद पहुंचाई थी। इसमें बड़े पैमाने पर ड्रोन और अन्य हथियार थे। पाकिस्तान और तुर्की ने अब सऊदी अरब के साथ मिलकर नया सैन्य गठबंधन बना लिया है। पाकिस्तान और तुर्की का साथ आना भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत की सुरक्षा की दृष्टि से यह सैन्य गठबंधन ठीक नहीं है। इसलिए भारत को सतर्क रहने का भी समय है।
वहीं इसी सवाल पर जेएनयू में विदेश विभाग की असिस्टेंट प्रो. राज यादव का कहना है कि भारत के सऊदी से अच्छे संबंध हैं, लेकिन पाकिस्तान और तुर्की दोनों भारत के दुश्मन देश हैं। इसलिए इस गठबंधन में दोनों का साथ होना निश्चित रूप से रणनीतिक रूप से सतर्क रहने का विषय है। ऑपरेशन सिंदूर में भी तुर्की पाकिस्तान के साथ खड़ा था। उसने ड्रोन और कुछ हथियार भी पाकिस्तान को दिए थे। तुर्की हमेशा पाकिस्तान के साथ खड़ा होता है। हालांकि इस तरह के गठबंधन ज्यादातर सिंबॉलिक ही रहे हैं। कभी पाकिस्तान के साथ भारत का फिर युद्ध हुआ तो ऐसा नहीं लगता कि तुर्की और सऊदी सीधे पाकिस्तान की तरफ से लड़ने आएंगे। हां, ये हो सकता है कि तुर्की हथियारों की और सऊदी आर्थिक मदद भले कर दे।




