
जर्मनी के एक राज्य का चुनाव इन दिनों पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह है सैक्सोनी-अनहाल्ट राज्य में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी ‘अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी’ (AfD) की ऐतिहासिक जीत। पार्टी ने 43.8% वोट हासिल किए हैं, जो जर्मनी के किसी भी राज्य में उसका अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। रूस का डर दिखाने और AfD को ‘पुतिन की कठपुतली’ बताने के बावजूद मतदाताओं ने उस पर भरोसा जताया। ऐसे में सवाल है कि क्या यह केवल एक राज्य का नतीजा है या जर्मनी से पूरे यूरोप को मिल रही बड़ी राजनीतिक चेतावनी?
एक राज्य का चुनाव पूरे जर्मनी के लिए क्यों अहम है?
सैक्सोनी-अनहाल्ट की आबादी भले पूरे जर्मनी का प्रतिनिधित्व नहीं करती, लेकिन यहां का नतीजा देश की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत जरूर दे रहा है। AfD ने 43.8% वोट हासिल किए हैं। यह जर्मनी के किसी भी राज्य में पार्टी का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। पांच साल पहले हुए चुनाव की तुलना में उसका वोट लगभग दोगुना हो गया है।
इसके उलट चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) को केवल 17.2% वोट मिले। वर्ष 2021 की तुलना में पार्टी का आधे से अधिक वोट घट गया। सैक्सोनी-अनहाल्ट में यह CDU का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। पार्टी एक भी निर्वाचन क्षेत्र सीधे जीतने में कामयाब नहीं हुई।
इस चुनाव में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) 9.3% वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रही। ग्रीन्स को 8.9%, लेफ्ट पार्टी को 8.6% और BSW को 5.3% वोट मिले हैं। राज्य में लगभग 77.8% मतदान हुआ, जो जर्मनी के एकीकरण के बाद इस राज्य का सबसे ऊंचा आंकड़ा है।

इतने बड़े मतदान के बीच AfD की जीत को सिर्फ नाराज वोटर्स का मामूली विरोध नहीं कहा जा सकता। जर्मन राजनीतिक वैज्ञानिक अलेक्जेंडर रार ने इसे जर्मनी के लिए एक राजनीतिक भूकंप बताया है। उनके मुताबिक, इस सफलता से दूसरे जर्मन राज्यों में भी AfD की लोकप्रियता बढ़ेगी।
चांसलर मर्ज की रूस नीति के खिलाफ भी जनादेश?
विशेषज्ञ CDU की हार को चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की निजी राजनीतिक हार और उनकी सरकार की नीतियों के प्रति वोटर्स की नाराजगी के रूप में देख रहे हैं। इनमें रूस को लेकर अपनाई गई नीति भी शामिल है।
’रशिया इन ग्लोबल अफेयर्स’ के प्रधान संपादक, विदेश एवं रक्षा नीति परिषद के प्रेसिडियम के अध्यक्ष और वाल्दाई इंटरनेशनल डिस्कशन क्लब के रिसर्च डायरेक्टर फ्योदोर लुक्यानोव के मुताबिक, चुनाव के अंतिम दिनों में AfD को नाजी और 'पुतिन की कठपुतली' बताने की कोशिश उसका बढ़ता समर्थन रोक नहीं सकी। उलटे, ऐसे आरोपों से पहले से नाराज मतदाता और भड़क सकते हैं।
लुक्यानोव इसकी तुलना सोवियत संघ के आखिरी दौर से करते हैं, जब कोई अधिकारी टेलीविजन पर आकर किसी बात पर जोर देता था तो आबादी का एक बड़ा हिस्सा मान लेता था कि सच्चाई शायद इसके उलट है।
जीत AfD की, लेकिन सत्ता से रोकने की तैयारी
AfD पूर्ण बहुमत से कुछ पीछे रह गई है, लेकिन BSW का समर्थन मिलने पर वह अपने इतिहास में पहली बार किसी राज्य की सरकार बना सकती है। BSW उम्मीदवार थॉमस शुल्जे ने सरकार बनाने के लिए AfD से बातचीत की संभावना से इनकार नहीं किया है। उन्होंने यह भी कहा कि रूस के साथ संबंधों सहित कुछ मुद्दों पर दोनों पार्टियों की सोच मिलती है।
AfD की सह-अध्यक्ष (Co-chair) एलिस वाइडेल ने चुनाव परिणाम को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि पार्टी को राज्य सरकार बनाने का जनादेश मिला है। उन्होंने जर्मनी की स्थिति मजबूत करने में दिलचस्पी रखने वाली सभी राजनीतिक ताकतों की ओर सहयोग का हाथ बढ़ाया है। इसके बावजूद AfD के सामने एक बड़ी राजनीतिक दीवार खड़ी है। BSW को छोड़कर बाकी दल उसके साथ काम करने से इनकार कर रहे हैं। CDU ने लेफ्ट पार्टी के साथ भी गठबंधन की संभावना खारिज कर रखी है। इससे सरकार बनाने की प्रक्रिया बेहद कठिन हो गई है।
AfD को सत्ता से रोकने के लिए कहां तक जाएगा जर्मनी?
उनका तर्क है कि जर्मनी की संघीय व्यवस्था इसलिए सफल रही है क्योंकि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राज्यों और केंद्र ने आपसी सहयोग बनाए रखा। वैध रूप से चुनी गई राज्य सरकार को सूचना देने से इनकार करना या उसके काम में रुकावट डालना एक पार्टी को रोकने की कोशिश में पूरी व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता है।
लुक्यानोव इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति की 'प्रतिबंध लगाने वाली मानसिकता' को अपने ही देश के भीतर लागू करने जैसा मानते हैं। अब तक यूरोप अपने विरोधी देशों के खिलाफ राजनीतिक और आर्थिक प्रतिबंधों का इस्तेमाल करता रहा है। सैक्सोनी-अनहाल्ट में ऐसी ही सोच जर्मनी के अपने वोटर्स और उनकी चुनी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल हो सकती है।
दूसरा ऑप्शन AfD को सत्ता से बाहर रखने के लिए लगभग सभी विरोधी दलों का एक असहज गठबंधन बनाना है। यह संवैधानिक रूप से संभव हो सकता है, लेकिन इसे बार-बार दोहराने की राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी। वोटर्स आखिरकार यह सवाल पूछेंगे कि सबसे ज्यादा वोट पाने के बाद भी उनकी चुनी पार्टी को सरकार बनाने क्यों नहीं दी जा रही।
AfD को रोकने की पुरानी रणनीति क्यों फेल हुई?
जर्मनी के मुख्यधारा के दलों ने लंबे समय से AfD के चारों तरफ राजनीतिक घेराबंदी कर रखी है। पार्टी के साथ सहयोग को नैतिक रूप से गलत बताया गया। लेकिन इस रणनीति ने AfD को कमजोर करने के बजाय उसे अब तक की सबसे बड़ी जीत तक पहुंचा दिया है। लुक्यानोव के मुताबिक, बेहतर रास्ता यह हो सकता है कि चुनाव परिणाम स्वीकार किया जाए और AfD जहां जीतती है, वहां उसे सरकार चलाने दी जाए। सत्ता की जिम्मेदारी आंदोलनों को अनुशासित करती है और वे विरोधाभास भी सामने लाती है जिन्हें विपक्ष में रहते हुए छिपाया जा सकता है।
लेकिन इसके लिए राजनीतिक समझ और लचीलेपन की जरूरत होगी। लुक्यानोव का मानना है कि निर्णायक मौकों पर जर्मन राजनीति लचीलेपन के बजाय खुद को नैतिक रूप से सही मानने लगती है। अब AfD के साथ बनाई गई दूरी खत्म करना मुख्यधारा के दलों के लिए अपनी पिछली रणनीति की विफलता स्वीकार करने जैसा होगा।
जर्मनी में दिखा यूरोप का बड़ा संकट
सैक्सोनी-अनहाल्ट का चुनाव सिर्फ AfD और CDU के बीच की लड़ाई नहीं है। यह पश्चिमी यूरोप में सत्ताधारी दलों और जनता के बीच लगातार बढ़ती दूरी का प्रमाण भी है। स्थापित राजनीतिक दल जो नीतियां पेश कर रहे हैं और आबादी का एक बड़ा हिस्सा जो चाहता है, उनमें अंतर बढ़ता जा रहा है। फ्योदोर लुक्यानोव के मुताबिक, करीब 25 से 30 साल पहले ग्लोबलाइजेशन के दौर में कई अहम फैसले राष्ट्रीय सरकारों के हाथों से निकलकर यूरोप जैसी बड़ी संस्थाओं के स्तर पर चले गए। शुरुआत में इस व्यवस्था ने समृद्धि और जीवन स्तर में सुधार दिया। फैसले जनता से दूर हो रहे थे, लेकिन आर्थिक लाभ उसकी भरपाई कर रहे थे।
अब यह समझौता कमजोर पड़ गया है। देशों की अर्थव्यवस्थाएं आपस में इतनी जुड़ी हैं कि सरकारें पूरी तरह राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर नहीं लौट सकतीं। दूसरी तरफ, ग्लोबलाइजेशन अब पहले जैसी आर्थिक गति और राजनीतिक भरोसा भी नहीं दे रहा। नतीजतन, पुरानी व्यवस्था को चलाने वाले नेता और ज्यादा नेशनल कंट्रोल मांगने वाले वोटर्स आमने-सामने आ गए हैं।
यही यूरोप में विरोध की राजनीति को ताकत दे रहा है। इन आंदोलनों में राष्ट्रीय संप्रभुता पर जोर और स्थापित संस्थाओं के प्रति नाराजगी जैसी समानताएं हैं। हालांकि फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के राष्ट्रवादी केवल ब्रसेल्स के विरोध के कारण स्वाभाविक सहयोगी नहीं बन जाएंगे, क्योंकि हर देश के हित और उसका इतिहास अलग है।
रूस को दुश्मन बताने से नहीं बचेगी पुरानी व्यवस्था
सैक्सोनी-अनहाल्ट में रूस विरोधी आरोपों के बावजूद AfD का वोट दोगुना होना बताता है कि यूरोप की पुरानी राजनीतिक रणनीति कमजोर पड़ रही है। मुख्यधारा के दल गठबंधनों और संस्थागत बाधाओं के जरिए नई राजनीतिक ताकतों को कुछ समय तक रोक सकते हैं, लेकिन जनता का रुझान इसी तरह बदलता रहा तो यह दीवार कब तक टिकेगी, यही सबसे बड़ा सवाल है।
हालांकि लुक्यानोव रूस को किसी भ्रम में न रहने की चेतावनी भी देते हैं। उनके मुताबिक, बढ़ते राष्ट्रवाद और परस्पर टकराते राष्ट्रीय हितों वाला यूरोप रूस के लिए जरूरी नहीं कि ज्यादा अनुकूल हो। इतिहास में ऐसी यूरोपीय राजनीति ने अस्थिरता भी पैदा की है, जिसका असर रूस पर पड़ा है।
फिर भी एक बात साफ है कि वैश्वीकरण के चरम दौर में बनी यूरोपीय राजनीतिक व्यवस्था बड़े बदलाव से गुजर रही है। सैक्सोनी-अनहाल्ट शायद वह जगह है, जहां इस बदलाव को छिपाना अब संभव नहीं रहा। चुनावी नतीजे को स्वीकार करने की जगह अगर रूस का डर दिखाकर सबसे बड़ी पार्टी और उसके वोटर्स को सत्ता से दूर रखा जाता है, तो संकट AfD का नहीं, यूरोप के अपने लोकतांत्रिक मॉडल का होगा।




