
3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के तीन दिन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फॉक्स न्यूज को एक इंटरव्यू दिया था। उन्होंने कहा था-
‘हम वेनेजुएला के जर्जर तेल इन्फ्रास्ट्रक्चर को दोबारा ठीक करेंगे और उसके तेल पर हमारा अधिकार होगा।’
ट्रंप ने उस वक्त कहा था, ‘हमारी बड़ी अमेरिकी तेल कंपनियां वहां जाएंगी, अरबों डॉलर खर्च करेंगी, बुरी तरह खराब हो चुके तेल के बुनियादी ढांचे को ठीक करेंगी और फिर इस तेल से अमेरिका के लिए कमाई शुरू करेंगी।’
इस घोषणा के लगभग 8 महीने बाद, अगस्त के आखिर में अमेरिका ने वेनेजुएला के साथ ‘दुनिया की सबसे बड़ी तेल डील’ का ऐलान किया। उन्होंने बताया कि इस डील से अमेरिका को वेनेजुएला के 65 अरब बैरल से ज्यादा के तेल रिजर्व पर कंट्रोल मिल गया है।
सवाल है कि क्या ये डील वाकई वेनेजुएला के लिए फायदेमंद है? क्या अमेरिकी नागरिकों को सच में सस्ता तेल मिल पाएगा? भारत की बात करें तो इस डील का क्या असर हो सकता है? ये इसलिए भी अहम है क्योंकि ईरान संकट गहराने के बाद वेनेजुएला भारत के लिए फिर से एक अहम तेल सप्लायर बनकर उभरा है।
वेनेजुएला तेल डील पर सवाल
वेनेजुएला के पास 303 अरब बैरल प्रमाणित तेल भंडार है। यूएस एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) का दावा है कि वेनेजुएला के 46 अरब डॉलर के तेल भंडार का नियंत्रण पहले से ही अमेरिका के हाथ में है।
अमेरिका की वेनेजुएला से डील पर कई सवाल उठ रहे हैं। व्हाइट हाउस के मुताबिक, इस डील में नॉर्थ अमेरिकन ब्लू एनर्जी पार्टनर्स (NABEP) की सबसे अहम भूमिका रही है, और आगे भी रहेगी।
NABEP वेनेजुएला की दूसरी सबसे बड़ी प्राइवेट तेल कंपनी है। इसके मालिक वेनेजुएला के तेल कारोबारी अलेक्जांद्रो बेटनकोर्ट हैं। बेटनकोर्ट के खिलाफ 5 देशों में अलग-अलग जांच चल रही है। अमेरिका भी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में इनके खिलाफ जांच कर रहा था। हालांकि अब खबरें हैं कि मियामी में फेडरल प्रॉसिक्यूटर्स ने बेटनकोर्ट के खिलाफ जांच को चुपचाप ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

25 या 100, कितने साल की डील?
अमेरिका का दावा है कि डील के तहत वेनेजुएला ने कंपनी को अपने 17 तेल फील्ड्स से 100 साल तक तेल निकालने का अधिकार दिया है। वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने टेलीविजन पर देश के नाम संबोधन में डील को ‘ऐतिहासिक’ बताया। लेकिन कहा कि यह 25 साल का समझौता है जिसका लक्ष्य तेल उत्पादन बढ़ाकर 15 लाख बैरल प्रतिदिन करना है।
रोड्रिगेज ने बताया कि डील से वेनेजुएला की ऑयल इंडस्ट्री में करीब 100 अरब डॉलर का निवेश आ सकता है। डील के तहत अमेरिका को बेचे जाने वाले हर बैरल तेल पर 19 डॉलर वेनेजुएला को मिलेंगे, जिससे तेल की कीमतों के आधार पर सालाना करीब 209 अरब डॉलर तक की कमाई हो सकती है।
रोड्रिगेज का यह अनुमान अगले 25 साल तक तेल की कीमत 65 डॉलर प्रति बैरल रहने पर आधारित है। लेकिन इस साल कच्चा तेल काफी महंगा बना हुआ है। अभी ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर से ऊपर है।
क्या यह डील वेनेजुएला के हित में है?
वेनेजुएला के अर्थशास्त्री फ्रांसिस्को रोड्रिगेज ने प्रमुख एनर्जी वेबसाइट 'ऑयल प्राइस' से बात करते हुए कहा कि वेनेजुएला को मिलने वाली रकम उतनी बड़ी नहीं है, जितनी सुनने में लगती है। 25 साल में 209 अरब डॉलर यानी हर साल करीब 8.4 अरब डॉलर, जबकि 2025 में वेनेजुएला ने अकेले 18.4 अरब डॉलर कमाए थे। अगर महंगाई को ध्यान में रखें तो 2051 में मिलने वाले 19 डॉलर आज के करीब 9 डॉलर के बराबर होंगे।
अमेरिका से तेल डील को लेकर वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति रोड्रिगेज की काफी आलोचना हो रही है। रोड्रिगेज का कहना है कि अमेरिका को देश के अरबों बैरल तेल पर अधिकार सौंपने की घोषणा के बावजूद वेनेजुएला अपनी संप्रभुता बरकरार रखे हुए है।
वहीं वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो का कहना है कि देश के प्राकृतिक संसाधन किसी 'अवैध सरकार' के नहीं हैं। हमारी जमीन के नीचे मौजूद संपदा वेनेजुएला के लोगों की है।’
सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में उन्होंने कहा कि बिना चुनी हुई, अंतरिम सरकार में बैठे लोग अमेरिका के दुश्मन हैं और उन्हें वेनेजुएला के प्राकृतिक संसाधनों पर बातचीत करने का न तो अधिकार है और न ही लोकतांत्रिक जनादेश।
Venezolanos,
— María Corina Machado (@MariaCorinaYA) September 3, 2026
Mi mensaje para ustedes a propósito del acuerdo energético anunciado entre Estados Unidos y el régimen:https://t.co/eXZBrqpXHgpic.twitter.com/Sd3048Kwgk
पूर्व वामपंथी सांसद विलियन रोड्रिगेज ने भी ट्रंप के साथ हुई इस डील की तीखी आलोचना की और पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज का जिक्र किया।
उन्होंने चावेज के शब्दों को दोहराते हुए कहा, ‘तेल हमारा है और इसी तेल के जरिए हमने अपनी मातृभूमि को वापस हासिल किया। यह समझौता इसके बिल्कुल उलट है। यह हमारी मातृभूमि को दूसरों के हवाले कर देता है और हमारे देश के भविष्य से समझौता करता है। इसे किसी भी तरह सही ठहराया नहीं जा सकता।’
एक्सपर्ट्स भी मान रहे हैं कि यह समझौता वेनेजुएला के हित में नहीं है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ डेलावेयर के डिपार्टमेंट ऑफ पॉलिटिकल साइंस एंड इंटरनेशनल रिलेशंस में प्रोफेसर मुक्तदर खान ने आरटी हिंदी से बात करते हुए कहा-
खान कहते हैं, ‘वेनेजुएला के लिए यह डील बिल्कुल भी सही नहीं है। इसी तरह की एक डील 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन ने ईरान से की थी और उसके अधिकांश तेल क्षेत्र पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया था। 1933 में अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ कुछ इसी तरह की डील की थी।’
अमेरिका को क्यों चाहिए वेनेजुएला का तेल?
अमेरिका दुनिया का शीर्ष तेल उत्पादक देश है। EIA के मुताबिक, साल 2025 में अमेरिका ने हर दिन 1 करोड़ 34 लाख बैरल कच्चा तेल बेचा। लेकिन फिर भी अमेरिका को कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका में उत्पादित तेल हल्का और साफ किस्म का होता है।

2 तरह का कच्चा तेल
जमीन से निकलने वाला तेल अपनी डेंसिटी, सल्फर की मात्रा के आधार पर मुख्य रूप से दो तरह का होता है-
- हल्का कच्चा तेल (लाइट क्रूड) ः इसे रिफाइन करना थोड़ा आसान होता है और इससे पेट्रोल और जेट फ्यूल निकाला जाता है।
- भारी कच्चा तेल (हेवी क्रूड) : इसे रिफाइन करने से जहाजों के लिए ईंधन, सड़क बनाने का मटीरियल और भारी उद्योगों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन निकलता है।
अमेरिका का अधिकांश कच्चा तेल लाइट क्रूड है लेकिन उसकी करीब 70% रिफाइनरियां खासतौर पर गाढ़े, भारी किस्म के तेल को प्रोसेस करने के लिए बनी हैं। यह डिजाइन 1970 के दशक का है, जब वेनेजुएला अमेरिका को तेल देने वाला सबसे बड़ा देश हुआ करता था। इसीलिए वेनेजुएला का गाढ़ा, भारी तेल अमेरिकी रिफाइनरियों में आसानी से खप सकता है।
वेनेजुएला अमेरिका के बिल्कुल पड़ोस में भी है, तो तेल ढुलाई का खर्च भी कम पड़ता है। ईरान से युद्ध के बीच अमेरिका का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व यानी आपात स्थिति के लिए रखा गया तेल भंडार 1982 के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है।
'तेल पर कब्जा चाहता है अमेरिका'
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के एक्सपर्ट, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो मनोज जोशी ने RT हिंदी से बात करते हुए कहा कि ईरान युद्ध के कारण तेल सप्लाई पर बड़ा संकट आया है और ऐसे में अमेरिका दुनिया के ज्यादा से ज्यादा तेल पर कब्जा कर लेना चाहता है।

वह कहते हैं, ‘अमेरिका की रणनीति है कि पूरे पश्चिमी गोलार्द्ध के तेल पर उसका कंट्रोल हो। उस क्षेत्र में अमेरिका सबसे ज्यादा तेल उत्पादित करता है और वेनेजुएला के पास सबसे बड़ा तेल भंडार है। इन दोनों ताकतों को मिला दिया जाए तो तेल की कीमतों पर अमेरिका का प्रभाव बढ़ जाएगा। अमेरिका दुनियाभर में तेल की कीमतों पर अपना नियंत्रण चाहता है।’
डील के भविष्य पर एक्सपर्ट्स के सवाल
अमेरिका और वेनेजुएला के बीच हुई इस तेल डील के भविष्य को लेकर एनर्जी एक्सपर्ट्स संदेह जता रहे हैं। उनका कहना है कि वेनेजुएला में कोई स्थायी सरकार नहीं है इसलिए निवेशक वहां निवेश करने से बचेंगे।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के सैंटा बारबरा रिसर्च यूनिवर्सिटी में ऑयल इंडस्ट्री पर रिसर्च करने वाले प्रोफेसर पाशा महदावी कहते हैं कि पहली नजर में यह डील बहुत बड़ी लगती है, लेकिन शायद इसका जमीन पर कोई खास असर न हो।
ह्यूस्टन पब्लिक मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला के साथ जॉइंट वेंचर का हिस्सा बनना नहीं चाहेंगी। वह कहते हैं, ‘अभी यह साफ नहीं है कि इस वेंचर में शामिल होने के लिए कौन-कौन सी अमेरिकी कंपनियां सामने आएंगी।’
मनोज जोशी भी डील के भविष्य पर सवाल उठाते हैं-
प्रो. मुक्तदर खान कहते हैं कि यह डील एक बड़ी राजनीतिक घोषणा भर है और जमीन पर इसका असर देखने के लिए वर्षों का इंतजार करना पड़ सकता है।
वह कहते हैं, ‘ट्रंप की यह डील कानूनी रूप से सही नहीं है इसलिए निवेशक सामने नहीं आ रहे हैं। अमेरिकी कंपनियों को ट्रंप की डील पर फिलहाल के लिए तो, भरोसा नहीं है। यह महज एक डील है, पूरी तस्वीर अभी साफ नहीं है कि क्या, कैसे और कब होगा। ट्रंप इस तरह की बड़ी घोषणाएं करते रहे हैं, उनके गाजा रिवेरा (Gaza Riviera) की भी काफी चर्चा हुई थी, लेकिन अब उस प्लान का कोई अता-पता नहीं है।’
सस्ते पेट्रोल के ट्रंप के दावे में कितना दम?
वेनेजुएला से डील को लेकर ट्रंप ने दावा किया कि इससे आम अमेरिकियों के लिए पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधन जल्द सस्ते होंगे, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञ इस दावे को फिलहाल पूरी तरह खारिज करते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि वेनेजुएला के तेल ढांचे को पूरी तरह दुरुस्त करने में कई साल लगेंगे, और यह एक चरणबद्ध प्रक्रिया होगी।
OPEC का डेटा बताता है कि जुलाई 2026 में वेनेजुएला का तेल उत्पादन करीब 11-11.2 लाख बैरल प्रतिदिन रहा। एनर्जी रिसर्च एंड बिजनेस इंटेलिजेंस कंपनी Rystad Energy का आकलन है कि अगले 2-3 साल में सीमित निवेश के साथ इसे करीब तीन से साढ़े तीन लाख बैरल प्रतिदिन तक बढ़ाया जा सकेगा।

15 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर तक पहुंचने के लिए 2026 से 2040 तक हर साल लगातार 8-9 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। इसी हिसाब से उत्पादन 2032 तक 20 लाख बैरल प्रतिदिन तक और 2040 तक 30 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।
सिर्फ मौजूदा उत्पादन स्तर को बनाए रखने के लिए भी अगले 15 साल में करीब 53 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत बताई गई है, जबकि पूरे ढांचे को ठीक करने में कुल मिलाकर 220 अरब डॉलर तक का खर्च आ सकता है।
अमेरिकी डील में कानून का पेच
अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनी GasBuddy के पेट्रोलियम एनालिसिस प्रमुख पैट्रिक डी हान ने टाइम मैगजीन से एक इंटरव्यू में कहा कि ‘गैस की कीमतें कम होंगी, ये सुनकर अच्छा लगता है लेकिन उस तेल को निकालने के लिए अभी अरबों डॉलर के निवेश की जरूरत होगी.’
वह कहते हैं, ‘अमेरिका किसी संप्रभु देश के प्राकृतिक संसाधनों पर अपना अधिकार कैसे जता सकता है? भले ही वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति ने इस डील को मंजूरी दी हो, लेकिन 100 साल के इस समझौते को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।’
उन्होंने यह भी कहा कि वेनेजुएला में तेल की ड्रिलिंग और उत्पादन शुरू होने में काफी लंबा समय लगेगा, इसलिए ईंधन की कीमतों पर इसका असर तुरंत या कुछ महीनों में भी दिखाई नहीं देगा।

अमेरिका-वेनेजुएला डील का भारत पर असर
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है जो अपनी जरूरत का 88% तेल आयात से पूरा करता है। ईरान संकट गहराने की वजह से, वेनेजुएला से भारत का तेल आयात अप्रैल में दोबारा शुरू होने के बाद तेजी से बढ़ा है।
डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2026 में भारत ने वेनेजुएला से करीब 3.83 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा। इसकी बदौलत रूस, यूएई और सऊदी अरब के बाद वेनेजुएला भारत का चौथा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया।
प्रो. मुक्तदर खान कहते हैं कि अगर अमेरिकी निवेश से वेनेजुएला का तेल उत्पादन बढ़ता है तो वैश्विक तेल बाजार में अतिरिक्त तेल आएगा। इससे भारत को तेल खरीदने का एक और विकल्प मिल सकेगा।
वह कहते हैं, ‘भारत के लिए अच्छी बात ये है कि वो हर तरह का तेल रिफाइन कर सकता है। गुजरात की जामनगर रिफाइनरी काफी सक्षम है जो वेनेजुएला, ईरान, रूस... सबका क्रूड रिफाइन कर सकती है। इसलिए भारत के लिए यह बात मायने नहीं रखती कि कहां से तेल आ रहा है।’
प्रो. खान कहते हैं कि अगर वेनेजुएला में निवेश के बाद उत्पादन तेजी से बढ़ता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति बढ़ सकती है जिससे कीमतें कम होने की संभावना रहेगी। भारत बहुत मात्रा में तेल खरीदता है इसलिए कीमत में छोटी गिरावट भी उसके आयात बिल पर बड़ा असर डाल सकती है। लेकिन इसमें दशकों लग सकते हैं।
ओआरएफ के विजिटिंग फेलो हरि शेषशायी हालांकि, इस बात से सहमत नहीं हैं। वह कहते हैं-
वह कहते हैं कि वेनेजुएला कभी 30 लाख बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन करता था, उसके मुकाबले आज उत्पादन काफी कम है और आने वाले भविष्य में भी उत्पादन बहुत ज्यादा बढ़ने की संभावना नहीं है।
हरि शेषशायी कहते हैं कि भारत को अपने तेल सप्लायर्स में विविधता लाने के लिए वेनेजुएला एक अच्छा विकल्प है। 2010 से 2020 के बीच भारत के कुल तेल आयात का करीब 10% वेनेजुएला से आया था। अगर फिर से यह मात्रा बढ़ती है तो अच्छी बात होगी।
वेनेजुएला की तेल कंपनियों में भारत का निवेश
भारत के लिए एक अहम पहलू वेनेजुएला के ऑयल फील्ड में सरकारी कंपनी ऑयल एंड नैचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड की विदेशी शाखा (ONGC Videsh LTD) का पुराना निवेश है।
ओएनजीसी विदेश का यह निवेश वेनेजुएला के ओरिनोको ऑयल फील्ड में स्थित दो प्रमुख प्रोजेक्ट्स में लगा है- सैन क्रिस्टोबल ऑयल फील्ड और काराबोबो-1 ऑयल ब्लॉक। सैन क्रिस्टोबल प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनी की 40% हिस्सेदारी है, जबकि बाकी 60% हिस्सेदारी वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA के पास है। इस प्रोजेक्ट में भारतीय कंपनी ने 40 करोड़ डॉलर का निवेश किया है।
काराबोबो-1 प्रोजेक्ट में ओएनजीसी विदेश की 11% हिस्सेदारी है। वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते PDVSA के पास ओएनजीसी विदेश का करीब 60 करोड़ डॉलर का डिविडेंड यानी मुनाफे में उसका हिस्सा फंसा हुआ है।

इस साल जुलाई में अमेरिकी वित्त मंत्रालय के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) से लाइसेंस मिलने के बाद ओएनजीसी विदेश को वेनेजुएला में ऑपरेशन शुरू करने की छूट मिल गई है।
इसके बाद कंपनी सैन क्रिस्टोबल प्रोजेक्ट में 20 करोड़ डॉलर का नया निवेश करने जा रही है। कंपनी दोनों प्रोजेक्ट्स का ऑपरेशन अपने हाथ में लेने के लिए वेनेजुएला के अधिकारियों से बातचीत भी कर रही है ताकि फंसे हुए बकाया लाभांश की वसूली हो सके।
नए निवेश पर एक्सपर्ट की सलाह
ओआरएफ के मनोज जोशी सलाह देते हैं कि भारत को वेनेजुएला में कोई नया निवेश नहीं करना चाहिए। इसकी वजह बताते हुए वह कहते हैं, ‘वेनेजुएला में राजनीतिक स्थिरता नहीं है और वहां की सरकार पर पूरा कंट्रोल ट्रंप का है। मैं समझता हूं कि ऐसे हालात में वहां नया निवेश करना रिस्की हो सकता है।
वह कहते हैं कि भारत चाहे तो तेल में यही निवेश कहीं और कर सकता है। कंपनियां चाहें तो अफ्रीकी देशों में निवेश बढ़ाएं, रूस में पहले से ही हमारा इन्वेस्टमेंट है। वहां निवेश को और बढ़ाया जा सकता है। रूस में सखालिन ऑयल फीड्ल में हमने निवेश किया है। वेनेजुएला में कोई ऐसी खास बात है नहीं कि वहां निवेश किया जाए।’




