
इस बार शंघाई सहयोग संगठन का शिखर सम्मेलन ऐसे वक्त में हुआ, जब एशिया की राजनीति तेजी से बदल रही है। सुरक्षा से लेकर व्यापार तक कई मोर्चों पर नए समीकरण बनते दिखे हैं। 31 अगस्त से 1 सितंबर तक किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हुए सम्मेलन में भारत, चीन, रूस और ईरान समेत SCO के देशों ने आतंकवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा की।
सदस्य देशों ने आतंकवाद से निपटने के लिए एक नए यूनिवर्सल सेंटर की स्थापना पर सहमति जताई। भारत के लिए SCO का मंच इसलिए खास है क्योंकि यहां एक ही टेबल पर भारत के करीबी साझेदार रूस, रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी चीन और पाकिस्तान जैसे देश मौजूद होते हैं। इस बार तीनों नेताओं की गर्मजोशी देखते ही बनी। पहले वीडियो देखिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में आतंकवाद के खिलाफ भारत का सख्त रुख दोहराया। ऐसे में सवाल यह है कि SCO सम्मेलन से भारत को वास्तव में क्या हासिल हुआ? इन्हीं सवालों को समझने के लिए हमने तीन विशेषज्ञों से बात की।
नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान की पूर्व वरिष्ठ फेलो मीना सिंह रॉय कहती हैं-
SCO एशिया का प्रमुख क्षेत्रीय संगठन है और इसका महत्व सिर्फ इसके सदस्य देशों तक सीमित नहीं है। इसलिए इस बैठक के नतीजों को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि मौजूदा परिस्थितियों में इससे क्या उम्मीदें थीं और क्या हासिल हुआ।
मेरे हिसाब से SCO के महत्व को समझने के लिए तीन बड़े पहलू हैं-
पहला- भू-राजनीतिक बदलाव जिसे मैं एक तरह का समुद्र मंथन कहती हूं। दुनिया और इस क्षेत्र में जिस तरह का भू-राजनीतिक बदलाव हो रहा है, उसका असर SCO पर भी पड़ा है।
दूसरा- ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक की सुरक्षा। हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ब्लॉक है, सप्लाई चेन प्रभावित हैं और ऊर्जा, खाद्य तथा उर्वरक की आपूर्ति से जुड़े सवाल गंभीर हो गए हैं। ईरान इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण देश है, क्योंकि वह SCO का पूर्ण सदस्य है। ऐसे में ईरान से जुड़ा मौजूदा संघर्ष और क्षेत्रीय अस्थिरता SCO के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा है।
तीसरा- साउथ-साउथ सहयोग यानी ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों का आपसी सहयोग। इन तीनों पहलुओं की वजह से इस संगठन की मौजूदा समय में काफी अहमियत है।

भारत के मुद्दे और SCO का घोषणापत्र
SCO में तीन बड़े देश भारत, चीन और रूस हैं। पाकिस्तान एक अलग चुनौती है। आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की नीति लंबे समय से एक समस्या रही है और अब उसी का असर उसे भी झेलना पड़ रहा है।
हमें यह भी समझना होगा कि SCO के गठन का एक बड़ा मकसद बॉर्डर मैनेजमेंट था। यह मूल रूप से सेंट्रल एशिया पर केंद्रित संगठन रहा है। लेकिन अब SCO का विस्तार हो चुका है और इसके स्थायी सदस्यों की संख्या भी बढ़ी है।
इसके बावजूद सेंट्रल एशिया और यूरेशिया की रणनीतिक अहमियत कम नहीं हुई है। दुनिया में जब भी कोई बड़ा संकट आता है, तो इस क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत के लिए भी यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत के नजरिए से इस बैठक में आतंकवाद सबसे प्रमुख मुद्दों में से एक था। संयुक्त घोषणा में आतंकवाद को लेकर स्पष्ट रुख सामने आया है। भारत लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ ‘डबल स्टैंडर्ड' के खिलाफ रहा है। इस लिहाज से यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण नतीजा है।
इसके अलावा राज्य प्रायोजित आतंकवाद और सीमा पार आतंकवाद को लेकर भी घोषणा में बात हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने बयानों में आतंकवाद के खिलाफ इस रुख को स्पष्ट किया है। भारत की ओर से युवाओं, संस्कृति और दूसरे क्षेत्रों में जो पहल की गईं, उन्हें भी समर्थन मिला है। इसलिए भारत के नजरिए से देखें तो बैठक का कुल मिलाकर परिणाम सकारात्मक रहा।
SCO में 'बैलेंसर' की भूमिका में भारत
भारत के सामने एक और महत्वपूर्ण भूमिका है। अक्सर SCO को पश्चिम-विरोधी मंच के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में भारत इस संगठन के भीतर एक बैलेंसर यानी संतुलनकारी देश की भूमिका निभाता है।
एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देश हैं, दूसरी तरफ रूस, चीन और ईरान जैसे देश हैं। ईरान पर प्रतिबंधों का अपना एक अलग संदर्भ है और हालिया अमेरिका-इजरायल हमले ने स्थिति को और जटिल बनाया है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और पश्चिम के नजरिए से, यही उसे इस पूरे समीकरण में एक महत्वपूर्ण संतुलनकारी भूमिका देता है।
भारत की सेंट्रल एशिया रणनीति को मिला बल
भारत की सेंट्रल एशिया रणनीति के लिहाज से भी यह शिखर सम्मेलन बहुत अच्छा रहा है। पीएम मोदी ने बिश्केक में कहा कि 2022 से सेंट्रल एशिया समिट नहीं हो पाई है लेकिन 2027 में यह बैठक होगी। मेरे हिसाब से पांच साल बाद इसका दोबारा शुरू होना भारत के लिए अच्छा है।
मेरा मानना है कि इस तरह के बहुपक्षीय मंचों का इस्तेमाल द्विपक्षीय रिश्तों को बढ़ाने के लिए भी होना चाहिए और इस बैठक में भारत ने यही किया है। अमेरिका-इजरायल के साथ ईरान का युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से मिले हैं। आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिन्यान से पीएम की मुलाकात हुई।

SCO या फिर इस तरह की बैठकों में सिर्फ मुख्य घोषणा ही महत्वपूर्ण नहीं होती। साइडलाइन बैठकों और द्विपक्षीय बातचीत का भी अपना महत्व होता है। भारत ने इन बैठकों के जरिए भी अपने हितों और चिंताओं को सामने रखा है।
सदस्य देशों के बीच सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और टेक्नोलॉजी पर सहयोग को लेकर 28 आउटकम डॉक्यूमेंट्स पर सहमति बनी और देशों के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को भी आगे बढ़ाने की कोशिश हुई है।
मोदी-ईरानी राष्ट्रपति की मुलाकात चर्चा में रही
ईरान के मुद्दे पर भारत का रुख काफी संतुलित रहा है। भारत लगातार कहता रहा है कि युद्ध और संघर्षों का समाधान संवाद और बातचीत के जरिए होना चाहिए।
पीएम मोदी ने SCO बैठक से इतर ईरानी राष्ट्रपति के साथ बातचीत की और उसका भी अपना महत्व है। साथ ही भारत ने यह भी कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला रहना चाहिए।

कनेक्टिविटी के मुद्दे पर भी भारत का रुख स्पष्ट है। भारत कनेक्टिविटी के खिलाफ नहीं है, लेकिन किसी भी कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट को देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए।
SCO बैठक से क्या हासिल हुआ?
अगर SCO की बैठक के पूरे नतीजे को देखें तो यह एक मिक्स लेकिन भारत के लिए सकारात्मक रहा है। भारत ने आतंकवाद, कनेक्टिविटी, सतत विकास, विज्ञान और तकनीक, AI तथा युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अपना पक्ष मजबूती से रखा। घोषणापत्र में ऐसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं है जिसे भारत के खिलाफ कहा जा सके।
इसमें पाकिस्तान की मौजूदगी और अगले साल उसकी मेजबानी से जुड़ी चुनौती अपनी जगह है, लेकिन भारत को SCO के भीतर अपने हितों को आगे बढ़ाते हुए इस वास्तविकता के साथ काम करना होगा।
JNU के असिस्टेंट प्रो. अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं-
अगर हम बिश्केक में हुई SCO की बैठक को देखें, तो मेरे विचार से भारत के लिए इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा आतंकवाद रहा। भारत लगातार यह कहता रहा है कि आतंकवाद को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
चाहे आतंकवाद किसी संगठन से आए या किसी देश की जमीन से उसे समर्थन मिले, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उसके खिलाफ एकजुट होकर कार्रवाई करनी होगी। इसलिए SCO जैसे मंच पर भारत की यह कोशिश रही कि आतंकवाद और उसके वित्तपोषण के खिलाफ और स्पष्ट तथा मजबूत संदेश दिया जाए।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा मध्य-पूर्व में बढ़ता तनाव, खासकर ईरान और क्षेत्र की स्थिति रही। भारत के लिए ईरान केवल एक पड़ोसी क्षेत्र का देश नहीं है, बल्कि वह हमारी ऊर्जा सुरक्षा और सेंट्रल एशिया तक पहुंच के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी INSTC भारत की इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
तीसरा मुद्दा कनेक्टिविटी और सेंट्रल एशिया है। भारत चाहता है कि सेंट्रल एशिया के साथ व्यापार और संपर्क बढ़े, लेकिन ऐसी कनेक्टिविटी किसी देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर के संदर्भ में भारत की अपनी स्पष्ट चिंताएं हैं।
इसके अलावा आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल तकनीक, AI और साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दे भी SCO के एजेंडे में महत्वपूर्ण रहे।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता दिखाने का मंच बना
कुल मिलाकर, मैं मानता हूं कि बिश्केक बैठक भारत के लिए केवल एक कूटनीतिक बैठक नहीं थी। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को प्रदर्शित करने का एक महत्वपूर्ण मंच था।
भारत एक तरफ रूस, चीन और सेंट्रल एशियाई देशों के साथ संवाद बनाए रखता है, लेकिन दूसरी तरफ अपने राष्ट्रीय हितों, विशेषकर आतंकवाद, संप्रभुता, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सुरक्षा पर अपनी स्वतंत्र स्थिति भी स्पष्ट रखता है।
प्रो. राज यादव कहती हैं-
SCO को बने करीब 25 साल हो चुके हैं, जबकि BRICS को भी करीब दो दशक पूरे हो गए हैं। इन वर्षों में दुनिया और वैश्विक व्यवस्था में काफी बदलाव आया है। 21वीं सदी को एशिया की सदी के तौर पर देखा जा रहा है और यूरेशिया भी दुनिया की राजनीति में लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
ऐसे समय में बहुपक्षीय संगठन और मंच अहम भूमिका निभा रहे हैं। SCO भी ऐसा ही एक मंच है, जहां यूरेशिया के कई देश एक साथ बैठकर महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करते हैं।
भारत एशिया की उभरती हुई ताकत है और ग्लोबल साउथ की एक भरोसेमंद आवाज के तौर पर अपनी जगह बना रहा है। भारत SCO और BRICS दोनों का सदस्य है। ऐसे में भारत इन मंचों पर अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ एक संतुलन बनाने की कोशिश करता है, जबकि अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय हितों से समझौता नहीं करता।
सेंट्रल एशिया के देशों के साथ अपार संभावनाएं
सेंट्रल एशिया के देशों के साथ भारत के रिश्ते सिर्फ आज के नहीं हैं। दोनों के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। रूस के साथ भी भारत की खास रणनीतिक साझेदारी है। सेंट्रल एशिया के देशों के साथ भारत के आर्थिक रिश्ते भी हैं, जिनमें ऊर्जा, कपड़ा और दवा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। हालांकि, अभी भारत का सेंट्रल एशिया के साथ कारोबार काफी कम है और इसमें बड़ी संभावनाएं हैं।
🎥 Watch highlights of PM @narendramodi's constructive visit to Kyrgyz Republic including his participation at the SCO Summit. ⬇️ pic.twitter.com/lozUGQ47Nm
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) September 3, 2026
सेंट्रल एशिया के साथ भारत का सालाना कारोबार करीब 2-3 अरब डॉलर का है, जबकि इसी क्षेत्र में चीन का कारोबार 100 अरब डॉलर से ज्यादा है। ऐसे में भारत के लिए सेंट्रल एशिया के साथ व्यापार बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। इसका एक उदाहरण भारत और उज्बेकिस्तान के बीच हाल में तय 5 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य के रूप में देखा जा सकता है।
दोनों देशों ने 31 अगस्त 2026 को महत्वपूर्ण खनिज, यूरेनियम, व्यापार, रक्षा, डिजिटल पेमेंट और शिक्षा समेत 11 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसके अलावा हिंदी और संस्कृत, खेल और विरासत संरक्षण जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी।




