'भैया को कहां खोजूं, भाभी को क्या जवाब दूं', नेपाल त्रासदी की ये कहानियां रुला देंगी
नेपाल त्रासदी को 5 दिन बीत चुके हैं पर ये एक ऐसा जख्म है जो बरसों लोगों को कुरेदता रहेगा। 900 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 4 हजार से ज्यादा लोग लापता हैं। कोई अपनों को तस्वीरों में,कोई मुर्दाघर में तो कोई दीवार पर लगी लंबी लिस्ट में खोज रहा है और कामना कर रहा है कि उनका अपना कहीं भी हो, बस सलामत हो।
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'भैया को कहां खोजूं, भाभी को क्या जवाब दूं', नेपाल त्रासदी की ये कहानियां रुला देंगी
nepal floods© ANI

- मुझे अब भी यकीन है कि मेरा बेटा जिंदा है। हमने सुना था कि यहां शव लाए गए हैं इसलिए मैं यहां (मुर्दाघर) आई हूं.

- मुझे समझ में नहीं आ रहा कि अब और कहां तलाश करूं। मैं अपनी भाभी को क्या जवाब दूं? एक लापता इंसान को खोजने के लिए हम कितनी जगहों पर भटकें?

- मुझे कोई अंदाजा नहीं है कि मेरे पिता कहां हैं या किस हाल में हैं। पांच दिन हो गए, मैं ठीक से सो भी नहीं पाया हूं.

- बेटी के लापता होने के बाद मेरा दिल घर पर बैठने की इजाजत नहीं दे रहा था। मैं 30 हजार रूपये कर्ज लेकर उसे ढूंढ रहा हूं.

26 अगस्त की वो सुबह किसी आम दिन की तरह थी। किसे पता था कि दूर पर्वत पर एक खामोश तबाही विनाश का प्लान बना रही है। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास जब इस तबाही ने पैर पसारे, तो नीचे सैलाब आ गया। फिर क्या लोगों के साथ घर, सड़कें और सब कुछ एक झोंके में बह गया। लोगों के हिस्से आई त्रासदी और रह गया कभी न भूलने वाला मंजर। ऊपर की ये 4 आपबीती पढ़कर आप कल्पना कर सकते हैं कि हिमालयी तबाही कितनी भयानक और दर्दनाक थी।

किसी ने अपना बेटा खोया, किसी ने पिता तो किसी ने बेटी। ग्लेशियर टूटने और भारी भूस्खलन से आई विनाशकारी बाढ़ ने उन सबके हिस्से में दुख का सागर भर दिया जो कभी न मिट सकेगा। 5 दिन बाद लोग अपनों को खोज रहे हैं। कोई अस्पताल में, कोई फोटो स्कैन कर तो कोई दीवार पर चस्पा लिस्ट में तलाश रहा है।

कल्पना करिए, जिसके साथ आप 5 दिन पहले हंस-बोल, खेल या घूम रहे थे, अब वह कहीं लिस्ट या तस्वीरों के अलावा किसी खामोश बुत की तरह सो गया है। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) की मानें, तो मरने वालों की संख्या 900 को पार कर गई है और 4 हजार से ज्यादा लोग लापता हैं। 10 हजार से ज्यादा लोग सुरक्षित बचा लिए गए हैं।

नेपाल त्रासदी पर सोमवार तक क्या पता चला

- नेपाल में आई भीषण बाढ़ में मरने वालों की संख्या 788 से बढ़कर 903 हो गई है। 
- इस आपदा में करीब 4,247 लोग लापता हैं और 10,451 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है।
- NDRRMA के मुताबिक, सबसे ज्यादा शव चितवन जिले से मिले हैं, जहां 272 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है।
- नवलपरासी (पूर्व) में 207, नवलपरासी (पश्चिम) में 151, नुवाकोट में 95, गोरखा में 62, धाडिंग में 55, तनहुं में 37 और रसुवा में 24 लोगों की जान गई है।
- लापता लोगों में नेपाल पुलिस के 25, नेपाली सेना के 45, सशस्त्र पुलिस बल के 13, सीमा शुल्क (कस्टम्स) कार्यालय के 15 और इमिग्रेशन कार्यालय के 3 कर्मचारी शामिल हैं। 
- नेपाली सेना ने हवाई मार्ग से 252 विदेशी नागरिकों और 3,344 नेपाली नागरिकों को रेस्क्यू किया है।
- अधिकारियों के अनुसार, 30 अगस्त को एक हाइड्रोपावर साइट से 15 लोगों को बचाया गया, जिनमें 5 चीनी और 7 भारतीय नागरिक शामिल थे। 
- राहत और बचाव के लिए अब तक कुल 411 उड़ानें भरी गई हैं, जिनमें से 7 उड़ानें सोमवार को टेकऑफ कर चुकीं।

'मेरा बेटा हर साल कैलाश पर्वत जाता था'

अपने बेटे की तलाश में नेपाल के इस पिता की आंखें भर आईं। पिता कंककुमार उस फ्लैश फ्लड के बाद से अपने बेटे को खोज रहे हैं। कंककुमार कहते हैं, 

”मेरा बेटा कैलाश पर्वत की यात्रा पर गया था। वह पिछले चार साल से कोयंबटूर में सद्गुरु के ईशा फाउंडेशन में रह रहा था। वह हर साल कैलाश पर्वत जाता था। इस साल, वह नेपाल के टिमुरे के एक होटल में रुका था। वह सुबह आठ बजे गांव के लिए निकला था। जब उससे संपर्क करने का समय हुआ, तो हमने उसके मोबाइल की लोकेशन ट्रैक की, जो सुबह 8:55 बजे सीमा (बॉर्डर) के पास दिखी। उसके बाद उससे संपर्क नहीं हो पाया। ईशा फाउंडेशन के नोटिस के अनुसार, मेरे बेटे के साथ फाउंडेशन के अस्सी लोग लापता हैं। हम त्रिशूली आर्मी कैंप भी गए थे, लेकिन वहां कोई जानकारी नहीं मिली। मैं सभी संबंधित अधिकारियों से अपील करता हूं कि वे मदद करें।”

एक और स्थानीय निवासी तीसाराम ने कहा, '

”मेरे पड़ोसी के दोस्त का बेटा सेना में है, वो मैलुंग चेक पोस्ट पर ड्यूटी के दौरान लापता हो गया। वह उस टीम का कैप्टन और लीडर भी है। सेना के 18 जवान लापता हैं। हमें अभी तक कोई जानकारी नहीं मिल रही है, इसलिए हम अस्पतालों में तलाश कर रहे हैं।”

नेपाल त्रासदी में गुमशुदा लोगों की डिटेल© ANI

भाई से वो आखिरी मुलाकात...

जब मंगलवार को राम बुढ़ा अपने छोटे भाई प्रवीण को रसुवा में काम की जगह छोड़कर काठमांडू लौटे, तो दोनों में से किसी ने नहीं सोचा था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात होगी। अगले ही दिन, भोटेकोशी नदी में भीषण बाढ़ आ गई। हाकुबेसी में 'अपर त्रिशूली-1' जलविद्युत परियोजना (हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट) में काम करने वाला प्रवीण (20) लापता हो गया। तभी से राम उसकी तलाश कर रहे हैं। वह काठमांडू से हाकुबेसी पहुंचे और जलविद्युत परियोजना की सुरंग (टनल) में घुसने की कोशिश की, इस उम्मीद में कि उनका भाई शायद अंदर फंसा हो, लेकिन सुरंग में सीने तक कीचड़ और मलबा भरा हुआ था, जिसके चलते उन्हें वापस लौटना पड़ा।

राम ने बताया, “मैं वहीं खड़ा होकर अपने भाई का नाम पुकारता रहा, इस उम्मीद में कि वह कोई जवाब देगा। मैंने कुछ देर इंतजार किया, लेकिन कोई आवाज नहीं आई। हमें कोई अंदाजा नहीं है कि सुरंग के अंदर के हालात कैसे हैं।” दोनों भाई जुम्ला के पातारासी गांव के रहने वाले हैं। उनके माता-पिता घर पर किसी खबर के इंतजार में बैठे हैं।

राम कहते हैं, “मैं उन्हें सिर्फ यही बता रहा हूं कि तलाश जारी है। लेकिन अब मैं अपने माता-पिता को क्या जवाब दूंगा?”

प्रवीण ने हाल ही में 12वीं की पढ़ाई पूरी की थी और वह नौकरी के लिए विदेश जाने की तैयारी कर रहा था। राम उसे रसुवा ले आए थे ताकि जाने से पहले वह कुछ पैसे कमा सके।

राम ने कहा, “वह बहुत मेहनती था और मेरी हर बात मानता था। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा दिन देखना पड़ेगा। मुझे बार-बार लगता है कि काश मैंने उसे काठमांडू में ही छोड़ दिया होता।”

लिस्ट में अपनों को खोजते लोग© ANI

निराश होकर लोग मुर्दाघर के चक्कर लगा रहे

लोग कर्णाली, सुदूरपश्चिम, मधेश और अन्य राज्यों के दूर-दराज के गांवों से रसुवा, नुवाकोट, चितवन, नवलपुर, तनहुं और पोखरा पहुंच रहे हैं। कुछ लोग एक अस्पताल के मुर्दाघर से दूसरे मुर्दाघर के चक्कर लगा रहे हैं, तो कुछ राहत शिविरों, पुलिस थानों और सेना के कैंपों में जा रहे हैं। कई लोग अपनी जेबों में लापता अपनों की तस्वीरें लिए घूम रहे हैं। उन्हें यह भी नहीं पता कि उनके अपने पानी के बहाव में बह गए, मलबे के नीचे दब गए, या फिर आपदा वाले इलाके में ही कहीं फंसे हुए हैं।

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परिजनों के लिए यह अनिश्चितता किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है। कई परिवारों के लोग अलग-अलग जिलों में बंटकर एक साथ तलाश कर रहे हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया पर गुहार लगा रहे हैं या स्थानीय नेताओं से मदद मांग रहे हैं। वहीं, जिन लोगों के पास पैसे, आने-जाने का साधन या इंटरनेट की सुविधा नहीं है, उनके पास घर पर इंतजार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।

परेशान परिवारवाले किसी अपने की तस्वीर के साथ© ANI

'मैं पैसे भेज रही हूं, आप वापस आ जाओ'

दांग के तुलसीपुर की रहने वाली सरिता चौधरी अपने पति सुनील की तलाश में पोखरा पहुंची हैं। सुनील रसुवा के टिमुरे में एक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में राजमिस्त्री का काम करते थे। बाढ़ आने से एक दिन पहले शाम 5 बजे तक उनकी अपने पति से फोन पर बात हुई थी।

सरिता ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “उन्होंने मुझे बताया था कि काम बहुत मुश्किल है और उन्हें नदी-नालों से डर लग रहा है। मैंने उनसे कहा था कि मैं किराए के पैसे भेज देती हूं, आप घर वापस आ जाओ।”

लेकिन सुनील ने मना कर दिया। सरिता बताती हैं, “उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अपने इलाज पर ध्यान दूं, बच्चों के लिए कपड़े खरीद लूं और वह दशहरे (दशैं) पर घर आएंगे। अगली दोपहर, हमें खबर मिली कि बाढ़ सब कुछ बहा ले गई।” उनका 16 साल का बेटा और 10 साल की बेटी बार-बार पूछ रहे हैं कि उनके पिता कहां हैं। सरिता कहती हैं, “अगर वह नहीं मिलते हैं, तो सरकार को कम से कम मुआवजा देना चाहिए और हमारे बच्चों की पढ़ाई व सुरक्षा में मदद करनी चाहिए।”

बेटे को तलाश रहीं मां की आंखें

60 साल की बिरसिमाया रविवार को अपने बेटे शेर बहादुर माझी की तलाश में रौतहट से भरतपुर पहुंचीं। बाढ़ आने से पहले वह रसुवा कस्टम कार्यालय के पास काम कर रहा था। परिवार को उसके लापता होने की खबर देर से मिली। उन्होंने कहा, “हमने सुना था कि यहां शव लाए गए हैं, इसलिए मैं आई।” उनके पति बुजुर्ग हैं। शेर बहादुर के भाई और पत्नी विदेश में हैं, इसलिए बिरसिमाया और दूसरे रिश्तेदारों को ही तलाश करनी पड़ रही है। चितवन में एक स्थानीय चैंबर ऑफ कॉमर्स की इमारत में बड़े पर्दे (स्क्रीन) पर अज्ञात शवों की तस्वीरें दिखाई जा रही हैं। बिरसिमाया अपनी बहू और एक पड़ोसी के साथ बैठकर उन तस्वीरों को ध्यान से देख रही थीं।

उन तस्वीरों में उनके बेटे का चेहरा नहीं था। उन्होंने सुना है कि शवों को गैंडाकोट और पोखरा के अस्पतालों में भी ले जाया गया है। उनका कहना है कि वह तलाश जारी रखेंगी। उन्होंने कहा, मुझे अब भी यकीन है कि मेरा बेटा जिंदा है।” तमाम दुखों के बावजूद उनकी उम्मीद कायम है। उनका एक और बेटा, जो नौकरी के सिलसिले में विदेश गया था, उसकी पहले ही मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ रही है, मुझे सिर्फ बुरी खबरें ही सुनने को मिल रही हैं।” कुछ परिवारों के लिए, इस तलाश ने उनके पैसे और हिम्मत दोनों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। बांके के कोहलपुर के रहने वाले करिंगा थारू अपने भाई आशाराम और भतीजे पृथ्वी नारायण की तलाश में कई दिनों से भरतपुर में भटक रहे हैं। वे दोनों नुवाकोट के एक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे।

बांके के तिलक घर्ती ने अपनी 28 साल की बेटी जानकी की तलाश में निकलने के लिए 30,000 रुपये का कर्ज लिया। जानकी करीब छह हफ्ते से रसुवा के एक होटल में काम कर रही थीं। उन्होंने कहा, “बेटी के लापता होने के बाद मेरा दिल घर पर बैठने की इजाजत नहीं दे रहा था।” जानकी नौकरी के लिए विदेश जाने की तैयारी कर रही थी, लेकिन एक दलाल पैसे लेकर भाग गया। वह उसी कर्जे को चुकाने के लिए रसुवा में काम करने गई थी। अब वह लापता है। तिलक चितवन पहुंचे और अधिकारियों को उसका नाम और तस्वीर सौंपी। रास्ते बंद होने और आगे बाढ़ के खतरे को देखते हुए रिश्तेदारों ने उन्हें घर लौटने की सलाह दी है।

उन्होंने कहा, “शायद मेरे पास वापस लौटने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है।” लेकिन उनके जैसे परिवारों के लिए, घर लौटने का मतलब उम्मीद छोड़ देना बिल्कुल नहीं है। मुर्दाघरों, अस्पतालों और राहत केंद्रों में भटकते हर परिवार के दिल में वही एक उम्मीद जिंदा है। जैसा कि अपने छोटे भाई की कई दिनों तक तलाश करने के बाद नवराज लामा ने कहा:“जब तक हमें वे जीवित नहीं मिल जाते या फिर शव ही... तब तक उम्मीद नहीं मरती।”

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