
बुधवार की सुबह जिबलाल अधिकारी रोज की तरह काम पर निकले थे। वो नेपाल के कुलेखानी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में काम करते हैं, लेकिन इन दिनों वह करीब 60 मेगावाट के अपर त्रिशूली-3A हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पहुंचे हुए थे। यहां सालाना मेंटेनेंस चल रहा था और मशीनों की जांच के लिए अनुभवी इंजीनियर और टेक्नीशियन बुलाए गए थे। सुबह करीब 7 बजे नाश्ता करने के बाद जिबलाल पहाड़ के भीतर बने अंडरग्राउंड पावरहाउस में चले गए।
उनकी पत्नी सीता पांडे जानती थीं कि अंदर मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता। इसलिए आम तौर पर लंच के समय पति से उनकी बात होती थी। उस दिन दोपहर में फोन नहीं आया। फिर शाम हो गई। इसके बाद एक दिन, दो दिन और अब पांच दिन बीत चुके हैं। जिबलाल का कोई फोन नहीं आया।
नेपाल की राजधानी काठमांडू से उत्तर की तरफ हिमालय में भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों के किनारे बने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में ऐसी ही सैकड़ों कहानियां हैं। किसी का भाई अंदर है, किसी का पति, तो किसी का बेटा। 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के विशाल हिस्से के ढहने के बाद पानी और मलबे का सैलाब नीचे की तरफ आया। इसने भोटेकोशी-त्रिशूली नदी कॉरिडोर को तहस-नहस कर दिया। गांव, सड़कें और पुल बह गए। नदी किनारे बने कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में पानी और मलबा घुस गया।
लेकिन अब सबसे मुश्किल लड़ाई जमीन के ऊपर नहीं, पहाड़ के भीतर लड़ी जा रही है।
गौरतलब है कि नेपाल में हालिया भीषण बाढ़ और भूस्खलन की तबाही के कारण भोटेकोशी और त्रिशूली घाटियों में 14 हाइड्रोपावर परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हुई हैं या पूरी तरह तबाह हुई हैं, जिनमें लगभग आधे दर्जन (लगभग 6) हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की टनल (सुरंगें) मलबे, कीचड़ और पत्थरों से ब्लॉक या धंसी हुई हैं।
933 लापता, लेकिन सभी सुरंग में नहीं
इस आपदा में आंकड़े तेजी से बदल रहे हैं। 31 अगस्त की Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल के हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से जुड़े 933 लोग अब भी लापता हैं। पूरे आपदा क्षेत्र में लापता लोगों की संख्या 3,000 से ज्यादा है। यहां एक फर्क समझना जरूरी है। 933 लोगों के बारे में यह पुष्टि नहीं है कि वे सभी सुरंगों में ही फंसे हैं। इनमें कुछ लोग बाढ़ में बह सकते हैं, कुछ दूसरे हिस्सों में फंसे हो सकते हैं और कुछ से संपर्क टूट गया है। लेकिन अधिकारियों को आशंका है कि सैकड़ों कर्मचारी अलग-अलग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की सुरंगों और अंडरग्राउंड पावरहाउस में फंसे हो सकते हैं। नेपाल विद्युत प्राधिकरण ने रविवार तक अपने चार प्रोजेक्ट्स में 265 लोगों से संपर्क न हो पाने की जानकारी दी थी। इनमें चिलिमे में 8, रसुवागढ़ी में 93 से ज्यादा, त्रिशूली-3ए में 42 और त्रिशूली-3बी में 122 लोग शामिल थे।
नेपाल के इस इलाके में समस्या इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यह किसी एक सुरंग का रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं है। नेपाली सेना कई अलग-अलग हाइड्रोपावर सुरंगों में सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही है।
Trishuli-3A: पहाड़ के भीतर कहां हैं लोग?
Nepal has intensified rescue efforts to free hundreds of people trapped inside tunnels at hydropower projects, including the Trishuli-3A site, following Wednesday’s flash floods.
— All India Radio News (@airnewsalerts) August 31, 2026
Rescuers, including experts from India and China, are trying to make contact with those inside the… pic.twitter.com/RNnhAGzKrE
इस पूरे ऑपरेशन का सबसे अहम केंद्र फिलहाल अपर त्रिशूली-3A है। जिस वक्त बाढ़ आई, यह प्रोजेक्ट शेड्यूल्ड मेंटेनेंस में था। 30 से 40 अनुभवी इंजीनियर और टेक्नीशियन इसके अंडरग्राउंड पावरहाउस में काम कर रहे थे। नेपाल बिजली प्राधिकरण का आंकड़ा कहता है कि यहां से 42 लोग मिसिंग हैं। समस्या यह थी कि बाढ़ के बाद सुरंग तक जाने वाला रास्ता ही गायब हो गया। पानी अपने साथ इतनी मिट्टी, चट्टान और मलबा लेकर आया कि कई जगह यह पता लगाना मुश्किल हो गया कि पावरहाउस या सुरंग का हिस्सा आखिर है कहां।
NEA के कार्यकारी निदेशक दीर्घयु कुमार श्रेष्ठ ने काठमांडू पोस्ट को बताया कि कुछ जगह तबाही इतनी ज्यादा है कि अधिकारी यह तक निर्धारित नहीं कर पा रहे कि पावरहाउस और सुरंग के ढांचे कहां हैं। यानी लोगों को बचाने से पहले रेस्क्यू टीम को सुरंग तलाशनी पड़ रही है।
तीन दिन पहाड़ खोदा, तब मिली सुरंग की छत
अपर त्रिशूली-3A में नेपाली सेना ने सीधे टनल के गेट से अंदर जाने की कोशिश नहीं की। दरअसल वहां हालात ऐसे थे कि गेट तक पहुंचना संभव नहीं था। इसलिए रेस्क्यू टीम ने पहाड़ के ऊपर से टनल की क्राउन यानी सुरंग की सबसे ऊपरी छत तलाशनी शुरू की। फिर ड्रिलिंग मशीन लगाई गईं। हाइड्रॉलिक कटर्स की मदद ली गई। करीब तीन दिन तक लगातार खुदाई का काम चला। आखिरकार रविवार दोपहर रेस्क्यूअर्स ने टनल की छत खोज ली। अब अगली समस्या थी कि इसके भीतर कैसे जाएं?

पहाड़ में बनाया 2×3 फीट का छेद
रेस्क्यू टीम ने टनल की छत में करीब 2 फीट × 3 फीट का छेद बनाया। फिर रस्सियों के सहारे एक रेस्क्यू एक्सपर्ट नीचे उतरा। अंदर अंधेरा था। उसने आवाज लगाई। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक रेस्क्यूअर्स ने छेद के जरिए अंदर उतरकर पुकारा, लेकिन किसी व्यक्ति की तरफ से जवाब नहीं आया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अंदर कोई जीवित नहीं है।
Reuters के मुताबिक जिस मुख्य वर्क एरिया में लोगों के होने की संभावना है, वह टनल के भीतर करीब 180 मीटर दूर हो सकता है। यानी रेस्क्यूअर्स ने फिलहाल पहाड़ के भीतर सिर्फ पहला दरवाजा खोला है। असली तलाश उसके आगे है।
अंदर पानी ही पानी मिला
छेद बनाने के बाद एक और समस्या सामने आई। नेपाली सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल राजाराम बस्नेत के मुताबिक जिस सुरंग में छेद बनाया गया, उसका दायरा करीब सात मीटर है और उसके भीतर पानी काफी ऊंचाई तक भरा मिला। इसका मतलब रेस्क्यूअर्स को एक साथ तीन खतरों से लड़ना है- पानी, मलबा और बंद अंडरग्राउंड जगह। अगर बिना जांच के तेजी से मलबा हटाया गया तो अचानक जमा पानी बाहर आ सकता है। ऐसे में अगर टनल का ढांचा कमजोर हुआ तो ये और बड़ा खतरा होगा। इसके अलावा अनियंत्रित विस्फोट भी अंदर मौजूद संभावित बचे हुए लोगों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। इसीलिए यह ऑपरेशन धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है।
सुरंग में हवा क्यों भेजी जा रही है?
रेस्क्यू का पहला मकसद तुरंत हर व्यक्ति तक फिजिकली पहुंचना नहीं है। पहले उनके जीवित रहने का समय बढ़ाना जरूरी है। इसीलिए रेस्क्यूअर्स टनल के भीतर हवा पंप करने की कोशिश कर रहे हैं। नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के अधिकारियों के मुताबिक टनल के अंदर ऑक्सीजन और पहले से मौजूद होने की संभावना है। अगर बाढ़ के पानी ने पूरे अंडरग्राउंड एरिया को नहीं भरा होगा और कर्मचारी किसी ऊंचे हिस्से या सुरक्षित चैंबर तक पहुंच गए होंगे, तो उनके जीवित रहने की संभावना बनी रह सकती है। लेकिन अभी यह सिर्फ उम्मीद है।
अंदर पानी कहां तक पहुंचा है, ऑक्सीजन कितनी है और अंदर फंसे वर्कर्स किस हिस्से में हैं, इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है। अगला बड़ा लक्ष्य छत में छेद को इतना चौड़ा करना है कि ऑक्सीजन, सिलेंडर, कैमरा और रेस्क्यू टीम अंदर पहुंच सकें। यही इस ऑपरेशन का निर्णायक मोड़ हो सकता है।
जहां सड़क नहीं बची, वहां हेलिकॉप्टर से पहुंचीं मशीनें
नेपाल की भौगोलिक स्थिति इस रेस्क्यू को और मुश्किल बना रही है। त्रिशूली कॉरिडोर में कई सड़कें और पुल बाढ़ में खत्म हो चुके हैं। इसका मतलब कई जगह एक्सकेवेटर या बुलडोजर चलाकर ले जाना संभव नहीं है। इसलिए भारी मशीनों को हेलिकॉप्टर से एयरलिफ्ट करना पड़ा। Reuters के मुताबिक अपर त्रिशूली इलाके में खुदाई की मशीनरी को हवा के रास्ते पहुंचाया गया ताकि रेस्क्यूअर्स टनल तक पहुंच सकें।
इस ऑपरेशन की मुश्किल को एक लाइन में समझें तो ऐसा मानिए कि पहले मशीन को पहाड़ तक पहुंचाओ, फिर मलबा हटाओ, फिर सुरंग खोजो, फिर पहाड़ में छेद करो और उसके बाद इंसान को तलाशो।
एक भाई पांच दिन से सुरंग में आवाज लगा रहा है
अपर त्रिशूली-1 में कहानी और भी मार्मिक है। 20 साल के प्रबिन बुधा इसी प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे। बाढ़ आने के बाद उनसे संपर्क टूट गया। उनके बड़े भाई राम बुधा पांच दिनों से बार-बार टनल के पास जा रहे हैं। रविवार को भी वह कुछ दूर टनल के भीतर गए और अपने भाई का नाम लेकर आवाज लगाते रहे। अंधेरे से कोई जवाब नहीं आया। फिर वह बाहर लौट आए। लेकिन उन्होंने तलाश बंद नहीं की है। यह वही अपर त्रिशूली-1 है जहां नेपाली सेना पहले बड़ी संख्या में वर्कर्स को निकालने में कामयाब भी हुई है। 29 अगस्त तक इस प्रोजेक्ट से 254 लोगों को बचाया जा चुका था। इसलिए हर ब्लॉक्ड टनल का मतलब मौत नहीं है और यही उम्मीद बाहर इंतजार कर रहे परिवारों को बांधे हुए है।
भारतीय टीम क्या कर रही है?
इतने बड़े मल्टीसाइट टनल ऑपरेशन के लिए नेपाल ने भारत और चीन से खास सहायता भी मांगी है। भारत से एक 11 सदस्यीय सुरंग में बचाव कार्य के लिए विशेष टीम नेपाल पहुंची है। काठमांडू पोस्ट के मुताबिक भारतीय NDRF टीम ने नेपाली सेना और आर्म्ड पुलिस फोर्स के समन्वय में चिलिमे और लांगटांग के प्रभावित इलाकों का जायजा लिया। भारत ने सुरंग-बचाव विशेषज्ञता के अलावा चिकित्सा और फोरेंसिक/डीएनए सहायता भी उपलब्ध कराई है।
चीन ने भी खास टनल एक्सपर्ट, थर्मल कैमरे, ड्रिलिंग उपकरण और हवा पंप करने वाले उपकरण भेजे हैं। हालांकि अपर त्रिशूली-3A की उस खास टनल पर मुख्य ऑपरेशन नेपाली सेना ही चला रही है। भारत और चीन की टीमें अलग-अलग हाइड्रोपावर साइट्स पर स्पेशल सपोर्ट दे रही हैं।
उत्तरकाशी से कितना अलग है नेपाल का ऑपरेशन?

भारत के लिए इस रेस्क्यू की तस्वीर नवंबर 2023 के उत्तरकाशी सिल्क्यारा टनल रेस्क्यू की याद दिलाती है। लेकिन दोनों को सीधे बराबर नहीं रखा जा सकता। उत्तरकाशी में एक टनल में 41 वर्कर फंसे थे। उनकी सटीक लोकेशन पता थी और रेस्क्यूअर्स का टारगेट एक निश्चित जगह तक पहुंचना था। लेकिन नेपाल में चुनौती अलग है। यहां कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, कई सुरंगें और अंडरग्राउंड बिजलीघर प्रभावित हुए हैं। कुछ जगह तो सुरंग तक पहुंचने का रास्ता ही बर्बाद हो चुका है। कहीं कीचड़ भर गया तो कहीं पानी है और कई लोगों की तो सटीक लोकेशन तक पता नहीं है।
नेपाल के लिए इससे भी बड़ा सवाल
इस आपदा की कहानी लोगों के बच जाने या न बच पाने पर खत्म नहीं होगी। नेपाल की अर्थव्यवस्था और भविष्य की एनर्जी स्ट्रेटजी में हाइड्रोपावर बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन इन्हीं प्लांट्स का बड़ा हिस्सा हिमालयन रिवर वैली में है। 26 अगस्त की तबाही ने नेपाल की लगभग 10 प्रतिशत पावर जनरेशन कैपेसिटी को प्रभावित किया है। यहीं इस हादसे का बड़ा सवाल छिपा है।
जिस हिमालय के पानी से नेपाल आने वाले वर्षों में हजारों मेगावाट बिजली पैदा करना चाहता है, क्लाइमेट चेंज और ग्लेशियर इनस्टेबिलिटी उसी इलाके को ज्यादा अप्रत्याशित भी बना रहे हैं। इस बार ऊपर से आया पानी सिर्फ गांव और सड़क नहीं, बहा ले गया। उसने पहाड़ के भीतर बनी उन सुरंगों को भी अपनी चपेट में लिया, जिन्हें इंसान ने पानी से बिजली निकालने के लिए बनाया था।




