यूक्रेन कैसे बना रूस का हिस्सा? एक विद्रोह जिसने पूर्वी यूरोप का नक्शा बदल दिया
एक समय यूरोप की सबसे बड़ी शक्ति माना जाने वाला पोलैंड चारों तरफ से घिर गया। 1667 की एंड्रुसोवो संधि के बाद ड्नीपर नदी नई सीमा बन गई। कीव और यूक्रेन का पूर्वी हिस्सा मॉस्को के प्रभाव क्षेत्र में आ गया, जबकि पश्चिमी हिस्सा पोलैंड के पास रहा। यहीं से यूक्रेन के पूरब और पश्चिमी हिस्से अलग-अलग राजनीतिक रास्तों पर चलने लगे।
यूक्रेन कैसे बना रूस का हिस्सा? एक विद्रोह जिसने पूर्वी यूरोप का नक्शा बदल दिया
जानें- यूक्रेन कैसे बना रूस का हिस्सा

साल 1648. यूक्रेन के विशाल घास के मैदानों में आग लगी हुई थी। गांव जल रहे थे, सामंती महल ध्वस्त किए जा रहे थे और हजारों लोग तलवारों के साये में अपनी किस्मत बदलने की कोशिश कर रहे थे। यह सिर्फ एक विद्रोह नहीं था, बल्कि वह तूफान था जिसने पूर्वी यूरोप की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।

इस कहानी के केंद्र में थे एक व्यक्ति। नाम- बोगदान ख्मेल्नित्स्की। एक ऐसा कोसैक नेता, जिसे आज भी रूस और यूक्रेन दोनों अपने इतिहास का नायक मानते हैं।

जब यूरोप की सबसे बड़ी ताकत था पोलैंड

17वीं सदी के मध्य में पोलिश-लिथुआनियाई राष्ट्रमंडल यूरोप का सबसे बड़ा राज्य था। बाल्टिक सागर से काला सागर तक फैले इस साम्राज्य को उस समय लोकतांत्रिक अभिजात वर्ग का आदर्श माना जाता था, लेकिन चमक-दमक के पीछे गंभीर संकट छिपे थे। राजा कमजोर था, जबकि बड़े-बड़े सामंत निजी सेनाएं रखते थे। सत्ता का बिखराव इतना था कि कई बार वारसॉ की सरकार अपने ही सीमावर्ती इलाकों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रख पाती थी। इसी सीमांत क्षेत्र में था यूक्रेन। उपजाऊ जमीन, लगातार तातार कबाइली हमले हो रहे थे और बीच में थे स्वतंत्र स्वभाव के योद्धा, जिन्हें दुनिया कोसैक के नाम से जानती है।

1648 में पोलिश-लिथुआनियाई कॉमनवेल्थ।© विकिपीडिया

कोसैक कौन थे?

कोसैक न तो पूरी तरह किसान थे और न ही नियमित सैनिक। वे सीमांत क्षेत्रों के स्वतंत्र योद्धा थे, जो घुड़सवारी, युद्धकला और आत्मनिर्भर जीवन के लिए प्रसिद्ध थे। जब पोलैंड को जरूरत होती, तो यही कोसैक उसकी सेना की रीढ़ बनते, लेकिन शांति के समय उन्हें अक्सर उपेक्षित कर दिया जाता। सरकार केवल सीमित संख्या में कोसैकों को आधिकारिक मान्यता देती थी, बाकी हजारों अनुभवी लड़ाके अधिकारों और सम्मान से वंचित रहते।

धीरे-धीरे असंतोष बढ़ता गया। 

एक जमींदार से विवाद और विद्रोह की शुरुआत

बोगदान ख्मेल्नित्स्की मूल रूप से पोलैंड के ही वफादार अधिकारी थे। उन्होंने पोलिश सेना में सेवा की थी और दरबार तक पहुंच रखते थे, लेकिन उनकी जिंदगी तब बदल गई जब एक प्रभावशाली पोलिश सामंत डेनियल चैप्लिंस्की ने उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया। ख्मेल्नित्स्की ने अदालतों, यहां तक कि राजा से भी न्याय की गुहार लगाई, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई. यहीं से व्यक्तिगत अपमान राजनीतिक विद्रोह में बदल गया। 1648 में ख्मेल्नित्स्की ने जापोरोजियन सिच में समर्थकों को इकट्ठा किया और पोलिश सत्ता के खिलाफ बगावत का झंडा उठा दिया।

इल्या रेपिन की पेंटिंग 'जैपोरोजियन कॉसैक तुर्की के सुल्तान को पत्र लिखते हुए'

कुछ महीनों में ढह गई पोलैंड की सैन्य ताकत

ख्मेल्नित्स्की ने एक अप्रत्याशित कदम उठाया। उन्होंने क्रीमिया के तातारों से गठबंधन कर लिया। मई 1648 में झोव्ती वोदी फिर कोर्सुन की लड़ाइयों में पोलिश सेनाओं को करारी हार मिली। कुछ ही हफ्तों में पोलैंड की प्रतिष्ठित सैन्य शक्ति धराशायी हो गई। विद्रोह की खबर जंगल की आग की तरह फैली। किसानों ने जमींदारों के खिलाफ हथियार उठा लिए। सामंती महलों को जला दिया गया। हजारों लोग मारे गए। यह केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं रह गया था, बल्कि सामाजिक विस्फोट बन चुका था।

कीव में नायक की तरह एंट्री

टार्नो में जिला संग्रहालय में बोहदान खमेलनित्सकी (सी. 1650) का चित्र।© विकिपीडिया

1648 के अंत तक ख्मेल्नित्स्की विजेता के रूप में कीव पहुंचे। चर्च की घंटियां बजीं। ऑर्थोडॉक्स पादरियों ने उन्हें मुक्तिदाता बताया। बहुत से लोगों को लगा कि सदियों पुराना पोलिश प्रभुत्व समाप्त हो चुका है, लेकिन एक बड़ी समस्या थी। विद्रोह जीत लिया गया था, शासन नहीं।

किसके सहारे जिंदा रहेगा नया राज्य?

ख्मेल्नित्स्की का नया कोसैक राज्य चारों ओर से दुश्मनों से घिरा था। तातार भरोसेमंद नहीं थे। ओटोमन साम्राज्य मदद के बदले अधीनता चाहता था। ट्रांसिल्वेनिया और मोल्दाविया जैसे संभावित सहयोगी कमजोर थे। ऐसे में नजरें मॉस्को पर गईं। कोसैक और रूस दोनों ऑर्थोडॉक्स ईसाई थे। धार्मिक और सांस्कृतिक समानताओं ने इस विकल्प को और मजबूत बनाया। 

1654: वह फैसला जिसने इतिहास बदल दिया

18 जनवरी 1654 को पेरेयास्लाव में एक ऐतिहासिक सभा हुई। ख्मेल्नित्स्की और उनके अधिकारियों ने रूसी जार अलेक्सी मिखाइलोविच के प्रति निष्ठा की शपथ ली। बदले में मॉस्को ने सुरक्षा और स्वायत्तता का वादा किया। उस समय यह फैसला जीवित रहने की रणनीति था लेकिन बाद की पीढ़ियों ने इसे अलग-अलग नजरिए से देखा। रूसी इतिहासकारों के लिए यह रूस और यूक्रेन के पुनर्मिलन का क्षण था, जबकि कई यूक्रेनी इतिहासकार इसे एक सैन्य गठबंधन मानते हैं, न कि स्थायी विलय.

हेटमैन बोगडान खमेलनित्सकी को चित्रित करने वाला पांच यूक्रेनी रिव्निया बैंकनोट।© विकिपीडिया

वो युद्ध, जिसने पूर्वी यूरोप को बदल दिया

पेरेयास्लाव की शपथ के बाद रूस और पोलैंड के बीच लंबा युद्ध शुरू हुआ। इसी दौरान 1655 में स्वीडन ने भी पोलैंड पर हमला कर दिया। इतिहास में इसे ‘द डेल्यूज’ कहा जाता है। एक समय यूरोप की सबसे बड़ी शक्ति माना जाने वाला पोलैंड चारों तरफ से घिर गया। 1667 की एंड्रुसोवो संधि के बाद ड्नीपर नदी नई सीमा बन गई। कीव और यूक्रेन का पूर्वी हिस्सा मॉस्को के प्रभाव क्षेत्र में आ गया, जबकि पश्चिमी हिस्सा पोलैंड के पास रहा। यहीं से यूक्रेन के पूरब और पश्चिमी हिस्से अलग-अलग राजनीतिक रास्तों पर चलने लगे।

एक अज्ञात कलाकार द्वारा जार एलेक्सी मिखाइलोविच का चित्र

वास्तव में यूक्रेन रूस का हिस्सा बन गया था?

यह सवाल आज भी विवाद का विषय है. रूसी नजरिया मानता है कि 1654 में यूक्रेन ने स्वेच्छा से रूस के साथ एकीकरण का रास्ता चुना था। दूसरी ओर, यूक्रेनी इतिहासकारों का तर्क है कि ख्मेल्नित्स्की ने केवल सैन्य संरक्षण मांगा था, न कि अपनी स्वतंत्रता स्थायी रूप से त्यागी थी।

सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं मौजूद है लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है। 1654 के पेरेयास्लाव समझौते ने रूस को पश्चिम की ओर विस्तार का अवसर दिया और यूक्रेन को आने वाली सदियों के लिए रूसी प्रभाव के दायरे में ले आया।

370 साल से है विवाद

ख्मेल्नित्स्की शायद अपने समय की समस्या का समाधान खोज रहे थे। उन्हें अपने लोगों को बचाना था, अपने विद्रोह को जीवित रखना था लेकिन उनके एक फैसले ने केवल एक युद्ध का परिणाम नहीं बदला। उसने रूस, यूक्रेन और पूरे पूर्वी यूरोप के भविष्य की दिशा तय कर दी। आज, जब मॉस्को और कीव युद्ध के मैदान में आमने-सामने हैं, तब भी 1654 के पेरेयास्लाव की गूंज सुनाई देती है। करीब 370 साल पहले लिया गया एक फैसला अब भी इतिहास और राजनीति की सबसे बड़ी बहस में से एक बना हुआ है।

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