खत्म हो रहा डॉलर का दबदबा? क्यों 'गोल्ड' को भविष्य की ग्लोबल करेंसी मान रहे एक्सपर्ट
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी ब्रेटन वुड्स व्यवस्था में तय हुआ कि दुनिया की कई मुद्राओं की कीमत अमेरिकी डॉलर से जुड़ी होगी और डॉलर की कीमत सोने (Gold) से तय रहेगी। इससे डॉलर दुनिया की सबसे भरोसेमंद मुद्रा बन गया। लेकिन अब वक्त बदल रहा है. अब दुनिया डॉलर से दूर हटने की कोशिश कर रही है।
खत्म हो रहा डॉलर का दबदबा? क्यों 'गोल्ड' को भविष्य की ग्लोबल करेंसी मान रहे एक्सपर्ट
कैसे सोने का दौर लौट रहा है?

दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों की वित्तीय व्यवस्था है, तो दूसरी तरफ BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य देश) ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम हो। RT के New Order कार्यक्रम में मशहूर अमेरिकी अर्थशास्त्री पीटर शिफ ने दावा किया कि आने वाले वर्षों में डॉलर का विकल्प कोई दूसरी करेंसी नहीं, बल्कि सोना (Gold) बन सकता है। उनका कहना है कि BRICS देशों के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी वित्तीय बाजारों पर निर्भरता कम करना है।

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा संभव है? आइए समझते हैं।

पहले समझिए: डॉलर इतना ताकतवर कैसे बना?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी ब्रेटन वुड्स व्यवस्था में तय हुआ कि दुनिया की कई मुद्राओं की कीमत अमेरिकी डॉलर से जुड़ी होगी और डॉलर की कीमत सोने (Gold) से तय रहेगी। इससे डॉलर दुनिया की सबसे भरोसेमंद मुद्रा बन गया।

1971 में अमेरिका ने डॉलर को सोने से जोड़ने की व्यवस्था (Gold Standard) खत्म कर दी। इसके बावजूद डॉलर की ताकत कम नहीं हुई। इसकी वजह यह रही कि दुनिया में तेल का बड़ा कारोबार डॉलर में होने लगा (जिसे Petrodollar System कहा जाता है), अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर का इस्तेमाल बढ़ता गया और देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में भी बड़ी मात्रा में डॉलर रखना जारी रखा।

आज भी दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का सबसे बड़ा हिस्सा है। अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन डॉलर में होते हैं। वैश्विक बैंकिंग व्यवस्था का बड़ा हिस्सा भी डॉलर पर आधारित है। इसके अलावा, अमेरिकी सरकार के Treasury Bonds को दुनिया के सबसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में माना जाता है। इसी वजह से अमेरिकी डॉलर सिर्फ एक मुद्रा नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक ताकत और प्रभाव का प्रतीक बन गया है।

क्या थी ब्रेटन वुड्स व्यवस्था?

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से पहले, जुलाई 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स शहर में 44 देशों का सम्मेलन हुआ। इसका उद्देश्य युद्ध के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था को स्थिर करना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक साझा वित्तीय व्यवस्था बनाना था। इसी सम्मेलन में ब्रेटन वुड्स व्यवस्था बनी, जिसके तहत अमेरिकी डॉलर को वैश्विक वित्तीय प्रणाली का केंद्र बनाया गया और उसकी कीमत सोने से जोड़ी गई। इसी सम्मेलन से International Monetary Fund (IMF) और World Bank की स्थापना भी हुई, जिन्हें ब्रेटन वुड्स की ‘जुड़वा संतानें’ कहा जाता है। बाद में 1971 में डॉलर और सोने का सीधा संबंध खत्म हो गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त में डॉलर का दबदबा बना रहा।

BRICS देश डॉलर से दूरी क्यों बनाना चाहते हैं?

पीटर शिफ
इसके पीछे केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक कारण भी हैं।
Peter Schiff
Peter Schiff
अर्थशास्त्री और 'द पीटर शिफ शो' पॉडकास्ट के होस्ट

1. प्रतिबंधों का डर

रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों और उसके विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज किए जाने के बाद कई देशों को एहसास हुआ कि यदि उनके अधिकांश विदेशी भंडार डॉलर में हैं तो वे भी भविष्य में ऐसी स्थिति का सामना कर सकते हैं। यही कारण है कि कई देश अपने रिजर्व में विविधता (Diversification) ला रहे हैं।

2. अमेरिका का बढ़ता कर्ज

अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। Peter Schiff का तर्क है कि सरकार अधिक उधार ले रही है। फेडरल रिजर्व लंबे समय तक आसान मौद्रिक नीति अपनाता रहा। इससे डॉलर की वास्तविक खरीद क्षमता समय के साथ कमजोर होती है। हालांकि, मुख्यधारा के कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था का आकार, उत्पादकता और डॉलर की वैश्विक मांग अब भी उसे मजबूत बनाए हुए है।

3. डॉलर का राजनीतिक इस्तेमाल

Schiff का मानना है कि जब डॉलर विदेश नीति का हथियार बन जाता है, तो दूसरे देश स्वाभाविक रूप से विकल्प खोजने लगते हैं। यही वजह है कि BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणाली पर जोर बढ़ा है। लेकिन डॉलर का विकल्प आखिर क्या होगा? यहीं Peter Schiff का सबसे बड़ा दावा सामने आता है।

उनके अनुसार डॉलर की जगह युआन, यूरो या कोई नई BRICS करेंसी नहीं लेगी, बल्कि Gold सबसे बड़ा विकल्प बनेगा। उनका तर्क है कि किसी भी देश की मुद्रा अंततः उसकी सरकार और केंद्रीय बैंक के फैसलों पर निर्भर करती है, जबकि सोना किसी सरकार के नियंत्रण में नहीं होता।

कौन है गोल्ड किंग?

Peter Schiff गोल्ड को सबसे सुरक्षित क्यों मानते हैं?

1. कोई सरकार सोना नहीं बना सकती

डॉलर, यूरो या रुपये की तरह सोने की आपूर्ति मनमर्जी से नहीं बढ़ाई जा सकती। इसलिए लंबे समय में इसकी दुर्लभता (Scarcity) इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

2. Neutral Asset

सोना किसी देश की देनदारी (Liability) नहीं है। यदि किसी देश के पास अमेरिकी बॉन्ड हैं तो वे अमेरिका पर निर्भर हैं, लेकिन सोना स्वयं एक वास्तविक संपत्ति (Real Asset) है।

3. सेंट्रल बैंकों की रिकॉर्ड खरीद

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई केंद्रीय बैंकों ने बड़े पैमाने पर सोना खरीदा है। विशेष रूप से चीन, रूस, भारत, तुर्किये और पोलैंड जैसे देशों ने अपने गोल्ड रिजर्व लगातार बढ़ाए हैं। इसे कई विशेषज्ञ डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति का हिस्सा मानते हैं।

क्या गोल्ड फिर से करेंसी बन जाएगा?

Peter Schiff इसे ‘Remonetization of Gold’ कहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि लोग बाजार में सोने के सिक्कों से खरीदारी करेंगे। बल्कि इसका मतलब है कि देशों के बीच व्यापारिक भुगतान में Gold की भूमिका बढ़ सकती है। केंद्रीय बैंक गोल्ड रिजर्व को अधिक महत्व देंगे। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में गोल्ड एक भरोसेमंद बैकअप एसेट बन सकता है।

क्या BRICS अपनी नई मुद्रा ला सकता है?

इस पर काफी चर्चा होती रही है। लेकिन फिलहाल BRICS की कोई साझा मुद्रा अस्तित्व में नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग आर्थिक नीतियां, अलग-अलग ब्याज दरें, अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं एक साझा करेंसी बनाना बेहद कठिन बना देती हैं। यही वजह है कि फिलहाल BRICS का जोर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डॉलर पर निर्भरता घटाने पर अधिक दिखाई देता है।

तो क्या कम हो रहा है गोल्ड का दबदबा?

क्या डॉलर का युग खत्म होने वाला है?

यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। Peter Schiff का मानना है कि डॉलर का प्रभुत्व धीरे-धीरे कमजोर होगा। लेकिन अधिकांश अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह प्रक्रिया यदि होती भी है तो बहुत धीमी होगी क्योंकि डॉलर अब भी सबसे अधिक भरोसेमंद रिजर्व करेंसी है। अमेरिकी बॉन्ड मार्केट दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे तरल बाजार है। वैश्विक वित्तीय व्यवस्था दशकों से डॉलर के इर्द-गिर्द बनी हुई है इसलिए निकट भविष्य में डॉलर का पूरी तरह समाप्त होना संभव नहीं माना जाता।

भारत इन देशों से कर रहा स्थानीय मुद्रा में व्यापार

भारत ने डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए कई देशों के साथ Local Currency Settlement (LCS) और Special Rupee Vostro Account (SRVA) जैसी व्यवस्थाएं शुरू की हैं, जिनसे रुपये या साझेदार देश की स्थानीय मुद्रा में व्यापार संभव हो रहा है

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत पहले से ही कई देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। साथ ही RBI लगातार गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाई जा रही है। BRICS और अन्य मंचों पर वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर चर्चा जारी है। हालांकि, भारत अभी भी डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

Peter Schiff का मानना है कि दुनिया धीरे-धीरे डॉलर केंद्रित व्यवस्था से निकलकर गोल्ड पर भरोसे की ओर बढ़ रही है। उनके अनुसार BRICS देशों के लिए अमेरिकी बाजारों और डॉलर पर निर्भरता कम करना आर्थिक सुरक्षा का रास्ता है। हालांकि, यह उनकी आर्थिक व्याख्या है। दूसरी ओर, कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि डॉलर की वैश्विक स्थिति अभी भी बेहद मजबूत है और निकट भविष्य में उसका विकल्प तैयार होना आसान नहीं होगा।

इतना जरूर है कि दुनिया के केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार बढ़ाई जा रही Gold Buying, BRICS की De-dollarisation रणनीति और भू-राजनीतिक तनाव इस बहस को पहले से कहीं अधिक गंभीर बना चुके हैं। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सोना वास्तव में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में फिर से केंद्रीय भूमिका हासिल कर पाता है, या डॉलर अपनी बादशाहत बनाए रखता है।

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