जब पूरी दुनिया की नजर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अटकी है, भारत एक ऐसे समुद्री रास्ते की ओर बढ़ रहा है, जो आने वाले दशकों में वैश्विक व्यापार का नक्शा बदल सकता है। नई दिल्ली में होने जा रही ब्रिक्स समिट में भी इस पर बात आगे बढ़ सकती है। अगर रूस की योजना सफल होती है, तो भारत पहली बार आर्कटिक के बर्फीले समुद्र के जरिए यूरोप तक सामान भेज सकेगा।
रूस की सरकारी कंपनी Rosatom और भारत के बीच नॉर्दर्न सी रूट (NSR) पर समझौते की तैयारी सिर्फ एक शिपिंग एग्रीमेंट नहीं है। यह भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा, रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी और भविष्य के वैश्विक व्यापार का नया चैप्टर हो सकता है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह रास्ता वास्तव में स्वेज नहर का विकल्प बन सकता है, या फिलहाल यह सिर्फ एक रणनीतिक सपना है?
पहले समझिए, नॉर्दर्न सी रूट है क्या?
नॉर्दर्न सी रूट (NSR) रूस के उत्तरी तट के साथ-साथ आर्कटिक महासागर से गुजरने वाला समुद्री मार्ग है। यह रूस के Murmansk से शुरू होकर बेरिंग स्ट्रेट तक जाता है।
यदि माल पहले चेन्नई या भारत के पूर्वी तट से व्लादिवोस्तोक पहुंचे, तो वहां से NSR के जरिए उत्तरी यूरोप तक भेजा जा सकता है यानी हिंद महासागर से होते हुए पूर्वी रूस, आर्कटिक महासागर और फिर यूरोप पहुंच सकते हैं।
BRICS से पहले नॉर्दर्न सी रूट पर भारत-रूस की बड़ी तैयारी
🇷🇺🇮🇳 Russia & India Eye Northern Sea Route Deal
— RT_India (@RT_India_news) September 9, 2026
Moscow and New Delhi could sign a landmark development cooperation MoU on the NSR before the end of 2026, 🇷🇺’s Deputy PM Denis Manturov told Interfax.
A joint pilot voyage is planned for next year - marking the 80th anniversary of… pic.twitter.com/pyLwJVqNg3
BRICS समिट से पहले रूस के डिप्टी पीएम डेनिस मंटुरोव ने नॉर्दर्न सी रूट को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने इंटरफैक्स से कहा कि मॉस्को और नई दिल्ली 2026 के अंत तक इस आर्कटिक समुद्री मार्ग के विकास में सहयोग के लिए एक अहम समझौता कर सकते हैं।
मंटुरोव के मुताबिक, दोनों देशों के राजनयिक संबंधों के 80 साल पूरे होने के मौके पर अगले साल एक संयुक्त परीक्षण यात्रा की भी योजना है। दोनों देशों का लंबे समय का लक्ष्य नॉर्दर्न सी रूट से हर साल 50 लाख टन तक सामान पहुंचाना है।
अभी इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है?
दुनिया का लगभग पूरा समुद्री व्यापार इस समय दो बड़े चोकपॉइंट्स पर निर्भर करता है-
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज
स्वेज नहर
ऐसे में एक जगह संघर्ष हो जाए और दूसरी जगह जहाज फंस जाएं तो पूरी सप्लाई चेन हिल जाती है। वैसे, इन दोनों के अलावा मलक्का स्ट्रेट और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री चोकपॉइंट्स भी काफी अहम हैं। 2021 में Ever Given जहाज के स्वेज में फंसने से दुनिया ने देखा था कि सिर्फ एक जहाज पूरे वैश्विक व्यापार को रोक सकता है।
2026 में मिडिल ईस्ट तनाव और होर्मुज को लेकर अनिश्चितता ने फिर यही सवाल खड़ा कर दिया। ऐसे समय में रूस कह रहा है, ‘अगर दक्षिण असुरक्षित है, तो उत्तर से आइए।’

भारत को कितना फायदा?
1. दूरी लगभग 40% तक कम
रूस का कहना है कि एशिया और उत्तरी यूरोप के बीच कुछ समुद्री मार्गों पर NSR से यात्रा की दूरी लगभग 30-40% तक कम हो सकती है। जहां स्वेज के जरिए जहाज को लगभग 35-40 दिन लग सकते हैं, वहीं आर्कटिक मार्ग से कई मामलों में कुछ मार्गों पर यात्रा का समय 10-15 दिन तक घट सकता है, हालांकि यह मौसम, बर्फ और जहाज के प्रकार पर निर्भर करता है।
इसका मतलब है कि
कम ईंधन
कम बीमा लागत (यदि मार्ग स्थिर हो)
जल्दी डिलीवरी
और लॉजिस्टिक्स खर्च में भी कमी
2. सिर्फ तेल नहीं, पूरा व्यापार बदलेगा
भारत और रूस ने 2030 तक 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य रखा है। लेकिन आज भी व्यापार का बड़ा हिस्सा तेल है।
NSR खुलने का मतलब-
मशीनरी
उर्वरक
कोयला
LNG
रेयर अर्थ मिनरल्स
लकड़ी
मेटल
जैसे सेक्टर भी तेजी से बढ़ सकते हैं।
3. भारत की आर्कटिक नीति बदल चुकी है
करीब एक दशक पहले तक भारत की आर्कटिक नीति मुख्यतः वैज्ञानिक शोध तक सीमित थी।
ग्लेशियर
जलवायु परिवर्तन
पोलर रिसर्च
लेकिन 2022 की आर्कटिक नीति के बाद भारत ने वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ-साथ व्यापार, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और निवेश पर भी अधिक जोर देना शुरू किया।
4. भारत सिर्फ ग्राहक नहीं, ऑपरेटर भी बन सकता है
NSR केवल भारत के लिए सामान ढोने का नया रास्ता नहीं है। समुद्री मामलों के जानकार अनुराग बिसेन के मुताबिक, यदि यह मार्ग बड़े पैमाने पर विकसित होता है तो भारत को केवल जहाज भेजने तक सीमित नहीं रहना पड़ेगा।
उनके अनुसार, इस मार्ग पर 20 से ज्यादा नए बंदरगाह विकसित हो सकते हैं, जहां भारतीय कंपनियां पोर्ट मैनेजमेंट, लॉजिस्टिक्स और समुद्री सेवाओं में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं यानी भारत भविष्य में इस नए समुद्री नेटवर्क का सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक प्रमुख संचालन भागीदार भी बन सकता है।
अब भारत की प्राथमिकताओं में शामिल हैं-
कनेक्टिविटी
एनर्जी
माइनिंग
रेयर अर्थ
शिपिंग
इकोनॉमिक प्रजेंस
यानी, भारत अब सिर्फ आर्कटिक का अध्ययन नहीं करना चाहता। वह वहां आर्थिक मौजूदगी भी चाहता है।
भारत का महत्व
पश्चिमी देशों की कंपनियां रूस के आर्कटिक प्रोजेक्ट्स से बाहर निकल चुकी हैं। उसके बाद चीन आगे आया और भारत-रूस के बीच भी बात चल रही है। यह सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, तीन रास्तों का नेटवर्क है। भारत धीरे-धीरे रूस के साथ तीन अलग-अलग कॉरिडोर विकसित कर रहा है।
- मुंबई - स्वेज - यूरोप: यही पारंपरिक रास्ता है।
- इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) मुंबई - ईरान - काकेशस - रूस: यानी सड़क, रेल और समुद्र का मिश्रण।
- ईस्टर्न मेरिटाइन कॉरिडोर: चेन्नई - व्लादिवोस्तोक और यहीं से आगे Northern Sea Route
इन तीनों को जोड़कर भारत एक तरह की Circular Connectivity बनाना चाहता है। अगर किसी एक मार्ग पर संकट आए तो दूसरा विकल्प मौजूद रहे। यही असली रणनीति है।
केवल व्यापार नहीं, ऊर्जा सुरक्षा भी
आज भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। रूस के आर्कटिक क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े तेल, गैस और LNG और कई महत्वपूर्ण खनिज संसाधन मौजूद हैं।
भारत की दिलचस्पी केवल तेल आयात तक सीमित नहीं है। रूस के सुदूर पूर्व (Far East) में भारत पहले ही 15 अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर चुका है, जिनमें सखालिन (Sakhalin) के हाइड्रोकार्बन प्रोजेक्ट भी शामिल हैं। ऐसे में NSR विकसित होने पर इन निवेशों से मिलने वाली ऊर्जा और संसाधनों को भारत तक अपेक्षाकृत तेज और सुरक्षित तरीके से पहुंचाना आसान हो सकता है।
लेकिन तस्वीर इतनी आसान भी नहीं
NSR अभी भी कई बड़ी चुनौतियों से घिरा है।
1. सालभर खुला नहीं रहता
बर्फ लगातार पिघल रही है। फिर भी अधिकांश समय जहाजों को Nuclear Icebreakers की जरूरत पड़ती है। इनकी संख्या सीमित है।
2. लागत अभी भी अधिक
Ice-Class जहाज सामान्य जहाजों से कहीं महंगे होते हैं। इनका संचालन भी महंगा है।
3. बीमा बड़ी समस्या
आर्कटिक समुद्र में दुर्घटना का जोखिम ज्यादा है। इसलिए बीमा कंपनियां अधिक प्रीमियम मांगती हैं।
4. भारत के पास पर्याप्त आर्कटिक शिपिंग क्षमता नहीं
भारत के पास अभी बड़े पैमाने पर पोलर नेविगेशन का अनुभव सीमित है। इसीलिए दोनों देश भारतीय नाविकों की पोलर ट्रेनिंग और शिपबिल्डिंग सहयोग पर भी काम कर रहे हैं।
समुद्री मामलों के विशेषज्ञ अनुराग बिसेन के अनुसार, इसी जरूरत को देखते हुए भारत और रूस ने भारतीय नाविकों (Seafarers) को पोलर नेविगेशन की ट्रेनिंग देने पर सहमति बनाई है। उनका कहना है कि जैसे-जैसे आर्कटिक मार्ग पर जहाजों की संख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे प्रशिक्षित भारतीय नाविकों की मांग भी तेजी से बढ़ सकती है। आज भारत दुनिया में नाविक उपलब्ध कराने वाले सबसे बड़े देशों में शामिल है और NSR इस क्षेत्र में नए अवसर खोल सकता है।
5. पश्चिमी प्रतिबंध
रूस के कई आर्कटिक प्रोजेक्ट पश्चिमी प्रतिबंधों के दायरे में हैं। इसी वजह से भारत ने पहले कुछ प्रतिबंधित LNG परियोजनाओं से दूरी भी बनाई थी। इसलिए हर परियोजना में राजनीतिक जोखिम बना रहेगा।
बिसेन का मानना है कि भारत केवल जहाज चलाने तक सीमित नहीं रहेगा। भारतीय नौसेना का हाइड्रोग्राफिक विभाग समुद्र की गहराई, समुद्री नक्शे और सुरक्षित नौवहन मार्ग तैयार करने में दुनिया के कई देशों के साथ काम कर चुका है। भविष्य में भारत और रूस आर्कटिक क्षेत्र के लिए भी संयुक्त हाइड्रोग्राफिक चार्ट विकसित कर सकते हैं।
NSR क्या स्वेज की जगह ले सकता है?
फिलहाल नहीं क्योंकि दुनिया के अधिकांश कंटेनर जहाज अब भी स्वेज से ही जाएंगे। आर्कटिक में मौसम सबसे बड़ी चुनौती है। इंफ्रास्ट्रक्चर अभी शुरुआती अवस्था में है। लेकिन यह स्वेज का रिप्लेसमेंट नहीं, बल्कि स्ट्रैटेजिक अल्टरनेटिव जरूर बन सकता है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
भारत की बड़ी रणनीति क्या है?
अगर पिछले दस वर्षों को देखें तो भारत की समुद्री नीति तेजी से बदल रही है। फिलहाल भारत
चाबहार बंदरगाह विकसित कर रहा है।
INSTC पर काम कर रहा है।
चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर बना रहा है।
अब Northern Sea Route से भी जुड़ रहा है।
इसके साथ ही भारत पूर्वी तट के बंदरगाहों और समुद्री इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर भी जोर दे रहा है, ताकि भविष्य में चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर और NSR का पूरा लाभ उठाया जा सके। भारत केवल एक समुद्री रास्ते पर निर्भर नहीं रहना चाहता। वह ऐसे कई वैकल्पिक नेटवर्क बना रहा है, जिनसे किसी एक क्षेत्र में युद्ध, प्रतिबंध या भू-राजनीतिक संकट आने पर व्यापार पूरी तरह ठप न हो।
नॉर्दर्न सी रूट पर भारत-रूस समझौता सिर्फ आर्कटिक में जहाज चलाने की योजना नहीं है। यह उस बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत है, जहां समुद्री व्यापार केवल भौगोलिक सुविधा से नहीं, बल्कि रणनीतिक सुरक्षा से भी तय होगा।
आज NSR आर्थिक रूप से हर माल के लिए सबसे व्यवहारिक विकल्प नहीं है। बर्फ, ऊंची लागत, बीमा, विशेष जहाजों की जरूरत और भू-राजनीतिक जोखिम इसकी राह कठिन बनाते हैं। फिर भी भारत इसमें निवेश इसलिए कर रहा है क्योंकि वह भविष्य की तैयारी कर रहा है। एक ऐसे समय की, जब जलवायु परिवर्तन आर्कटिक को अधिक समय तक नौवहन योग्य बनाएगा और वैश्विक व्यापार के नए मार्ग खुलेंगे।
इसलिए इस समझौते को केवल ‘एक नया समुद्री रास्ता’ मानना भूल होगी। यह भारत की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक सप्लाई चेन और रूस के साथ आर्थिक साझेदारी को कई वैकल्पिक गलियारों के जरिए मजबूत करना चाहता है। आने वाले वर्षों में यदि दुनिया का व्यापारिक नक्शा बदलता है, तो उसकी शुरुआती रेखाएं शायद आर्कटिक की बर्फ पर ही खींची जा रही हों।




