
रूस का नाम लेते ही दिमाग में मॉस्को, सेंट पीटर्सबर्ग, साइबेरिया या बर्फ से ढके इलाके उभरते हैं। लेकिन रूस के बीचों बीच बहने वाली वोल्गा नदी के किनारे एक ऐसा पुराना गांव है, जिसने इतिहास और पुरातत्व के शोधकर्ताओं के सामने एक दिलचस्प सवाल खड़ा किया था।
नाम है- स्ताराया मायना (Staraya Maina)
रूस के उल्यानोव्स्क (Ulyanovsk) क्षेत्र में स्थित और राजधानी मॉस्को से करीब 881 किलोमीटर दूर यह जगह आज भले ही एक छोटा-सा कस्बा है, लेकिन 2007 में पुरातात्विक खुदाई के दौरान यहां एक ऐसी प्रतिमा मिलने की खबर सामने आई, जिसने भारत और रूस के प्राचीन रिश्तों को लेकर जिज्ञासा बढ़ा दी। वो थी भगवान विष्णु की प्रतिमा।
स्ताराया मायना में सालों से आर्कियोलॉजिकल एक्सकैवेशन कर रहे उल्यानोव्स्क स्टेट यूनिवर्सिटी (Ulyanovsk State University) के पुरातत्वविद् डॉक्टर अलेक्जेंडर कोझेविन (Alexander Kozhevin) और उनकी टीम को 2007 में ये मूर्ति मिली थी। जिसके बाद उन्होंने इसके बारे में पब्लिश किया।

तब इस खबर के सामने आने के बाद भारत से भी एक टीम रूस पहुंची। इसी दल का हिस्सा रहे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के सेंटर फॉर रशियन स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर सोनू सैनी से RT हिंदी ने बात की।
प्रोफेसर सैनी कहते हैं-
हम लोग रशियन स्टडीज के तहत रूस की संस्कृति और इतिहास से जुड़ी चीजों के बारे में पढ़ते और रिसर्च करते रहते हैं। इसी दौरान 2007 में हमें इस मूर्ति के बारे में जानकारी मिली। जिसके बाद हमने इसके बारे में और पढ़ना शुरू किया और ज्यादा जानकारी जुटाने की कोशिश की। इसी रिसर्च के दौरान हमें पता चला कि इस पुरातात्विक खोज से जुड़े डॉक्टर अलेक्जेंडर कोझेविन कौन हैं? इसके बाद हमने उनके बारे में जानकारी जुटाई और उनसे सीधे संपर्क किया। हमने डॉक्टर अलेक्जेंडर कोझेविन से कहा कि हम साइट को देखने आना चाहते हैं। उन्होंने हमें बुलाया और खुद उस पुरातात्विक स्थल पर लेकर गए। इसके बाद स्थानीय म्युनिसिपैलिटी के ऑफिस में भी हमारी विस्तार से बातचीत हुई कि खुदाई कैसे हुई और मूर्तियां कैसे मिलीं”

लेकिन 2007 की खुदाई में मिली इस मूर्ति की विष्णु प्रतिमा के ही रूप में पहचान किस आधार पर की गई थी?
इसपर प्रोफेसर सैनी बताते हैं कि
जब भगवान विष्णु की इस मूर्ति को प्रकाशित किया गया, तो कुछ भारतीयों ने इसकी तुलना मां काली की प्रतिमाओं से की, खासकर दोनों तरफ बनी सिर (मुंडियों) जैसी आकृतियों के आधार पर। एक दावा यह भी आया कि यह किसी प्राचीन बौद्ध प्रतिमा से मिलती है।
हालांकि, अब तक के अध्ययन में सबसे मजबूत समानता विष्णु की प्रतिमा से ही मिलती है। काली की प्रतिमाओं से भी कुछ समानताएं हैं, इसलिए इस पर अभी और रिसर्च की जरूरत है।
लेकिन विष्णु की प्रतिमा रूस कैसे पहुंची?
यही इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल है। स्ताराया मायना रूस के वोल्गा क्षेत्र में स्थित है। वोल्गा नदी सदियों से पूर्वी यूरोप और यूरेशिया के विशाल भूभाग को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण जलमार्ग रही है। ऐसे में किसी भारतीय देवता से जुड़ी प्रतिमा का यहां मिलना स्वाभाविक रूप से इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए दिलचस्प सवाल पैदा करता है।
मूर्ति यहां कैसे पहुंची?
वोल्गा नदी उस समय एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग थी और इसके प्रमाण मिलते हैं कि भारतीय व्यापारी भी इस रास्ते से रूस तक आते थे। इसलिए संभव है कि यह मूर्ति भी इसी व्यापारिक संपर्क के जरिए यहां पहुंची हो। इसी क्षेत्र से ‘सामंत देव’ नाम वाला एक सिक्का मिलने का उल्लेख भी मिलता है, जिसे विशेषज्ञों ने लगभग 12वीं शताब्दी से जोड़ा है।
इस खोज की अहमियत समझने के लिए स्ताराया मायना की अपनी आर्कियोलॉजिकल कहानी भी समझनी होगी। कोझेविन के मुताबिक, इस इलाके के आसपास बड़ी संख्या में प्राचीन चीजें मिली थीं। उनका मानना था कि प्राचीन काल में यहां की आबादी आज के मुकाबले कई गुना अधिक रही होगी। उस समय यहां से लोगों के दूसरे इलाकों की ओर जाने की भी परिकल्पना सामने रखी गई थी।
यही वजह है कि 2007 की रिपोर्ट में इस खोज को केवल “एक प्रतिमा मिलने” की घटना नहीं माना गया, बल्कि इसे प्राचीन रूस के इतिहास को समझने के बड़े आर्कियोलॉजिकल कॉन्टेक्स्ट में रखा गया था।

प्रोफेसर सैनी साथ ही इसपर कहते हैं कि हम इस विष्णु की मूर्ति की कार्बन डेटिंग भी कराना चाहते हैं। चूंकि मूर्ति को भारत लाना संभव नहीं है वो वहां पर एक म्यूजियम में रखी गई है, इसलिए रूस में ही इसकी डेटिंग कराने का अनुरोध किया गया है, ताकि इसकी उम्र और पहचान को लेकर तथ्य और अधिक स्पष्ट हो सकें।
प्रोफेसर सैनी साथ ही बताते हैं कि इस साल 2026 में भी इसी स्ताराया मायना में एक और मूर्ति मिली थी। जिसमें एक भगवान कमल के फूल पर बैठे हैं। इसपर भी स्टडी जारी है।
भले ही फिलहाल इन मूर्तियों को लेकर स्टडी जारी है लेकिन इस खोज ने भारत-रूस संबंधों की टाइमलाइन में एक नया सवाल भी पैदा किया।
दरअसल भारत और रूस के ऐतिहासिक संबंधों की चर्चा अक्सर 15वीं शताब्दी और रूसी यात्री अफनासी निकितिन से शुरू होती है। निकितिन ने भारत की यात्रा की और अपने अनुभवों को The Journey Beyond the Three Seas में दर्ज किया।
लेकिन स्ताराया मायना की विष्णु प्रतिमा की कहानी इस टाइमलाइन से एक कदम पीछे जाकर सवाल पूछती है-
क्या भारत और रूसी भूभाग के बीच संपर्क निकितिन से कई सदियों पहले शुरू हो चुके थे?
प्रोफेसर सैनी कहते हैं-
अफानासी निकितिन निश्चित तौर पर इन संबंधों का एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन हैं, क्योंकि उन्होंने भारत की यात्रा की और यहां के बारे में विस्तार से लिखा। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि उस दौर से पहले यात्राओं और संपर्कों का लिखित रिकॉर्ड बहुत सीमित था। रूस और भारत के बीच आने-जाने वाले लोगों की यात्राएं शायद दर्ज ही नहीं हो पाती थीं। संभव है कि रूसी व्यापारी भारत आते रहे हों या भारतीय व्यापारी रूस के इलाकों तक पहुंचते रहे हों, लेकिन उस समय लेखन की परंपरा और लिखित दस्तावेजों की उपलब्धता आज जैसी नहीं थी। कागज भी आसानी से उपलब्ध नहीं था, इसलिए बहुत-सी यात्राओं और संपर्कों का कोई लिखित प्रमाण हमारे पास नहीं बचा।

ऐसे में 8वीं सदी की यह मूर्ति एक महत्वपूर्ण संकेत देती है। यह इस संभावना को मजबूत करती है कि भारत और रूस के बीच लोगों और संस्कृति का संपर्क अफानासी निकितिन से कई सदियों पहले से मौजूद रहा होगा।”
वोल्गा से उठता एक बड़ा सवाल
आज स्ताराया मायना को देखें तो शायद यह कल्पना करना मुश्किल हो कि कभी यह इलाका प्राचीन व्यापारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा रहा होगा। लेकिन मिट्टी में दबे सिक्के, आभूषण, हथियारों के अवशेष और वह कथित विष्णु प्रतिमा एक ऐसी दुनिया की झलक देते हैं, जिसमें आधुनिक देशों की सीमाएं मौजूद नहीं थीं।
व्यापारी नदियों और जमीन के रास्तों से चलते थे। वस्तुएं हजारों किलोमीटर दूर पहुंचती थीं। और उनके साथ केवल सामान नहीं जाता था, कहानियां, प्रतीक, भाषाएं और संस्कृतियां भी यात्रा करती थीं।




