
बड़ी-बड़ी मशीनें मालगाड़ी पर लदकर चली जा रही थीं। रेलवे लाइन के आसपास जिसकी भी नजर पड़ती, वह रुककर देखने लगता। ये क्या चीज है भाई? ऐसा कुछ अब तक लोगों ने पहले कभी नहीं देखा था। ट्रेन छुक-छुक करती मुंबई बंदरगाह से सीधे राजस्थान के सूरतगढ़ स्टेशन पर जाकर रुकी। ये मशीनें असल में सोवियत संघ से आई थीं।
ये बात 1954-55 के समय की है। देश को आजाद हुए अभी एक दशक भी नहीं बीता था। आज के समय में जैसे ऑयल इंपोर्ट करना पड़ता है, तब देश को अनाज खरीदना पड़ता था। इसमें काफी पैसा खर्च होता था। भारत की इस सबसे बड़ी समस्या को दूर करने के लिए समंदर के रास्ते मशीनों की ये बड़ी खेप मुंबई में उतरी थी। सोवियत संघ (USSR) के व्लादिवोस्तोक और दूसरे शहरों से जहाज पर लादकर इसे भेजा गया था। इसमें भारी-भरकम सोवियत ट्रैक्टर, कल्टीवेटर्स और वर्कशॉप की कंक्रीट-मशीनरी भी थी।
सोवियत इंजीनियरों के सहयोग से इन मशीनों को असेंबल किया गया और थार के रेगिस्तान में एशिया के सबसे बड़े मशीनीकृत फार्म की शुरुआत हुई। उस वक्त 70 लाख रुपये कीमत की ये सारी मशीनें और उपकरण USSR ने भारत को गिफ्ट किए थे। इन्हीं मशीनों ने हमारे किसानों को खेती का आधुनिक तरीका सिखाया। भारत ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। इन मशीनों को अब म्यूजियम में संभालकर रखा गया है।
डॉ. दधीच बताते हैं कि यह फार्म सही समय पर सही सिंचाई, उन्नत तकनीक और बीज के माध्यम से उत्पादन में बढ़ोतरी में योगदान दे रहा है और इसका फायदा देश के किसानों तक पहुंच रहा है। किन्नू, अलसी, गाजर से लेकर गेहूं, चना, जौ समेत तमाम फसलों की उन्नत खेती की जाती है। सूक्ष्म सिंचाई पद्धति, रेनगन, केंद्रीय धुरीय सिंचाई पद्धति, वॉटर हार्वेस्टिंग का इस्तेमाल होता है। जेसीबी मशीनों से लेकर कंबाइन हार्वेस्टर, पैडी स्ट्रॉ कटर, लेजर लेवलर जैसे आधुनिक उपकरण यहां मौजूद हैं। फसल कटाई से लेकर बीज प्रसंस्करण जैसे काम मशीनों से किए जाते हैं।

वो रूस का गिफ्ट था
सरदारगढ़ (गंगानगर, राजस्थान) स्थित सेंट्रल स्टेट फॉर्म के AGM (इंजीनियरिंग) सुशांत प्रियदर्शी उस दौर में लेकर जाते हैं। कहते हैं, जैसे आज के समय में महाराष्ट्र के लातूर की स्थिति है, कुछ वैसा ही तब राजस्थान के मरुस्थल इलाके का हाल था। राज्य के 10 जिले थार रेगिस्तान में आते हैं, जो अरावली के पश्चिम में हैं। नहर ना होने से खेती करना बहुत मुश्किल था। उसी समय रूस ने आगे बढ़कर ऑफर किया कि हम आपके लिए क्या कर सकते हैं? भारत ने कहा कि हम खाद्यान्न की समस्या से जूझ रहे हैं, हमें भारी इंपोर्ट करना पड़ रहा है।
खेतों में मशीन तब सपना थी
सोवियत संघ तकनीकी रूप से एडवांस्ड था। सोवियत संघ की मदद से ही सूरतगढ़ का फॉर्म तैयार हुआ। भिलाई स्टील प्लांट भी उसी समय का है। ये फार्म 1956 में स्थापित हुआ, तीन साल बाद पानी की सुविधा पहुंची। उस समय मैकेनाइज्ड हार्वेस्टिंग भारतीयों के लिए सपना था। ट्रैक्टर और दूसरे यंत्रों के बारे में किसानों को पता ही नहीं था। ज्यादातर खेती के काम हाथ से और पशुओं की मदद से होते थे। इसमें मेहनत के साथ समय भी ज्यादा लगता और पैदावार बढ़ नहीं पाती थी। मजदूर बहुत थे, मशीनीकरण बिल्कुल नहीं। जब फार्मों पर मशीनें चलने लगीं, तब आसपास के लोगों ने देखा और इसे अपनाना शुरू किया।
अब बात दोस्ती के अंकुर की
हां, माना जाता है कि भारत और रूस की दोस्ती का नया अंकुर नवंबर-दिसंबर 1955 में सोवियत संघ के दो बड़े नेताओं निकिता ख्रुश्चेव और मार्शल निकोलाई बुल्गानिन के दौरे से फूटा था। ख्रुश्चेव सोवियत संघ के कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुखऔर बुल्गानिन प्रधानमंत्री थे। दिल्ली, कोलकाता और दूसरे शहरों में इनका स्वागत करने के लिए जुटी भीड़ ने सोवियत दोस्तों के दिल में भारतीयों के लिए विशेष जगह बनाई। इसके बाद दोनों देशों में संबंध मजबूत होने लगे। उसी साल नेहरू रूस के दौरे पर गए। पहले उनके दौरे की तस्वीर देखिए। कैसे हिंदी में भारतीय प्रधानमंत्री के स्वागत में बड़े बैनर लगाए गए थे।
#Nehru#Russia#India#Soviet
— The Nehru Blog 🇮🇳 (@TheNehruBlog) May 22, 2026
Jawaharlal Nehru gets warm welcome in Moscow.
On 7th June, 1955, Prime Minister of India Jawaharlal Nehru being received at airport by Prime Minister, Bulganin; Nikita Khrushchev, Foreign Minister, Molotov, Mr. Malenkov and Mr. Maxim Saburov.… pic.twitter.com/wlO0sNn1i2
अब देखिए, कुछ महीने बाद आए ख्रुश्चेव के दिल्ली दौरे की झलक। उस समय की रिपोर्ट बताती है कि दोनों रूसी नेताओं का वेलकम करने के लिए करीब 10 लाख लोग जुटे थे। ख्रुश्चेव इतने खुश थे कि माथे पर तिलक लगाए रहे। देखिए कैसे ख्रुश्चेव और रूसी प्रीमियर मंच से हैट हिलाकर लोगों का अभिवादन करते रहे।
When India Gave the Soviet Leaders a Million-Strong Welcome
— New Order with Afshin Rattansi (@NewOrder_TV) July 2, 2026
The 1955 state visit of Soviet leaders Nikita Khrushchev and Nikolai Bulganin to India marked a turning point in India–Soviet relations. As they arrived in New Delhi, an estimated one million people lined the… pic.twitter.com/9PzKXvQFSJ
वापस सेंट्रल स्टेट फार्म, सूरतगढ़ लौटते हैं।
'उस दिन तेज धूप थी। मेरी नजर खेत में काम करने वाले एक शख्स पर पड़ी। मुझे बताया गया कि वह रिटायर्ड जनरल महादेव सिंह हैं। ऐसा हमारे जनरलों और अफसरों को भी सोचना चाहिए। वह सेना के एक बड़े पद से रिटायर होने के बाद उस फार्म को संभाल रहे थे। पूरे जोश और हुनर के साथ, जिससे भारत में खेती का उत्पादन बढ़ा है।' ये शब्द तत्कालीन सोवियत संघ के प्रधानमंत्री निकिता ख्रुश्चेव के हैं। भारतीयों की मेहनत देख वह इतने प्रभावित हुए कि लौटकर मॉस्को स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स में एक लंबा भाषण दिया था।

2018 में केंद्रीय राज्य फार्म सूरतगढ़ में भारत और रूस की मित्रता की प्रतीक इस फॉर्म की 70वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में रूस के कृषि मंत्री एवं भारत के तत्कालीन जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत मौजूद थे। फार्म में रूस की मशीनरी के म्यूजियम का भी उद्घाटन किया गया।
निकिता ख्रुश्चेव उस स्पीच में सूरतगढ़ फार्म की ही बात कर रहे थे। वह आज भी राजस्थान के सूरतगढ़ में भारत और रूस की दोस्ती की कहानी कह रहा है। मशीनें भले ही देसी हो गई हों, लेकिन यहां की माटी में दोनों देशों की दोस्ती की मिठास घुली है। उसी माटी में भारत और रूस की दोस्ती का एक अंकुर फूटा था, जो अब वटवृक्ष बन चुका है। इसके पहले डायरेक्टर जनरल महादेव सिंह थे, जिन्हें खेत में काम करता देख निकिता ख्रुश्चेव काफी प्रभावित हुए थे।

वर्तमान में यह फार्म कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के अधीनस्थ राष्ट्रीय बीज निगम लिमिटेड की इकाई है।
ख्रुश्चेव की वो बड़ी बात
मॉस्को में दिए अपने भाषण में ख्रुश्चेव ने एक और खास बात कही थी, जो साबित करती है कि रूसियों के दिल में भारत के लिए कितनी जगह है। सोवियत नेता ने आज से करीब 70 साल पहले कहा था कि हम लोगों को अपने इतिहास के अनुभव से अच्छी तरह पता है कि कोई भी देश भारी उद्योगों, कारखानों और कंस्ट्रक्शन यूनिटों के बिना अपनी अर्थव्यवस्था का विकास नहीं कर सकता है। भारी उद्योग ही किसी देश की ताकत और शक्ति का स्रोत होते हैं। आगे उन्होंने भिलाई के कारखानों में भी सहयोग का जिक्र किया था। वहां उन्होंने सोवियत और भारतीय कर्मचारियों को साथ-साथ देखा और नारा सुना था- हिंदी-रूसी, भाई-भाई।
रूसी वैज्ञानिकों ने ही थार के रेगिस्तान में खेती की नींव रखने में मदद की थी, जिसका असर पंजाब और आसपास के इलाकों में भी हुआ। फायदा यह हुआ कि मशीनों के इस्तेमाल से खेती आसान और तेज हो गई।




