रूस का परदेसी, हिंदुस्तान की नरगिस... 500 साल पुरानी कहानी का सिनेमाई सफर
रूस में राज कपूर और मिथुन जैसे बॉलीवुड के सितारों को लेकर दीवानगी की कहानी आखिर शुरू कहां से हुई? इसका जवाब 1957 पर पर्दे पर आई एक फिल्म में छिपा है। जब एक रूसी व्यापारी की 500 साल पहले की हिंदुस्तान यात्रा की कहानी ने भारत-रूस के बीच सिनेमा का ऐसा पुल बनाया, जिसकी गूंज आज तक सुनाई देती है।
रूस का परदेसी, हिंदुस्तान की नरगिस... 500 साल पुरानी कहानी का सिनेमाई सफर
फिल्म परदेसी का एक सीनRT

“परदेसी हूं...”

सामने हिंदुस्तान की जमीन है। गांव के लोग एक अजनबी को घेरकर खड़े हैं। सवाल होता है- कौन हो तुम? कहां से आए हो? जवाब मिलता है- “रूस से।”

लोगों के चेहरे पर हैरानी है। रूस? ये रूस कहां है?

वह शख्स बताता है कि बहुत दूर, यहां तक पहुंचने में उसे करीब दो साल लग गए।

ये कोई आज की कहानी नहीं है। ये कहानी है 15वीं सदी के उस रूसी यात्री अफानासी निकितिन की, जिसने हिंदुस्तान तक का सफर किया था। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि करीब 500 साल बाद उसकी यही यात्रा भारत और सोवियत संघ के सिनेमा को एक साथ ले आई।

साल था 1957 और फिल्म थी ‘परदेसी’। फिल्म निकितिन की भारत यात्रा पर लिखी गई डायरी पर बनी थी। जो हिंदी और रूसी भाषा, दोनों में बनी। रूसी भाषा में फिल्म का नाम था ‘होज़दिएनी ज़ा त्री मोरे’ यानी Journey Beyond Three Seas

ये महज एक ऐतिहासिक फिल्म नहीं थी। भारत-सोवियत सिनेमा की पहली बड़ी साझेदारी यानी को-प्रोडक्शन थी ‘परदेसी’। पर्दे पर एक रूसी यात्री का हिंदुस्तान से सामना था और कैमरे के पीछे भारत और सोवियत संघ के कलाकारों की साझेदारी। ये दोनों देशों के सांस्कृतिक रिश्ते की एक अनोखी कहानी है।

फिल्म परदेसी के एक सीन में निकितिनRT

रूस से चला एक सौदागर... हिंदुस्तान की तलाश में

फिल्म की शुरुआत निकितिन की रूस से विदाई से होती है।

घर में मां उसे रोकती है। आखिर कौन मां चाहेगी कि उसका बेटा दूसरे देश के अनजान रास्तों पर निकल जाए? लेकिन निकितिन के सामने व्यापार की दुनिया है, दूर देशों की जिज्ञासा है और हिंदुस्तान पहुंचने का सपना। घर पीछे छूट जाता है।

इसके बाद शुरू होती है एक ऐसी यात्रा जिसमें समुद्र है, लुटेरे हैं, रेगिस्तान है, चोरी है और लगातार बदलते रास्ते हैं। एक जगह समुद्री लुटेरे जहाज पर हमला कर देते हैं और निकितिन का सामान लूट लिया जाता है। फिर रास्ते में उसका घोड़ा भी चोरी हो जाता है।

लेकिन वह रुकता नहीं।

और फिर सामने आया हिंदुस्तान...

लंबे सफर के बाद जब निकितिन हिंदुस्तान पहुंचता है, तो यहां की दुनिया उसके लिए उतनी ही नई है, जितने वह स्थानीय लोगों के लिए। भाषा अलग, पहनावा अलग, खान-पान अलग और सामाजिक रीति-रिवाज भी अलग।

इसी दौरान फिल्म में एक बेहद खूबसूरत सीन आता है।

एक गांव में चंपा को सांप काट लेता है। अफरा-तफरी मच जाती है। तभी निकितिन आगे आता है और अपने पास मौजूद दवा से उसकी जान बचा लेता है। चंपा का किरदार निभाया था उस जमाने की खूबसूरत एक्ट्रेस नरगिस ने।

यहीं से कहानी सिर्फ एक यात्री और हिंदुस्तान की नहीं रहती। इसमें एक भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाता है।

निकितिन और चंपा (फिल्म का स्क्रीन ग्रैब)RT

चंपा और निकितिन की कहानी...

चंपा का परिवार इस परदेसी को अपने घर बुलाता है। उसे हिंदुस्तानी कपड़े पहनाए जाते हैं- धोती-कुर्ता और बंडी।

एक तरफ वह रूसी यात्री है, दूसरी तरफ गांव की दुनिया।

खाने की मेज पर छुआछूत की बात निकलती है। चंपा के पिता कहते हैं कि वे दूसरी जाति के लोगों के साथ खाना नहीं खाते। निकितिन का जवाब इस पूरे दृश्य को मानवीय बना देता है- “हमारी जात एक ही है, मेरे पिता भी खेती ही किया करते थे।”

इतिहास की बड़ी कहानी के बीच फिल्म ऐसे छोटे-छोटे मानवीय पलों से अपनी दुनिया बनाती है।

बारिश आई... और परदेसी का दिल भीग गया

फिर फिल्म में बारिश का मौसम आता है। चंपा की खुशी, गांव की हरियाली और बारिश के बीच गूंजता गीत- 

“रिमझिम बरसे पानी आज मोरे अंगना,
ले गया मन मोरा जैसे कोई बांका परदेसी छोरा...”

मीना कपूर और मन्ना डे की जादुई आवाज से सजा गीत। यहीं से निकितिन और चंपा के रिश्ते में एक नया रंग आता है।

निकितिन उसे रूस के बारे में बताता है- मॉस्को की बर्फ के बारे में। दो बिल्कुल अलग दुनिया के लोग एक-दूसरे को अपनी-अपनी दुनिया समझाने लगते हैं। लेकिन दोनों जानते हैं कि ये रिश्ता आसान नहीं है।

चंपा कहती है- तुम्हारी दुनिया अलग है, तुम्हारा धर्म अलग है... इस जन्म में हमारा मिलना संभव नहीं। और यहीं फिल्म की प्रेम कहानी इतिहास की कठोर वास्तविकता से टकराती है।

एक प्रेम कहानी, जो पूरी नहीं हुई

निकितिन को पता चलता है कि चंपा की शादी बचपन में ही तय हो गई थी। बारिश रुकती है। और उसके साथ निकितिन के रुकने की वजह भी। वह हिंदुस्तान छोड़ने की तैयारी करता है। पीछे रह जाती है चंपा और उसकी याद। फिल्म में इस बिछड़ने के दर्द को गीत के जरिए और गहरा किया गया- 

“तेरे बिना जिया मोरा लागे ना...”

नरगिस की आंखों में विरह और निकितिन की चुप्पी… ये फिल्म के उन दृश्यों में से है जहां इतिहास एक निजी कहानी बन जाती है।

दरअसल ‘परदेसी’ 1957 में ऐसे समय आई, जब भारत और सोवियत संघ के राजनीतिक रिश्ते मजबूत हो रहे थे। 

कल्चरल डिप्लोमेसी की सिनेमाई शुरुआत

इस पर RT हिंदी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) और दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के इतिहास विभाग से सम्बद्ध रहे प्रोफेसर और वर्तमान में स्कूल ऑफ आर्ट्स, बर्मिंघम सिटी यूनिवर्सिटी में फेलो विशाल चौहान से बात की।

Vishal on Indo Soviet
परदेसी’ को भारत और सोवियत संघ के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने वाली शुरुआती फिल्मों में देखा जा सकता है। कई मायनों में इसने दोनों देशों के बीच कल्चरल या ‘थर्ड-टियर डिप्लोमेसी’ की शुरुआत की। फिल्म के निर्माण में दोनों देशों के फिल्मकार साथ आए। 15वीं सदी के रूसी यात्री अफानासी निकितिन की भारत यात्रा को आधार बनाकर फिल्म ने 500 साल पुरानी कहानी को नए तरीके से पेश किया और लोगों के स्तर पर दोनों देशों को जोड़ने का काम किया।
विशाल चौहान
विशाल चौहान
पूर्व प्रोफेसर, JNU

यानी उस दौर में रिश्ते सिर्फ राजनीति और विचारधारा तक सीमित नहीं थे, बल्कि सिनेमा के जरिए लोगों को लोगों से जोड़ने की कोशिश भी हो रही थी।

बीदर पहुंचा निकितिन... और बदली कहानी की दिशा

फिल्म का अगला हिस्सा आपको दक्षिण भारत लेकर जाता है। 

चंपा के गांव से निकलकर निकितिन दक्षिण भारत के बीदर (आज कर्नाटक में मौजूद) पहुंचता है। यहां फिल्म का रंग बदल जाता है। अब सामने है दरबार, सत्ता, युद्ध, स्थापत्य और राजनीति।

यहीं उसकी मुलाकात बलराज साहनी के किरदार सुखाराम से होती है। सुखाराम अपनी निजी जिंदगी में जातिगत भेदभाव की वजह से हुए दर्द की कहानी निकितिन को सुनाता है। निकितिन के लिए हिंदुस्तान अब सिर्फ सुंदरता और प्रेम की जमीन नहीं है। वह यहां के समाज की जटिलताओं को भी देख रहा है।

फिर आती है एक्ट्रेस पद्मिनी की एंट्री। वह दरबार की नर्तकी लक्ष्मी के किरदार में हैं। भारतीय नृत्य और दरबारी संस्कृति का यह हिस्सा फिल्म को एक अलग दृश्यात्मक भव्यता देता है।

परदेसी फिल्म का एक दृश्य

जब निकितिन से कहा गया- जासूसी करोगे? 

बीदर के दरबार में निकितिन की मुलाकात वजीर महमूद गवां से होती है। उसे एक प्रस्ताव मिलता है- विजयनगर की सैन्य ताकत और किलेबंदी की जानकारी जुटाने का। बदले में इनाम। लेकिन निकितिन मना कर देता है।

वह व्यापारी है, यात्री है- जासूस नहीं।

उसका ये फैसला फिल्म के किरदार को एक नई पहचान देता है। वह सिर्फ हिंदुस्तान घूमने आया विदेशी नहीं है, वह अपने सिद्धांतों वाला आदमी है। और शायद इसी ईमानदारी की वजह से दरबार भी उससे प्रभावित होता है।

उसे रूस के शासक के लिए दोस्ती और व्यापार का संदेश लेकर जाने का मौका मिलता है। यानी जिस यात्रा की शुरुआत व्यापार की तलाश में हुई थी, वह अब दो दूर-दराज की दुनिया के बीच संपर्क का माध्यम बन चुकी है।

कैमरे के पीछे भी भारत और सोवियत संघ

यहीं ‘परदेसी’ अपने समय से आगे की फिल्म नजर आती है। 1957 में जब भारत आजादी के शुरुआती दशक में था और सोवियत संघ के साथ उसके रिश्ते तेजी से मजबूत हो रहे थे, तब दोनों देशों ने मिलकर इस फिल्म को बनाया।

फिल्म का निर्देशन भारतीय फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास और सोवियत डायरेक्टर वी. एम. प्रोनिन ने किया। कहानी और कहानी लिखने में भी अब्बास के साथ रूसी लेखिका मारिया स्मिरनोवा की भागीदारी थी। फिल्म का निर्माण भारत के नया संसार और सोवियत संघ के मोसफिल्म ने मिलकर किया। और कलाकारों की लिस्ट भी अपने आप में भारत-सोवियत साझेदारी की तस्वीर थी।

निकितिन बने सोवियत अभिनेता ओलेग स्ट्रिझेनोव। उनके साथ थीं नरगिस, पद्मिनी, पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, जयराज, डेविड अब्राहम, अचला सचदेव और मनमोहन कृष्ण जैसे भारतीय कलाकार।

यानी पर्दे पर एक रूसी यात्री की कहानी थी, लेकिन उसे कहने के लिए दोनों देशों के कलाकार एक साथ खड़े थे।

सिर्फ कलाकार नहीं, प्रोडक्शन भी दोनों देशों से

’परदेसी’ की खासियत सिर्फ इसकी स्टारकास्ट नहीं थी। कैमरे के पीछे भी भारत और सोवियत संघ के फिल्मकार साथ काम कर रहे थे। भारतीय सिनेमैटोग्राफर रामचंद्र के साथ सोवियत कैमरामैन वी. वी. निकोलायेव और ई. एन. अंद्रिकानिस जुड़े थे। आर्ट डायरेक्शन में भारत की तरफ से एम. आर. अचरेकर और सोवियत पक्ष से म्यासनिकोव और बोग्दानोव थे। साउंड की जिम्मेदारी सोवियत विशेषज्ञ पोपोव के पास थी।

यानी फिल्म की कहानी भारत और रूस को जोड़ रही थी, और फिल्म बनाने की पूरी प्रक्रिया भी वही काम कर रही थी।

संगीत में भी गूंजी भारत-रूस की आवाज

फिल्म का संगीत भी इसी मेल की एक खूबसूरत मिसाल था। भारतीय संगीतकार अनिल बिस्वास और सोवियत संगीतकार बोरिस चायकोव्स्की ने मिलकर संगीत तैयार किया। और आवाजें थीं- लता मंगेशकर, मीना कपूर और मन्ना डे की।

“सबसे अच्छे हैं यहां के लोग...”

भारत छोड़ वापस रूस लौटते निकितिन। फिल्म का एक दृश्य।

वापसी के सफर में निकितिन हिंदुस्तान को याद करता है- यहां के गांव, शहर, गीत, लोग और उनकी दोस्ती।

फिल्म के मुताबिक, करीब दो साल हिंदुस्तान में बिताने के बाद उसके मन में इस देश की एक गहरी छाप रह जाती है। एक ऐसा यात्री जो व्यापार की तलाश में आया था, अपने साथ भारत की यादें लेकर लौट रहा है। और फिर आता है फिल्म का आखिरी दृश्य।

फिल्म के अंत में जब निकितिन अपने वतन लौटने लगता है, तब मन्ना डे की आवाज में गूंजता है-

“फिर मिलेंगे जाने वाले,
यार दसविदानिया...”

’दसविदानिया’ रूसी भाषा में विदाई का भाव है- यानी फिर मिलेंगे।

एक रूसी शब्द, एक भारतीय आवाज, लोगों की आंखों में आंसू और हिंदुस्तान की धरती से विदा होता एक रूसी यात्री। इससे ज्यादा खूबसूरत तरीके से भारत और रूस की सांस्कृतिक मुलाकात को शायद ही फिल्माया जा सकता था।

’परदेसी’ ने जो शुरुआत की, राज कपूर और बाद में मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मों ने उसे एक नए आयाम तक पहुंचाया। रूस में भारतीय सिनेमा को नए मुकाम तक लेकर गए।  

Vishal on effect
परदेसी’ के बाद भारतीय सिनेमा में समाजवादी विचारों से प्रभावित फिल्मों का दौर मजबूत हुआ। राज कपूर की फिल्मों में रूसी रियलिज्म और समाजवादी सोच का प्रभाव दिखाई देता है। इन फिल्मों ने सिनेमा को समाज से जोड़ा और एक नए समाज की परिकल्पना सामने रखी।
विशाल चौहान
विशाल चौहान
पूर्व प्रोफेसर, JNU

उस परिकल्पना के राजनीतिक और आर्थिक पहलुओं पर बहस हो सकती है, लेकिन उसकी प्रेरणा कहीं न कहीं रूसी संस्कृति और समाजवाद से जुड़ी थी। इसलिए ‘परदेसी’ को उस सांस्कृतिक सिनेमाई रिश्ते की शुरुआती कड़ी माना जा सकता है, जिसे राज कपूर और मिथुन चक्रवर्ती ने आगे बढ़ाया।”

आज भारत-रूस रिश्तों को अक्सर जियोपॉलिटिक्स, डिफेंस और रणनीतिक साझेदारी के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन ‘परदेसी’ इस रिश्ते की सांस्कृतिक और लोगों से लोगों के जुड़ाव की पृष्ठभूमि की भी याद दिलाती है। 

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