.001 सेकंड की अहमियत पता है? भारत बदलने जा रहा अपना 'टाइम'
भारत देशभर की सभी घड़ियों को प्रमाणित भारतीय समय से जोड़ने जा रहा है। आखिर एक मिलीसेकंड की गड़बड़ी से क्या बिगड़ सकता है और GPS के जाम होने पर ये कैसे मददगार साबित होगा, समझिए आसान भाषा में...
.001 सेकंड की अहमियत पता है? भारत बदलने जा रहा अपना 'टाइम'
भारत की घड़ियों में अब बड़ा बदलाव होने जा रहा है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)Gettyimages.ru

आपके मोबाइल की घड़ी 10 बजकर 30 मिनट दिखा रही है। लैपटॉप भी 10:30 बता रहा है। रेलवे स्टेशन की घड़ी और बैंक की वेबसाइट पर भी लगभग यही समय है। देखने में सब ठीक है। लेकिन डिजिटल दुनिया के लिए सवाल यह नहीं है कि घड़ी 10:30 दिखा रही है या नहीं। सवाल ये है कि जब एक बैंक के सर्वर पर समय 10:30:00.001 था, तब दूसरे सर्वर पर वास्तव में समय कितना था?

फर्क सिर्फ कुछ मिलीसेकंड का हो सकता है, लेकिन यही छोटा-सा अंतर करोड़ों रुपये के वित्तीय लेनदेन, शेयर बाजार के ऑर्डर, बिजली ग्रिड में गड़बड़ी और साइबर हमलों की जांच में घटनाओं का क्रम बदल सकता है। यही वजह है कि भारत ने अब सिर्फ हाथ में पहनने वाली घड़ी का ही नहीं, बल्कि देशभर में चल रही मशीनों और डिजिटल प्रणालियों के टाइम को भी एक प्रमाणित भारतीय समय से जोड़ने का फैसला किया है।

केंद्र सरकार ने 27 अगस्त को विधिक मापविज्ञान (भारतीय मानक समय) नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं। ये नियम राजपत्र में प्रकाशन के 180 दिन बाद लागू होंगे। इनके तहत कानूनी, प्रशासनिक, व्यावसायिक और दूसरे आधिकारिक कामों में भारतीय मानक समय यानी IST को मानक समय-संदर्भ बनाया गया है। इस बदलाव का असर घड़ी की सुइयों से कहीं ज्यादा बड़ा है।

एक मिलीसेकंड आखिर कितना छोटा होता है?

  • 1 सेकंड = 1,000 मिलीसेकंड
  • 1 मिलीसेकंड = 1,000 माइक्रोसेकंड
  • 1 माइक्रोसेकंड = 1,000 नैनोसेकंड

यानी एक सेकंड में 10 लाख माइक्रोसेकंड होते हैं।

आम जिंदगी में इतना छोटा समय लगभग अर्थहीन लगता है। लेकिन दो कंप्यूटर अगर हर सेकंड हजारों-लाखों निर्देश और लेनदेन संभाल रहे हों तो यह अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है। इसे एक बैंक लेनदेन से समझिए।

  • 10:00:00.001- बैंक A के सर्वर ने पैसा डेबिट किया
  • 10:00:00.003- भुगतान का संदेश बैंक B तक पहुंचा
  • 10:00:00.005- बैंक B ने पैसा क्रेडिट किया

सामान्य स्थिति में रिकॉर्ड देखकर साफ है कि पहले क्या हुआ और बाद में क्या। लेकिन मान लीजिए बैंक A की घड़ी वास्तविक समय से 5 मिलीसेकंड आगे और बैंक B की घड़ी 5 मिलीसेकंड पीछे चल रही है। अब डिजिटल रिकॉर्ड देखकर ऐसा लग सकता है कि बैंक B को संदेश बैंक A के भेजने से पहले ही मिल गया। पैसा वास्तव में समय में पीछे नहीं गया। गड़बड़ी सिर्फ मशीनों की घड़ियों में थी। यहीं से समय का सवाल साइबर सुरक्षा, वित्तीय विवाद और डिजिटल सबूत का सवाल बन जाता है।

आखिर अभी भारत का सही समय आता कहां से है?

भारत के आधिकारिक समय का संरक्षक CSIR-National Physical Laboratory यानी CSIR-NPL है। NPL दिल्ली में परमाणु घड़ियों के समूह के जरिए भारत का राष्ट्रीय समयमान बनाए रखता है। इसमें सीज़ियम परमाणु घड़ियां और हाइड्रोजन मेज़र शामिल हैं। NPL के मुताबिक उसकी समय प्रणाली की UTC (Coordinated Universal Time) के मुकाबले व्यवस्थित अनिश्चितता लगभग ±2.8 नैनोसेकंड है।

भारत का IST मूल रूप से UTC (NPLI) +5 घंटे 30 मिनट = IST है। इसलिए यह बदलाव UTC से भारत को काटने का प्रयास नहीं है। भारत का समय अंतरराष्ट्रीय UTC व्यवस्था से जुड़ा रहेगा। फर्क यह है कि देश के भीतर महत्वपूर्ण प्रणालियों को प्रमाणित और पता लगाए जा सकने वाले भारतीय स्रोत से समय देने की व्यवस्था मजबूत की जा रही है।

तो फिर नया क्या है?

दरअसल भारत में लोग पहले से IST इस्तेमाल करते हैं। सरकारी दफ्तर से रेलवे स्टेशन तक घड़ियां IST में ही चलती हैं। नई व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल और महत्वपूर्ण प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाले समय का स्रोत भी सटीक, प्रमाणित और राष्ट्रीय समय से जुड़ा हुआ हो। नए नियमों के तहत दूरसंचार, वित्तीय सेवाओं, ऊर्जा और डेटा सेंटर जैसे महत्वपूर्ण सेक्टरों को अपनी समय-निर्भर प्रणालियां अधिकृत स्रोत के अनुरूप करनी होंगी। इन स्रोतों में NPLI, क्षेत्रीय मानक प्रयोगशालाएं (RRSL), NavIC आधारित टाइमिंग रेफरेंस, NIC और दूसरे अधिकृत स्रोत शामिल हो सकते हैं।

यानी सवाल अब सिर्फ 'कितने बजे हैं?' नहीं रहेगा। बल्कि 'आपकी मशीन को किसने बताया कि कितने बजे हैं, वह स्रोत कितना सटीक है और जरूरत पड़ने पर क्या आप इसे साबित कर सकते हैं?' यह ज्यादा महत्वपूर्ण होगा।

मामले को 5 केस स्टडीज के जरिए आसानी से समझते हैं-

1. UPI: पैसा पहले गया या पहले पहुंचा?

मान लीजिए आपने UPI से ₹50,000 भेजे। आपके खाते से पैसे कट गए, लेकिन सामने वाले के खाते में रकम नहीं पहुंची। अब बैंक इसकी जांच करता है। एक बैंक के रिकॉर्ड में दिख रहा है कि पैसा 10:15:32.220 बजे भेजा गया, जबकि दूसरे बैंक के रिकॉर्ड में उसी लेनदेन से जुड़ी एंट्री 10:15:32.180 बजे की है। यानी रिकॉर्ड देखकर ऐसा लग रहा है कि दूसरे बैंक में एंट्री पैसा भेजे जाने से पहले ही हो गई। ऐसा वास्तव में नहीं हुआ। इसकी एक वजह दोनों बैंकों के सर्वर की घड़ियों में मामूली अंतर हो सकता है। ऐसे में जांच के दौरान यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि असल में कौन-सी घटना पहले हुई। अगर दोनों बैंकों के सिस्टम एक ही प्रमाणित समय से जुड़े हों, तो अलग-अलग सर्वर के रिकॉर्ड को मिलाकर घटनाओं का सही क्रम समझना आसान हो जाता है। यही वजह है कि बैंकिंग और डिजिटल भुगतान जैसी सेवाओं में सही टाइमस्टैम्प यानी किसी घटना के होने का सटीक समय दर्ज होना बेहद जरूरी है।

UPI पेमेंट की सटीक टाइमिंग का पता लगाना होगा आसान।

2. शेयर बाजार: यहां एक मिलीसेकंड भी बहुत बड़ा है

शेयर बाजार में समय की अहमियत और आसानी से समझी जा सकती है। कल्पना कीजिए कि किसी शेयर की कीमत तेजी से गिर रही है। दो निवेशकों ने लगभग एक साथ बेचने का ऑर्डर दिया। 11:00:00.101 बजे ऑर्डर A आया और 11:00:00.102 बजे ऑर्डर B आया। दोनों के बीच सिर्फ एक मिलीसेकंड का अंतर है। लेकिन बाजार में सवाल उठ सकता है कि पहले कौन-सा ऑर्डर आया, किसका ऑर्डर माना जाएगा?

SEBI की तकनीकी व्यवस्था में समय की सटीकता पहले से बेहद महत्वपूर्ण है। SEBI के मास्टर सर्कुलर के मुताबिक, स्टॉक एक्सचेंज की सिस्टम क्लॉक को परमाणु घड़ी से सिंक्रोनाइज (मिलान) किया जाना चाहिए और उसमें कम-से-कम एक माइक्रोसेकंड की प्रिसीजन तथा लगभग ±1 मिलीसेकंड की एक्युरेसी होनी चाहिए। इसलिए 'एक सेकंड से क्या फर्क पड़ेगा?' का जवाब शेयर बाजार में बहुत सरल है, एक सेकंड यहां बहुत लंबा समय हो सकता है।

3. साइबर हमला: हैकर किस सर्वर में पहले घुसा?

अब रात 2 बजे किसी बैंक या सरकारी नेटवर्क पर साइबर हमला होता है। जांचकर्ताओं को अलग-अलग प्रणालियों के लॉग मिलते हैं।

  • 02:14:20.320 - संदिग्ध लॉगइन
  • 02:14:20.450 - डेटाबेस एक्सेस
  • 02:14:20.600 - फाइल ट्रांसफर
  • 02:14:21.100 - सुरक्षा अलर्ट

इन टाइमस्टैम्प से जांचकर्ता हमले की पूरी श्रृंखला बनाते हैं। लेकिन यदि अलग-अलग सर्वरों की घड़ियां एक-दूसरे से मिली हुई नहीं हैं तो संभव है कि रिकॉर्ड में सुरक्षा अलर्ट हमले से पहले दिखाई दे या फाइल ट्रांसफर लॉगइन से पहले दर्ज हो जाए। ऐसी स्थिति में डिजिटल फॉरेंसिक जांच कठिन हो सकती है। इसीलिए नए नियमों में केवल समय की सटीकता नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा और समय प्रणाली की मजबूती को भी जगह दी गई है। संस्थानों को जामिंग, स्पूफिंग और साइबर हमलों जैसी परिस्थितियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था और आकस्मिक योजना रखने को कहा गया है।

4. बिजली ग्रिड: गड़बड़ी पहले कहां हुई?

देश का बिजली ग्रिड एक विशाल आपस में जुड़ी मशीन जैसा है। मान लीजिए तीन जगह लगभग एक ही समय पर गड़बड़ी दर्ज हुई।

  • 14:22:10.010 - स्टेशन A पर फ्रीक्वेंसी में बदलाव
  • 14:22:10.014 - स्टेशन B पर लाइन ट्रिप
  • 14:22:10.018 - स्टेशन C पर सुरक्षा प्रणाली सक्रिय

अब इंजीनियरों को पता लगाना है कि असली समस्या कहां से शुरू हुई। यदि अलग-अलग स्थानों की मशीनों के समय में अंतर है तो कारण और परिणाम उलट सकते हैं। यानी जो घटना असल में दूसरी थी, लॉग में पहली दिखाई दे सकती है। यही कारण है कि बिजली ग्रिड को नए नियमों में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के रूप में विशेष महत्व दिया गया है।

5. रेलवे और एयरपोर्ट

रेलवे या एयरपोर्ट पर हम समय को आमतौर पर प्रस्थान और आगमन से जोड़ते हैं। लेकिन डिजिटल नेटवर्क के भीतर समय का इस्तेमाल इससे कहीं ज्यादा जगह होता है- संचार, नियंत्रण प्रणालियों, घटनाओं के रिकॉर्ड और अलग-अलग प्रणालियों के बीच तालमेल में। इसलिए सरकार ने परिवहन को भी उन क्षेत्रों में शामिल किया है जहां प्रमाणित IST जरूरी होगा। नियम प्रमुख सार्वजनिक स्थानों, रेलवे, एयरपोर्ट और सरकारी कार्यालयों में भी ट्रेस करने योग्य स्रोत से सिंक्रोनाइज IST प्रदर्शित करने की बात करते हैं।

GPS बंद हो गया तो कितने बजे होंगे?

सिर्फ इतना ही नहीं। इस बदलाव का एक पहलू देश की जरूरी डिजिटल सेवाओं की सुरक्षा से भी जुड़ा है। आज दुनिया की बहुत-सी डिजिटल प्रणालियां केवल लोकेशन पता करने के लिए नहीं, बल्कि सटीक समय पाने के लिए भी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणालियों का इस्तेमाल करती हैं। GPS अमेरिकी प्रणाली है। समस्या यह है कि सैटेलाइट आधारित संकेतों को जाम किया जा सकता है या नकली संकेत भेजकर भ्रमित करने की कोशिश की जा सकती है, जिसे स्पूफिंग (spoofing) कहा जाता है। इसीलिए नए भारतीय नियम स्पष्ट रूप से जैमिंग, स्पूफिंग और साइबर हमलों से समय-सिंक्रोनाइजेशन प्रणाली को बचाने तथा वैकल्पिक स्रोत रखने की बात करते हैं। इसलिए जरूरी सेवाओं को समय की सटीक जानकारी के लिए NavIC समेत एक से ज्यादा भरोसेमंद भारतीय स्रोतों से जुड़ना होगा।

इसका मतलब यह नहीं कि GPS कल से बंद कर दिया जाएगा। असल लक्ष्य है कि अगर एक स्रोत गायब हो जाए तो देश की डिजिटल घड़ी बंद न हो।

भारत का क्या प्लान है?

भारत इसके लिए कई स्तर की व्यवस्था तैयार कर रहा है। इस पूरी व्यवस्था का आधार CSIR-NPL होगा, जहां से भारत का आधिकारिक और सटीक समय तय होता है। दूसरा है भारत की अपनी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली NavIC। इसरो के मुताबिक, NavIC एक स्वतंत्र नेविगेशन प्रणाली है और उसके सैटेलाइटों में ज्यादा सटीक परमाणु घड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा सरकार अहमदाबाद, बेंगलुरु, भुवनेश्वर, फरीदाबाद और गुवाहाटी में पांच Regional Reference Standard Laboratories के जरिए समय-वितरण का ढांचा विकसित कर रही है। इसका मकसद मिलीसेकंड से माइक्रोसेकंड स्तर तक प्रमाणित IST पहुंचाना है।

और यहीं आता है White Rabbit

नाम सुनकर लगता है जैसे किसी साइंस फिक्शन फिल्म की तकनीक हो। लेकिन White Rabbit बेहद सटीक समय-सिंक्रोनाइजेशन की तकनीक है। सामान्य इंटरनेट नेटवर्क में समस्या यह है कि डेटा को एक मशीन से दूसरी मशीन तक पहुंचने में थोड़ा समय लगता है। नेटवर्क की भीड़ और रास्ते के कारण यह देरी बदल भी सकती है। बेहद सटीक टाइमिंग में यह देरी मायने रखती है।

Pawan Duggal on White Rabbit
White Rabbit जैसी फाइबर आधारित तकनीक GPS जामिंग और स्पूफिंग का खतरा काफी हद तक कम कर सकती है, क्योंकि सही समय के लिए केवल सैटेलाइट सिग्नल पर निर्भरता नहीं रहती। हालांकि फाइबर नेटवर्क भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, इसलिए बैकअप जरूरी रहेगा।
डॉ. पवन दुग्गल
डॉ. पवन दुग्गल
साइबर लॉ एक्सपर्ट

आसान भाषा में समझें तो White Rabbit फाइबर नेटवर्क के जरिए अलग-अलग मशीनों की घड़ियों को बेहद सटीक तरीके से मिलाता है। यह इस बात का भी हिसाब रखता है कि एक जगह से दूसरी जगह सिग्नल पहुंचने में कितना समय लगा। इससे अलग-अलग मशीनों की घड़ियों के बीच अंतर बेहद कम रखा जा सकता है।

CSIR-NPL भी फाइबर नेटवर्क के जरिए बेहद सटीक समय पहुंचाने की तकनीक पर काम कर रहा है। इसका मकसद बैंकिंग, टेलीकॉम और बिजली ग्रिड जैसी जरूरी सेवाओं को ऐसी व्यवस्था देना है, जो GPS उपलब्ध न होने या उसके सिग्नल से छेड़छाड़ की स्थिति में भी काम कर सके।

जुलाई 2026 में बेंगलुरु के RRSL में White Rabbit आधारित IST डेमो नेटवर्क शुरू किया गया। इसके बाद CSIR-NPL, ISRO, SEBI, NSE और BSNL ने मिलकर RRSL बेंगलुरु से NSE चेन्नई तक सुरक्षित तरीके से IST पहुंचाने का प्रदर्शन भी किया।

लेकिन क्या भारत अब दुनिया के समय से अलग हो जाएगा?

नहीं। भारत दुनिया से अलग अपना कोई नया समय नहीं बना रहा है। दुनियाभर में समय तय करने के लिए UTC (यूनिवर्सल टाइम) को आधार माना जाता है। भारत का समय यानी IST भी इसी से जुड़ा है। आसान भाषा में कहें तो UTC में 5 घंटे 30 मिनट जोड़ने पर भारत का समय यानी IST मिलता है। मसलन, अगर UTC के हिसाब से दोपहर के 12 बजे हैं, तो भारत में शाम के 5:30 बजे होंगे। नई व्यवस्था में भी यह नहीं बदलेगा।

बदलाव सिर्फ इतना है कि भारत अपने बैंकों, बिजली ग्रिड, टेलीकॉम नेटवर्क और दूसरी जरूरी सेवाओं को सही समय बताने के लिए किसी एक विदेशी सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भर नहीं रहना चाहता। इसके लिए भारत अपनी परमाणु घड़ियों, स्वदेशी सैटलाइट नेविगेशन सिस्टम NavIC और देश में तैयार किए जा रहे टाइम नेटवर्क का इस्तेमाल बढ़ाएगा। यानी दुनिया की घड़ी से तालमेल बना रहेगा, लेकिन भारत के पास सही समय पाने की अपनी मजबूत व्यवस्था भी होगी।

तो क्या मोबाइल और लैपटॉप की सेटिंग बदलनी पड़ेगी?

आम लोगों को फिलहाल अपने मोबाइल या लैपटॉप की घड़ी में कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं है। नए नियमों का बड़ा असर बैंक, पेमेंट सिस्टम, टेलीकॉम, बिजली ग्रिड, डेटा सेंटर और दूसरी ऐसी सेवाओं पर होगा, जहां कुछ सेकंड या मिलीसेकंड की गलती भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

सरकार ने ऐसी संस्थाओं को नई व्यवस्था अपनाने के लिए 180 दिन का समय दिया है। इन्हें अपनी मशीनों और सर्वरों की घड़ियों को सरकार द्वारा मान्य समय के स्रोत से जोड़ना होगा। साथ ही ऐसी व्यवस्था भी रखनी होगी कि अगर एक स्रोत काम करना बंद कर दे तो दूसरे स्रोत से सही समय मिलता रहे।

Duggal Quote 2
बैंकों, डेटा सेंटर और टेलीकॉम कंपनियों को सबसे पहले यह देखना होगा कि उनके सर्वर और सिस्टम अभी समय कहां से ले रहे हैं। इसके बाद उन्हें अधिकृत भारतीय समय स्रोत से जोड़ना, बैकअप तैयार करना और टाइमस्टैम्प का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना होगा।
डॉ. पवन दुग्गल
डॉ. पवन दुग्गल
साइबर लॉ एक्सपर्ट

सरकार आखिर बदल क्या रही है?

अभी कोई मशीन कहती है कि 'मेरी घड़ी के हिसाब से अभी 10 बजे हैं।' नई व्यवस्था में मशीन के पास यह बताने का भरोसेमंद आधार होगा- 'अभी ठीक 10 बजे हैं और मुझे यह समय भारत के अधिकृत स्रोत से मिला है।' यानी समय वही रहेगा, लेकिन उसे बताने वाली व्यवस्था ज्यादा भरोसेमंद और सुरक्षित होगी।

आखिर एक मिलीसेकंड इतना अहम क्यों है?

हमारे लिए एक मिलीसेकंड यानी एक सेकंड का हजारवां हिस्सा बहुत छोटा समय है। लेकिन कंप्यूटर और डिजिटल सिस्टम के लिए इतना समय भी महत्वपूर्ण हो सकता है। मान लीजिए किसी ऑनलाइन लेनदेन को लेकर विवाद हो गया। जांच में पता करना है कि पैसा पहले किस बैंक से निकला? दूसरे बैंक तक संदेश कब पहुंचा? पैसा खाते में कब जमा हुआ? इसी तरह साइबर हमले में पता करना पड़ सकता है कि हैकर पहले किस सर्वर में घुसा। शेयर बाजार में देखना पड़ सकता है कि दो ऑर्डर में से कौन-सा पहले आया। बिजली ग्रिड में यह पता लगाना पड़ सकता है कि खराबी सबसे पहले कहां हुई।

Duggal Quote 3
डिजिटल दुनिया में एक मिलीसेकंड की गलती भी छोटी नहीं है। इससे बैंकिंग और शेयर बाजार में लेनदेन का क्रम बिगड़ सकता है, साइबर जांच में सबूत उलझ सकते हैं और बिजली ग्रिड या टेलीकॉम नेटवर्क में गंभीर परेशानी पैदा हो सकती है।
डॉ. पवन दुग्गल
डॉ. पवन दुग्गल
साइबर लॉ एक्सपर्ट

यानी डिजिटल दुनिया में समय अब सिर्फ घड़ी नहीं, एक सबूत भी है। पैसा कब निकला, शेयर का ऑर्डर कब आया, हैकर कब सिस्टम में घुसा या बिजली ग्रिड में खराबी सबसे पहले कहां हुई, इन सवालों का जवाब मशीनों पर दर्ज समय से मिल सकता है।

इसलिए भारत की यह कवायद घड़ियों में IST दिखाने भर की नहीं है। असल कोशिश यह है कि देश की कोई मशीन जब कहे कि कोई घटना ठीक इसी समय हुई थी, तो उस समय पर भरोसा किया जा सके।

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