
आपके घर के दरवाजे पर पहुंचा एक सामान्य-सा पार्सल। ऊपर कपड़े, दवा, खाने का सामान या गिफ्ट लिखा हो सकता है, लेकिन उसके भीतर नशीला पदार्थ छिपा हो सकता है। भेजने वाले का नाम फर्जी, पता किसी दूसरे व्यक्ति का और मोबाइल नंबर कुछ समय बाद बंद होने वाला हो सकता है। ड्रग्स की तस्करी का यह ऐसा रास्ता है, जिसमें तस्कर खुद खेप लेकर सड़क, रेलवे स्टेशन या हवाई अड्डे से नहीं गुजरता। उसके और ड्रग्स के बीच कूरियर कंपनी, गोदाम, छंटाई केंद्र और डिलीवरी करने वाले कर्मचारियों की कई परतें आ जाती हैं। ऐसे में पार्सल पकड़े जाने के बाद भी जांच एजेंसियों के सामने दो बड़े सवाल रहते हैं- इसे वास्तव में भेजा किसने और मंगाया किसने?
गृह मंत्री अमित शाह ने 6 सितंबर को गोवा में माना कि डाक और कूरियर सेवाओं से होने वाली ड्रग्स की आपूर्ति रोकने के लिए अभी कोई अभेद्य योजना नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार इस समस्या पर कई एक्सपर्ट से चर्चा कर रही है और कूरियर तथा पार्सल के माध्यम से आने वाले ड्रग्स को रोकने के लिए नई रणनीति तैयार की जा रही है।
हालांकि, शाह ने प्रस्तावित रणनीति का विवरण सार्वजनिक नहीं किया। इतना जरूर कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल छोटे-छोटे पार्सल पकड़ना नहीं, बल्कि एक साथ ड्रग्स की बड़ी खेप जब्त करना और उसके पीछे मौजूद पूरे नेटवर्क तक पहुंचना है।
नक्सलवाद के बाद नशे के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई
शाह ने नशे के कारोबार को नक्सलवाद के बाद देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय लड़ाई बताया। उन्होंने कहा कि सरकार ने जुलाई 2026 से जुलाई 2029 तक चलने वाला तीन साल का खाका तैयार किया है और इस अवधि में भारत को नशामुक्त बनाने की दिशा में अभियान चलाया जाएगा। सरकार की रणनीति चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित होगी। खुफिया सूचनाओं के आधार पर कार्रवाई, कृत्रिम और रासायनिक नशीले पदार्थों पर नियंत्रण, नशे की मांग और उससे होने वाले नुकसान को कम करना तथा केंद्रीय एवं राज्य एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाना।
सरकार का दावा है कि अब जांच केवल सड़क पर ड्रग्स बेचने वाले छोटे व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगी। ‘नीचे से ऊपर’ की जांच में स्थानीय विक्रेता से सप्लायर और फिर मुख्य सरगना तक पहुंचा जाएगा। वहीं, ‘ऊपर से नीचे’ की जांच में बड़े तस्कर से उसके वितरकों, स्थानीय विक्रेताओं और ग्राहकों तक पूरी श्रृंखला खोजी जाएगी।
कूरियर से ड्रग्स की डिलीवरी कैसे होती है?
तेलंगाना की नशा-विरोधी एजेंसी ईगल की एक आंतरिक रिपोर्ट के आधार पर मार्च 2026 में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, तस्कर पार्सल बुक करते समय फर्जी नाम, अधूरा पता या किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल कर सकते हैं। कुछ मामलों में पते के बजाय केवल मोबाइल नंबर दिया जाता है। पार्सल बुक होने के बाद उसकी रसीद या खेप संख्या प्राप्तकर्ता तक पहुंचा दी जाती है। इसके आधार पर वह कूरियर कार्यालय से पार्सल ले सकता है। ऑनलाइन माध्यमों और संदेश भेजने वाले एप्लीकेशन के कारण खरीदार और विक्रेता को आमने-सामने आने की जरूरत भी नहीं पड़ती।
नशीले पदार्थ को किसी सामान्य सामान के बीच छिपाकर पार्सल तैयार किया जा सकता है। बाहर से देखने पर वह किसी साधारण घरेलू या व्यावसायिक खेप की तरह दिखाई देता है। अगर कूरियर कंपनी को पार्सल के भीतर मौजूद सामान की सही जानकारी नहीं है तो कर्मचारी भी अनजाने में उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा सकते हैं।
हर पार्सल खोलकर देखना संभव क्यों नहीं?
देश में प्रतिदिन बड़ी संख्या में डाक और कूरियर पार्सल एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजे जाते हैं। प्रत्येक पैकेट को खोलकर जांचना व्यावहारिक नहीं है। ऐसा करने से सामान्य पार्सल की आपूर्ति प्रभावित होगी और ग्राहकों की निजता से जुड़े सवाल भी खड़े होंगे। जांच एजेंसियां इसलिए पार्सल का वजन, घोषित सामग्री, भेजने और पाने वाले की पहचान, बार-बार बदलते मोबाइल नंबर तथा असामान्य बुकिंग जैसी सूचनाओं के आधार पर संदिग्ध पैकेट पहचानने की कोशिश करती हैं।

समस्या तब बढ़ जाती है जब किसी पार्सल पर दिया गया नाम-पता फर्जी हो, इस्तेमाल किया गया मोबाइल नंबर किसी और के नाम पर हो या रिसीवर पार्सल लेने के लिए किसी तीसरे व्यक्ति को भेज दे। कूरियर कंपनियों, डाक विभाग, स्थानीय पुलिस, सीमा शुल्क विभाग और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के पास मौजूद जानकारियां समय पर आपस में न जुड़ें तो तस्कर तक पहुंचना और कठिन हो जाता है।
तकनीक से संदिग्ध पार्सल पहचाना जा सकता है?
समस्या कितनी बड़ी है?
गृह मंत्रालय ने जुलाई 2024 में राज्यसभा को बताया था कि 2020 से अप्रैल 2024 के बीच देश की नशा-विरोधी एजेंसियों के सामने कूरियर और पार्सल से ड्रग्स भेजे जाने के 1,025 मामले आए थे।
वर्ष | कूरियर या पार्सल से जुड़े मामले |
|---|---|
| 2020 | 259 |
| 2021 | 250 |
| 2022 | 240 |
| 2023 | 241 |
| जनवरी-अप्रैल 2024 | 35 |
| कुल | 1,025 |
ये केवल वे मामले हैं जिन्हें एजेंसियों ने पकड़ा और दर्ज किया। इन आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि कितने पार्सल जांच से बचकर निकल गए। सरकार ने यह भी नहीं बताया कि इन मामलों में कितने मुख्य तस्कर पकड़े गए और कितने मामलों में केवल पार्सल भेजने या लेने वाला व्यक्ति गिरफ्तार हुआ।
क्या कूरियर कंपनी भी जिम्मेदार होगी?
दिसंबर 2023 में महाराष्ट्र के तत्कालीन गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में कहा था कि पार्सल में नशीला पदार्थ मिलने पर कूरियर कंपनियों की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी। कंपनियों को संदिग्ध पैकेट मिलने पर उसकी जांच करने और पुलिस को सूचना देने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, किसी पार्सल में ड्रग्स मिलना और कूरियर कंपनी या उसके कर्मचारी की जानबूझकर मिलीभगत साबित होना दो अलग बातें हैं। जांच में यह देखना होगा कि कंपनी ने पहचान और बुकिंग से जुड़े नियमों का पालन किया था या नहीं। यह भी साबित करना होगा कि किसी कर्मचारी को पार्सल की वास्तविक सामग्री की जानकारी थी या उसने जानबूझकर तस्कर की सहायता की।
अगर हर बरामदगी के लिए कंपनी को सीधे जिम्मेदार ठहराया जाता है तो निर्दोष कर्मचारियों पर कार्रवाई का खतरा पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, जिम्मेदारी तय न होने पर कंपनियां पहचान की जांच और संदिग्ध पार्सल की सूचना देने में लापरवाही कर सकती हैं।
ड्रग्स की आपूर्ति आतंकी साजिश का हिस्सा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अगस्त 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ‘नशामुक्त युवा के लिए विकसित भारत संकल्प अभियान’ की शुरुआत की थी। सरकार के मुताबिक, देश के 28 हजार से अधिक स्थानों से एक करोड़ से ज्यादा युवा कार्यक्रम से जुड़े थे। प्रधानमंत्री ने कहा था कि दुश्मन देश भारत के युवाओं को नशे के जाल में फंसाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने ड्रग्स की आपूर्ति से पैसा कमाने और भारत जैसे देशों को नुकसान पहुंचाने को आतंकी साजिश का हिस्सा बताया था।
नार्को-टेररिज्म क्या है?
ड्रग्स के कारोबार और आतंकवाद के गठजोड़ को नार्को-टेररिज्म कहा जाता है। इसमें नशीले पदार्थों की तस्करी से मिले पैसे का इस्तेमाल हथियार खरीदने, आतंकियों की भर्ती, प्रशिक्षण, यात्रा और दूसरी आतंकी गतिविधियों के लिए किया जाता है। हालांकि, हर ड्रग्स मामला नार्को-टेररिज्म नहीं होता। किसी मामले को आतंकवाद से जोड़ने के लिए जांच एजेंसी को ड्रग्स के पैसे, तस्करों और आतंकी संगठन के बीच संबंध के प्रमाण जुटाने होते हैं।
पाकिस्तान का नाम क्यों आता है?
पंजाब और जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान से लगती सीमा के रास्ते हेरोइन और दूसरे नशीले पदार्थों की तस्करी सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती रही है। ड्रोन और सीमा पार सक्रिय नेटवर्क के माध्यम से नशीले पदार्थ भेजे जाने के मामले भी सामने आते रहे हैं।
हालांकि, भारत में पकड़े जाने वाले कुल ड्रग्स में पाकिस्तान से आई खेप का हिस्सा कितना है, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है। इसलिए हर ड्रग्स बरामदगी को पाकिस्तान या आतंकवाद से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
अशोक कुमार ने कहा, 'पाकिस्तान से ड्रोन और दूसरे रास्तों से आने वाले ड्रग्स का पैसा आतंकी नेटवर्क तक पहुंचने के काफी प्रमाण हैं। एनआईए और दूसरी जांच एजेंसियां इसके बारे में विस्तार से बता सकती हैं, लेकिन इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि तस्करी से आया पैसा आतंकी नेटवर्क तक जाता है।'
उन्होंने आगे कहा, 'सामान्य तस्करी में छोटे-मोटे अपराधी ड्रग्स बेचकर अपने लिए पैसा कमाते हैं। नार्को-टेररिज्म में ड्रग्स सीमा पार से आते हैं और उससे कमाया गया पैसा आतंकवादी गतिविधियों या आतंकी नेटवर्क तक पहुंचता है।'
भारत तस्करों के निशाने पर क्यों है?
भारत दुनिया के दो बड़े अवैध ड्रग्स उत्पादन क्षेत्रों के बीच स्थित है। पश्चिम में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान वाले क्षेत्र को ‘गोल्डन क्रिसेंट’ कहा जाता है। पूर्व में म्यांमार, लाओस और थाईलैंड वाला क्षेत्र ‘गोल्डन ट्रायंगल’ कहलाता है। भारत की लंबी जमीनी सीमा, बड़ा समुद्री क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय हवाई संपर्क और विशाल घरेलू बाजार तस्करों के लिए अवसर पैदा करते हैं। ड्रग्स नेटवर्क भारत को बड़े बाजार के साथ दूसरे देशों तक खेप पहुंचाने के रास्ते के रूप में भी इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं।
कूरियर और डाक सेवाएं इस चुनौती को और जटिल बनाती हैं। सड़क या सीमा पर बड़ी खेप के साथ पकड़े जाने का जोखिम अधिक होता है, जबकि पार्सल के माध्यम से खेप भेजने पर तस्कर खुद नशीले पदार्थ के साथ मौजूद नहीं रहता।
शाह की नई रणनीति में क्या हो सकता है?
अमित शाह ने अभी रणनीति का विवरण सार्वजनिक नहीं किया है इसलिए इसके संभावित उपायों को सरकार की घोषित योजना नहीं माना जा सकता। फिर भी, समस्या को देखते हुए नई व्यवस्था के सामने कुछ प्रमुख प्रश्न होंगे। क्या पार्सल भेजने और लेने वाले दोनों की पहचान की जांच अनिवार्य होगी? क्या बार-बार फर्जी नाम और बदले हुए मोबाइल नंबर से बुक किए गए पार्सल पकड़ने के लिए साझा आंकड़ा व्यवस्था बनेगी? क्या निजी कूरियर कंपनियां, डाक विभाग, सीमा शुल्क विभाग, स्थानीय पुलिस और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो संदिग्ध पार्सल की जानकारी वास्तविक समय में साझा करेंगे?
इसके अलावा, सरकार को यह भी तय करना होगा कि छोटे कूरियर केंद्रों को जांच के उपकरण और प्रशिक्षण कौन देगा। संदिग्ध पार्सल मिलने पर उसे तुरंत जब्त किया जाएगा या निगरानी में उसके गंतव्य तक पहुंचने दिया जाएगा, ताकि उसे लेने वाले व्यक्ति और उसके पीछे मौजूद पूरे नेटवर्क को पकड़ा जा सके।
सरकार के सामने चुनौती केवल ड्रग्स वाला एक पार्सल पकड़ने की नहीं है। असली चुनौती उस पूरी पूरी कड़ी तक पहुंचने की है, जिसमें कहीं फर्जी पहचान, कहीं किसी तीसरे व्यक्ति का बैंक खाता, कहीं अस्थायी मोबाइल नंबर और कहीं दूसरे शहर या देश में बैठा मुख्य संचालक हो सकता है। जब तक ये सभी कड़ियां एक साथ नहीं जुड़तीं, एक पार्सल पकड़े जाने के बाद भी दूसरा पार्सल किसी नए नाम, नए नंबर और नए पते के साथ निकल सकता है। अमित शाह ने भी फिलहाल कोई अभेद्य योजना नहीं होने की बात स्वीकार की है। अब नजर इस पर होगी कि सरकार की नई रणनीति पार्सल पकड़ने से आगे बढ़कर उसे भेजने वाले पूरे नेटवर्क तक कैसे पहुंचती है।
नशामुक्त भारत अभियान की 3 बड़ी बातें
तीन साल का अभियान
अमित शाह ने कहा कि पूरा देश नशामुक्त भारत के तीन साल के अभियान का समर्थन करेगा। उन्होंने गोवा के मीडिया से भी अपील की कि भारत को नशामुक्त बनाने का लक्ष्य हासिल करने में सरकार की मदद करे। सरकार ने हर लक्ष्य के लिए समय-सीमा, जिम्मेदार मंत्रालय, परिणाम मापने की व्यवस्था और हर तीन महीने में समीक्षा का प्रावधान रखा है। इसका जोर ड्रग्स की आपूर्ति कम करने, नशे की मांग घटाने और इसकी चपेट में आए लोगों के उपचार तथा पुनर्वास पर होगा।
1.19 करोड़ किलो से ज्यादा नशीले पदार्थ जब्त
अमित शाह के मुताबिक, 2004 से 2014 के बीच 26 लाख किलोग्राम नशीले और मन पर असर डालने वाले पदार्थ जब्त किए गए थे। वहीं, 2014 से जुलाई 2026 के बीच यह आंकड़ा बढ़कर 1.19 करोड़ किलोग्राम से अधिक हो गया। हालांकि, जब्ती बढ़ने के दो मतलब हो सकते हैं। पहला, जांच एजेंसियां पहले से ज्यादा कार्रवाई कर रही हैं। दूसरा, देश में ड्रग्स की आवाजाही भी बढ़ी हो सकती है। केवल जब्ती के आंकड़े से यह तय नहीं किया जा सकता कि नशे का कारोबार वास्तव में कितना घटा है। इसके लिए ड्रग्स की उपलब्धता, कीमत, तस्करी के मामलों और नशा करने वाले लोगों की संख्या को भी देखना होगा।
एक लाख ‘नशामुक्त भारत मित्र’
गृह मंत्री के मुताबिक, अभियान के माध्यम से 50 करोड़ लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य है। सरकार एक लाख ‘नशामुक्त भारत मित्र’ तैयार करेगी। ये लोग स्कूलों, कॉलेजों और समुदायों में नशे के खिलाफ जागरूकता फैलाने तथा जरूरतमंदों को इलाज और पुनर्वास से जोड़ने में सहायता करेंगे। सरकार ने नशामुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 1,751 करने का लक्ष्य भी रखा है।




