जरा सोचिए- पृथ्वी से करीब 36 हजार किलोमीटर ऊपर एक ऐसा कैमरा तैनात हो, जो भारत के बड़े हिस्से को लगातार देख सके। जमीन पर मौसम बदल रहा हो, कहीं बाढ़ आ रही हो, जंगलों में आग लगी हो या किसी इलाके में तेजी से बदलाव हो रहा हो- इस कैमरे की नजर से कुछ बच न पाए।
यही EOS-05 मिशन की सबसे बड़ी खासियत है।
ISRO यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान ने संगठन EOS-05 (GISAT-1A) सैटलाइट को सतीश धवन स्पेस सेंटर से रात 2:55 बजे लॉन्च कर दिया। यह मिशन इसलिए खास है क्योंकि यह भारत का पहला इमेजिंग सैटेलाइट है, जो जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट (Geosynchronous Orbit) में जाएगा। यह भारत की जियो स्टेशनरी इमेजिंग सैटेलाइट कैपेबिलिटी को स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम है। इसका क्या मतलब है, आसान भाषा में समझते हैं।

आखिर EOS-05 है क्या?
EOS यानी अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट (Earth Observation Satellite)। नाम से ही साफ है- ऐसे सैटेलाइट पृथ्वी को ऊपर से देखते हैं और जमीन, पानी, जंगल, खेती, बादल और पर्यावरण में हो रहे बदलावों की तस्वीरें और डेटा उपलब्ध कराते हैं।
लेकिन EOS-05 का तरीका थोड़ा अलग है। आमतौर पर EOS पृथ्वी की लो अर्थ ऑर्बिट (Low Earth Orbit - LEO) जैसी कक्षाओं में घूमते हैं। ये पृथ्वी के सबसे पास वाला, 160 से 2000 किलोमीटर की ऊंचाई वाला क्षेत्र होता है। यहां स्थापित सैटलाइट पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों के ऊपर से गुजरते हुए तस्वीरें लेते हैं।
EOS-05 को LEO के बजाय जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में भेजा जाएगा। यही इस मिशन की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट क्या होती है?
RT हिंदी ने ISRO के पूर्व साइंटिस्ट विनोद कुमार श्रीवास्तव से बात की और समझने की कोशिश की कि ये EOS-05 सैटेलाइट क्यों खास है और काम कैसे करेगा?
इसी सिद्धांत का इस्तेमाल जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स में होता है। यह कक्षा पृथ्वी से लगभग 35,786 किलोमीटर ऊपर होती है।
जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट का क्या फायदा?
इस कक्षा में स्थापित सैटेलाइट पृथ्वी के साथ-साथ घूमता है और स्थिर होकर धरती के किसी खास इलाके को लगातार देख सकता है, जबकि दूसरी ऑर्बिट वाले सैटलाइट ऐसा नहीं कर पाते।
यानी EOS-05 का सबसे बड़ा फायदा है- “बार-बार उसी जगह को देखने की क्षमता।” यह खासतौर पर उन घटनाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो तेजी से बदलती हैं।

तो फिर बाकी EOS से क्या अलग है?
इस पर साइंटिस्ट श्रीवास्तव कहते हैं-
यहां एक आसान अंतर समझिए। सामान्य तौर पर EOS पृथ्वी के चारों ओर LEO में चक्कर लगाता रहता है। मान लीजिए, किसी सैटेलाइट ने पृथ्वी के एक खास इलाके का ऑब्जर्वेशन किया और वहां से मिलने वाली अलग-अलग स्पेक्ट्रल जानकारी के आधार पर उसकी तस्वीर तैयार की। इसके बाद सैटेलाइट अपनी कक्षा में आगे बढ़ गया और पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती रही। अब उसी इलाके की दोबारा तस्वीर लेने के लिए सैटेलाइट को अपनी कक्षा में घूमकर फिर से उसी क्षेत्र के ऊपर से गुजरना होगा। अगर सैटेलाइट की रीविजिट अवधि 24 घंटे है, तो वह लगभग 24 घंटे बाद दोबारा उसी इलाके का ऑब्जर्वेशन कर सकेगा। इस तरह दोनों तस्वीरों की तुलना करके उस क्षेत्र में समय के साथ हुए बदलावों का पता लगाया जा सकता है।
EOS-05 सैटेलाइट बहुत ऊंची जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में रहते हुए एक बड़े क्षेत्र को लगातार देख, ऑब्जर्व कर सकेगा। इसका मतलब है कि किसी क्षेत्र में बदलाव को बार-बार मॉनीटर करने का समय LEO सैटेलाइट से बहुत कम होगा।
इसी वजह से GISAT जैसी सैटेलाइट आर्किटेक्चर को नियर-रियल-टाइम अर्थ इमेजिंग के लिए विकसित किया गया है।
सिर्फ तस्वीरें नहीं, ‘समय के साथ बदलाव’ देखना असली ताकत
EOS-05 को केवल एक बड़ा कैमरा समझना ठीक नहीं होगा। इसकी असली उपयोगिता इस बात में है कि एक ही क्षेत्र को अलग-अलग समय पर देखकर उसमें हो रहे बदलावों को समझा जा सके।
मान लीजिए किसी इलाके में अचानक बाढ़ आती है। सैटेलाइट पहले उस इलाके की स्थिति देख रहा था। फिर पानी फैलता है। बाढ़ का क्षेत्र बढ़ता या घटता है। ऐसे में लगातार मिलने वाली तस्वीरें अधिकारियों को हालात की तेजी से मॉनिटरिंग में मदद कर सकती हैं।

भारत के लिए यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत जैसे विशाल और विविध देश में जमीन से हर जगह लगातार निगरानी करना संभव नहीं है। हिमालय से लेकर समुद्र तक, रेगिस्तान से लेकर घने जंगलों तक- देश का भूगोल बेहद विविध है। स्पेस-बेस्ड ऑब्जरवेशन इस पूरे क्षेत्र को एक अलग नजरिया देता है।
और EOS-05 का जियोसिंक्रोनस आर्किटेक्चर इसमें एक और लेयर जोड़ता है और लगातार निगरानी करता है।
यानी यह केवल “ऊपर से तस्वीर लेने” की बात नहीं है। यह रियल टाइम के करीब बदलती परिस्थितियों को समझने की क्षमता बढ़ाने की कोशिश है।
GSLV-F17 क्यों महत्वपूर्ण है?
EOS-05 को GSLV-F17 के जरिए लॉन्च किया जाना है। GSLV यानी Geosynchronous Satellite Launch Vehicle। आसान भाषा में कहें तो सैटलाइट ले जाने वाला रॉकेट।
ये प्रक्षेपण यान भारी सैटेलाइट को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट मे प्रक्षेपित कर देगा। उसके बाद सैटेलाइट प्रोपल्शन के जरिए उसे ऑपरेशनल ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा।

लॉन्चिंग के बाद ऑर्बिट तक कैसे पहुंचेगा EOS-05?
ISRO के मुताबिक-
लॉन्च - रॉकेट के इंजन/बूस्टर जलते हैं और रॉकेट ऊपर जाता है।
सेपरेशन- इस्तेमाल हो चुके फ्यूल टैंक एक-एक करके अलग होते जाते हैं।
क्रायोजेनिक इंजन- आखिरी स्टेज का क्रायोजेनिक इंजन सैटेलाइट को जरूरी ऊंचाई और गति देता है।
Sub-GTO में पहुंचना- EOS-05 को शुरुआती कक्षा में स्थापित किया जाता है।
सैटेलाइट सेपरेशन- EOS-05 रॉकेट से अलग हो जाता है।
फाइनल ऑर्बिट- सैटेलाइट अपने इंजन के जरिए अपनी अंतिम जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट तक पहुंचेगा।
रात 2:55 बजे ही क्यों लॉन्च?
EOS-05 के लॉन्च की टाइमिंग को लेकर भी चर्चा है। EOS-05 का 4 सितंबर रात 2:55 बजे लॉन्च हुआ। सैटेलाइट बिल्कुल सही जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचे, इसके लिए पृथ्वी के घूमने की स्थिति, लॉन्चिंग साइट की लोकेशन, रॉकेट के अंतरिक्ष में पहुंचने का रास्ते आदि के बीच सही टाइमिंग और सटीक तालमेल जरूरी होता है। इन्हीं सब को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक लॉन्चिंग का टाइम तय करते हैं। आमतौर पर ये कुछ ही मिनटों का वक्त होता है। मौसम, हवा और रेंज सेफ्टी जैसी परिस्थितियां भी इस टाइम विंडो को प्रभावित करती हैं। EOS-05 को चूंकि पृथ्वी से 36 हजार किलोमीटर ऊंची विशेष कक्षा में स्थापित किया जाना है, इसलिए 2:55 बजे का समय तय किया गया था।




