
अमेरिकी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वॉर और ईरान युद्ध ने पश्चिम की जियोपॉलिटिक्स को पूरी तरह बदल दिया है। अमेरिका फर्स्ट का नारा देने वाले डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने सिर्फ प्रतिद्वंद्वी और गैर-सहयोगी देशों को ही नहीं, बल्कि अपने मित्र देशों को भी विरोधी की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। लिहाजा जो देश अमेरिका के पुराने सहयोगी थे, वही अब उसके खिलाफ खड़े होते दिख रहे हैं। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) से लेकर मिडिल-ईस्ट तक के देश मौजूदा वैश्विक हालातों के अनुसार अपनी विदेश नीति को तेजी से बदल रहे हैं। यही वजह है कि नाटो देशों ने ईरान युद्ध की शुरुआत के दौरान होर्मुज पर ट्रंप की अपील के बावजूद अपनी सेना नहीं भेजी और किसी भी तरह की मदद से इनकार कर दिया था।
अब ब्रिटेन, फ्रांस, फिनलैंड समेत 12 देशों ने इजरायल पर बैन लगाने का ऐलान करके पश्चिम की पॉलिटिक्स में खलबली मचा दी है। खास बात यह है कि ये सभी देश अमेरिका के प्रमुख सहयोगी रहे हैं और इजरायल-यूएसए की दोस्ती भी जगजाहिर है। ऐसा संभवतः पहली बार हुआ है, जब अमेरिका के सहयोगी इजरायल के खिलाफ नाटो के इतने सारे देश और सऊदी से लेकर कतर, और कनाडा तक खड़े हो गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि ईरान को अलग-थलग करने निकला अमेरिका क्या अब खुद अपनों के बीच अकेला पड़ता जा रहा है? इजरायल के खिलाफ अमेरिका के सहयोगी 12 देशों का एक्शन और उसको मिल रहा अन्य देशों का बड़ा समर्थन ट्रंप के लिए क्या संदेश है? आइए सबसे पहले जानते हैं कि नाटो समेत अन्य देशों ने इजरायल के खिलाफ बैन का ऐलान क्यों किया?
इजरायल पर एक्शन, अमेरिका को संदेश
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रोफेसर और विदेश मामलों के एक्सपर्ट शांतेश कुमार सिंह ने आरटी हिंदी से बातचीत में कहा कि इजरायली बस्ती के साथ ट्रेड पर बैन का ऐलान करने वाले इन सभी देशों को पता है कि अमेरिका ही तेल-अवीव का प्रमुख सहयोगी है। ट्रंप ने भले ही कई बार नेतन्याहू पर लेबनान और गाजा के मामले पर नाराजगी जाहिर की हो, लेकिन अंततः अमेरिका कभी इजरायल के खिलाफ नहीं जा सकता। क्योंकि इजरायल अमेरिका का सबसे भरोसेमंद सहयोगी है।
यह बात नाटो और यूरोपीय देश जानते हैं। ट्रंप ने कई बार नाटो को धमकियां दीं। कभी ग्रीनलैंड को लेकर तो कभी होर्मुज में सपोर्ट नहीं करने को लेकर बैन लगाने या सैन्य सहयोग और हथियारों का सपोर्ट कम करने की चेतावनी दी। इससे नाटो ट्रंप और अमेरिका से नाखुश है। मगर समस्या यह है कि खुलकर और सीधे नाटो देश अमेरिका के खिलाफ नहीं जा सकते। न ही वे सीधे अमेरिका के खिलाफ कोई कदम उठा सकते हैं। इसलिए उन्होंने इजरायल और इजरायली बस्ती पर बैन का ऐलान करके एक तरह से सीधे और परोक्ष दोनों रूप से अमेरिका को सख्त संदेश दिया है। उन्हें पता है कि इजरायल पर एक्शन का असर ट्रंप और अमेरिका पर जरूर होगा।
ईरान युद्ध ने बदल दी पश्चिम की जियोपॉलिटिक्स
प्रोफेसर शांतेश सिंह ने कहा कि ईरान युद्ध ने केवल मिडिल-ईस्ट में ही नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम की जियोपोलिटिक्स को बदल दिया है। इस दायरे से अब कोई भी बाहर नहीं है। नाटो और यूरोपीय देश जानते हैं कि इजरायल को हथियारों की सबसे बड़ी सप्लाई करने वाला देश अमेरिका ही है। इसका संदेश साफ है कि अमेरिका इजरायल का सपोर्ट बंद करे और ग्रीनलैंड व यूरोप के मुद्दे पर अपना रुख बदले, नहीं तो यूरोपीय संघ भी अमेरिका का साथ नहीं देंगे।
मिडिल-ईस्ट का भी टूटा भरोसा
जिस तरह से ईरान ने अमेरिका से बदला लेने के लिए मिडिल-ईस्ट में अमेरिकी सैन्य बेस को निशाना बनाया है और उसमें अरब-खाड़ी देशों को जो नुकसान हुआ है, उसने अमेरिका से मध्य-पूर्व के भरोसे को कमजोर कर दिया है। मिडिल-ईस्ट को यह बात समझ आ गई है कि अमेरिका अब उन्हें बचा नहीं पाएगा। इसीलिए कई बार जब ईरान ने मिडिल-ईस्ट के अमेरिकी सहयोगियों को भी सीधे निशाना बनाया तो भी वह ईरान के खिलाफ युद्ध लड़ने नहीं आए। इससे साफ है कि मिडिल-ईस्ट देशों की कहीं न कहीं ईरान के साथ सहानुभूति है। मगर वे अमेरिका पर इतने अधिक निर्भर हैं कि उसके खिलाफ भी कुछ नहीं बोल पा रहे हैं।
ट्रंप की पॉलिसी फ्लॉप
जाने-माने रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा ने कहा कि ईरान पर अमेरिका की सारी रणनीतियां फेल साबित हुई हैं। वह ईरान में कोई भी टारगेट हासिल नहीं कर सका। होर्मुज पर नाटो देशों ने ट्रंप के कहने पर अपनी सेनाएं नहीं भेजी, इसलिए उन्होंने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने और यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। यूरोपीय देश इसलिए ज्यादा कुछ नहीं बोले कि वह सुरक्षा के लिए काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर हैं, लेकिन धीरे-धीरे वह भी अपना रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं और अमेरिका से निर्भरता कम कर रहे हैं। वह भी अब अमेरिका के बहुत ज्यादा दबाव में आने वाले नहीं हैं, क्योंकि समय बदल चुका है।
इजरायल का साथ देने की अमेरिका की मजबूरी क्या है?
प्रोफेसर शांतेश सिंह ने बताया कि अमेरिका मिडिल-ईस्ट में अगर किसी देश पर सबसे ज्यादा भरोसा करता है तो वह इजरायल ही है। अमेरिका में कोई भी सरकार आए, उसकी इजरायल पॉलिसी समान रहती है। भले ही हाल में आपने कई बार ट्रंप को नेतन्याहू और इजरायल के खिलाफ बोलते और धमकी या चेतावनी देते भी देखा होगा, लेकिन वास्तव में अमेरिका उसके खिलाफ नहीं जा सकता। इसकी वजह इजराइल-अमेरिका के बीच रिलीजियस और स्ट्रैटेजिक वजहें हैं। अन्य देशों के साथ उसके सिर्फ व्यापारिक रिश्ते हैं।
मिडिल-ईस्ट रीजन में अमेरिका को मजबूती से साथ देने वाला केवल एक ही देश है, वह इजरायल है। ईरान पर हमले में भी इजरायल अमेरिका के साथ रहा। अगर अमेरिका ईरान में कुछ कर सका तो वह इजरायल की वजह से कर सका। क्योंकि अमेरिका और ईरान भौगोलिक रूप से बहुत ज्यादा दूरी पर हैं। वहां से आकर ईरान के खिलाफ लंबे समय तक जंग लड़ पाना अमेरिका के लिए आसान नहीं है, वह भी ऐसी स्थिति में जब ईरान ने मिडिल-ईस्ट में अमेरिका के ज्यादातर सभी सैन्य बेस को तबाह कर दिया हो।
यूरोपीय देशों ने क्यों उठाया ऐसा कदम
प्रोफेसर शांतेश सिंह ने कहा कि नाटो या कह लें कि यूरोपीय देशों की ओर से इजरायल के खिलाफ उठाया गया यह कदम सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति है। वह इजरायल पर एक्शन के बहाने अमेरिका को प्रेशर में लाना चाहते हैं। इस बैन का कोई सीधा या बड़ा असर इजरायल या अमेरिका पर नहीं होने वाला है, लेकिन इतना जरूर है कि यह ट्रंप को अपनी पॉलिसी पर सोचने के लिए मजबूर कर सकता है।
अमेरिका खुद पड़ गया अलग
प्रोफेसर शांतेश सिंह ने कहा कि यह बात सही है कि अमेरिका ईरान को अलग-थलग करना चाहता था, लेकिन वह अपना कोई मुख्य टारगेट हासिल नहीं कर सका। अमेरिका ने सोचा था कि उसके सुप्रीम लीडर खामेनेई को मारकर ईरान में सत्ता बदल देगा। ट्रंप को यह भी लगता था कि खामेनेई शासन के खिलाफ ईरानी जनता खड़ी है और खामेनेई के मरते ही वह अमेरिकी कार्रवाई के पक्ष में सड़कों पर आ जाएगी और वह रिजीम चेंज करवा देंगे, लेकिन अमेरिका का यह सपना पूरा नहीं हो सका। वहीं ट्रंप अपनी फॉरेन पॉलिसी को स्थिर नहीं रख पा रहे हैं। इसलिए उनके सहयोगी देश ट्रंप पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में अमेरिका निश्चित रूप से खुद अलग-थलग पड़ता दिख रहा है।
इजरायल के खिलाफ क्यों एक्शन में आए अमेरिकी सहयोगी?
ब्रिटेन ने सबसे पहले इजरायल पर आरोप लगाया कि वह कब्जाए गए वेस्ट बैंक में इजरायली बस्ती बसाने और फिलिस्तीनियों का पूरी तरह सफाई करने की योजना पर काम कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कथित तौर पर इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके बाद इजरायल और अमेरिका के कई प्रमुख पश्चिमी सहयोगी देशों के बीच बड़ा राजनयिक विवाद हो गया। नाटो के 11 देशों समेत आयरलैंड, सऊदी और कतर भी वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों के साथ ट्रेड पर बैन का समर्थन किया।
इजरायली बस्तियों पर बैन का ऐलान करने वाले देश

इन सभी देशों ने 8 सितंबर को इजरायल पर बैन को लेकर एक जॉइंट स्टेटमेंज जारी किया और इजरायली बस्तियों के साथ ट्रेड बैन का ऐलान किया। इसमें आयरलैंड को छोड़कर बाकी सभी नाटो देश हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा जैसे देशों की ओर से उठाए गए इस कदम का सऊदी और कतर जैसे देशों ने भी समर्थन किया। ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा ने राष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने का भी ऐलान किया।
ब्रिटेन के बैन में क्या शामिल है?
- अवैध इजरायली बस्तियों से सभी आयात पर बैन
- निर्माण से लेकर बुनियादी ढांचे और बस्ती विस्तार की फंडिंग पर बैन
- बस्ती निर्माण में सहयोग देने वाले संगठनों और व्यक्तियों पर बैन
- फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा को समर्थन करने और उकसाने वालों पर बैन
- बस्तियों पर कब्जे में इस्तेमाल होने वाले हथियारों या सामानों के लाइसेंस पर बैन
ब्रिटेन के बाद फ्रांस, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भी एक्शन में आए
ब्रिटेन की ओर से वेस्ट बैंक में इजरायल की तथाकथित अवैध बस्तियों से सभी आयातों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा के बाद फ्रांस तथा कनाडा ने आने वाले महीनों में इसी तरह के कदम उठाने का संकल्प लिया। वहीं आयरलैंड, स्पेन, नीदरलैंड, नॉर्वे और बेल्जियम पहले ही ब्रिटेन के इस फैसले का स्वागत कर चुके हैं। जबकि डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, पोलैंड, पुर्तगाल और स्वीडन ने बस्तियों के साथ ट्रेड के खिलाफ यूरोपीय संघ की कार्रवाई का समर्थन किया। ऑस्ट्रेलिया ने बाद में कहा कि वह भी टारगेटेड बैन की तैयारी कर रहा है, लेकिन ब्रिटेन के पूर्ण व्यापार प्रतिबंध में शामिल नहीं होगा।
यूरोपीय संघ भी इजरायल के खिलाफ
यूरोपी संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कलास ने कहा कि सभी सदस्य देश वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध मानते हैं। वेस्ट बैंक में इजरायली सरकार की ओर से किया जा रहा बस्तियों का विस्तार दो-राज्य समाधान की उम्मीदों को धुंधला कर रहा है।
The UK and 11 other countries today announced their support for trade sanctions targeting illegal Israeli settlements in the West Bank.
— Kaja Kallas (@kajakallas) September 8, 2026
All EU Member States agree that Israeli settlements in the West Bank are illegal under international law. The Israeli Government’s settlement…
सऊदी, तुर्की और मिस्र ने भी किया फैसले का स्वागत
सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र ने भी इजरायली बस्तियों के साथ ट्रेड बैन के 12 देशों के फैसले का समर्थन किया है। साथ ही अन्य देशों की सरकारों को भी ऐसा ही करने के लिए कहा है। तुर्की ने कहा कि “अवैध बस्तियां कब्जे की एक व्यवस्थित नीति में बदल गई हैं और बस्ती की हिंसा “जातीय सफाई” के रूप में हो गई है। मिस्र के विदेश मंत्रालय ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के समर्थन में एक “महत्वपूर्ण कदम” बताया, और कहा कि बस्तियों का निरंतर विस्तार फिलिस्तीनी जमीनों की क्षेत्रीय अखंडता और एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की संभावनाओं के लिए खतरा है।
इजरायल की कड़ी प्रतिक्रिया
12 देशों की ओर से यह कदम उठाए जाने के बाद इजरायल ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। इजरायल ने येरुशलम में ब्रिटेन के कॉन्सुलेट को बंद कर दिया है। साथ ही गाजा कोआर्डिनेटर सेंटर से ब्रिटिश प्रतिनिधियों को बाहर निकाल दिया है और ब्रिटिश राजनेताओं व कार्यकर्ताओं के इजरायल में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है।
क्या होगी चुनौती
आरटी (RT) के न्यूज कंट्रीब्यूटर मार्टिन जे ने कहा कि वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों पर ब्रिटेन का बैन सिर्फ प्रतीकात्मक साबित होगा। उन्होंने कहा कि इनका कोई खास व्यावहारिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह सिर्फ “एक राजनीतिक खेल” है और पाखंड से भरा है। इसमें कुछ खास दम नहीं है, क्योंकि यह पहचान पाना मुश्किल होगा कि कौन सा सामान इजरायली वेस्ट बैंक की बस्तियों से आया है और कौन सा नहीं।




