नक्शे में किसी देश को 1 cm कम दिखाने से क्या बदल जाता है? एक्सपर्ट से समझिए वेस्टर्न गेम
आखिर पश्चिमी देश अपना इलाका छोटा होने के बावजूद ग्लोबल मैप पर उसे बड़ा, और दूसरे देशों को उनके आकार से छोटा क्यों दिखाते हैं, इसके पीछे का माइंडगेम क्या है? भारत को आखिर नया बयान जारी करके आपत्ति क्यों जतानी पड़ी है।

आपने फिल्मों में कैमरे का कमाल तो बहुत बार देखा होगा, जिसमें किसी वस्तु या व्यक्ति के आकार को छोटा या बड़ा दिखाकर दर्शकों का ध्यान खींचा जाता है। लेकिन जब ये काम 'ग्लोबल मैप' पर किसी प्रभावशाली देश या उनके समूहों द्वारा दूसरे देशों के असली आकार को जानबूझकर छोटा दिखाने के लिए किया जाता है, तो वह रणनीतिक साजिश के दायरे में आता है। मगर देश ऐसा क्यों करते हैं, विश्व के मानचित्र पर इस तरह की साजिश, जानबूझकर किसी देश को उसके असली आकार से छोटा दिखाने का वेस्टर्न गेम क्या है?

आखिर पश्चिमी देश अपने इलाके को छोटा होने के बावजूद ग्लोबल मैप पर बड़ा, और दूसरे देशों का आकार बड़ा होने के बावजूद उसे छोटा क्यों दिखाते हैं, इसके पीछे का माइंडगेम क्या है? 4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में विश्व के नए मैप के पक्ष में भारत ने वोटिंग की। लेकिन अब भारतीय विदेश मंत्रालय को नया बयान आखिर क्यों जारी करना पड़ा है? आइए समझते हैं ग्लोबल मैप के 'साइज गेम' की इनसाइड स्टोरी।

पहले समर्थन, तो अब भारत को आपत्ति क्यों?

भारत ने 4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में “Correct the Map” प्रस्ताव का समर्थन किया और उसके पक्ष में वोटिंग की। विश्व के मानचित्र पर दुनिया के देशों खासकर अफ्रीका का सही आकार दिखाने के लिए इस पहल को जरूरी बताया। हालांकि, दो दिन बाद 6 सितंबर को ही दुनिया को सख्त संदेश देने के लिए विदेश मंत्रालय ने एक और बयान जारी किया। इसमें लिखा- 

“4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने “Correct the Map” का प्रस्ताव पास किया। दुनिया के नक्शे में सही संतुलन और अफ्रीका जैसे इलाकों का सही आकार अपनाया गया। इसका मकसद ऐसे समान क्षेत्रफल वाले मैप के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जो सभी महाद्वीपों के भूभागों का असली जमीनी आकार बनाए रखते हैं।

मगर इस प्रस्ताव का किसी देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, विवादित क्षेत्रों या जगहों के नामों सहित किसी राजनीतिक मानचित्रण से कोई लेना देना नहीं है और न ही यह विश्व के किसी विशेष मैप को अपनाता है और न तो उसे प्रमाणित करता है।

भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया और उसी समय यह स्पष्ट कर दिया कि हम सिर्फ नक्शे में जमीन के सही आकार को दिखाने का समर्थन कर रहे हैं। इस प्रस्ताव का मतलब यह कतई नहीं है कि किसी भी नक्शे या अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की मैपिंग को स्वीकार कर लिया गया है।

जम्मू-कश्मीर और भारत का पूरा इलाका भारत के सरकारी मैप के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए। भारत के नक्शे को गलत या भ्रामक तरीके से दिखाया जाना हमें कतई मंजूर नहीं है। भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर हमारा रुख साफ, सुसंगत है और हम इस पर कोई समझौता नही कर सकते।”

भारत के इस संदेश के मायने क्या हैं?

जेएनयू के प्रो. शांतेश कुमार सिंह ने आरटी हिंदी से कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारत एक ऐसा देश है, जो नैतिकता के सिद्धांत पर चलता है। इसलिए उसने यूएन में अफ्रीका के वास्तविक आकार को वैश्विक नक्शे पर सही तरीके से दिखाए जाने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया और वोट भी किया।

सिंह ने कहा कि अब भारत ने स्पष्ट किया है कि किसी महाद्वीप या क्षेत्र को ग्लोबल मैप पर उसके सही आकार में दिखाना एक अलग विषय है, भारत उसका समर्थन करता है। लेकिन उसके किसी क्षेत्र को वर्ल्ड मैप पर गलत दिखाया जाता है तो भारत बर्दाश्त नहीं करेगा। भारत ने विशेष तौर पर जम्मू-कश्मीर का नाम इसलिए लिया कि कश्मीर तो भारत का अभिन्न अंग है ही, इसके अलावा PoJK (पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर) भी भारत का हिस्सा है। भारत कई बार यह बात सार्वजनिक रूप से कहता रहा है। 

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भारत का साफ संदेश है कि यूएन के मैप में या दुनिया के अन्य किसी संस्थान या सरकार के मैप में भारत के आधिकारिक नक्शे को सही दिखाया जाना चाहिए। यह पूरी दुनिया के लिए संदेश है कि उसके किसी भूभाग को गलत दिखाए जाने को भारत सहन नहीं करेगा।
शांतेश कुमार सिंह, प्रोफेसर जेएनयू
शांतेश कुमार सिंह, प्रोफेसर जेएनयू
विदेश मामलों के एक्सपर्ट

वैश्विक संस्थाओं पर पश्चिम का नियंत्रण

रक्षा एवं विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा ने आरटी हिंदी से कहा कि कई प्रमुख वैश्विक संस्थाओं पर पश्चिमी देशों का कंट्रोल है। चाहे संयुक्त राष्ट्र हो, वर्ल्ड बैंक हो या कोई और, ये सब अमेरिका और यूरोप के हित में काम करते हैं। यह समस्या लंबे समय से है। पश्चिमी देश कभी मल्टीपोलर वर्ल्ड नहीं बनने देना चाहते। यह मैप को गलत दिखाकर विवाद खड़ा करते हैं।

उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, आप उसका मैप गलत नहीं दिखा सकते। अफ्रीका का साइज भी सही दिखाइए, क्योंकि वह बड़ा देश है। उसका भी संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इस तरह भारत का संदेश साफ है कि भारत अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा।

कमर आगा ने आगे कहा कि यूएन की समस्या ये है कि किसी प्रस्ताव को एक बार वह बहुमत से पास करते हैं, लेकिन बाद में अमेरिका या यूरोपीय देश उसे वीटो कर देते हैं। यह सब बंद होना चाहिए और UNSC का विस्तार होना चाहिए।

जेएनयू की असिस्टेंट प्रोफेसर और फॉरेन एक्सपर्ट राज यादव ने भी आरटी हिंदी से कहा कि भारत के बयान का मतलब साफ है कि वैश्विक मैप पर किसी देश का आकार जानबूझकर छोटा या बड़ा नहीं दिखाया जाना चाहिए, बल्कि वास्तविक रूप में ही दिखाना चाहिए।  

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भारत का दुनिया के लिए संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि वह अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के साथ खिलवाड़ को सहन नहीं करेगा। उसने सख्ती से यह संदेश दिया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इसलिए भविष्य में किसी भी वैश्विक मंच पर उसके आधिकारिक मैप से छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए।
राज यादव, असिस्टेंट प्रो. जेएनयू, नई दिल्ली
राज यादव, असिस्टेंट प्रो. जेएनयू, नई दिल्ली
विदेश मामलों के एक्सपर्ट

मैप में किसी देश का आकार गलत क्यों दिखाता है पश्चिम?

जेएनयू के प्रोफेसर शांतेश कुमार सिंह कहते हैं कि ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो दुनिया के भूगोल पर अब तक उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की छाप नजर आती है। अभी तक यूएन समेत जितनी वैश्विक संस्थाएं बनी हैं, उनमें अमेरिका या यूरोप की जिम्मेदारी ज्यादा रही है, इसलिए ऐसी संस्थाएं उनके प्रभाव में काम करती हैं।

उनके मुताबिक, पश्चिमी देश यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वह बाकी देशों से सुपीरियर हैं। अपनी कथित सर्वोच्चता दिखाने का उनका एक तरीका यह भी है कि उन देशों को मैप में छोटा दिखाया जाए, जिनको वह अपनी मानसिकता में छोटा ही मानते हैं।

शांतेश कुमार सिंह का कहना है कि अगर देखा जाए तो दुनिया में सबसे ज्यादा रिसोर्सेज अफ्रीकी देशों के पास हैं। इसके बावजूद उसे नजरंदाज किया जाता रहा है। उसी ऐतिहासिक गलती को सुधारने के प्रस्ताव पर भारत ने वोट किया। मगर साथ ही संदेश भी दिया कि इस समर्थन का मतलब ये नहीं कि किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा विवाद वाले क्षेत्रों को भी गलत दिखाया जाएगा।

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पश्चिमी देश नियम बनाते हैं, वही वैश्विक संस्थाओं को नियंत्रित करते हैं। ये संस्थान उनके अनुसार ही काम करते हैं। इसीलिए वह अन्य देशों पर अपनी सुप्रीमेसी दिखाना चाहते हैं। वह यूएनएससी का विस्तार भी इसीलिए नहीं होने देना चाहते।
कमर आगा
कमर आगा
विदेश और रक्षा नीति विशेषज्ञ

पश्चिमी देशों की सोच क्या है?

जेएनयू के असिस्टेंट प्रोफेसर और विदेश मामलों के एक्सपर्ट डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि शीत युद्ध का दौर बीत गया है। ग्लोबलाइजेशन भी एक तरीके से आकर उसके बाद धुल गया है। पश्चिमी देश संसाधन से संप्रभुता तक में एशिया और अफ्रीकी देशों को अपने से कमतर मानते रहे हैं। यह शुरू से उनकी मानसिकता में रहा है। मगर अब वह दौर खत्म हो चुका है। इसके बावजूद उनकी सोच नहीं बदली है। वह अब भी सोचते हैं कि हम इन देशों पर शासन करने के लिए ही हैं। वो अपनी सुप्रीमेसी को बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए उन देशों को अब इनके खिलाफ एकजुट होना चाहिए, जो लंबे समय से इनके उपनिवेशवाद में रहे हैं या पीड़ित रहे हैं।

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पश्चिमी देश संसाधन से संप्रभुता तक में एशियाई और अफ्रीकी देशों को कमतर आंकते रहे हैं। वे सोचते हैं कि हम इन देशों पर शासन करने के लिए ही हैं। दुनिया बदल गई, पर उनकी ये सोच अब तक नहीं बदली है।
अभिषेक श्रीवास्तव, असिस्टेंट प्रोफेसर, जेएनयू
अभिषेक श्रीवास्तव, असिस्टेंट प्रोफेसर, जेएनयू
विदेश मामलों के एक्सपर्ट

मर्केटर मैप क्या था, इसे संयुक्त राष्ट्र ने क्यों बदला?

मर्केटर प्रोजेक्शन मैप को 1569 में एक फ्लेमिश भूगोल शास्त्री गेरार्डस मर्केटर ने बनाया था। इसमें विश्व के मानचित्र पर अफ्रीका के आकार को उसके वास्तविक साइज से छोटा दिखाया गया है। जबकि ग्रीनलैंड, कनाडा समेत यूरोप के कई देश और उत्तरी अमेरिका के हिस्से के उनके छोटे आकार के बावजूद बड़ा दिखाया जाता है। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि मर्केटर मैप में ध्रुवों के आसपास के क्षेत्रों को जहाजों के नेवीगेशन के इरादे से बड़े साइज में दिखाया जाता था।

पुराने मैप में छोटे दिखने वाले भूभाग

  1. अफ्रीका
  2. लैटिन अमेरिका
  3. दक्षिण एशिया

मैप पर अपने साइज से बड़े दिखने वाले क्षेत्र

  • उत्तरी अमेरिका
  • ग्रीनलैंड
  • कनाडा
  • अलास्का

पुराने वर्ल्ड मैप में क्या है?

  • अफ्रीका को ग्रीनलैंड के बराबर दिखाया जाता है, जबकि ग्रीनलैंड वास्तव में अफ्रीका से 14 गुना छोटा है।
  • अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया के देश छोटे दिखाए जाते हैं।
  • भारत को भी मैप में छोटे आकार में दिखाया जाता है।
  • उत्तरी अमेरिका के देशों को मैप में बड़ा दिखाया जाता है।
  • यूरोपीय देशों को भी मैप में बड़ा दिखाया जाता है।
  • कनाडा भी मैप में बड़ा दिखता है, जबकि कनाडा का आकार दक्षिण अफ्रीका का करीब एक तिहाई है।
  • अमेरिका को भी साइज में बड़ा दिखाते हैं, जबकि वह अफ्रीका से कम से कम 3 गुना छोटा है।
  • अमेरिका के अलास्का को मैप पर मेक्सिको और ब्राजील से बड़ा दिखाया जाता है। लेकिन वास्तव में अलास्का मेक्सिको और ब्राजील से छोटा है।

अफ्रीका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप

यह हाल तब था, जब अफ्रीका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। अफ्रीका का कुल क्षेत्रफल 30.7 मिलियन वर्ग किलोमीटर है। इसके बावजूद उसे दुनिया के नक्शे पर छोटा दिखाया जाता था। दुनिया का सबसे बड़ा महाद्वीप 44.58 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल रखने वाला एशिया है। मगर एशियाई महाद्वीप के भारत जैसे देशों को भी मर्केटर मैप पर छोटा दिखाया जाता था।

दुनिया के महाद्वीप और इनका क्षेत्रफल

विश्व के महाद्वीप

UN में अफ्रीका के वास्तविक नक्शे को मंजूरी से क्या बदलेगा?

संयुक्त राष्ट्र ने नक्शे में अफ्रीका को उसके वास्तविक आकार के मुताबिक दर्शाने को मंजूरी जरूर दी है, लेकिन पुराने मर्केटर मैप को बैन नहीं किया गया है। सिर्फ विभिन्न देशों की सरकार, शैक्षिक और टेक्निकल संस्थाओं को नए इक्वल प्रोजेक्शन मैप को अधिक से अधिक इस्तेमाल करने की अपील की गई है।

यूएन में इस प्रस्ताव पर हुई वोटिंग में 164 देशों ने पक्ष में मतदान किया था, जिसमें भारत भी शामिल था। विपक्ष में सिर्फ अमेरिका ने वोट किया था। वहीं सर्बिया, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा और यूक्रेन जैसे देशों ने वोटिंग से दूरी बना ली थी।

यूएन ने प्रस्ताव को मंजूरी देने के बाद कहा था कि अफ्रीका को छोटा दिखाना बंद करें। उसने माना कि एक गोल धरती को समतल कागज पर दिखाने की अपनी सीमाएं होती हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र दुनिया के सभी देशों, स्कूलों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और टेक कंपनियों को 'इक्वल अर्थ' मैप का उपयोग करने के लिए प्रेरित करता है, ताकि विश्व के नक्शे पर महाद्वीपों का सही आकार दिखे। 

अमेरिका ने अकेले खिलाफ में वोटिंग क्यों की?

भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में वोटिंग करके सभी महाद्वीपों को सही आकार दिखाने वाले मैप का समर्थन किया। वहीं अमेरिका ने इसे कट्टरपंथी और राजनीतिक एजेंडा बताकर खारिज कर दिया और कहा कि यह प्रस्ताव यूएन के काम और उसके उद्देश्यों का मजाक उड़ाता है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब यूएन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के मंच पर अमेरिका खुद अलग-थलग और बिलकुल अकेला पड़ गया हो।

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