दुनिया के नक्शे पर अफ्रीका को मिला अपना हक, बस एक अमेरिका ने ही क्यों किया विरोध?
क्षेत्रफल के लिहाज से 30.37 मिलियन वर्ग किलोमीटर आकार के साथ अफ्रीका को दुनिया का सबसे बड़ा दूसरा महाद्वीप होने का दर्जा हासिल है। इसके बावजूद उसे विश्व के मानचित्र पर छोटा दिखाया जाता था।

दुनिया के दूसरे सबसे बड़े महाद्वीप अफ्रीका को आखिरकार सदियों के संघर्ष के बाद विश्व के नक्शे पर उसका असली हक मिल गया है। 4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने दुनिया के नक्शे को लेकर एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया। अफ्रीका के वास्तविक और असली मैप को मंजूरी दे दी है। इससे नक्शे पर दुनिया का आकार अब पहले से काफी ज्यादा बदल गया है। एशिया दुनिया का सबसे बड़ा महाद्वीप है। वहीं क्षेत्रफल के लिहाज से 30.37 मिलियन वर्ग किलोमीटर आकार के साथ अफ्रीका को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप होने का दर्जा हासिल है। बावजूद उसे विश्व के मानचित्र पर छोटा दिखाया जाता था। अफ्रीका लंबे समय से अपने हक की लड़ाई वैश्विक मंच पर लड़ रहा था। आइए जानते हैं कि UNGA में क्या हुआ और पूरा मामला क्या है?

UN ने अफ्रीका के वास्तविक नक्शे को दी मंजूरी

संयुक्त राष्ट्र में अफ्रीकी संघ और टोगो की अगुवाई में एक 4 सितंबर को प्रस्ताव लाया गया। इसका उद्देश्य मर्केटर प्रोजेक्शन की जगह इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन को बढ़ावा देना है। भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में और अमेरिका ने अकेले इसके खिलाफ में वोटिंग की। जबकि 6 देश गैर-हाजिर रहे। 

UNGA में क्या हुआ?

  • 4 सितंबर को अफ्रीका का नक्शा बदलने के लिए प्रस्ताव लाया गया।
  • इसकी अगुवाई अफ्रीकी संघ और टोगो ने की।
  • UNGA में 'करेक्ट द मैप' प्रस्ताव पर वोटिंग हुई।
  • प्रस्ताव मर्केटर मैप को बंद करने और इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन लागू करने के लिए लाया गया।
  • इसका मकसद दुनिया के नक्शे पर अफ्रीका का सही आकार दिखाना था।
  • अभी तक आकार में बड़ा होने के बावजूद अफ्रीका दुनिया के नक्शे पर छोटा दिखता था।
  • भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में और अमेरिका ने खिलाफ वोटिंग की।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुई वोटिंग का नतीजा

क्या है मर्केटर मैप (Mercator Projection) और इसमें क्या गड़बड़ी थी?

  • मर्केटर मैप को 1569 में एक फ्लेमिश भूगोल शास्त्री गेरार्डस मर्केटर ने बनाया था।
  • यह मूल रूप से समुद्री जहाजों को दिशा दिखाने के लिए था।
  • जब गोल धरती को समतल कागज पर छापा जाता है, तो भूमध्य रेखा से दूर (ध्रुवों की ओर) स्थित देश नक्शे पर बहुत बड़े दिखने लगते हैं।
  • मर्केटर मैप पर यूरोप और उत्तरी अमेरिका (जैसे ग्रीनलैंड) बहुत बड़े दिखाई देते हैं।
  • जबकि आकार में बड़ा होने के बावजूद अफ्रीका काफी छोटा दिखता है।
  • वास्तव में अफ्रीका ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना बड़ा है।
  • मगर नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ्रीका का आकार लगभग एक जैसा दिखाई देता था।

संयुक्त राष्ट्र ने क्या कहा?

संयुक्त राष्ट्र ने अफ्रीका के वास्तविक मैप को मंजूरी दे दी और 16वीं शताब्दी के ‘मर्केटर प्रोजेक्शन’ को आधिकारिक रूप से हटा दिया। साथ ही अब इसकी जगह 2018 के अधिक सटीक ‘इक्वल अर्थ’ डिजाइन पर आधारित मैप को अपनाने का निर्णय लिया। अपील में विश्व से कहा कि अफ्रीका को छोटा दिखाना बंद करें। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारी बहुमत से इस प्रस्ताव को पारित किया। 

अमेरिका ने क्यों किया विरोध?

प्रस्ताव के पक्ष में भारत समेत 164 देशों ने वोट किया, लेकिन अमेरिका ने अकेले इस प्रस्ताव के खिलाफ में मतदान किया। भारत ने सभी महाद्वीपों को सही आकार दिखाने वाले मैप का समर्थन किया। अमेरिका प्रस्ताव के खिलाफ वोटिंग करने वाला विश्व का इकलौता देश था। अमेरिका ने इस पहल को एक कट्टरपंथी और राजनीतिक एजेंडा बताकर खारिज कर दिया।

अमेरिकी प्रतिनिधि ने तर्क दिया, “यह प्रस्ताव इस संस्था (UN) के काम और उद्देश्य का मजाक उड़ाता है। अमेरिका ने कहा जिसे नक्शों के आकार को सुधारने की एक सीधी-साधी कोशिश के रूप में पेश किया जा रहा है, वह वास्तव में उस बड़े और कट्टरपंथी वैचारिक एजेंडे का हिस्सा है। अमेरिका ने प्रस्ताव में इस्तेमाल किए गए “ऐतिहासिक भरपाई” और “मानसिक न्याय” जैसे शब्दों पर आपत्ति जताई और इस तरह की पहलों को “कामकाज में रुकावट पैदा करने वाली चीजें और संस्था की विश्वसनीयता घटने की वजह” बताया।

विश्व के प्रमुख महाद्वीप

भारत ने क्या कहा?

भारत ने अफ्रीकी संघ के प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। यूएनजीए में भारतीय राजनयिक रघू पुरी ने कहा, इक्वल एरिया प्रोजेक्शन्स इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि वे महाद्वीपीय/क्षेत्रीय भू-भागों के सापेक्ष आकार और क्षेत्रफल को सुरक्षित रखते हैं। इसलिए भारत संयुक्त राष्ट्र के ‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव का स्वागत करता है।

यूक्रेन समेत 6 देश वोटिंग से रहे दूर

इस प्रस्ताव पर हो रहे मतदान के दौरान यूक्रेन समेत 6 देशों ने वोटिंग से दूरी बनाई। इसमें यूक्रेन के अलावा एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया का नाम शामिल है। ये सभी देश मतदान के समय विभिन्न कारणों से अनुपस्थित रहे।

यूएन की मंजूरी के बाद क्या बदलाव होगा?

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह प्रस्ताव मर्केटर नक्शे पर बैन नहीं लगाता और न ही किसी एक नक्शे को जबरन थोपता है। बल्कि यह दुनिया के सभी देशों, स्कूलों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और टेक कंपनियों को 'इक्वल अर्थ' के साथ अन्य समान-क्षेत्रफल वाले नक्शों का उपयोग करने के लिए प्रेरित करता है, ताकि विश्व के मानचित्र पर महाद्वीपों का सही आकार दिखे। यूएन का कहना है कि एक गोल धरती को समतल कागज पर दिखाने की अपनी सीमाएं होती हैं।

संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते हैं, इसलिए देशों और संस्थानों को केवल नए नक्शे का उपयोग करने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा और न ही पुराने नक्शे के उपयोग पर बैन लगाया गया है। मगर इस फैसले के बाद अब शिक्षा, तकनीक और शासन में अब तक व्यापक रूप से इस्तेमाल हो रहे मर्केटर प्रोजेक्शन के रुकने और स्कूली पाठ्यक्रमों के साथ रोजमर्रा की तकनीक में बदलाव आने की उम्मीद है।

अफ्रीका के नक्शे को लेकर क्या था विवाद?

अफ्रीका के पुराने नक्शे को लेकर सदियों से छिड़ी तकनीकी बहस के पीछे इतिहास और वैश्विक ताकतों से जुड़ी एक बड़ी सच्चाई छिपी है। यहां सवाल उठता है कि क्या 16वीं सदी में यूरोपीय नाविकों के लिए बनाए गए एक नक्शे ने पीढ़ियों से न केवल भूगोल को, बल्कि एक पूरे विशाल और जटिल महाद्वीप के प्रति लोगों की सोच को भी बिगाड़ कर रख दिया है? टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने मतदान से पहले कहा, “नक्शे भूगोल नहीं बदलते, बल्कि दुनिया के प्रति हमारी समझ को आकार देते हैं। वे शिक्षा का मार्गदर्शन करते हैं, कल्पना को पंख देते हैं और सामाजिक सोच को प्रभावित करते हैं।”

क्यों छोटा दिखता था अफ्रीका का आकार?

गेरार्डस मर्केटर एक फ्लेमिश मानचित्रकार थे। उन्होंने 1569 में समुद्री यात्राओं में होने वाली वास्तविक बाधाओं को दूर करने के लिए यह नक्शा बनाया था। इस मैप पर सीधी रेखाएं समुद्री दिशाओं को सही दर्शाती थीं, जिससे नाविक आसानी से अपना रास्ता तय कर सकते थे। इसलिए मुख्य रूप से यह मैप जहाजों के नेविगेशन के उद्देश्य से ही बनाया गया था। भूमध्य रेखा (Equator) से दूर स्थित देश इस मैप पर बहुत बड़े दिखाई देते थे, जबकि अफ्रीका उन देशों से आकार में बड़ा होने के बावजूद छोटा दिखता था।

उदाहरण के लिए, इस नक्शे पर ग्रीनलैंड और अफ्रीका लगभग एक ही आकार के दिखते हैं, जबकि असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। इसी तरह उत्तरी यूरोप और उत्तरी अमेरिका भी भूमध्य रेखा के आसपास के इलाकों की तुलना में बहुत बड़े दिखाई देते हैं।

मैप को लेकर क्या थी मुश्किल?

यह मैप वैसे तो जहाजों के नेविगेशन और नाविकों की सुविधा के लिए बनाया गया था। मगर इस मर्केटर मैप को ही आज के दौर में छात्रों की पढ़ाई में, मीडिया में खबरे दिखाने के लिए, विभिन्न तरह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर और सरकारी कामों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसलिए 16वीं शताब्दी के 'मर्केटर प्रोजेक्शन' के खिलाफ अफ्रीका के नेतृत्व में चलाए गए अभियान की यह एक बड़ी जीत है। मर्केटर प्रोजेक्शन आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला नक्शा है।

अफ्रीकी महाद्वीप के मुख्य फैक्ट्स

क्यों लाया गया प्रस्ताव?

अफ्रीका का वास्तविक आकार विश्व के नक्शे पर दर्शाने और उसका हक दिलाने के लिए यह प्रस्ताव लाया गया। अफ्रीकी संघ और टोगो ने इस प्रस्ताव की अगुवाई की। प्रस्ताव को लाने से पहले अफ्रीकी संघ ने इसके समर्थन में अभियान चलाया। इसके तहत टोगो ने अफ्रीकी समूह की ओर से इस प्रस्ताव पर बातचीत की अगुवाई की। प्रस्ताव में गड़बड़ी को सुधारने के लिए “मानसिक न्याय और ऐतिहासिक भरपाई” की संज्ञा दी गई। प्रस्ताव में सुझाव दिया गया कि इसकी जगह 2018 में विकसित 'इक्वल अर्थ' (Equal Earth) के मैप को लाया जाए, क्योंकि यह विश्व के मैप पर महाद्वीपों के वास्तविक आकार को सही तरीके से दिखाता है।

रॉबर्ट डुसे ने स्पष्ट किया कि इस प्रयास का मकसद मर्केटर की आलोचना करना या किसी एक नक्शे को जबरन लागू करना नहीं है, क्योंकि समुद्री यात्राओं के लिए मर्केटर की उपयोगिता को वे भी मानते हैं। उन्होंने कहा, “एक निष्पक्ष नक्शा दुनिया के भूगोल को नहीं बदलता, यह सिर्फ दुनिया को देखने के हमारे नजरिए को बदलता है।” प्रस्ताव में कहा गया कि इन गलतियों ने अफ्रीका के “सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक महत्व को कम करने” में भूमिका निभाई है और दुनिया को देखने के एक असमान नजरिए को बढ़ावा दिया है।

यूक्रेन क्यों रहा वोटिंग से दूर?

यूक्रेन ने कहा कि वह अफ्रीका और 'ग्लोबल साउथ' के अन्य हिस्सों को प्रभावित करने वाली ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने के प्रयासों का समर्थन करता है, लेकिन उसे आपत्ति यह है कि 'इक्वल अर्थ' मैप का इस्तेमाल करने वाले कुछ नक्शे यूक्रेनी क्षेत्रों को अलग तरह से दर्शाते हैं। यूक्रेनने चेतावनी दी कि पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना इस नक्शे को अपनाने से “विवादों का पिटारा” खुल सकता है, जिससे विवादित सीमाओं को लेकर असमंजस की स्थिति बन सकती है।

यूरोपीय संघ ने समर्थन भी किया और चिंता भी जताई

यूरोपीय संघ (EU) ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन उसने भी संभावित सीमा-विवाद को लेकर अपनी चिंता भी जाहिर की। यूरोपीय संघ की ओर से आयरलैंड ने कहा कि यह कदम केवल महाद्वीपों के तुलनात्मक आकार पर लागू होता है और इसका किसी देश की संप्रभुता, क्षेत्र की कानूनी स्थिति या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। संघ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके समर्थन का मतलब यह नहीं है कि वह 'इक्वल अर्थ' की वेबसाइट पर दिखाए गए नक्शों को मान्यता देता है।

फ्रांस ने क्यों दिया अफ्रीकी संघ का साथ

अमेरिका ने जहां प्रस्ताव का विरोध किया और यूक्रेन व यूरोपीय संघ ने चिंता जाहिर की, वहीं फ्रांस का रुख इससे बिल्कुल उलट रहा। मतदान से कुछ घंटे पहले फ्रांस के विदेश मंत्री ज्यां-नोएल बारो ने घोषणा की कि पेरिस अपने दुनिया के नक्शों में 'मर्केटर' का इस्तेमाल बंद करने की योजना बना रहा है। इस कदम से उनकी सरकार अफ्रीकी संघ के इस अभियान के साथ आकर खड़ी हो गई।

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