मलबे से भरी टनल में 220 घंटे कैसे चलती रहीं सांसें? नेपाल में 'चमत्कार' की Inside Story
नेपाल में बाढ़ के बाद पावर प्रोजेक्ट की सुरंग में फंसे दो लोगों को 9 दिन बाद करीब 170 मीटर अंदर से जिंदा रेस्क्यू किया गया। एक्सपर्ट्स का कहना है कि दोनों जहां फंसे थे वहां पर्याप्त ऑक्सीजन की मौजूदगी थी और सुरंग में और लोग जिंदा हो सकते हैं। इसी उम्मीद में रेस्क्यू ऑपरेशन और तेज कर दिया गया है।
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मलबे से भरी टनल में 220 घंटे कैसे चलती रहीं सांसें? नेपाल में 'चमत्कार' की Inside Story
सुरंग से रेस्क्यू के बाद कबीर महर्जन ने हाथ जोड़कर रेस्क्यू टीम का धन्यवाद किया।© Nepal Army

नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ के बाद त्रिशूली-3A हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में फंसे दो मजदूरों को 9 दिन बाद जिंदा बाहर निकाला गया। नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस ने विदेशी रेस्क्यू टीम की मदद से दोनों का रेस्क्यू किया। शुक्रवार सुबह बचाए गए दोनों लोगों की पहचान संजय शाह और कबीर महर्जन के रूप में हुई है।

स्थानीय मीडिया के मुताबिक, संजय शाह मैकेनिकल फोरमैन और कबीर महर्जन मैकेनिकल सुपरवाइजर हैं। दोनों त्रिशूली-3A हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में काम करते थे। काठमांडू के रहने वाले कबीर महर्जन पावर प्रोजेक्ट के नियमित मेंटेनेंस के काम के लिए गए थे। सप्तरी के संजय शाह प्रोजेक्ट के ऑपरेशन में शिफ्ट ड्यूटी पर थे।

रेस्क्यू के बाद उन्हें हेलीकॉप्टर से काठमांडू ले जाया गया। संजय शाह को बीरेंद्र आर्मी हॉस्पिटल और कबीर को नेशनल ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया है। स्थानीय मीडिया में चल रही खबरों के मुताबिक, अधिकारियों ने बताया कि कबीर अपने हाथ-पैर नहीं हिला पा रहे थे, हालांकि संजय चोटिल नहीं हैं।

कहां फंसे थे दोनों?

26 अगस्त को ग्लेशियर के टूटने से आई बाढ़ में पानी, चट्टान और कीचड़ तेज रफ्तार से त्रिशूली नदी की घाटी में आया। इस दौरान नेपाल में भारी तबाही हुई। 4 सितंबर तक 1,259 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। बाढ़ में 12 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में काम करने वाले करीब 900 कर्मचारी लापता हो गए। मलबे की वजह से हाइड्रोपावर की सुरंगों के रास्ते बंद हो गए।

त्रिशूली-3A में भी रेस्क्यू टीम को सुरंग तक पहुंचने में कई दिन लग गए। भारी कीचड़ और बड़े-बड़े पत्थरों के कारण सुरंग का रास्ता लगभग बंद हो गया था। बचावकर्मियों ने मशीनों की मदद से मलबा हटाया और धीरे-धीरे सुरंग के अंदर जाने का रास्ता बनाया।

रेस्क्यू ऑपरेशन में शामिल सुरक्षाकर्मियों के मुताबिक, शाह और महर्जन सुरंग के करीब आधे रास्ते में मिले। बाहर निकलने की कोशिश के दौरान वो बीच में फंस गए थे। दोनों सुरंग के अंदर करीब 170 मीटर की गहराई पर थे।

नेपाल की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के सांसद और इंजीनियर श्रीराम न्यौपाने रेस्क्यू साइट पर मौजूद थे और वहां से सोशल मीडिया के जरिए लगातार अपडेट दे रहे थे।

उन्होंने बताया कि त्रिशूली-3 ‘ए’ हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग के अंदर से लोगों के बोलने की आवाज सुनाई दी है। इसके बाद नेपाली सेना ने रेस्क्यू टीम के साथ मिलकर बचाव का काम तेज कर दिया। 

उन्होंने यह भी बताया था कि सुरंग के अंदर एक से ज्यादा लोगों की आवाज सुनाई देने की पुष्टि हुई है। न्यौपाने के मुताबिक, जब बचाव दल ने अंदर मौजूद लोगों से कहा, ‘घबराइए नहीं, हम आपको बचा रहे हैं,’ तो अंदर से जवाब मिला, ‘ठीक है।’

9 दिन तक कैसे जिंदा रहे?

9 दिन बाद यानी 220 घंटे से ज्यादा समय बाद संजय शाह और कबीर महर्जन का जिंदा निकल आना किसी चमत्कार से कम नहीं है। प्रलय के बाद नेपाल के लिए एक अच्छी खबर है। सुरंग का रास्ता बंद होने की वजह से वहां पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं था जिससे फंसे लोगों के लिए वहां सांस लेना काफी मुश्किल माना जा रहा था। ऐसे में दोनों लोग 9 दिन तक जिंदा कैसे रह गए?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, दोनों लोग अंडरग्राउंड एयर पॉकेट में रहने की वजह से जिंदा रह सके। रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान इंजीनियर सुरंगों के नेटवर्क में लगातार ऑक्सीजन पहुंचा रहे थे।

ऑस्ट्रेलियाई जियोलॉजिस्ट और टनल एक्सपर्ट अर्नोल्ड डिक्स, जो नेपाल में तकनीकी मदद कर रहे हैं, के मुताबिक भूमिगत पावरहाउस की बनावट ने लोगों को बचने का मौका दिया हो सकता है।

डिक्स ने एबीसी न्यूज से बातचीत में बताया कि त्रिशूली-3A का पावरहाउस पहाड़ के अंदर करीब 11 मंजिल गहराई में बना है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरंग से पावरहाउस तक पहुंचने वाली जगह के ऊपरी हिस्से में ऐसी जगह हो सकती है जहां बाढ़ का पानी पूरी तरह नहीं पहुंचा और हवा फंसी रही।

प्रोफेसर डिक्स ने इस हिस्से को ‘Goldilocks zone’ कहा है। यह ऐसी जगह है जहां लोगों को पानी से बचने के लिए पर्याप्त ऊंचाई और सांस लेने के लिए पर्याप्त हवा मिल सकती है। उनके मुताबिक, अगर कोई इस तबाही से बचा होगा तो उसके इस ऊपरी हिस्से में होने की संभावना ज्यादा थी।

इस अंडरग्राउंड पावरहाउस में बड़े कमरे और दूसरी खाली जगहें भी हैं। बताया जा रहा है कि वहां मौजूद पानी और दूसरे उपकरणों ने भी कुछ समय तक दोनों को जिंदा रहने में मदद की हो सकती है।

हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि यहां भी धीरे-धीरे ऑक्सीजन के कम होने का खतरा है। डिक्स का अनुमान था कि अगर लोगों को पर्याप्त हवा वाली जगह मिल गई हो तो वो 17 दिन तक भी जीवित रह सकते हैं।

'सबसे भागने को कहा, फिर मेरे निकलने में देर हो गई'

रेस्क्यू के बाद संजीव शाह का अपने पिता से फोन पर बातचीत का एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में सुरक्षाकर्मी फोन पर शाह के पिता को बता रहे हैं कि उन्हें बाहर निकालकर आर्मी कैंप में लाया गया है। इसके बाद शाह अपने पिता को बताते हैं कि मैं बिल्कुल ठीक हूं और आर्मी अस्पताल में हूं।

उन्होंने रेस्क्यू टीम को बताया कि हादसे के बाद जब दूसरे लोग बाहर निकल रहे थे, तब वो पीछे रुक गए थे, क्योंकि उनकी जिम्मेदारी सभी लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की थी।

हादसे के वक्त वो पावर प्रोजेक्ट के कंट्रोल रूम में काम कर रहे थे। उन्होंने तुरंत खुद बाहर निकलने के बजाय पहले दूसरे लोगों को सुरक्षित निकालने की कोशिश की। 

Sanjay Shah
मैं कंट्रोल रूम में काम कर रहा था। मेरी जिम्मेदारी सभी की जान बचाने की थी। मैंने सभी से भागने के लिए कहा। ऐसा करने में मेरा समय निकल गया। आखिर में मैं बाहर नहीं निकल सका।
संजय शाह
संजय शाह
नेपाल में सुरंग से रेस्क्यू किए गए हाइड्रोपावर वर्कर

नेपाली सेना की मेडिकल टीम से बात करते हुए उन्होंने बताया कि सुरंग के अंदर फंसे रहने के दौरान वो मंत्र का जाप करते रहे और रेस्क्यू टीम के आने का इंतजार करते रहे।

जब उनसे पूछा गया कि सुरंग के अंदर कितने लोग अभी भी फंसे हो सकते हैं, तो उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने आसपास तीन-चार लोगों से बातचीत की थी या उनकी आवाजें सुनी थीं।

शाह ने यह भी कहा कि सुरंग के और अंदर, खासकर पावरहाउस के आसपास, कुछ और लोग फंसे हो सकते हैं।

वहीं, कबीर महर्जन की पत्नी ने नेपाली अखबार कांतिपुर से बात की है। उन्होंने कहा कि उनके पति को दूसरी जिंदगी मिली है। पत्नी हीरा शोभा ने कांतिपुर से कहा, ‘उन्हें दूसरी जिंदगी मिली है। हम बेहद खुश हैं। हम उनका इंतजार कर रहे थे। अब मैं अपने पति को देखने अस्पताल जा रही हूं।’

कबीर महर्जन के परिवार को यकीन था कि वो वापस आएंगे।© Nepali Army

उन्होंने आगे कहा, ‘उन दिनों को गुजारना बहुत मुश्किल था। यह एक-दो दिन की बात नहीं थी। हम न तो खाना खा पा रहे थे और न ही सो पा रहे थे।’

महर्जन के परिवार को भरोसा था कि वो जिंदा वापस आएंगे। हीरा शोभा के मुताबिक, महर्जन पिछले 7 साल से त्रिशूली-3ए प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे। बुधवार सुबह करीब 7:30 बजे उनकी आखिरी बार पति से बात हुई थी। इसके कुछ ही समय बाद भोटेकोशी नदी में भीषण बाढ़ आ गई।

सुरंग में और लोगों के जिंदा होने की उम्मीद जगी

दो लोगों के जिंदा मिलने के बाद रेस्क्यू टीम की उम्मीद बढ़ गई है। अधिकारियों के मुताबिक, त्रिशूली-3A प्रोजेक्ट में अभी भी बड़ी संख्या में मजदूरों का पता नहीं चल पाया है और करीब 115 लोगों के मुख्य सुरंग में फंसे होने की आशंका है। रेस्क्यू टीम कोशिश कर रही है कि सुरंगों के अंदर मौजूद ऐसे ही एयर पॉकेट और सूखी जगहों तक पहुंचकर दूसरे लोगों को भी बचाया जा सके।

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