वो धमाके जैसा शोर था, 30 मिनट में पूरा परिवार बह गया... नेपाल तबाही की 5 आपबीती
नेपाल की तबाही सबकुछ बर्बाद कर गई। मरने वालों का आंकड़ा और लापता लोगों का आंकड़ा रोज बढ़ता जा रहा है। हम आपको ऐसी पांच आपबीती बताने जा रहे हैं, जिन्हें पढ़कर आपको एहसास होगा उस दिन 30 मिनट के भीतर क्या कुछ हुआ था।
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वो धमाके जैसा शोर था, 30 मिनट में पूरा परिवार बह गया... नेपाल तबाही की 5 आपबीती
नेपाल त्रासदी© ANI

वो जो प्यासा लगता था सैलाब-ज़दा था, पानी-पानी कहते-कहते डूब गया है... मशहूर उर्दू शायर आनिस मुईन का ये शेर नेपाल की त्रासदी पर बिल्कुल मुफीद बैठता है। 26 अगस्त को उस रोज सूरज की किरण के साथ दूर पर्वत पर एक सैलाब खामोश बैठा था। जैसे ही नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बसे लोगों की डेली रूटीन शुरू हुई, अगले 20-25 मिनट में एक सैलाब आया और सब बहा ले गया। बच गया तो सिर्फ गम का मंजर। घर मलबे में दब गए, लोग कोसों दूर चले गए। किसी के निशान मिले तो किसी की खोज अब भी जारी है।

1200 से ज्यादा मौतें और 4800 से ज्यादा लापता। जिनके शव मिले उनका अंतिम संस्कार आंखें देखकर भी देखना नहीं चाहतीं और जो लापता हैं, उनके पुतलों का ही अंतिम संस्कार हो रहा है।

1. 'मेरे शरीर पर कीचड़ आ गया था'

असम के श्रमिक पंकज बर्मन ने उन खौफनाक पलों को याद किया- जब नेपाल के अपर त्रिशूली जलविद्युत परियोजना वाले इलाके में सैलाब आया तो हम लोगों को जान बचाकर ऊंचाई वाली जगह की ओर भागना पड़ा। हम लोग सिर्फ बिस्कुट और पानी के सहारे तीन दिनों तक फंसे रहे।

बर्मन ने एएनआई (ANI) को बताया,

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मैं अपर त्रिशूली हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट में काम कर रहा था। काम के दौरान मैं अपनी ड्यूटी पर था और पावरहाउस व टनल के अंदर अपना काम कर रहा था। तभी एक बहुत जोरदार आवाज आई। हम सोचने लगे कि यह कैसा शोर है,यह किसी बड़े धमाके जैसा लगा। बाहर लोगों की चीख-पुकार सुनकर जनरेटर वाले इलाके से बाहर आया तो देखा कि टरबाइन फ्लोर पर पानी तेजी से भर रहा था।
असम के शख्स की आपबीती
असम के शख्स की आपबीती

उन्होंने कहा, 'जैसे ही मैं बाहर आया, पानी का एक भारी रेला सीधे मेरी तरफ दौड़ा। मेरे पूरे शरीर पर कीचड़ और पानी की बौछार पड़ गई, और मैं जान बचाने के लिए बाहर की तरफ भागा।' उन्होंने कहा, “पानी और भारी-भरकम चट्टानें तेजी से बह रही थीं। बाढ़ का पानी 50 से 60 फीट तक ऊपर उठ चुका था। बड़े पत्थर, मकान और गाड़ियां बहती चली जा रही थीं। लोग चीख-चीख कर कह रहे थे- हमें बचाओ! हमें बचाओ! हम ऊंचाई की तरफ तब तक दौड़ते रहे, जब तक कि पहाड़ की चोटी पर नहीं पहुंच गए। 

उस इलाके में करीब 100 से 150 मजदूर मौजूद थे, लेकिन इस आपदा ने सबको अलग-अलग दिशाओं में तितर-बितर कर दिया। लगभग 15-20 मजदूर पहाड़ पर एक साथ रहे और बड़ी चट्टानों की ओट में शरण ली।

बर्मन ने बताया कि भागते समय उनका साथी समर उनके साथ ही रहा। उन्होंने कहा, “समर मेरे साथ था। मैं उसे अपने साथ ले गया। हम साथ भागे। मैंने उससे कहा, 'दूसरी तरफ मत जाओ, मेरे साथ रहो। अगर कुछ होता भी है, तो कम से कम हममें से कोई एक तो जिंदा बचेगा, घर लौटकर अपने परिवारों को बता सकेगा कि क्या हुआ था।'”

बर्मन ने बताया कि उनके कई साथी मजदूर अब भी लापता हैं, जिनमें उनके करीबी दोस्त अरुण महंता भी शामिल हैं, जो काम के सिलसिले में उनके साथ ही आए थे। उन्होंने कहा, “हमारे स्टाफ में से लापता हुए अन्य मजदूरों में से अब तक कोई नहीं मिला है।” बाढ़ में सारा सामान और पहचान संबंधी दस्तावेज बह गए। बर्मन ने बताया कि जब प्रशासन ने लापता मजदूरों की जानकारी मांगी, तो उनके मोबाइल फोन में सेव पहचान पत्रों की तस्वीरें काफी काम आईं।

नेपाल त्रासदी के बाद की तस्वीर© ANI

2. 'संभलने के लिए थे सिर्फ 30 मिनट'

26 अगस्त की उस सुबह बित्रावती के रहने वाले के. वाइबा ने बताते हैं कि जब बाढ़ आई, तो लोगों के पास संभलने के लिए मुश्किल से 30 मिनट का वक्त था।

उन्होंने बताया, 'जब यह हुआ तो सब कुछ करीब 30 मिनट के भीतर हो गया। हमें कोई चेतावनी भरा संदेश नहीं मिला था। पानी हवा के एक तेज झोंके की तरह अचानक सब कुछ बहा ले जाने आया। यहां पहले कभी ऐसा कुछ नहीं हुआ था। न कोई पूर्व सूचना थी, न ही कोई चेतावनी। उस वक्त बित्रावती बाजार में 500 से ज्यादा लोग मौजूद थे।”

के. वाइबा ने पीटीआई को बताया कि बित्रावती बाजार में 100 से ज्यादा घर थे पर सब बह गए। कितने शव हैं, अब इनकी गिनती करके क्या फायदा। सब एक झटके में खत्म हो गया।

3. 'मेरे घर को कुछ नहीं हुआ'

नुवाकोट के एक स्थानीय निवासी ने बताया कि ये एक मार्केट वाला एरिया था, हालांकि मेरे घर को कुछ नहीं हुआ। मेरी दुकान भी बच गई। नुवाकोट में कई घर हैं जिनकी नींव हिल गई और कई की छत भी उजड़ गई। नीचे वीडियो देखिए। 

4. 'नाश्ते के लिए साथ बैठे थे और...'

26 अगस्त की बाढ़ को याद करते हुए एक वृद्धाश्रम के बुजुर्ग ने बताया कि हम सभी नाश्ते के लिए इकट्ठा हुए थे, तभी एक महिला ने अचानक आकर हमें बाढ़ आने की खबर दी। इस बाढ़ में हमने छह लोगों को खो दिया, साथ ही तीन गायें और उनके बछड़े भी बह गए। महज 7-8 मिनट के भीतर सब कुछ तबाह होकर बह गया। हम भोजन और आश्रय से हमारी मदद करने के लिए भारत सरकार को धन्यवाद देते हैं। हम भारत से अपील करते हैं कि वह यहां हमारे लिए एक वृद्धाश्रम (ओल्ड-एज सेंटर) का निर्माण कराए।

5. 'उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था'

विनाशकारी बाढ़ के बाद होल्डिंग सेंटर में रह रहे लोगों ने अपना दर्द बयां किया। एक महिला की आपबीती सुनाते हुए एक लड़की ने कहा, “वह बुरी तरह घायल हो गई थीं और उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था। लोगों ने उन्हें ऊंचाई से देखा और खींचकर सुरक्षित बाहर निकाला। वह जंगल वाले इलाके में फंसी हुई थीं और उनका कोई भी परिवार वाला वहां मौजूद नहीं था जो उन्हें बचा सके। गांव वालों ने उन्हें बचाया और यहां लेकर आए।”

उन्होंने आगे बताया, 'इस समय उनके पास इलाज कराने के लिए एक रुपया भी नहीं है। अगर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराकर बेहतर इलाज मिल सके, तो बहुत बड़ी मदद होगी। यहां उन्हें सिर्फ प्राथमिक उपचार (फर्स्ट एड) मिल रहा है, जो उनकी हालत के हिसाब से काफी नहीं है; यहां सामान्य दवाएं ही उपलब्ध हैं। वह रो रही हैं क्योंकि उनके बच्चे भी यहीं फंसे हुए थे। अब वे सब कुछ खो चुके हैं- उनके घर और सारा सामान बर्बाद हो गया। उनके पास अब कुछ भी नहीं बचा है।'

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