नेपोलियन को मॉस्को सौंपकर रूसियों ने कैसे जीती जंग? रणनीति हैरान कर देगी
फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन ने 1812 में रूस पर हमला किया, लेकिन उसके बाद रूस ने जंग कैसे जीती, ये कहानी है उसी अनोखी रणनीति, साहस और धैर्य की है, जो आज भी हैरान करती है।
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नेपोलियन को मॉस्को सौंपकर रूसियों ने कैसे जीती जंग? रणनीति हैरान कर देगी
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15 सितंबर 1812 की तारीख... यह दिन रूस के इतिहास में कभी नहीं भुलाया जा सकता। यही वो दिन है, जब नेपोलियन बोनापार्ट की अगुवाई में फ्रांसीसी सेना मॉस्को के क्रेमलिन में दाखिल हुई। दुनिया को लगा कि सब कुछ खत्म हो गया। रूस का सबसे बड़ा शहर दुनिया के सबसे बड़े सैन्य कमांडर के आगे झुक गया। लेकिन तीन महीनों के अंदर ही ऐसा पांसा पलटा कि नेपोलियन की बची-खुची सेना भागने लगी। गर्मियों में रूस पर हमला करने वाली विशालकाय सेना साल खत्म होते-होते लगभग साफ हो चुकी थी। पश्चिमी देशों में आमतौर पर यह माना जाता है कि नेपोलियन को रूस की कड़ाके की ठंड की वजह से पीछे हटना पड़ा था। खराब मौसम ने उसकी सेना को कमजोर कर दिया था, लेकिन ये पूरी सच्चाई नहीं है। ये कहानी है रूस की उसी अनोखी रणनीति की, साहस की और धैर्य की, जो आज भी लोगों को हैरान करती है। 

इस महायुद्ध में कितने लोगों की जानें गईं, कितना नुकसान हुआ, इसके सही आंकड़ों को लेकर आज तक बहस चलती है, लेकिन अनुमान है कि उस वक्त मारे गए या पकड़े गए सैनिकों की संख्या 4 से 5 लाख के बीच हो सकती है। 

एडम अल्ब्रेख्त की 'जलते हुए मॉस्को में नेपोलियन'RT© RT

नेपोलियन की हार क्यों हुई?

फ्रांस का सम्राट नेपोलियन बहुत अनुभवी कमांडर था। उसे अद्भुत सैन्य रणनीतिकार माना जाता है। वह यूरोप के बड़े हिस्से पर अपना प्रभुत्व जमा चुका था। ऐसे में यह सोचना ही गलत है कि इतने अनुभवी जनरल ने हमले से पहले उस देश के मौसम पर विचार नहीं किया होगा, जिसे वह जीतने निकला था। नेपोलियन पहले भी सर्दियों में सैन्य अभियान चला चुका था। 1805 में ऑस्टरलिट्ज की लड़ाई में रूसियों को हार का सामना करना पड़ा था, जबकि उस समय तापमान बेरेजिना की लड़ाई (जिसमें रूसी जीते थे) के मुकाबले काफी कम था। भारी बर्फीले तूफान के बीच लड़ी गई आइलाऊ की लड़ाई तो बिना किसी नतीजे के खत्म हुई थी। इस लिहाज से ये सोचना गलत होगा कि रूस की भीषण सर्दी ने नेपोलियन और उसकी सेना के दांत खट्टे कर दिए होंगे। 

क्या किसानों के गुरिल्ला युद्ध ने हराया?

ये सोचना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि इस युद्ध में नेपोलियन को इसलिए पीछे हटना पड़ा क्योंकि रूस के आम लोग और किसानों ने भी हथियार उठा लिए थे और फौज की मदद के लिए आगे आ गए थे। गुरिल्ला युद्ध करने लगे थे। यह पहली बार नहीं था, जब नेपोलियन को आम नागरिकों की सेना (मिलिशिया) से लड़ना पड़ा हो। स्पेन में ऐसी ही टुकड़ियों ने वेलिंगटन की रेगुलर फौज की मदद की थी, तब भी फ्रांसीसी सेना इतनी बुरी तरह और इतनी तेजी से बर्बाद नहीं हुई थी। तो फिर 1812 में हुआ क्या था? क्यों नेपोलियन की ग्रांडे आर्मी को विनाशकारी हार झेलनी पड़ी थी?

1812 का अनोखा युद्ध

1812 का युद्ध अनोखा था। शुरुआत में फ्रांसीसी सेना आगे बढ़ी, और रूसी सेना पीछे हट गई। लेकिन इससे युद्ध की दिशा नहीं बदली। बाद में नेपोलियन पीछे हटने लगा। हर लड़ाई के बाद नेपोलियन की फौज पीछे हटती गई और रूसी सेना उसका पीछा करती रही। उसके पास एक डिटेल्ड प्लान था। इस प्लान की जड़ें 1805 और 1806-07 के असफल अभियानों में छिपी थीं। कई शर्मनाक हार के बाद, रूस के राजा जार अलेक्जेंडर प्रथम और नेपोलियन ने टिलसिट की संधियों पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, इस शांति समझौते से दोनों देशों के बीच का विवाद हल नहीं हुआ। सभी को एहसास था कि ये अस्थायी शांति से ज्यादा कुछ नहीं है।

ज़ार एलेक्जेंडर प्रथम कौन थे?

जार अलेक्जेंडर प्रथम रूस के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण शासकों में से एक थे। उन्होंने 1801 से 1825 तक रूस के साम्राज्य पर शासन किया। उनका काल नेपोलियन के युद्धों, यूरोपीय राजनीति में रूस के उभार और आंतरिक प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना जाता है।

नेपोलियन रणनीतिक लक्ष्य हासिल करने में माहिर था और इससे एक समस्या खड़ी हो गई। उस समय तक रूस हमेशा ऑस्ट्रिया और पर्शिया जैसे देशों के गठबंधन का हिस्सा रहा था, लेकिन अब वो नेपोलियन के शासन के अधीन थे इसलिए मदद करने में असमर्थ थे। वो जानते थे कि नेपोलियन महान सेनापति है। उसके पास कहीं ज्यादा सैनिक होंगे। ऐसी स्थिति में कोई भी रूसी सेना पर दांव नहीं लगाता। रूस भी ये जानता था। ऐसे में उसे ही कुछ अलग तरह की योजना बनाने की जरूरत थी। 

किसने बनाई जीत की योजना?

आखिरकार अप्रैल 1812 तक योजना तैयार भी हो गई। दिलचस्प बात यह है कि इसे एक ऐसे व्यक्ति ने तैयार किया था, जिसे आज के रूस में बहुत कम लोग जानते हैं। उनका नाम था- लेफ्टिनेंट कर्नल प्योत्र चुइकेविच। वह युद्ध मंत्रालय के ‘स्पेशल ऑफिस’ में काम करते थे। यह एक ऐसा गुप्त विभाग था जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता था। असल में, यह रूस की पहली आधिकारिक खुफिया जानकारी जुटाने वाली एजेंसी थी। 

‘स्पेशल ऑफिस’ वॉर मिनिस्टर माइकल बार्कले डी टोली के पसंदीदा प्रोजेक्ट्स में से एक था। बार्कले एक रूसी राजकुमार और बाल्टिक जर्मन-स्कॉटिश मूल के सैनिक थे। वह एक शानदार और सफल कमांडर थे। बार्कले की काबिलियत हालांकि उन क्षेत्रों में थी, जिनसे आमतौर पर सैन्य गौरव नहीं मिलता। वो सप्लाई चेन को मैनेज करने, लॉजिस्टिक्स और खुफिया जानकारी जुटाने में माहिर थे। चुइकेविच ‘स्पेशल ऑफिस’ में उनके द्वारा नियुक्त किए गए लोगों में से एक थे। 

प्योत्र एंड्रीविच चुइकेविच(बायें); मिखाइल बार्कले डी टॉली (दायें)RT

क्या था फ्रांसीसी सेना को हराने का प्लान?

फ्रांसीसी सेना के स्ट्रक्चर और नेपोलियन की पसंदीदा रणनीति की बारीकी से स्टडी करने के बाद, लेफ्टिनेंट कर्नल चुयकेविच ने युद्ध की योजना तैयार की और उसे बार्कले को सौंपा। 

  • चुयकेविच ने सुझाव दिया कि आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि फ्रांसीसी सेना को अपनी ताकत का फायदा उठाने ही न दिया जाए। 

  • उन्होंने सुझाव दिया कि रूसी सैनिकों की जान बचाने के लिए उन्हें आमने-सामने की बड़ी लड़ाई से बचाया जाए और पीछे हटते हुए गुरिल्ला युद्ध किया जाए। 

  • नेपोलियन की सेना के पिछले हिस्से पर वार करके रसद सप्लाई को रोका जाए, जिससे सेना को जरूरत का सामान न मिल सके। 

  • नेपोलियन की सेना को युद्ध में थकाकर कमजोर कर दिया जाए ताकि उन पर हमला करके विजयी बढ़त हासिल की जा सके।

प्लान अच्छा था। फ्रेंच सेना ताकतवर थी, लेकिन उसके पास रसद सामग्री पाने के सिर्फ दो ही रास्ते थे। या तो पश्चिमी यूरोप से सामान मंगवाया जाए, या फिर लूट-पाट करके और आस-पास के इलाकों से सामान इकट्ठा किया जाए। जाहिर है, पश्चिम से सामान मंगवाना भरोसेमंद उपाय नहीं था। वजह थी कि काफिलों को बहुत लंबी दूरी तय करनी पड़ती और रूस की सड़कों की हालत खराब थी। ऐसे में वक्त ज्यादा लगता और लूटपाट का भी खतरा था। ऐसे में दूसरे उपाय पर भरोसा किया गया। फ्रेंच सेना ने स्थानीय स्तर पर ही सामान इकट्ठा करने का विकल्प चुना। रूसियों ने उनकी इसी कमजोरी का फायदा उठाया।

रूसी टुकड़ियों का गुरिल्ला ऑपरेशन

रूस में आबादी का घनत्व यूरोप के दूसरे हिस्सों की तुलना में बहुत कम है। ऐसे में नेपोलियन की टुकड़ियों को सामान इकट्ठा करने के लिए काफी दूर-दूर तक जाना पड़ता था। रूसी उन्हें निशाना बनाने लगे। वो गुरिल्ला ऑपरेशन (छापामार हमले) करने में माहिर थे। वो दो तरह से हमले करने लगे। फ्रांसीसी सेना की मुख्य लाइन के पीछे रूसी सेना की नियमित टुकड़ियां एक्टिव कर दी गईं। इनकी कमान अधिकारी संभालते थे। उनके पास सैनिक और अक्सर हल्की तोपें भी होती थीं। ये टुकड़ियां फ्रांसीसी सेना के लिए खाना-पीना जुटाने वालों को खत्म करती थीं और संदेश ले जाने वालों को रोकती थीं।

फ्रांसीसियों को ऐसी टुकड़ियों का भी सामना करना पड़ता था जिनमें किसान शामिल थे। ये किसान लूटपाट करने वाले फौजियों को गांवों में घुसने से रोकते थे। ऐसी टुकड़ियों की कमान अक्सर स्थानीय जमींदारों के हाथ में होती थी, जो आमतौर पर सेना से रिटायर्ड अधिकारी होते थे और उन्हें सैन्य संगठन की बुनियादी जानकारी होती थी। वे ऐसे किसानों को भर्ती करते थे जिन्हें हथियार चलाने और खुले में रहने का अनुभव हो- जैसे शिकारी, जानवरों को हांकने वाले, वन-रक्षक वगैरह। 

हथियारबंद किसान और सेना की रणनीति

जाहिर है, हथियारबंद किसान नेपोलियन की फ्रांसीसी सेना का ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे, लेकिन उनका काम बस नियमित गुरिल्ला सेना को खबर देना होता था। वो चर्च की घंटियों का इस्तेमाल करके एक-दूसरे से संपर्क करते थे। अगर छापामार दुश्मन को रोकने में नाकाम रहते, तो नियमित सेना मदद के लिए आ जाती थी। यह व्यवस्था पूरी तरह सही तो नहीं थी, लेकिन अधिकतर समय काम कर जाती थी।

इस रणनीति में मुख्य सेना की एक खास भूमिका थी। उन्हें नेपोलियन की मुख्य सेना की नजरों के सामने रहना था ताकि वो इधर उधर न भटके और एक ही जगह पर सीमित रहे। रूसी सेना ने यह तरीका इसलिए भी अपनाया क्योंकि सामने रूसी सेना को देखकर फ्रांसीसी सेना न तो आराम कर सकती थी और न ही कहीं और जा सकती थी। इससे उन्हें थकाना आसान हो गया। 

इस रणनीति का असर ये हुआ कि फ्रांसीसी सेना न तो सही से हमला कर पा रही थीं, न ही उन्हें पर्याप्त भोजन मिल पा रहा था। सैनिक भुखमरी का शिकार होने लगे थे। वो अपने कम्युनिकेशन सिस्टम की सुरक्षा के लिए पर्याप्त सैनिक भी नहीं भेज पा रहे थे। नेपोलियन को मुख्य रूसी सेना का सामना करने में सक्षम एक सेना की जरूरत थी। 

रूसी सेना ने एक और रणनीति अपनाई। वह लगातार पीछे हटती जा रही थी। इस तरह वह फ्रांसीसी सेना को उनके बेस से सैकड़ों किलोमीटर दूर ले आए। इसकी वजह से फ्रांसीसी कमांडरों को व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपने बेस पर भी बड़ी संख्या में सैनिकों को तैनात करना पड़ा। पश्चिम से आने वाली सप्लाई भी बंद हो चुकी थी।

रूसियों ने मॉस्को क्यों छोड़ दिया?

बोरोडिनो गांव के पास हुई लड़ाई का तरीका अलग था। रूस की तरफ से ये लड़ाई कमांडर-इन-चीफ मिखाइल कुतुजोव की अगुआई में लड़ी गई थी। कुतुजोव हालांकि एक राजनेता भी थे। उन्हें एहसास था कि बिना किसी बड़ी लड़ाई के मॉस्को छोड़ना ऐसी बात होगी जिसे रूसी समाज कभी माफ नहीं करेगा। वह लड़ाई के सैन्य से अधिक राजनीतिक कारण जानते थे। इसलिए जब लड़ाई के पहले दिन किसी भी पक्ष को निर्णायक जीत नहीं मिली, तो उन्होंने आगे बढ़ने के बजाय पीछे हटने और रूसी सेना को बचाने के लिए मॉस्को छोड़ने का फैसला किया। इस लड़ाई में थकी-हारी रूसी सेना की पूरी तरह हार हो सकती थी। 

मॉस्को में घुसकर नेपोलियन चूहेदानी में रखे पनीर के लालच में फंस गया। उसे पूरा शहर खाली मिला। रूस के सबसे बड़े शहर ने उसे कई सप्ताह तक फंसाए रखा। उस दौरान फ्रांसीसी सम्राट शांति के लिए बातचीत की कोशिश करता रहा, लेकिन नाकाम रहा। इस उलझन ने फ्रांसीसी सेना को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया। कुछ समय बाद फ्रांसीसी सेना पीछे हटने लगी। 

वासिली वीरेशचागिन द्वारा 'नेपोलियन नियर बोरोडिनो'RT© RT

घोड़ों को खाकर जिंदा रहे सैनिक

नेपोलियन के सैनिक जब घर लौटने के लिए लंबी यात्रा पर निकले, तो मौसम अच्छा था, लेकिन रूस की ‘भयानक रूसी सर्दी’ का सामना करना अभी बाकी था। सेना पहले ही भुखमरी का शिकार होने लगी थी। रसद सप्लाई न मिलने से उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा। जैसे-जैसे तापमान जमाव बिंदु से नीचे गिरा, सैनिक और घोड़े मरने लगे। जब कुछ नहीं मिला तो मांस के लिए सेना के घोड़ों को मारा जाने लगा। सैनिकों के पास घोड़े कम होने लगे। घोड़ों के न होने का मतलब था घुड़सवार सेना का न होना, जिससे फ्रांसीसी सेना रूस की घुड़सवार टुकड़ियों के सामने कमजोर पड़ने लगी।

फील्ड मार्शल कुतुजोव ने फ्रांसीसी सेना के पिछले हिस्से के खिलाफ नई टुकड़ियां भेजना जारी रखा, जो पीछे से सैनिकों को खत्म करती रही। आमने सामने की सीधी बड़ी लड़ाइयों से बचा जा सका। फ्रांसीसी सेना लाचार थी। हालात मुश्किल हो गए थे। वो आगे बढ़ती रही। उधर रूसी सैनिक भी भीषण ठंड से अछूते नहीं रहे। फ्रांसीसियों की तरह, कई रूसी सैनिक भी पीछे छूट गए या बीमार पड़ गए। हालांकि, रूसी सैनिक जहां ठीक होने तक आस-पास के गांवों में रुक सकते थे, लेकिन फ्रांसीसी सैनिकों को ये सहूलियत नहीं थी। अगर वो पीछे रुकते तो बंदी बना लिए जाते। इस डर से उन्हें तब तक आगे बढ़ते रहना पड़ता था, जब तक कि उनकी हालत और खराब न हो जाए। कमजोर पड़ने पर इन्फेक्शन का भी खतरा था।

भूख और कड़ाके की ठंड ने किया बेहाल

फील्ड मार्शल कुतुजोव ने अपने अफसरों को जो आदेश दिए, उनमें से एक आदेश सुनने में वीरतापूर्ण भले न लगे लेकिन बहुत व्यावहारिक था। रूसी सेना जान-बूझकर फ्रांसीसी सेना के खाने-पीने के भंडार को निशाना बना रही थी। ल्याखोवो गांव में छापामार सैनिकों के हाथों जनरल जीन-पियरे ऑगेरो की ब्रिगेड की हार हुई। यह हार असल में सप्लाई डिपो खोजने की मुहिम में एक बड़ा फायदा साबित हुई। फ्रांसीसी सेना ठंड से तो नहीं मरी, लेकिन भूख से बेहाल हो गई। 

वासिली वेरेशागिन की 'विथ वेपन - शॉट!'RT© RT

ये लड़ाइयां एकतरफा हमले जैसी साबित हुईं। रूसी सेना बिना आमने-सामने की बड़ी लड़ाई के अपने करीब से गुजरती फ्रांसीसी टुकड़ियों को तितर-बितर करने के लिए तोपखाने का इस्तेमाल कर रही थी। वैसे भी, फ्रांसीसी सेना अधिक मुकाबला नहीं कर सकती थी, क्योंकि उनके अधिकतर घोड़े सैनिकों का खाना बन चुके थे। उनकी तोपें पीछे छूट गई थीं। सेना के लिए घायल और बीमार सैनिक भी समस्या खड़ी कर रहे थे। या तो उन्हें मुश्किलों और इन्फेक्शन के रिस्क के बावजूद साथ घसीटा जाए, या फिर उन्हें रूसियों की दया पर छोड़ दिया जाए। 

कैदी सैनिकों को वोदका पिलाते थे रूसी

क्रास्नी के पास मार्शल मिशेल की सैन्य टुकड़ी के अधिकतर हिस्से नष्ट हो चुके थे। बचे हुए सैनिक रूसी ठिकानों की ओर यह पूछने के लिए चल पड़े कि वो कहां आत्मसमर्पण कर सकते हैं। उनसे बंदूकें ले ली गईं और उन्हें कैम्पफायर भेज दिया गया। वहां रूसी सैनिकों ने दुश्मन सैनिकों पर दया दिखाई। रूसी सैनिक कैदी बनाए गए फ्रांसीसियों को और अधिक तकलीफ नहीं देना चाहते थे। रूसी सैनिक खुद भी ठंड और बदहाली से जूझ रहे थे। लेकिन फिर भी वो अपने कैदियों को थोड़ी गर्माहट महसूस कराने के लिए वोदका देते थे। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है, लेकिन कई दिनों तक जीरो से भी कम तापमान में पैदल मार्च कर रहे सैनिकों के लिए यही सहारा था।

इस ‘घेराबंदी’ वाली रणनीति का एक अहम हिस्सा था डेन्यूब की छोटी सेना का ऑपरेशन, जिसे पावेल चिचागोव ने नेपोलियन की सेना के पीछे रहकर अंजाम दिया था। चिचागोव को मुख्य रूप से उस व्यक्ति के तौर पर याद किया जाता है जो जाल बंद करने में नाकाम रहा, जिससे बेरेजिना नदी के पास हुई लड़ाई में फ्रांसीसी सेना के बचे-खुचे सैनिकों को भागने का मौका मिल गया। हालांकि चिचागोव के ऑपरेशन का सबसे अहम हिस्सा वह था, जो उन्होंने बेरेजिना की लड़ाई के दौरान नहीं, बल्कि उससे पहले किया था। बेरेजिना में नेपोलियन को फंसाने की कोशिश करने से पहले, चिचागोव ने मिन्स्क पर कब्जा कर लिया था। ये फ्रांसीसियों का मुख्य सप्लाई डिपो था, जहां रोज बीस लाख सैनिकों के लिए राशन मौजूद थे। इस डिपो पर रूसी कब्जा होने से फ्रांसीसी सेना के बचे रहने की बची-खुची उम्मीद भी खत्म हो गई। 

एडोल्फ नॉरथेन की 'नेपोलियन का मॉस्को से पीछे हटना'RT© RT

यही वो समय था, जब बर्फ से ढके मैदानों और जंगलों से होते हुए पश्चिम की ओर बढ़ रही सेना कड़ाके की ठंड के कारण खत्म हो गई। ये मौसम ‘ग्रैंड आर्मी’  की बर्बादी की आखिरी वजह साबित हुआ। इसने उस सेना को पूरी तरह खत्म कर दिया, जो पहले ही बुरी तरह हार चुकी थी। रूस के लिए 1812 का साल न सिर्फ एक बड़ी सैन्य जीत का प्रतीक था, बल्कि यह ताकत के दम पर की जाने वाली कार्रवाई के मुकाबले समझदारी और संयम की जीत भी थी। 

(लेखक येवगेनी नोरिन रूसी पत्रकार और इतिहासकार हैं, जो पूर्व सोवियत संघ में युद्ध और संघर्ष मामलों के जानकार हैं।) 

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