
वो शख्स कुछ अलग था। दिल में क्रांति की आग थी। जज्बा था अपने मुल्क को पूर्व उपनिवेश की बेड़ियों से आजाद करने का, कर्ज के जंजाल से निकालने का, आर्थिक आजादी दिलाने का, सामाजिक-लोकतांत्रिक विकास की राह पर आगे बढ़ाने का। अपने देश में ‘तीसरे दर्जे’ का ये शख्स महज 37 साल की उम्र में राष्ट्रपति बना और 4 साल के शासन में ऐसे क्रांतिकारी काम किए, जिसने इतिहास में नाम अमर कर दिया। लेकिन देश को तरक्की की राह पर ले जाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। वह पश्चिम की आंख में खटकने लगे। फ्रांसीसी सेना की मदद से तख्तापलट हुआ और उन्हें गोली मार दी गई। गोली भी उसी दोस्त ने मारी, जिसने राष्ट्रपति की कुर्सी तक पहुंचाया था। ये कहानी है- कम्युनिस्ट क्रांतिकारी थॉमस इसिडोर नोएल संकारा की, जिन्हें लोग ‘अफ्रीका का चे ग्वेरा’ भी कहते हैं।
कहानी ‘ईमानदार लोगों की धरती’ की
थॉमस इसिडोर नोएल संकारा 4 अगस्त 1983 को सत्ता में आए थे। आते ही उन्होंने सबसे पहले अपने देश का नाम बदला, जो फ्रांसीसी उपनिवेश की निशानी थी। देश का नाम था- फ्रेंच अपर वोल्टा। संकारा ने उसे बदलकर बुर्किना फासो (Burkina Faso) कर दिया। स्थानीय भाषा में इसका मतलब होता है- ईमानदार लोगों की धरती।
संकारा का जन्म 1949 में एक कैथोलिक परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता की दसवीं संतान थे। पिता फ्रेंच सेना में थे और देश के सबसे बड़े जातीय समूह ‘मोसी’ लोगों के प्रतिनिधि थे। मां ‘फुला’ समुदाय से थीं। मिली-जुली वंशावली की वजह से संकारा को ‘तीसरे दर्जे” का व्यक्ति माना जाता था।

बनना था पादरी, बन गए फौजी
जवानी के दिनों में उन्हें पादरी बनने के लिए प्रोत्साहित किया गया, लेकिन उन्होंने इसके बजाय सेना में करियर चुना। उन्होंने अपर वोल्टा की मिलिट्री अकादमी में दाखिला लिया। 1970 में मेडागास्कर में पढ़ाई की और अफसर बनकर निकले। मेडागास्कर में कार्ल मार्क्स और व्लादिमीर लेनिन के विचारों से परिचय हुआ। उन्होंने राजनीति विज्ञान और राजनीतिक अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातें सीखीं। मन में क्रांतिकारी विचार पनपने लगे।
जब संकारा मेडागास्कर में थे, उसी दौरान वहां के तानाशाह नेता फिलिबर्ट सिरानना को सत्ता से हटा दिया गया। सिरानना के फ्रांस से करीबी संबंध थे और वह पश्चिमी देशों के साथ भी रिश्ते मजबूत करना चाहते थे। सिरानना को हटाए जाने की घटना ने युवा संकारा को अपने देश में भी सत्ता बदलने के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया।
क्रांतिकारियों ने दिया बढ़ावा
दो साल बाद अपर वोल्टा लौटे तो संकारा को अपनी सैन्य कुशलता आजमाने का मौका मिला। वे पैराशूटर्स की यूनिट में शामिल हो गए। 1974 में जब माली ने अपर वोल्टा के उत्तर-पूर्व में मौजूद संसाधनों से भरपूर जमीन पर अपना दावा पेश किया तो माली के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

इसके बाद संकारा मोरक्को पहुंचे। वहां उनकी मुलाकात ब्लेज कॉम्पोर, हेनरी जोंगो और जीन-बैप्टिस्ट बौकारी लिंगानी जैसे लोगों से मिले। इन्हीं लोगों ने बाद में राष्ट्रपति बनने में संकारा की मदद की। क्रांतिकारी आदर्शों से प्रेरित होकर इन युवा अफसरों ने ‘कम्युनिस्ट ऑफिसर्स ग्रुप’ नाम का संगठन बनाया।
पहले मंत्री, फिर प्रधानमंत्री बने
1981 में संकारा बुर्किनाबे नेता साये जर्बो की सरकार में सूचना राज्य मंत्री बने, जो एक साल पहले तख्तापलट के बाद सत्ता में आए थे। हालांकि सिर्फ एक साल बाद ही संकारा ने अपनी मर्जी से यह पद छोड़ दिया। उन्होंने विपक्ष की आवाज को दबाने और ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध लगाने के सरकार के फैसले का विरोध किया।
इस्तीफा देते समय संकारा ने नारा दिया- ‘जो लोगों की आवाज दबाते हैं, उनका बुरा हो!’ उन्होंने लोगों के प्रति सरकार के बर्ताव की कड़ी आलोचना की।
1983 की शुरुआत में संकारा सरकार में वापस आए। इस बार प्रधानमंत्री बनकर। इसके बाद नई दिल्ली में आयोजित गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में हिस्सा लिया। भारत में रहने के दौरान संकारा क्यूबा और मोजाम्बिक के मशहूर क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो और समोरा माचेल से मिले।
विद्रोही विचारों से छिन गई कुर्सी
संकारा की लोकप्रियता बढ़ती गई। उनके प्रभावशाली भाषणों और साम्राज्यवाद व औपनिवेशिक निर्भरता की आलोचना को ओआगाडौगौ (Ouagadougou - बुर्किना फासो की राजधानी) में विपक्ष का भी समर्थन मिला। हालांकि उनकी सोच सरकार के आधिकारिक रुख के उलट थी। उनके सुधारवादी और क्रांतिकारी विचार ऐसे थे कि वह ज्यादा समय प्रधानमंत्री नहीं रह पाए। राष्ट्रपति ने महज छह महीने से भी कम समय में संकारा को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया।
संकारा को हटाने में फ्रांसीसी राष्ट्रपति के अफ्रीकी मामलों के सलाहकार जीन-क्रिस्टोफ मिटरैंड की बड़ी भूमिका रही। उन्होंने युवा प्रधानमंत्री के विचारों की आलोचना की। साथ ही, धमकी दी कि यदि वे इसी राजनीतिक रास्ते पर चलते रहे तो देश पर प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे। संकारा को न सिर्फ पद से हटाया गया, बल्कि नजरबंद भी कर दिया गया। इससे बड़े पैमाने पर लोगों और युवा सैनिकों में नाराजगी फैल गई।

तख्तापलट करके बने राष्ट्रपति
लोगों की नाराजगी जब बड़े विरोध-प्रदर्शन में बदल गई तो राष्ट्रपति जीन बैप्टिस्ट ओएड्रोगो को संकारा को रिहा करने के लिए मजबूर होना पड़ा। संकारा के राजनीतिक अनुभव ने उन्हें इस बात का यकीन दिला दिया कि उस सरकार में समाजवादी विचारों को लागू नहीं किया जा सकता था। अपर वोल्टा के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश में, जून 1983 में उन्होंने कम्युनिस्ट ऑफिसर्स ग्रुप के साथियों के साथ मिलकर तख्तापलट की तैयारी शुरू कर दी।
4 अगस्त 1983 को संकारा के फौजी साथी ब्लेज कॉम्पोर की अगुआई में राजधानी पर कब्जा कर लिया गया। उन्होंने घोषणा की कि देश का शासन अब ‘नेशनल काउंसिल फॉर द रेवोल्यूशन’ (CNR) चलाएगी, जिसके प्रमुख संकारा होंगे। पांच दिन बाद सेना ने तख्तापलट की कोशिश की, जिसे CNR ने दबा दिया। एक नई सरकार बनी, जिसमें राष्ट्रीय कम्युनिस्ट संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे। संकारा को राष्ट्रपति बनाया गया।
देश को दिया नया नाम, नया झंडा
संकारा का लक्ष्य देश का सिस्टम बदलना था। समाजवादी समाज कायम करना और देश को आर्थिक स्वतंत्रता दिलाना नई सरकार की मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल था। औपनिवेशिक अतीत से नाता तोड़ने के लिए, राष्ट्रपति संकारा ने अगस्त 1984 में देश का नाम बदल दिया। ‘अपर वोल्टा’ का नाम बदलकर ‘बुर्किना फासो’ कर दिया गया। स्थानीय मूरे और ड्युला भाषाओं में इसका अर्थ होता है- ‘ईमानदार लोगों का देश’।
नई समाजवादी सरकार ने देश के प्रतीक-चिह्न भी बदल दिए। झंडे पर लाल रंग क्रांतिकारियों के बहाए गए खून और बुर्किना फासो के लोगों के बलिदानों का प्रतीक था। हरा रंग कृषि संपदा की प्रचुरता को दर्शाता था। पीला-हरा तारा क्रांति की मार्गदर्शक विचारधारा को दिखाता था।

पश्चिम की मदद लेने से इनकार
4 अक्टूबर 1984 को संकारा ने न्यूयॉर्क में UN जनरल असेंबली के 39वें सेशन में भाषण दिया। विषय था- “आजादी सिर्फ़ संघर्ष से ही मिल सकती है।” उन्होंने ऐलान किया कि बुर्किना फासो अब पश्चिमी या पूर्वी गुटों का सहयोगी नहीं बनेगा। उनका देश अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अन्य विकासशील देशों के साथ साझेदारी विकसित करेगा। उन्होंने इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF), वर्ल्ड बैंक और फ्रांस से आर्थिक मदद लेने से इनकार कर दिया और विदेशी दखल के बिना आर्थिक सुधारों पर भी बात की।
बड़े पैमाने पर सुधार कार्यक्रम चलाए
बुर्किना फासो की बड़ी आबादी गरीब थी। राष्ट्रपति संकारा ने गरीबों के लिए बड़े पैमाने पर सुधार शुरू किए। इन उपायों में अर्थव्यवस्था, शिक्षा और महिलाओं व बच्चों के अधिकार जैसे सार्वजनिक जीवन के सभी पहलू शामिल थे। समाजवादी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए नई कार्यकारी संस्थाएं और ‘क्रांति की रक्षा के लिए समितियां’ बनाई गईं। युवाओं का एक संगठन ‘क्रांति के अग्रदूत’ भी बनाया गया।
संकारा ऐसी अर्थव्यवस्था बनाना चाहते थे जो विदेशी आयात पर निर्भर न हो। इस लक्ष्य को पाने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी था। बुर्किना फासो की सूखी जलवायु में भोजन की कमी को रोकने के लिए संकारा ने कृषि क्षेत्र पर फोकस किया। औद्योगीकरण के बजाय कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने पर जोर दिया, क्योंकि उनके लिए औद्योगीकरण का मतलब साम्राज्यवाद था।
संकारा ने किसानों की मदद के लिए कई उपाय किए, जैसे कि कृषि सुधार और नई कीमत व टैक्स नीतियां। कृषि सुधार में जमीन का दोबारा बंटवारा, जमीन की फीस में कमी और नई सहकारी समितियां शामिल थीं। अनाज वितरण के लिए सरकारी प्रोग्राम भी शुरू किया। फूड प्रोडक्ट की प्राइवेट बिक्री को सीमित कर दिया। इन उपायों से पड़ोसी देश आइवरी कोस्ट से सामान मंगाने पर निर्भरता कम हुई।
बराबरी का हक, भ्रष्टाचार पर वार
संकारा सरकार की सामाजिक नीति में झुग्गी-बस्तियों की जगह पब्लिक हाउसिंग बनाना, किराया घटाना और साक्षरता अभियान चलाना शामिल था। उन्होंने हेल्थ सर्विस सिस्टम का भी विस्तार किया। 25 लाख से अधिक बच्चों का वैक्सीनेशन शुरू किया गया, जिससे बाल मृत्यु दर कम हुई। गांवों तक मेडिकल सुविधाएं पहुंचाई गईं।
संकारा के शासनकाल में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए। महिलाओं का खतना, जबरन शादी और बहुविवाह जैसी कुरीतियों पर रोक लगा दी गई। देश के इतिहास में पहली बार, महिलाओं को उच्च सरकारी पदों पर नियुक्त किया गया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई ‘नेशनल काउंसिल फॉर द रेवोल्यूशन’ (CNR) की एक अहम नीति थी। हर अधिकारी को अपनी आय की जानकारी देना अनिवार्य था। एक रेडियो शो भी था जहां लोग भ्रष्टाचार की जानकारी दे सकते थे। इन सुधारों से बुर्किना फासो अपने इतिहास में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति GDP ग्रोथ हासिल कर पाया।
फ्रांस और पड़ोसी देशों में चिंता फैली
सीएनआर को हालांकि सभी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को हल करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया। बुर्किना फासो के सफल सामाजिक सुधारों और विदेशी मदद लेने से साफ इनकार ने फ्रांस और उस पर निर्भर पड़ोसी अफ्रीकी देशों में चिंता पैदा कर दी। 1986 में, फ्रांसीसी सरकार की पहल पर आइवरी कोस्ट के यामौसौक्रो शहर में एक सम्मेलन हुआ। इस बैठक में पड़ोसी देशों के नेताओं ने मांग की कि संकारा को अपनी सुधारवादी गतिविधियां बंद कर देनी चाहिए।

तख्तापलट… और मार दी गोली
15 अक्टूबर 1987 को, 37 साल की उम्र में संकारा को उन्हीं के सबसे करीबी दोस्त ने धोखा दिया। वही ब्लेज कॉम्पोर, जिसने संकारा को राष्ट्रपति बनने में मदद की थी। उसी की अगुआई में संकारा का तख्तापलट कर दिया गया। न सिर्फ तख्तापलट हुआ बल्कि संकारा को गोली भी मार दी गई। एक समाजवादी राष्ट्रपति को सत्ता से हटाने की वजह यह बताई गई कि उनकी नीतियों ने आइवरी कोस्ट और फ्रांस के साथ संबंधों को खतरे में डाल दिया था।
रशियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के इंस्टीट्यूट फॉर अफ्रीकन स्टडीज में सेंटर फॉर ट्रॉपिकल अफ्रीकन स्टडीज के प्रमुख रिसर्चर वासिली फिलिपोव ने एक लेख लिखा था- “फ्रांस्वा मितरां की अफ्रीकी नीति”। इसमें उन्होंने संकारा की हत्या को ‘जीन-क्रिस्टोफ मितरां की सबसे गंदी चालों में से एक’ बताया।
कई इतिहासकार दावा करते हैं कि संकारा के सुधारों को “फ्रांस की निगरानी और सीधी भागीदारी” में खत्म कर दिया गया। पेरिस ने संकारा सरकार के तख्तापलट को “लोकतंत्र की प्रक्रिया” माना और कॉम्पोर के शासन को मान्यता दी। बाद में कॉम्पोर पश्चिम अफ्रीका में “फ्रांस के सबसे करीबी दोस्त” की तरह उभरे।
आजादी मिलने के बाद से अपर वोल्टा में कई विद्रोह हुए, लेकिन संकारा ही एकमात्र ऐसे नेता थे जिनकी तख्तापलट के बाद हत्या कर दी गई। संकारा के उलट, देश के पिछले नेताओं ने रूढ़िवादी नीतियां अपनाईं। लोगों की परेशानियों से मुंह फेरकर उन्होंने पूर्व औपनिवेशिक शासकों से मजबूत संबंध बनाए रखे।
फ्रांस के दस्तावेजों से खुला राज
2015 में थॉमस संकारा की पत्नी मरियम ने उनकी हत्या का मामला उठाया और फ्रांस पर हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया। सरकार से संकारा के राष्ट्रपति कार्यकाल और 1987 की घटनाओं से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग की गई। दो साल बाद, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने जानकारी सार्वजनिक करने का वादा किया और तीन आर्काइव बुर्किना फासो को सौंपे।
फ्रांस के सौंपे इन डॉक्यूमेट्स में 16 अक्टूबर 1987 का एक प्रोटोकॉल भी था, जिसे अप्रैल 2021 में फ्रांसीसी अख़बार ‘ल’ह्यूमैनिटे’ (L’Humanité) ने पब्लिश किया था। इससे इस बात की पुष्टि हुई कि संकारा की हत्या की साजिश रचने और उसे अंजाम देने में फ्रांसीसी सेना शामिल थी। साल 2021 के आखिर में, बुर्किना फासो की सरकार ने संकारा की हत्या के मामले में मुकदमा चलाया। 27 साल तक सत्ता में रहे कॉम्पोर को 2022 में संकारा की हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई।
साल 2022 में सैन्य अधिकारी इब्राहिम ट्राओरे बुर्किना फासो की सत्ता में आए। नई मंत्रिपरिषद ने संकारा को आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय नायक घोषित किया। साथ ही, 15 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्मृति दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया। संकारा के सम्मान में एक स्मारक भी बनाया गया है। संकारा बुर्किना फासो की क्रांति और न्याय के लिए संघर्ष का प्रतीक बन गए। उन्हें अक्सर ‘अफ्रीका का चे ग्वेरा’ और “सबसे ईमानदार राष्ट्रपति” कहा जाता है। मौत के 36 साल बाद भी वह बदलाव के लिए संघर्ष का प्रतीक बने हुए हैं।
(यह लेख डारिया सुखोवा ने लिखा है, जो इंटेक्सपर्टीज रिसर्च सेंटर में रिसर्च फेलो हैं। लेख को RT Hindi टीम ने एडिट किया है।)




