परमाणु हथियार भूल जाइए, ये है रूस के खौफ का नया नाम - Oreshnik
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुद ओरेशनिक मिसाइल की तारीफ करते हुए कहा था कि इस हथियार ने बेहद कम समय में, जंग के बीच अपनी काबिलियत साबित की है।
परमाणु हथियार भूल जाइए, ये है रूस के खौफ का नया नाम - Oreshnik
ओरेशनिक मिसाइल: रूस का 'ब्रह्मास्त्र'© RT Hindi

करीब दो साल पहले की बात है... तारीख थी 21 नवंबर 2024… सूरज एक नई सुबह के साथ उगने को तैयार था कि तभी यूरोप की चौथी सबसे लंबी नीपर नदी के ऊपर आसमान में तेज और रहस्यमयी रोशनी चमकी। ये न कोई टूटता तारा था, न ही कोई ड्रोन, तो फिर ये था क्या? जब तक कोई कुछ समझ पाता, एक जोरदार धमाका हुआ। निशाने पर थी दक्षिण-पूर्वी यूक्रेन में ‘युजमाश’ नाम की डिफेंस फैक्ट्री। हमला इतना भीषण था कि फैक्ट्री के परखच्चे उड़ गए। वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया। 

डिफेंस एक्सपर्ट भी चकरा गए कि ये कौन सा हथियार था, जिसने एक ही वार में यूक्रेन की इस सबसे बड़ी डिफेंस फैक्ट्री को नेस्तानाबूद कर दिया। तब खुद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इसका नाम बताया- ओरेशनिक (Oreshnik)। रूस की एक बिल्कुल नई बैलिस्टिक मिसाइल। रूस ने अपने हथियारों के पिटारे से ऐसी नायाब चीज निकाली थी, जिसने मानो युद्ध के नियम बदलने की वकालत कर दी। यह परमाणु हमले की दहलीज को पार किए बिना, उसी की तरह खौफ पैदा करने में सक्षम है। आज कहानी रूस की इसी घातक मिसाइल ओरेशनिक की। 

5500 KM दूर तक मार, आवाज से 10 गुना तेज रफ्तार  

यह किसी से छिपा नहीं है कि रूस हथियारों और सैन्य ताकतों के मामलों में दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में है। ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग 2026 में रूस को दुनिया की दूसरी सबसे मजबूत सैन्य शक्ति माना गया है। ओरेशेनिक मिसाइल इसी ताकत की एक नई मिसाल है। 

ओरेशनिक मिसाइल की खूबियां

ओरेशनिक के काम का अनोखा तरीका 

जिस मिसाइल ने यूक्रेन के निप्रो यानी निप्रॉपेट्रोस में युजमाश फैक्ट्री पर 2 साल पहले हमला किया था, उसकी चौंकाने वाली बात ये थी कि उसने अपने पीछे न तो झुलसी हुई जमीन छोड़ी, न ही चारों तरफ बिखरा मलबा। एक्सपर्ट्स ने जब सैटेलाइट तस्वीरें देखीं तो दिखा कि धरती की सतह पर तो नुकसान का दायरा बहुत छोटा था, लेकिन जमीन के नीचे का पूरा ढांचा ढह चुका था। तबाही का ये तरीका उन्हें हैरान करने वाला था।

इस अनोखे तरीके से संकेत मिला कि यह मिसाइल की कोई नई तकनीक है। सामने आए डेटा और मिलिट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ओरेशनिक मिसाइल अपने साथ ‘क्लस्टर टाइप पेनिट्रेटिव वॉरहेड’ (जमीन को चीरने वाले कई छोटे बम) लेकर चलती है। इसमें भारी और बेहद मजबूत धातुओं से बने कई छोटे-छोटे हथियार होते हैं। ये मिसाइल हवा में या जमीन की सतह पर नहीं फटती, बल्कि इसका मुख्य हिस्सा पहले धरती की गहराई में अपने टारगेट तक पहुंचता है, और फिर धमाका होता है। यह खास डिजाइन दुश्मन की सेना के मजबूत अंडरग्राउंड बंकरों और ठिकानों को तबाह करने के लिए बनाया गया है।

ओरेशनिक मिसाइल की तस्वीर© RT Hindi

4 हजार डिग्री की गर्मी झेल सकती है

राष्ट्रपति पुतिन ने खुद बताया था कि ओरेशनिक के वॉरहेड्स वायुमंडल में फिर से दाखिल होते समय 4,000 डिग्री का भयानक तापमान झेल सकते हैं। 

समझिए, ये कितनी मजबूत

  • एक आम इंसान के लिए 50 डिग्री से ज्यादा की गर्मी झेलना मुश्किल होता है 
  • 100 डिग्री सेल्सियस तापमान पर पानी उबलने लग जाता है
  • शुद्ध लोहा भी करीब 1500 डिग्री पर पिघलने लगता है
  • ओरेशनिक मिसाइल के वॉरहेड्स 4 हजार डिग्री टेंपरेचर झेल जाते हैं। 

ये मिसाइल क्यों है इतनी खास? 

इतनी गर्मी को झेलते हुए अपनी रफ्तार पर स्थिर रहने के लिए इस मिसाइल के हथियारों पर एडवांस कंपोजिट मटेरियल्स की परत चढ़ाई जाती है। इसमें हाइपरसोनिक विमानों में गर्मी सहन करने के लिए प्रयोग होने वाले ceramics और कार्बन-कार्बन स्ट्रक्चर्स जैसी नई तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। 

इस मिसाइल की एक बड़ी खासियत यह भी है कि उड़ान के आखिरी समय में भी यह अपनी हाइपरसोनिक रफ्तार बनाए रखती है। पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें नीचे आते समय धीमी हो जाती हैं, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक ओरेशनिक घने वायुमंडल में भी Mach 10-11 (ध्वनि की रफ्तार से 10-11 गुना तेज) रफ्तार बनाए रखती है। इतनी तेज रफ्तार के कारण इससे पैदा होने वाली गतिज ऊर्जा (kinetic energy) इतनी भयंकर होती है कि यह बिना किसी बारूदी धमाके के भी जमीन को चीरते हुए अंदर तक पहुंचकर भारी तबाही मचा सकती है। 

ऐसे हमले धरती की गहराई में बने कमांड बंकरों, रडार स्टेशनों या मिसाइल ठिकानों को तबाह करने के मकसद से किए जाते हैं। इस हथियार की ताकत इस बात पर निर्भर नहीं करती कि धमाके का असर कितनी दूर तक होगा, बल्कि इस बात पर करती है कि यह कितनी सटीक और कितनी प्रचंड ऊर्जा के साथ अपने टारगेट से टकराती है। यही वजह है कि इस मिसाइल को समय रहते न तो पकड़ा जा सकता है और न ही बीच रास्ते में रोका जा सकता है।

ओरेशनिक के पीछे किसकी सोच?

भले ही ओरेशनिक मिसाइल 2024 में अचानक दुनिया के सामने आई, लेकिन इसकी तकनीकी जड़ें दशकों पुरानी हैं। इसकी बनावट, इसे बनाने के पीछे की सोच और यहां तक कि इसका नाम भी एक ऐसी संस्था से जुड़ा है, जिसने रूस के मिसाइल इतिहास को गढ़ा है। नाम है- मॉस्को इंस्टीट्यूट ऑफ थर्मल टेक्नोलॉजी (MITT)।  कोल्ड वॉर (शीत युद्ध) के दौरान एडवांस सॉलिड फ्यूल वाले मिसाइल सिस्टम बनाने के लिए MITT की स्थापना की गई थी। यह संस्था लंबे समय से रूस के सबसे आधुनिक और चलते-फिरते रणनीतिक मिसाइल प्लेटफॉर्म्स बनाने के लिए जानी जाती रही है।

ओरेशनिक नाम कैसे पड़ा© RT Hindi

यूक्रेन पर जिस हमले को शुरू में सिर्फ एक बार किया गया एक्शन माना जा रहा था, वह अब बड़े पैमाने पर चलने वाले हथियार प्रोग्राम में बदल चुका है। जून 2025 में, रूस की टॉप मिलिट्री अकादमियों के ग्रेजुएट्स के साथ एक बैठक के दौरान, राष्ट्रपति पुतिन ने इस मिसाइल की तारीफ की थी।

putin on oreshnik
ओरेशनिक मिसाइल सिस्टम का बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू हो चुका है। इस हथियार ने बहुत ही कम समय में, युद्ध के हालात के बीच खुद को बेहद असरदार साबित किया है। - व्लादिमीर पुतिन, रूस के राष्ट्रपति

बेलारूस में तैनाती और सैन्य रणनीति

रूस का पड़ोसी देश बेलारूस लंबे समय से उसके मिसाइल सिस्टम्स के लिए भारी-भरकम ‘मोबाइल चेसिस’ (मिसाइल ले जाने वाले मजबूत वाहन) बनाता रहा है। ओरेशनिक के लिए इस्तेमाल होने वाली गाड़ी भी संभवतः इसमें शामिल है। ये आपसी तालमेल बेलारूस में मिसाइल तैनाती की शायद एक वजह है लेकिन मामला सिर्फ तकनीकी तालमेल तक सीमित नहीं है। बेलारूस में तैनात होने से ओरेशनिक मिसाइल पूरे मध्य और पश्चिमी यूरोप को अपनी जद में ले सकती है। वहीं नाटो (NATO) के लिए यह मिसाइल एक नए तरह का खतरा है।

ओरेशनिक मिसाइल की विनाशकारी क्षमता इसे राजनीतिक और रणनीतिक दबाव का एक अचूक हथियार बनाती है। यह असल में ‘गैर-परमाणु निवारक नीति’ का ही नया रूप है। मतलब, परमाणु हमले की लक्ष्मण रेखा को पार किए बिना, राजनीतिक या युद्ध के लक्ष्यों को ठीक उसी की तरह हासिल कर लेना। सैन्य रणनीति के नए दौर में, ओरेशनिक सिर्फ एक मिसाइल नहीं है, यह भविष्य के युद्ध का नया मॉडल है। 

(ये लेख मिलिट्री एनालिस्ट, इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट और डिफेंस रिसर्च बेवसाइट MilitaryRussia.ru के संस्थापक दिमित्री कॉर्नेव ने लिखा है, जिसे RT Hindi टीम ने ए़डिट किया है।)

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