हेग की वो अदालत जिसका फैसला हर देश नहीं मानता, अब सिंधु जल संधि पर कहने से क्या होगा?
अकेले भारत ही नहीं, बल्कि चीन, रूस समेत कई प्रभावशाली देश भी इस मध्यस्थता अदालत के फैसलों, अस्तित्व और अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठा चुके हैं।
दुनिया
हेग की वो अदालत जिसका फैसला हर देश नहीं मानता, अब सिंधु जल संधि पर कहने से क्या होगा?
भारत-पाकिस्तान सिंधु जल संधि विवाद

भारत-पाकिस्तान से जुड़े सिंधु जल संधि पर अवार्ड (आदेश) देने वाले नीदरलैंड के हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय आर्बिटरेशन कोर्ट (मध्यस्थता अदालत) को विवादित फैसले देने के लिए ही जाना जाता है। अकेले भारत ही नहीं, बल्कि चीन, रूस समेत कई दूसरे ताकतवर देश भी इस मध्यस्थता अदालत के फैसलों, अस्तित्व और अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठा चुके हैं। वैसे भी यह कोई स्थायी अदालत नहीं है। जब कोई देश किसी विवादित मामले को आर्बिटरेशन कोर्ट में ले जाता है तो यह अदालत एक अस्थायी ट्रिब्यूनल का गठन करती है। इसके बाद पैनल ऑफ आर्बिटरेटर्स सूची के जज इस मामले की सुनवाई करते हैं। अब इसने सिंधु जल संधि पर एकतरफा आदेश दिया है। 

ऐसे मामलों की सुनवाई करने के लिए कोई स्थायी जज भी नहीं होता। भारत ने साफ कर दिया है कि सिंधु जल संधि पर फैसला देने का इस अदालत के पास कोई कानूनी अधिकार ही नहीं है। इस अदालत के ट्रिब्यूनल को ही अवैध तरीके से गठित किया गया था। आइए जानते हैं कि सिंधु जल संधि समेत दुनिया के 5 बड़े विवादित फैसले कौन-से हैं, जिसे किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी और मध्यस्थता अदालत के आदेश को गैरकानूनी बताकर खारिज कर दिया।

पहले बात सिंधु जल संधि (2023-26) की

पाकिस्तान की अपील पर हेग की मध्यस्थता अदालत ने 31 अगस्त को सिंधु जल संधि पर कहा कि संधि को सस्पेंड करने या खत्म करने कि लिए भारत के कारण पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए इसे पूरी तरह लागू रहना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि भारत को संधि के दायित्यों का पालन करना चाहिए। भारत ने इस पर बहुत कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए सिंधु जल संधि बहाल करने के आर्बिटरेशन कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया। वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने एक पोस्ट में कहा कि “यह ट्रिब्यूनल अवैध तरीके से गठित किया गया था। इसमें संधि को बहाल करने वाले अंतरिम उपाय करने का आदेश देने समेत अन्य सभी फैसलों का कोई कानूनी महत्व नहीं है। सिंधु जल संधि पर संप्रभु फैसले पूरी तरह भारत के हाथ में हैं। संधि निलंबित ही रहेगी।”

कोट
भारत ने इस तथाकथित मध्यस्थता अदालत को कभी मान्यता नहीं दी इसलिए इसका फैसला भी अवैध है। वह भारत पर बाध्यकारी नहीं हो सकता। यह पाकिस्तान के एजेंडे पर पक्षपाती होकर काम कर रहा था मगर दुनिया इसकी हकीकत जान चुकी है इसीलिए भारत के अलावा रूस और चीन भी इसके कई फैसलों को खारिज कर चुके हैं।
अभिषेक श्रीवास्तव, असिस्टेंट प्रोफेसर, JNU
अभिषेक श्रीवास्तव, असिस्टेंट प्रोफेसर, JNU
विदेश मामलों के एक्सपर्ट

विदेश मंत्रालय ने कहा, "तथाकथित अदालत विश्व बैंक की ओर से निर्धारित संधि की शर्तों का खुला उल्लंघन करके बनाई गई थी। भारत इसके तथाकथित फैसले को पूरी तरह खारिज करता है, जैसा कि इस अवैध संस्था के पहले के सभी फैसलों को खारिज किया था। भारत ने कभी भी अवैध रूप से गठित इस तथाकथित मध्यस्थता अदालत के कानूनी अस्तित्व को मान्यता नहीं दी। भारत हमेशा से कहता रहा है कि इस तथाकथित मध्यस्थता संगठन का गठन ही सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है। इसलिए भारत कभी इस संस्था के सामने न तो पेश हुआ और न ही इसके फैसलों को कभी तवज्जो दी। भारत के संप्रभु फैसलों पर इस अदालत का कोई अधिकार नहीं है इसलिए इसके किसी भी फैसले का मौजूदा या भविष्य के किसी आदेश का भारत की परियोजनाओं और निर्णयों पर कोई असर नहीं होगा। सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला जारी रहेगा।"

2. फिलीपींस vs चीन का केस (2016)

फिलीपींस ने दक्षिण चीन सागर में चीन के अधिकार क्षेत्र के दावों को लेकर हेग की मध्यस्थता अदालत में एक केस दायर किया था। इसे चीन के “नाइन-डैश-लाइन” दावे के रूप में जाना जाता है। इसके तहत बीजिंग दक्षिण चीन सागर के करीब 90 फीसदी समुद्री क्षेत्र पर अपना दावा करता है। फिलिपींस की इस याचिका पर सुनवाई करने के बाद हेग की मध्यस्थता अदालत ने चीन की “नाइन-डैश-लाइन” को अवैध करार दिया। अदालत ने कई चट्टानों और रीफ्स को द्वीप का दर्जा देने से इनकार कर दिया और कहा कि इसे लेकर किए जा रहे चीन के ऐतिहासिक अधिकारों के दावे का कानूनी आधार नहीं है।

चीन ने क्या किया

चीन ने मध्यस्थता अदालत के फैसले को शून्य और अमान्य बताकर खारिज कर दिया। साथ ही कहा कि कोर्ट का यह फैसला उसके लिए महज एक कागज का टुकड़ा है। चीन ने तर्क देकर कहा कि किसी देश के क्षेत्रीय संप्रभुता के मामले में आदेश देने का अदालत के पास कोई अधिकार ही नहीं है। चीन ने न तो इस अदालती कार्यवाही में कभी भाग लिया और न ही उसके आदेश को कभी मान्यता दी। लिहाजा यह मामला आज भी विवादित है, जिसे लेकर कई देशों के साथ दक्षिण चीन सागर में चीन का जल सीमा विवाद कायम है।

3. यूकोस ऑयल कंपनी केस (2014)

यूकोस (Yukos) रूस की सबसे बड़ी प्राइवेट ऑयल कंपनी थी। इस कंपनी ने 2003-2006 की तत्कालीन सरकार पर जानबूझकर भारी-भरकम टैक्स लगाने का आरोप लगाया। आरोप था कि तत्कालीन सरकार ने इसके मालिक मिखाइल खोदोरकोव्स्की को जेल भेज दिया और कंपनी दिवालिया हो गई। इसकी ज्यादातर संपत्ति सरकारी कंपनी रोसनेफ्ट को मिल गई। यूक्रोस ने रूस फेडरेशन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत में केस दायर किया। इसे बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय विवाद के तौर पर देखा गया।

कोर्ट का फैसला

2014 में अदालत ने फैसले में रूसी सरकार को दोषी ठहराया और यूकोस के शेयर धारकों को 50 अरब अमेरिकी डॉलर के मुआवजे का आदेश दिया। ब्याज जोड़कर इस राशि को बाद में 65 अरब डॉलर कर दिया गया।

फिर रूस ने क्या किया?

रूस की सरकार ने मध्यस्थता अदालत के इस फैसले को राजनीतिक बताते हुए खारिज कर दिया। साथ ही इसे नीदरलैंड और यूरोपीय अदालतों में लंबे समय तक चुनौती दी। यह फैसला अब भी विवाद का कारण बना हुआ है। सरकार ने भुगतान करने से इनकार किया है।

4. क्रोएशिया vs स्लोवेनिया सीमा विवाद (2017)

यह क्रोएशिया और स्लोवेनिया के बीच का समुद्री सीमा विवाद है, जिसे लेकर क्रोएशिया ने मध्यस्थता अदालत का दरवाजा खटखटाया था। यह विवाद 1991 में युगोस्लाविया के विघटन के बाद शुरू हुआ था। दोनों देशों के बीच खासकर पिरान की खाड़ी और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र तक स्लोवेनिया की पहुंच को लेकर समुद्री सीमा विवाद था। 2009 में दोनों देशों ने आर्बिटरेशन कोर्ट में एक एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करके विवाद को भेजने पर सहमति दर्ज की थी।

कोर्ट का फैसला

जून 2017 में मध्यस्थता अदालत के ट्रिब्यूनल ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया और पिरान की खाड़ी का करीब 80 फीसदी हिस्सा स्लोवानिया को दे दिया। क्रोएशिया के हिस्से में महज 20 फीसदी क्षेत्र ही आ सका। वहीं स्लोवानिया को अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र तक पहुंच के लिए 2.5 मील चौड़ा और करीब 10 समुद्री मील लंबा एक विशेष गलियारा देने का फैसला भी किया गया। इस गलियारे से सभी जहाजों के स्वतंत्र आवागमन का अधिकार दिया गया।

क्रोएशिया का रुख

स्लोवेनिया ने तो फैसले को स्वीकार कर लिया, लेकिन क्रोएशिया ने मध्यस्थता अदालत के फैसले को मध्यस्थता प्रक्रिया में गड़बड़ी बताते हुए खारिज कर दिया। क्रोएशिया ने ट्रिब्यूनल के एक आर्बिटरेटर पर स्लोवेनिया के साथ संपर्क रखने का आरोप लगाया। क्रोएशिया ट्रिब्यूनल का फैसला आने से पहले ही 2015 में सुनवाई प्रक्रिया से बाहर निकल गया था। उसने आज तक मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के इस फैसले को मान्यता नहीं दी और विवाद जारी है।

5. आर्कटिक सनराइज केस (2015)

यह मामला रूस के आर्कटिक क्षेत्र में सितंबर 2013 में एक तेल प्लेटफॉर्म (प्रिराज्लोम्नाया) के खिलाफ नीदरलैंड के झंडे वाले ग्रीनपीस के जहाज द्वारा विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। रूसी अधिकारियों ने इस जहाज को सीज किया और उसमें सवार 30 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। नीदरलैंड ने इसे समुद्री कानून संधि का उल्लंघन बताते हुए मध्यस्थता अदालत में एक केस दायर किया। नीदरलैंड ने रूसी अफसरों पर बिना अनुमति एक विदेशी जहाज पर धावा बोलने, जहाज और चालक दलों को गिरफ्तार करने साथ ही किसी राष्ट्र के झंडे के अधिकारों का उल्लंघन करार दिया।

कोर्ट का फैसला

मध्यस्थता अदालत के ट्रिब्यूनल ने अगस्त 2015 में रूस के खिलाफ फैसला दिया। अदालत ने रूस को अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के उल्लंघन का दोषी ठहराया। साथ ही इससे जहाज और चालक दलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा देने का आदेश सुनाया। 2017 में इस मुआवजे की राशि 5.4 मिलियन यूरो यानी करीब 62 लाख 64 हजार अमेरिकी डॉलर तय की गई। जहाज को पहुंची क्षति का मुआवजा भी इसमें शामिल था।

रूस ने क्या कहा?

रूस ने इस मध्यस्थता सुनवाई में हिस्सा नहीं लिया और फैसले को मानने से साफ इनकार कर दिया। बाद में कुछ समझौते हुए, लेकिन रूस ने इसके कई पहलुओं को लेकर विरोध को जारी रखा और अदालत के ज्यादातर आदेशों को खारिज कर दिया।

फैसला और टाइमिंग सवालों के घेरे में

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय स्टडी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर और विदेश मामलों के एक्सपर्ट डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव ने आर्बिटरेशन कोर्ट के फैसले, टाइमिंग और वैधता तीनों को सवालों के कठघरे में खड़ा किया।


उन्होंने कहा कि पहली बात यह है कि भारत इस कोर्ट को मान्यता ही नहीं देता। इसलिए इसका कोई भी निर्णय देश पर बाध्यकारी नहीं है। दूसरा यह है कि पाकिस्तान ने बड़ी चालाकी से और साजिशन आतंकवाद से दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए यह सब किया था और उसकी साजिश में आर्बिटरेशन कोर्ट भी शामिल हो गया। क्योंकि यह फैसला ऐसे समय में आया, जब बिश्केक में एससीओ सम्मेलन हो रहा है और उसमें दुनिया के तमाम देश जुटे हैं। पाकिस्तान की कोशिश थी कि वह आतंकवाद पर दुनिया का ध्यान भटकाए, लेकिन वह एक्सपोज हो गया है। इस कोर्ट को हालांकि भारत मान्यता नहीं देता मगर इस फैसले और उसकी टाइमिंग के साथ इसकी वैधता पर भी सवाल है। उन्होंने इस फैसले को लेकर 10 अहम बातें बताई।

ये 10 बातें आपको जाननी चाहिए

  1. भारत इस अदालत के अस्तित्व को मान्यता नहीं देता, लिहाजा इसका कोई निर्णय बाध्यकारी नहीं है।
  2. कोई कोर्ट दोनों पक्षों को सुने बिना फैसला नहीं देता। एक पक्ष को सुनकर फैसला देना न्याय के बेसिक सिद्धांत के खिलाफ है।
  3. भारत का सिंधु के जल पर पूरा अधिकार है।
  4. अगर पाकिस्तान को पानी चाहिए तो उसे अपने चाल-चरित्र में बदलाव लाना होगा।
  5. वह खून भी बहाएंगे और पानी भी मांगेंगे तो ऐसे नहीं चलेगा। पीएम मोदी भी यह बात कह चुके हैं।
  6. पाकिस्तान आतंकवाद पर पक्षपाती है और मध्यस्थता अदालत भी सिंधु मामले पर बायस्ड साबित हुआ है।
  7. पाकिस्तान अपने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को पहले न्याय दिलवा ले फिर सिंधु जल की बात करे।
  8. दुनिया की कोई अदालत भारत के संप्रभु अधिकारों के खिलाफ फैसला नहीं दे सकती।
  9. भारत अपने राष्ट्रीय हित के खिलाफ किसी भी फैसले को मानने के लिए बाध्यकारी नहीं है।
  10. पाकिस्तान और मध्यस्थता ट्रिब्यूनल दोनों दुनिया के सामने एक्सपोज हो चुके हैं।

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