
किर्गिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का शिखर सम्मेलन...भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक मंच पर...भारत, चीन और रूस की तिकड़ी आखिर दुनिया को क्या संदेश दे रही है? विश्व के प्रमुख मंचों पर भारत के प्रति बढ़ता दुनिया का भरोसा। साथ ही ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका मध्य एशिया से यूरोप तक की जियोपॉलिटिक्स को किस तरह से बदल रही है? भारत, रूस और चीन की दोस्ती से कौन सबसे ज्यादा चिंतित है? ईरान-अमेरिका युद्ध, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक आर्थिक युद्ध व तनावों के बीच एससीओ शिखर सम्मेलन और उसके कुछ ही दिनों बाद 12, 13 सितंबर को दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन क्यों महत्वपूर्ण है और इसके मायने क्या हैं? आइये विशेषज्ञों से जानते हैं।
SCO और ब्रिक्स से कौन परेशान है?
एससीओ शंघाई देशों का एक बड़ा और मजबूत संगठन है। इसमें भारत, चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, पाकिस्तान और अब ईरान व बेलारूस जैसे देश इसके सदस्य हैं। अब यह 10 देशों का संगठन बन चुका है। इसमें अफगानिस्तान और मंगोलिया को भी शामिल करने पर विचार किया जा रहा है। भारत, रूस और चीन एससीओ की प्रमुख ताकते हैं। किर्गिस्तान से पहले सितंबर 2025 में चीन के तियानजिन में यह शिखर सम्मेलन हुआ था। उस दौरान भी पीएम मोदी, राष्ट्रपति पुतिन और शी जिनपिंग एक मंच पर जुटे थे। इन तीनों नेताओं की एक मंच पर मौजूदगी से पश्चिमी देश और अमेरिका सबसे अधिक चिंतित थे। इस बार यह सम्मेलन किर्गिस्तान में हो रहा है, जहां एक बार फिर मोदी, पुतिन और जिनपिंग की तिकड़ी ने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।
SCO के सदस्य देश
- भारत
- चीन
- रूस
- कजाकिस्तान
- किर्गिस्तान
- तजाकिस्तान
- उज्बेकिस्तान
- पाकिस्तान
- ईरान
- बेलारूस
एससीओ बैठक क्यों महत्वपूर्ण?
देश के जाने-माने रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा ने कहा कि SCO और BRICS दोनों भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण मंच है। किर्गिस्तान में एससीओ की यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब पश्चिम एशिया संकट के दौर से गुजर रहा है। 30 अगस्त को ईरान और अमेरिका के बीच एक-दूसरे पर हमले हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति पुतिन तीनों ही मजबूत नेता हैं। ऐसे में इन तीनों नेताओं का एक मंच पर आना खासकर पश्चिमी देशों के लिए बड़ा मैसेज है। एससीओ के बाद दिल्ली में ब्रिक्स समिट भी होना है। उसमें भी अगर तीनों नेता जुटते हैं तो इससे पश्चिमी देश और अमेरिका और भी ज्यादा चिंतित हो सकते हैं। भारत, चीन और रूस यूरेशिया की बड़ी ताकतें हैं। इन ताकतों का एक होना न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का आगाज है।
कमर आगा ने कहा कि यह बैठक ईरान-अमेरिका और रूस-यूक्रेन युद्ध के खात्मे के लिहाज से भी बहुत जरूरी है। इससे विकसित और विकासशील दोनों देशों को खासतौर पर ज्यादा नुकसान हो रहा है। एससीओ देशों को इस पर विचार करना चाहिए। इसके लिए संयुक्त प्रयास किए जाने चाहिए, क्योंकि रूस और ईरान दोनों ही सेंट्रल एशिया के बड़े ऑयल सप्लायर हैं। युद्ध जारी रहने से दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, जिसका फायदा तेल कंपनियों को होता है। इससे सबसे ज्यादा पश्चिम एशिया प्रभावित है। ग्लोबल इकोनॉमी पर इसका असर पड़ रहा है। इसलिए ईरान के साथ रूस-यूक्रेन युद्ध भी बंद होना चाहिए। जेलेंस्की और यूरोप पर दबाव पड़ना चाहिए। खासकर उन यूरोपीय देशों को जो हथियार सप्लाई कर रहे हैं। यह अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ है। युद्ध के बीच में हथियार सप्लाई नहीं किया जा सकता। इसलिए युद्ध बंद होने चाहिए। अगर ये दोनों युद्ध बंद हो जाते हैं तो पश्चिम एशिया में तेल की कीमतें कम हो सकती हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत को हो सकता है।
भारत को क्या फायदा?
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर और विदेश मामलों की एक्सपर्ट प्रो. राज यादव कहती हैं कि एससीओ ब्रिक्स जैसा ही एक अहम मंच है, जिसका भारत भी सदस्य है। इसमें ईरान भी है। रूस, ईरान के साथ भारत की अच्छी साझेदारी है और चीन के साथ भी हमारे रिश्ते सुधर रहे हैं। यह भारत के लिए सेंट्रल एशिया में रणनीतिक बढ़त है। यह एक अच्छी बैठक साबित होने वाली है। इस बैठक से कहीं न कहीं ईरान को भी बल मिलेगा। एससीओ के बाद भारत में ब्रिक्स सम्मेलन भी है। दोनों ही मंचों पर भारत का रोल बढ़ा है। दुनिया संघर्षों से गुजर रही है। ऐसे में भारत ही एक ऐसा देश है, जिस पर यूरेशिया से लेकर यूरोप तक के देश भरोसा कर सकते हैं। यह मंच भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इससे आगे की रणनीति बनाने में मदद मिलेगी।
वहीं कमर आगा कहते हैं कि भारत के लिए एससीओ समिट चीन के साथ तनाव को दूर करने और अपनी रणनीति बनाने का अहम मंच है। चीन के साथ भारत सैकड़ों किलोमीटर बॉर्डर साझा करता है। बॉर्डर को लेकर विवाद है। भारत युद्ध नहीं चाहता है। वह बातचीत से मसले हल करना चाहता है। भारत का कहना है कि यह युद्ध का काल नहीं है। पीएम मोदी ने भी कई बार कहा है कि ये युद्ध का युग नहीं है। मगर साथ में भारत की नीति यह भी है कि अगर ऐसी परिस्थिति आती है तो सेना पूरी तरह युद्ध के लिए तैयार है। इसलिए भारत-चीन को बातचीत जारी रखने के लिए यह अच्छा मंच है। ताकि ऐसी नौबत नहीं आए, क्योंकि युद्ध किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं है। बातचीत चलती रहे तो अच्छा है। भारत चीन के बीच रिश्ते जितने अच्छे होंगे, उतना ही मध्य एशिया के लिए अच्छा होगा। मगर इसके लिए चीन को अपनी विस्तारवादी नीति में बदलाव लाना होगा।
मल्टीपोलर वर्ल्ड में किसकी बादशाहत खतरे में?
कमर आगा कहते हैं कि एससीओ और ब्रिक्स मल्टीपोलर वर्ल्ड बनाने के अहम मंच साबित हुए हैं। अमेरिका के साथ पश्चिमी देश भी कोशिश कर रहे हैं कि युद्ध के माध्यम से या किसी दूसरे जरिये से मल्टीपोलर वर्ल्ड को रोक लें। मगर अब ये संभव नहीं है। इसे रोका नहीं जा सकता। चाहे वह युद्ध करे या कोई दूसरा तरीका अपनाए, मगर किसी भी तरह से वे अब इसे रोक नहीं पाएंगे। यह सच्चाई है। इसलिए बेहतर होगा कि वह बातचीत करें, संयुक्त राष्ट्र में सुधार लाएं, सिक्योरिटी काउंसिल का विस्तार करें। वह ब्रिक्स को रोकने की हर तरह की कोशिश कर रहे हैं। मगर वह नहीं हो पाएगा। दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन भी बहुत महत्वपूर्ण है। भारत, चीन और रूस इसके बड़े खिलाड़ी हैं। दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर आगे बढ़ चुकी है।
वहीं प्रो. राज यादव का कहना है कि भारत रूस और चीन तीनों यूरेशिया की बड़ी ताकते हैं। ये मल्टीपोलर वर्ल्ड का निर्माण कर चुके हैं। एससीओ और ब्रिक्स जैसे सम्मेलन अमेरिका और पश्चिम दोनों को यह मैसेज देने के लिए है कि अब उनकी मनमानी नहीं चलेगी। इस मंच से भारत को सेंट्रल एशिया में ट्रेड के लिए भी पहुंच मिलेगी। इसका फायदा सेंट्रल एशिया को भी होगा, क्योंकि भारत खुद उनके लिए एक बहुत बड़ा बाजार है। भारत इस क्षेत्र का अब उभरता हुआ अहम खिलाड़ी है। ब्रिक्स की अध्यक्षता से भारत की उपयोगिता दुनिया के लिए और बढ़ेगी। यूरोपीय देश भी सेंट्रल एशिया में अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। भारत के यूरोपी देशों से अच्छे रिश्ते हैं। ऐसे में सेंट्रल एशिया में भारत की बढ़त उसे यूरोप तक रिश्तों और व्यापार का कोरिडोर बनाने में और ज्यादा मददगार साबित होगी।
इस्लामिक नाटो की ओर बढ़ रहे पाक-तुर्की
प्रो. राज यादव कहती हैं कि एक तरफ एससीओ बैठक हो रही है, जिसका सदस्य पाकिस्तान भी है। वहीं दूसरी तरफ वह इस्लामिक नाटो की ओर भी बढ़ रहा है। तुर्की उसका मजबूत साथी है। पाकिस्तान को मक्का डील से कहीं न कहीं रणनीतिक बढ़त जरूर मिली है। मक्का डील के बाद अब पाकिस्तान तुर्की और सऊदी के साथ पहली बैठक कर रहा है। पाकिस्तान एक तरह से मुस्लिम देशों में अपना एक्सेस और नेटवर्क बढ़ा रहा है। दूसरी तरफ वह एससीओ में भी मौजूद है। इसलिए रणनीतिक रूप से एससीओ में भारत की मौजूदगी और भी ज्यादा अहम हो जाती है। इस मंच पर भारत के होने से चीन-पाकिस्तान अपने एजेंडे को आगे नहीं बढ़ा पाएंगे। यह मंच भारत और चीन को भी करीब लाने और आपसी कड़वाहट को दूर करने का मौका देता है।
सेंट्रल एशिया भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण
उन्होंने कहा कि सेंट्रल एशिया भारत के लिए तेल, गैस, यूरेनियम, सुरक्षा सहयोग, दुर्लभ भू-तत्वों रक्षा एवं सैन्य सहयोग और व्यापार व कनेक्टिविटी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत का संबंध हमेशा ही सेंट्रल एशिया के साथ अच्छा रहा है। इसमें मुख्य रूप से कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान जैसे देश आते हैं। कई बार अफगानिस्तान और मंगोलिया को भी इसमें शामिल कर लिया जाता है।
अभी हाल ही में जो मॉस्को की तरफ से रूस-भारत रेल कोरिडोर बनाने की बात हो रही है, अगर वह योजना भविष्य में कभी सफल होती है तो यह सेंट्रल एशिया में भारत की पकड़ को और मजबूत करेगी। क्योंकि इससे भारत को पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान होते हुए सेंट्रल एशिया और यूरोप तक एक्सेस मिल जाएगा। इससे यूरेशियाई देशों में भारत को व्यापार करना आसान हो जाएगा। इसमें अफगानिस्तान की तरफ से कोई दिक्कत नहीं है, पाकिस्तान भी लगता है रूस के कहने से मान जाएगा। अगर यह काम हो जाता है तो वाकई भारत के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा। भारत को सेंट्रल एशिया के साथ जुड़कर रहना और एससीओ में रहना बहुत जरूरी है। उसे प्रोएक्टिव रहना है और अपनी अंतरराष्ट्रीय रणनीति को स्ट्रांग बनाए रखना है।
कब और क्यों बना था एससीओ?
एससीओ का आगाज 2001 में हुआ था। इसकी शुरुआत रूस और चीन की अगुवाई में हुई थी। कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान को इसका शुरुआती सदस्य बनाया गया था। आरंभ में इसका उद्देश्य आतंकवाद, अलगाववाद और अतिवाद जैसे खतरों से निपटना था। मगर बाद में इसका दायरा काफी बढ़ गया। अब यह व्यापार, ऊर्जा, विकास, डिजिटल सहयोग और कनेक्टिविटी का बड़ा मंच बन चुका है। भारत और पाकिस्तान 2017 में इसके सदस्य बने। बाद में ईरान और बेलारूस को भी स्थायी सदस्य बनाए गए। इसलिए यह भू-राजनैतिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
भारत के लिए एससीओ क्यों जरूरी?
- व्यापक रणनीतिक हितों और राजनीतिक व व्यापारिक पहुंच के लिए।
- रणनीतिक स्वतंत्रता और मल्टी-अलाइनमेंट के लिए
- यूरेशियाई महाद्वीप के साथ कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए।
- मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी को स्थिर रखने के लिए।
- आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को बेहतर करने के लिए
- चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी को कमजोर करने और उनके एजेंडे को काउंटर करने के लिए
अपनी कूटनीति के उच्च स्तर को बनाए रखने के लिए। - कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति को गहरा करने के लिए।
- रूस समेत अन्य देशों के साथ अपनी साझेदारी को लगातार मजबूत करने के लिए।
- रूस, चीन के साथ मिलकर बहुध्रुवीय व्यवस्था के आधार को ताकत देने के लिए।
ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियन से मिले पीएम मोदी
Met President Masoud Pezeshkian in Bishkek. Reiterated our commitment to strengthening India’s long standing friendship with Iran across diverse sectors. We want to expand and diversify our trade basket in the times to come.
— Narendra Modi (@narendramodi) August 31, 2026
We had a discussion on the prevailing situation in… pic.twitter.com/qagQy5o108
ईरान-अमेरिका युद्ध के बाद पीएम मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बीच सोमवार को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में एससीओ से इतर पहली मुलाकात हुई। पीएम मोदी ने अपने एक्स पर लिखा, “बिश्केक में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से मिला। भारत के साथ ईरान की दोस्ती को गहरा करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिबद्धताओं को दोहराया। आने वाले समय में हम अपने ट्रेड बास्केट का विस्तार और डायवर्सिफिकेशन करेंगे। हमने क्षेत्र के मौजूदा हालात पर चर्चा की। भारत स्थायी शांति के लिए किए जाने वाले सभी प्रयासों का समर्थन जारी रखेगा।”




