8वीं पास कवि जिसे देश ने ठुकराया, पागलखाने भेजा… विदेश में नोबेल जीतकर भी बना रहा दिल से रूसी
साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले ब्रोड्स्की के बारे में दिलचस्प बात यह थी कि उन्होंने कभी रूसी भाषा में कविता लिखना बंद नहीं किया। उनकी सोच एकदम 'शाही' थी।
8वीं पास कवि जिसे देश ने ठुकराया, पागलखाने भेजा… विदेश में नोबेल जीतकर भी बना रहा दिल से रूसी
जोसेफ ब्रोडस्की को साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका था।© RT Hindi

जोसेफ ब्रोड्स्की… दुनिया में बहुत कम ऐसे लेखक होते हैं जो जीते-जी एक मिसाल बन जाते हैं। महज 8वीं पास कवि, अपनी लेखनी के लिए पागलखाने पहुंचे, ‘कामचोरी’ के आरोप में सजा काटी और एक दिन उसी लेखनी ने उन्हें नोबेल प्राइज दिलाया। पैदाइश से रूसी यहूदी, लेकिन आध्यात्मिक अपनापन ईसाई धर्म में मिला। ब्रोड्स्की के बारे में दिलचस्प बात यह थी कि उन्होंने कभी भी रूसी भाषा में कविता लिखना बंद नहीं किया। सोच उनकी एकदम ‘शाही’ थी, जैसे पुराने जमाने के रोम के लोग दुनिया को देखते थे। यूक्रेन के आजादी की निंदा करते तो स्पैनिश विजेताओं का बचाव भी करते। ब्रोड्स्की ने पुराने तौर-तरीकों को सिर्फ चुनौती ही नहीं दी, बल्कि उन्हें तोड़कर रख दिया।

जोसेफ ब्रोडस्की युवावस्था में

बचपन में ही चुपके से बना दिया ईसाई

किसी ने खूब कहा है कि इंसान कैसा बनेगा, ये उसका बचपन तय कर देता है। जोसेफ ब्रोड्स्की के मामले में यह बात सौ फीसदी सच थी। ब्रोड्स्की का जन्म 24 मई 1940 को लेनिनग्राद (आज के सेंट पीटर्सबर्ग ) में एक यहूदी परिवार में हुआ था। पिता नौसेना में अफसर थे। नाजी जर्मनी ने जब रूस पर हमला किया तो पिता मोर्चे पर चले गए। 1941-1942 की उस भयानक और बर्फीली सर्दी में, नन्हे जोसेफ ने लेनिनग्राद की खतरनाक नाकेबंदी को झेला। बाद में उन्हें मां के साथ सुरक्षित निकालने के लिए चेरेपोवेट्स शहर भेज दिया गया। वहीं एक रूसी नैनी ने चुपके से उनका बपतिस्मा (ईसाई धर्म में जल के प्रयोग से किया जाने वाला एक पवित्र धार्मिक संस्कार) कराकर ईसाई बना दिया।

युद्ध खत्म होने पर पूरा परिवार लेनिनग्राद में फिर से साथ आ गया। ब्रोड्स्की ने बाद में उन शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया था,

joseph brodsky
मेरे पिता ने करीब दो साल और नौसेना की वर्दी पहनी। वह नेवल म्यूजियम की फोटो लैब के इंचार्ज अफसर थे, जो पूरे शहर की सबसे खूबसूरत इमारतों में से एक था। उसे पूरे साम्राज्य की सबसे खूबसूरत इमारत कहा जाए तो गलत नहीं होगा। वह इमारत पहले स्टॉक एक्सचेंज हुआ करती थी। जो दिखने में किसी यूनानी मंदिर से कहीं ज्यादा यूनानी लगती थी।
जोसेफ ब्रोडस्की
जोसेफ ब्रोडस्की
कवि

कभी फैक्ट्री मजदूर बने, कभी कोयला झोंका

किशोरावस्था में जोसेफ ब्रोडस्की की कुछ महत्वकांक्षाएं थीं। ये अलग बात है कि वो सफल नहीं हुईं। उन्हें नौसेना में जाने के लिए एडमिशन लेना था, जो नहीं ले पाए। 8वीं क्लास पास करने के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। एक फैक्ट्री में नौकरी की। अगले कुछ साल तरह-तरह के काम किए। कभी कोयला झोंकने वाले बने, कभी फोटोग्राफर, कभी रूस के सुदूर पूर्वी इलाकों में जमीन खोजने वाले अभियानों में भी शामिल हुए। लेकिन इस सब के बीच, उन्होंने अपनी लिखना-पढ़ना नहीं छोड़ा और खुद से ही जमकर सीखते-पढ़ते रहे।

स्कूल छोड़ना पड़ा, देश से निकाल दिया 

जोसेफ ब्रोडस्की को जानिएRT© RT Hindi

20 साल में ही सुनाने लगे कविताएं

ब्रोडस्की के पास भले ही साहित्य की कोई ऑफिशियल डिग्री नहीं थी, फिर भी वह ज्ञानी और समझदार इंसान बनकर उभरे। 1960 के दशक की शुरुआत में, जब वो अपनी उम्र के शुरुआती 20वें साल में थे, तब लेनिनग्राद में सबके सामने कविताएं सुनाने लगे थे। वहीं उनकी मुलाकात उस दौर के कुछ सबसे बड़े और मशहूर कवियों से हुई जिनमें अन्ना अख्मातोवा (Anna Akhmatova) भी थीं। उनकी पहली मुलाकात का एक किस्सा मशहूर है। उम्रदराज अख्मातोवा ने युवा ब्रोड्स्की से पूछा कि जब एक कवि भाषा के सारे तुक-ताल और लय पर महारत हासिल कर ले तो उसे आगे क्या करना चाहिए? ब्रोड्स्की ने बिना हिचकिचाए जवाब दिया- “पर सोच और नजरिये का बड़प्पन तो फिर भी रह जाता है ना।”

अफसरों ने जब ‘निकम्मा’ मानकर गिरफ्तार किया

ब्रोड्स्की सिर्फ 23 साल के थे, जब कड़वी सच्चाई उनके बढ़ते कदमों के आड़े आ गई। हुआ ये कि 1963 में सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने कामचोरों और नैतिक रूप से गिरे हुए लोगों को उखाड़ फेंकने के लिए एक सरकारी अभियान शुरू किया था। ख्रुश्चेव के शब्दों में - ये वो लोग थे जो निकम्मों और आवारा लोगों की अजीबोगरीब भाषा में लिखते थे। अधिकारियों की नजर में कवि इसी कैटगरी में आते थे।

उसी साल नवंबर में ‘वेचेर्नी लेनिनग्राद’ नाम के अखबार में ब्रोड्स्की को निशाना बनाते हुए एक लेख छपा, जिसका टाइटल था- “द नियर-लिटरेरी ड्रोन” (साहित्य के नाम पर जीने वाला परजीवी)। इस लेख में जिन कविताओं का हवाला दिया गया, वो असल में ब्रोड्स्की ने लिखी ही नहीं थीं। लेकिन अधिकारियों को फर्क नहीं पड़ा। कुछ महीनों बाद ब्रोड्स्की को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर “सामाजिक परजीविता” यानी समाज पर बोझ बनकर रहने और कोई ढंग का काम न करने का आरोप लगाया गया।

जोसेफ ब्रोडस्की फाइल इमेज

कोर्ट ने नहीं माना असली लेखक, हुई बहस

ब्रोड्स्की उस समय तक साहित्य की दुनिया में अच्छी-खासी पहचान बना चुके थे। उनकी कविताएं बड़े अखबारों और सम्मानित पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। उन्हें दूसरी भाषाओं की कविताओं का अनुवाद करने के लिए बाकायदा काम भी मिलने लगा था, लेकिन कोर्ट को इन सब से कोई लेना-देना नहीं था। मुकदमा चला तो जज ने ब्रोड्स्की को एक असली लेखक मानने से इनकार कर दिया। मुकदमे के दौरान ब्रोड्स्की और जज के बीच दिलचस्प बातचीत हुई जो इतिहास में अमर हो गई- 

जोसेफ और वकील के बीच बहस© RT Hindi

पहले पागलखाने, फिर मजदूरी की सजा

ब्रोड्स्की की दलीलों से जज संतुष्ट नहीं हुए। पहले तो उन्हें मानसिक जांच के लिए भेजा गया, फिर कुछ काम न करने के जुर्म में 5 साल की कड़ी मजदूरी की सजा सुना दी गई। उन्हें रूस के सुदूर उत्तर में बसे अर्खांगेल्स्क इलाके में भेज दिया गया। वहां ब्रोड्स्की को अन्य लोगों के साथ एक सरकारी खेत में काम पर लगा दिया गया। वह खाली समय में पढ़ते, अनुवाद करते और खुद से अंग्रेजी सीखते थे। 

आखिरकार, साहित्य की दुनिया के कुछ चर्चित चेहरों के दखल पर उनकी सजा समय से पहले खत्म कर दी गई। इनमें मशहूर म्यूजिक कंपोजर दिमित्री शोस्ताकोविच, कवि कोर्नेई चुकोव्स्की, लेखक कोंस्तान्तिन पाउस्तोव्स्की और यहां तक कि फ्रांस के बड़े दार्शनिक ज्यां-पॉल सार्त्र भी थे।

अन्ना अखमातोवा के साथ जोसेफ ब्रोडस्की

1965 में जब ब्रोड्स्की इस सजा से लौटे तो उन्हें ‘राइटर्स यूनियन’ के एक प्रोफेशनल ग्रुप में ऑफिशियल मेम्बरशिप दे दी गई। यह एक तरह का कागजी दांवपेच था ताकि उन पर फिर से कामचोर होने का आरोप न लगाया जा सके। इसके बाद उन्होंने जमकर काम किया। उनकी कविताएं विदेशों में खूब छपने लगीं। उन्होंने बड़े-बडे विद्वानों, एडिटर्स और पत्रकारों से अच्छे रिश्ते बना लिए। इसके बावजूद, सोवियत संघ में सिर्फ उनकी बच्चों वाली कविताएं ही छपती थीं। वो सिस्टम में फिट नहीं बैठ पा रहे थे।

सरकार ने दिया देश निकाला

फिर मई 1972 में उन्हें गृह मंत्रालय से बुलावा आया। उनके सामने शर्त रखी गई- या तो तुरंत देश छोड़ दें, या फिर मुश्किल दिनों के लिए तैयार रहें। ब्रोड्स्की ने देश छोड़ना बेहतर समझा। सिर्फ 12 दिनों में ब्रोड्स्की का वीजा तैयार हो गया। जून 1972 में, उन्होंने देश छोड़ दिया, हमेशा-हमेशा के लिए।

जोसेफ ब्रोड्स्की ने जब सोवियत संघ छोड़ा तो सब कुछ पीछे छोड़ आए। माता-पिता, अपने दोस्त, प्रेमिका और अपना बेटा भी। उन्होंने सोवियत संघ के जनरल सेक्रेटरी लियोनिद ब्रेझनेव को भावुक चिट्ठी में लिखी थी-

 ”रूस को छोड़ना मेरे लिए बहुत दर्दनाक है। मेरा जन्म यहीं हुआ, मैं यहीं बड़ा हुआ और यहीं अपनी जिंदगी जी। मेरे पास आज जो कुछ भी है, मैं इस देश का कर्जदार हूं।”

लेकिन सोवियत सरकार ने उन्हें कभी वापस आने की इजाजत नहीं दी। वो फिर कभी अपने माता-पिता को नहीं देख पाए, यहां तक कि उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो सके।

प्रोफेसर के रूप में जोसेफ ब्रोडस्की

मिशिगन यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का मौका

जब वो वियेना पहुंचे तो उनकी मुलाकात अमेरिकी पब्लिशर और रूसी साहित्य के जानकार कार्ल प्रोफर से हुई। उन्होंने ब्रोड्स्की को ‘यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन’ में एक गेस्ट कवि (visiting poet) के तौर पर पढ़ाने का मौका दिया। किस्मत का अजीब खेल देखिए- ब्रोड्स्की ने स्कूल में सिर्फ आठवीं तक पढ़ाई की थी, लेकिन फिर भी अगले 24 साल तक उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन की सबसे बड़ी और नामी यूनिवर्सिटीज में रूसी साहित्य, कविता और कम्पैरेटिव लिटरेचर पढ़ाया।

1987 में मिला साहित्य का नोबेल प्राइज

ब्रोड्स्की को पढ़ाने का किताबी तरीका नहीं आता था। वो स्टूडेंट्स से उसी चीज के बारे में बात करते थे, जो उनके दिल के सबसे करीब थी- कविताएं। 1987 में उन्हें साहित्य का नोबेल प्राइज (Nobel Prize) मिला। ये पुरस्कार मिलने के बाद एक स्टूडेंट ने उनसे पूछा कि अब जब आपको पढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है, तो भी आप क्यों पढ़ाते हैं?

उनका जवाब बहुत सीधा और प्यारा था, “मैं बस यह चाहता हूं कि जिस चीज से मैं प्यार करता हूं, तुम भी उसी से प्यार करने लगो।”

शरारती, जिंदगी जीने वाले शख्स थे ब्रोड्स्की 

अगर आप यह सोच रहे हैं कि ब्रोड्स्की दुनिया से कटे हुए, संजीदा किस्म के बुद्धिजीवी थे तो आप गलत हैं। वो सिर्फ किताबों में खोए रहने वाले इंसान नहीं थे, उन्हें जिंदगी का मजा लेना भी आता था। वो काफी शरारती थे। उनके दोस्त और मशहूर कवि ग्लिन मैक्सवेल बताते हैं कि ब्रोड्स्की और उनके दोस्तों का ग्रुप काफी शोर-शराबा करने वाला था। वो बिना किसी रोकटोक के खुलकर बोलते थे। कई बार तो काफी देसी और बेबाक हो जाते थे। वो अल्फा मेल्स (दबंगों) की तरह बर्ताव करते थे। ड्रिंक करते थे, एडल्ट चुटकुले सुनाते थे, और जहां भी बैठते, महफिल में छा जाते थे। लेकिन बात जब कविताओं की आती थी, तो ब्रोड्स्की बेहद संजीदा हो जाते थे। 

अमेरिका की नागरिकता मिलने के बाद उन्होंने पूरा ध्यान निबंध लिखने, रूसी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद करने और खुद अंग्रेजी में कविताएं लिखने पर लगा दिया। वो अंग्रेजी भाषा का सम्मान करते थे और उसकी कविताओं की परंपरा से उन्हें प्यार था। हालांकि वो जानते थे कि अंग्रेजी चूंकि उनकी मातृभाषा नहीं है, इसलिए वो हमेशा इसे एक बाहरी इंसान के नजरिये से ही लिखेंगे। 

ब्रोड्स्की सिर्फ रूसी भाषा का इस्तेमाल ही नहीं करते थे, उसे अंदर से सींचते और मजबूत भी करते थे।

रूस छोड़ा, पर रूसी भाषा दिल के अजीज

उनकी बायोग्राफी लिखने वाली वेलेंटीना पोलुखिना का कहना है कि विदेश में इतनी बड़ी कामयाबी मिलने के बाद भी ब्रोड्स्की दिल से हमेशा एक रूसी कवि रहे। उनके लिए कविता किसी भी भाषा को बयां करने का सबसे अच्छा तरीका थी। रूसी ही वो भाषा थी जिसमें उनकी रूह सबसे खुलकर बात करती थी।

वेलेंटीना कहती हैं, “कभी-कभी मुझे लगता है कि ब्रोड्स्की ने रूसी भाषा को बहुत सोच-समझकर और जानबूझकर चुना था।”

मशहूर कवयित्री बेला अख्मादुलिना ने भी बिल्कुल यही बात कही थी। उन्होंने बताया कि ब्रोड्स्की सिर्फ रूसी भाषा का इस्तेमाल ही नहीं करते थे, बल्कि उसे अंदर से सींचते और मजबूत भी करते थे। उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं थी कि उनके आस-पास के लोग कैसे बोलते हैं। वो खुद रूसी भाषा के लिए एक उपजाऊ जमीन बन गए थे।

हर क्रिसमस पर लिखते थे एक कविता 

जोसेफ ब्रोड्स्की कितने अनोखे और गहरे इंसान थे, यह उनकी छोटी-छोटी आदतों से पता चलता है। उन्होंने एक बार कहा था कि जब वह 24-25 साल के थे, तब उनके दिमाग में एक आइडिया आया कि उन्हें हर क्रिसमस पर एक कविता लिखनी चाहिए। उन्होंने इसे ताउम्र निभाया। इसकी शुरुआत वैसे तो पहले ही हो गई थी। जब वो 22 साल के थे, तब उन्होंने ‘ए क्रिसमस रोमांस’ नाम की कविता लिखी थी। 1972 में देश से निकाले जाने तक वो हर साल क्रिसमस पर कविता लिखते रहे। बीच में एक लंबा गैप आया, लेकिन 1987 में उन्होंने इस परंपरा को फिर से शुरू किया और 1996 में अपनी मौत तक इसे हर साल निभाया। 

joseph brodsky
क्रिसमस है क्या? उस ईश्वर का जन्मदिन जो खुद इंसान बनकर आया। किसी भी इंसान के लिए इसे मनाना उतना ही स्वाभाविक है, जैसे कि वो अपना खुद का जन्मदिन मनाता हो। यह हमारी दुनिया में मनाया जाने वाला सबसे पुराना जन्मदिन है।
जोसेफ ब्रोडस्की
जोसेफ ब्रोडस्की
कवि

‘जिंदगी बुरे और बदतर की जंग’

उनकी ये आध्यात्मिक सोच सिर्फ धार्मिक रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं थी। 1972 में ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ को लिखे एक खत में, ब्रोड्स्की ने सोवियत राजनीति के उन बड़बोले दावों को चुनौती दी थी जिनमें धरती पर ही स्वर्ग बना देने के बड़े-बड़े वादे किए जाते थे।

ब्रोड्स्की कहते थे, “जिंदगी जैसी असल में ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि ‘बुरे’ और ‘उससे भी बदतर’ की जंग है। इंसानियत का असली काम बस यही रह गया है कि वो इस ‘बुराई के दौर’ में खुद को अच्छा बनाए रखे।” 

एक यहूदी परिवार में पैदा होने के बावजूद, ब्रोड्स्की खुद को हमेशा एक रूसी कवि ही कहते थे। उनकी नजर में रूस को कभी भी ईसाई सांस्कृतिक दुनिया से अलग करके नहीं देखा जा सकता था। देश से निकाले जाने के बाद भी उन्होंने अपने वतन की कभी बुराई नहीं की। 

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मैंने अपनी मर्जी से रूस नहीं छोड़ा था। आप चाहे जिस भी हालात में अपना घर छोड़ें, घर आखिर घर ही रहता है। मुझे यह बात बिल्कुल समझ नहीं आती कि क्यों कुछ लोग यह उम्मीद करते हैंं कि मैं अपने ही घर पर कालिख पोतूं और बदनामी करूं… 'रूस मेरा घर है। मैं वहां अपनी पूरी ज़िंदगी रहा और आज मेरी रूह में जो कुछ भी है, उसके लिए मैं रूस और वहां के लोगों का कर्जदार हूं, उसकी भाषा का कर्जदार हूं।
जोसेफ ब्रोडस्की
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कवि

खुले विचारों वाला ‘बागी’ कवि

ब्रोड्स्की कड़वी सच्चाई बोलने से नहीं कतराते थे। वो साफ बोलते थे। दुनिया देखने का उनका नजरिया न तो कोई सपनों वाली रोमांटिक सोच थी और न ही कोई काल्पनिक। उनकी सबसे विवादित कविताओं में से एक है- On Ukraine’s Independence। यह गुस्से और तीखे तंज से भरी है। ब्रोड्स्की की नजरों में, रूस से अपने ऐतिहासिक रिश्तों को तोड़ने का यूक्रेन का फैसला सिर्फ एक राजनीतिक अलगाव नहीं, बल्कि साझा संस्कृति, भाषा और साहित्यिक विरासत का भी तिरस्कार था। उन्होंने इसे अपनी कविताओं में भी लिखा है। ब्रोड्स्की के लिए यूक्रेन का रूसी सांस्कृतिक दायरे से अलग होना सिर्फ राजनीति नहीं थी, यह साहित्य और सभ्यता के उस सिलसिले का टूटना था जो बरसों से चला आ रहा था। 

1990 के दशक और 2000 की शुरुआत में, रूस के कई खुले विचारों वाले बुद्धिजीवियों ने ब्रोड्स्की को एक बागी कवि मान लिया था। कुछ हद तक यह सच भी है। उनकी कविताओं में इस बगावत के बारीक लेकिन दमदार निशान मिलते हैं। जैसे-जैसे समय के साथ उनकी इस विरासत को और गहराई से परखा गया, तब उनकी एक और उलझी तस्वीर सामने आई- एक ऐसे रूसी कवि की तस्वीर जिसकी सोच पर रूसी साम्राज्य का गहरा असर था और जो इतिहास में रूस की भूमिका को लेकर बिना किसी पछतावे के अपनी बात रखता था। 

(लेखक- मैक्सिम सेमेनोव एक रूसी पत्रकार हैं और अंतरराष्ट्रीय मामलों, सोवियत संघ के बाद की राजनीति और वहां के इतिहास पर लिखते हैं।)

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