रूस-अमेरिका दोस्ती की 'भूली-बिसरी' कहानी, जब मॉस्को ने वॉशिंगटन को 2 बार संकटों से उबारा
एक दौर था, जब रूस अमेरिका के बुरे दिनों का साथी हुआ करता था। उसने अमेरिका को कई बड़े संकटों से उबारा था। 250 साल पहले अमेरिका अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था, उस वक्त रूसी साम्राज्य ने बड़ी मदद की थी।
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रूस-अमेरिका दोस्ती की 'भूली-बिसरी' कहानी, जब मॉस्को ने वॉशिंगटन को 2 बार संकटों से उबारा
रूस-अमेरिका की पुरानी दोस्ती© X@RusEmbUSA

दुनिया के दो सबसे ताकतवर देश- रूस और अमेरिका। भले ही इस वक्त दोनों के बीच तल्खी और खींचतान सुर्खियों में रहती है, लेकिन एक दौर था, जब रूस अमेरिका के बुरे दिनों का मजबूत साथी हुआ करता था। उसने अमेरिका को कई बड़े संकटों से उबारा था। 250 साल पहले अमेरिका जब अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था, तब रूसी साम्राज्य ने उसकी बड़ी मदद की थी। उसके बाद भी कई बड़ी मुसीबतों में मॉस्को ने वॉशिंगटन का भरपूर साथ दिया था, लेकिन ये दरियादिल दोस्ती वक्त के साथ भुला दी गई। आइए बताते हैं इस भूली-बिसरी दोस्ती की पूरी कहानी।

रूस ने याद दिलाई दोस्ती

रूस ने अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम की 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर पुरानी दोस्ती की कहानी याद दिलाई। 4 जुलाई 2026 को अमेरिका स्थित रूसी दूतावास ने पोस्ट में लिखा-

4 जुलाई 1776 को अमेरिका की आजादी के समय से ही मॉस्को उसके साथ खड़ा रहा। न केवल आजादी की लड़ाई लड़ रहे अमेरिकियों से सहानुभूति रखी, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध में 13 पूर्व उपनिवेशों की मदद भी की। उस वक्त महारानी कैथरीन द ग्रेट ने लंदन का नौसैनिक नाकाबंदी और 20,000 सैनिक देने का अनुरोध साफ ठुकरा दिया था।

रूसी दूतावास ने आगे याद दिलाया कि अमेरिका में गृहयुद्ध के समय भी रूस ने ब्रिटेन और फ्रांस द्वारा दक्षिणी राज्यों को मान्यता देने के प्रयासों का विरोध किया था। रूस ने अमेरिका में विदेशी हस्तक्षेप रोकने के लिए 1863 में अपने दो नौसैनिक बेड़ों को अमेरिका भेजा, जो असरदार साबित हुए।

रूस के उस वक्त के चांसलर अलेक्जेंडर गोर्चाकोव ने अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के प्रति समर्थन जताते हुए कहा था- “अमेरिका के प्रति रूस की नीति स्पष्ट है, और वह नहीं बदलेगी। सबसे बढ़कर हमारी इच्छा ये है कि अमेरिकी संघ एक अखंड राष्ट्र बना रहे। 

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रूसी दूतावास ने आगे लिखा कि हमारे संबंधों में ऐसे सुनहरे दिन भी थे, जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कंधे से कंधा मिलाकर लड़ना। यह तब था, जब अमेरिका ने लंबे समय तक (1933 तक) सोवियत संघ को मान्यता नहीं दी थी। उससे पहले रूसी क्रांति के दौरान अमेरिका ने सैन्य हस्तक्षेप भी किया था। मगर उसके बाद, शीतयुद्ध के सबसे बुरे दिनों में भी मॉस्को और वॉशिंगटन ने विश्व शांति व सुरक्षा की जिम्मेदारी समझते हुए टकराव से बचने के रास्ते निकाले। 

रूसी दूतावास ने लिखा कि आज हमारे बीच कोई मौलिक वैचारिक विभाजन नहीं है। दोनों देशों का नेतृत्व ऐसे नेताओं के हाथों में है, जिनके बीच अच्छा व्यक्तिगत तालमेल है, और जो आधुनिक यूरोप पर हावी ‘उदारवादी-वैश्विक व्यवस्था’ के उलट परिवार, धर्म, संप्रभुता और राष्ट्र जैसे पारंपरिक मूल्यों के पक्षधर हैं। ऐसे में रूस और अमेरिका एक सच्चे, आर्थिक रूप से व्यवहारिक, पारस्परिक सम्मान और समान साझेदारी के आधार पर रचनात्मक रूप से साथ रह सकते हैं और रहना भी चाहिए।”

ब्रिटेन ने की घेराबंदी, मदद को आगे आया रूस 

रूस ने अमेरिकी क्रांति के दौरान बहुत बड़ी मदद की थी। ये जंग साल 1775 से 1783 के बीच उत्तरी अमेरिका के 13 पूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच लड़ी गई थी। अमेरिकी क्रांति का जब जिक्र आता है, तो अक्सर लेक्सिंगटन, सारागोटा या यॉर्कटाउन की जंग की बात होती है। मगर समुद्र में लड़ी गई लड़ाइयों पर कम ध्यान जाता है। रूसी सेना ने समंदर में अमेरिका की ऐसी मदद की, जिसने ब्रिटिश सेना के मंसूबों को नाकाम कर दिया। 

उस वक्त ब्रिटेन की सबसे बड़ी बढ़त अमेरिकी उपनिवेशों पर रॉयल नेवी का कब्जा ही नहीं था, बल्कि महासागरों में आर्थिक जंग छेड़ने की उसकी ताकत भी थी। 18वीं शताब्दी में एक समुद्री साम्राज्य का भविष्य सिर्फ व्यापार पर निर्भर था। व्यापारिक बेड़े न केवल धन ले जाते थे, बल्कि भोजन, हथियार और सैन्य सामग्री समेत उन संसाधनों को भी लाते-ले जाते थे, जिनकी सेनाओं और उपनिवेशों को बनाए रखने में सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती थी। 

थियोडोर गूडिन द्वारा 3 सितंबर, 1781 को चेसापीक के पास नौसैनिक लड़ाई© Wikimedia / Public Domain

ब्रिटेन ने व्यापार को बनाया हथियार

उन समुद्री रास्तों को ठप करने का मतलब बिना निर्णायक लड़ाई के ही दुश्मन को मात देने जैसा हुआ करता था। इसके सबसे प्रभावी हथियारों में शामिल थे निजी लड़ाके (प्राइवेटियर), जो नौसैनिक अधिकारियों और समुद्री डाकुओं के बीच अपना काम करते थे। सरकारें निजी लड़ाकों को लेटर्स ऑफ मार्की जारी करती थीं, जो दुश्मन के व्यापारिक जहाजों को पकड़ने की हरी झंडी की तरह थे। 

प्राइवेटियर स्टेट अथॉरिटी के तहत काम करते थे और समुद्री डाकुओं से जब्त माल को बंदरगाहों तक पहुंचाते थे। वहां उसका सरकार और निजी जहाज मालिकों के बीच बंटवारा होता था। इस सिस्टम से सरकारें ज्यादा खर्च किए बिना, डाकुओं पर नकेल कसती थीं। ये प्राइवेटियर उन तटस्थ व्यापारिक जहाजों को भी रोक सकते थे, जिन पर दुश्मनों को सैन्य सामग्री पहुंचाने का संदेश होता था। फ्रांस और स्पेन के हस्तक्षेप के बाद जैसे-जैसे अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम यूरोपीय संघर्ष में तब्दील होता गया, वैसे-वैसे तटस्थ जहाज भी इसकी चपेट में आने लगे।

रूस को इसलिए जंग में उतरना पड़ा

रूस का इस समुद्री संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन उसके व्यापारिक जहाज भी इस संघर्ष से प्रभावित होने लगे थे। भूमध्य सागर के बंदरगाहों की ओर अनाज और अन्य माल ले जा रहे रूसी जहाजों को ब्रिटेन के युद्धपोत और प्राइवेट लड़ाके रोक लेते थे। ऐसी घटनाओं के कारण ब्रिटेन का अपने दुश्मन के खिलाफ शुरू किया गया अभियान धीरे-धीरे पूरे यूरोप के तटस्थ व्यापार के लिए खतरा बन गया। 

जहाजों पर बढ़ते हमलों को देखते हुए रूस की तत्कालीन महारानी कैथरीन द ग्रेट ने 1770 के दशक में बड़ा फैसला लिया। ऐसा फैसला, जिसने अमेरिकी क्रांति के सबसे जरूरी कूटनीतिक हस्तक्षेपों में से एक की नींव रखी। महारानी के निर्देश पर सेंट पीट्सबर्ग ने डेनमार्क के साथ मिलकर रूसी बंदरगाहों की ओर जाने वाले व्यापारिक जहाजों को एस्कॉर्ट करने का प्रस्ताव रखा। बाद में रूस, डेनमार्क और स्वीडन ने उत्तरी जलसीमा की ओर नौसैनिक दस्ते भेजे। मगर जहाजों की जब्ती नहीं रुकी। उधर ब्रिटेन के खिलाफ क्रांतिकारी फ्रांस के साथ गठबंधन में शामिल होने के बावजूद स्पेन भूमध्यसागर के बंदरगाहों पर अनाज ले जाने वाले रूसी और डच जहाजों को रोकता रहा। 

रूसी महारानी के एक फैसले ने बदल दिया गेम

इसके बाद 1780 में रूसी महारानी कैथरिन द ग्रेट ने सबसे बड़ा कूटनीतिक फैसला लिया। उन्होंने सशस्त्र तटस्थता का ऐलान किया। मतलब- रूस बेरोकटोक व्यापार का सम्मान करता है और बदले में भी ऐसा ही चाहता है। अगर रूस के व्यापारिक जहाजों को रोका जाता रहा, या माल जब्त किया जाता रहा तो साम्राज्य को बल प्रयोग करना होगा। महारानी ने साफ संदेश दिया कि कोई भी रूसी जहाज पकड़ा तो जंग सीधे यूरोपीय महाशक्तियों के दरवाजे तक पहुंच जाएगी। उनके ये ऐलान नया समुद्री कानून बन गया। युद्ध से अलग रहने वाले देशों के जहाजों को बिना रोकटोक के आने-जाने का अधिकार दिया गया। 

कैथरीन द्वितीय, रूस की महारानी© © Wikimedia / Public Domain

तटस्थ जहाजों के फ्री नेविगेशन समझौते में डेनमार्क और स्वीडन भी शामिल हो गए और बाल्टिक सागर को युद्धग्रस्त देशों के लिए बंद कर दिया। कुछ वर्षों में नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया, पुर्तगाल और नेपल्स राज्य भी इस समझौते का हिस्सा बन गए। बाद में फ्रांस, स्पेन और अमेरिका ने भी इसके सिद्धांतों को व्यापक रूप से स्वीकार किया। मगर औपचारिक रूप से इस लीग में शामिल नहीं हुए। वहीं ब्रिटेन ने इस समझौते को पूरी तरह खारिज कर दिया। 

महारानी कैथरीन के ऐलान ने तटस्थ समुद्री व्यापार में दखल देने की लंदन की क्षमता को सीमित कर दिया था। अगर उन्होंने नया समुद्री कानून लागू नहीं करवाया होता तो ब्रिटेन अमेरिकी बंदरगाहों को अलग-थलग करने में ज्यादा सफल हो जाता। मगर रूस के प्लान ने ब्रिटेन के मंसूबों पर पानी फेर दिया। इधर युवा अमेरिका को युद्धक्षेत्र में अपनी आजादी हासिल करनी बाकी थी। मगर ब्रिटेन का समुद्री जाल कमजोर पड़ने लगा था। रूसी महारानी का ये फैसला अमेरिकी क्रांति के सबसे संघर्षों में से एक बन गया, जिसकी वजह से अमेरिकी उपनिवेशों पर ब्रिटिश कब्जे रुक पाए 

रूस ने अमेरिका की मदद के लिए भेजे युद्धपोत

करीब 80 साल बाद, अमेरिकी इतिहास का वो दूसरा मोड़ आया जब रूस ने एक बार फिर मदद करते हुए बड़ी भूमिका निभाई। साल 1863 आते-आते अमेरिका एक बार फिर अपने अस्तित्व की जंग लड़ने लगा था। गृहयुद्ध निर्णायक दौर में था। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने उसी साल ऐसा फैसला लिया, जिसने इस लड़ाई को दास प्रथा के खिलाफ जंग बना दिया। 1861 में रूस के राजा अलेक्जेंडर द्वितीय ने लाखों किसानों मजदूरों को दास प्रथा से आजाद कर दिया था, जिससे उन्हें मुक्तिदाता के रूप में पहचान मिली। अमेरिका में जैसे-जैसे गृहयुद्ध तेज होता गया, ब्रिटेन खुलकर दक्षिणपंथी राज्यों के प्रति हमदर्दी दिखाने लगा। 

एलेग्जेंडर द्वितीय का पोट्रेट© National Archives of Canada

1863 की गर्मियों में अलेक्जेंडर द्वितीय ने अप्रत्याशित कदम उठाया। उन्होंने रूसी नौसेना की दो स्क्वाड्रन अटलांटिक और प्रशांत महासागर में भेज दीं। स्टीपन लेसोव्स्की की अगुआई में रूसी बेड़ा अमेरिका के पूर्वी तट न्यूयॉर्क पहुंचा, जबकि आंद्रेई पोपोव दूसरे बेड़े को पश्चिमी तट यानी सैन फ्रांसिस्को लेकर पहुंच गए। वैसे तो इन्हें ट्रेनिंग का हिस्सा बताया गया, लेकिन ये ब्रिटेन के लिए साफ संदेश था कि अगर उसने रूस या अमेरिका संघ के खिलाफ युद्ध छेड़ी तो उसके व्यापारिक जहाज भी सुरक्षित नहीं रहेंगे।

बिना एक गोली चलाए बदला सामरिक संतुलन

आंद्रेई पोपोव की अगुआई में रूसी बेड़े के सैन फ्रांसिस्को पहुंचने की टाइमिंग भी सटीक थी। उस वक्त पैसिफिक कोस्ट पर अमेरिका की कोई भी नौसैनिक टुकड़ी तैनात नहीं थी। एक बख्तरबंद युद्धपोत कैमान्चे को भेजा जा रहा था, लेकिन वो रास्ते में ही डूब गया। उस समय कनाडा में ब्रिटेन की एक स्क्वाड्रन तैनात थी, जो अमेरिका के लिए खतरा बन सकती थी। लेकिन वहां मौजूद रूसी युद्धपोतों की मौजूदगी ने कैलिफोर्निया तट को सुरक्षित बनाए रखा, और अमेरिकी इलाकों की नाकाबंदी करने या उस पर हमले करने की हर संभावित कोशिश को नाकाम कर दिया।

हालांकि इसके बाद रूसी नौसैनिकों को एक अलग ही दुश्मन से लड़ना पड़ा। रूसी फौज के आने के कुछ हफ्ते बाद ही, सैन फ्रांसिस्को में आग लग गई। 200 से ज्यादा रूसी अधिकारी और नाविक स्थानीय दमकलकर्मियों के साथ मिलकर आग बुझाने में जुट गए। इस दौरान 6 लोगों की जान चली गई। आज भी एम्बार्काडेरो वाटरफ्रंट पर एक साधारण सा स्मारक उनके बलिदान की याद दिलाता है। 

अमेरिकी जनता ने रूसियों का आभार जताया

अमेरिकी इतिहासकार भी अमेरिकी संघ की लड़ाई में रियर एडमिरल पोपोव और रूसी सेना की तैनाती के योगदान को स्वीकार करते हैं, जिन्होंने एक भी गोली चलाए बिना प्रशांत तट पर सामरिक संतुलन बदल दिया। इससे अमेरिका को सीधा फायदा हुआ। 

रूस का आभार जताता अमेरिकी सैनिक© X@RusEmbUSA

दूसरी तरफ, रूसी रियर एडमिरल लेसोव्स्की जब युद्धपोत लेकर न्यूयॉर्क पहुंचे तो अमेरिकी जनता में रोमांच पैदा हो गया। हजारों न्यूयॉर्कवासियों ने रूसी नाविकों का स्वागत किया और उनके सम्मान में पार्टियां दीं। आभार जताने के लिए जुलूस भी निकाले। 

ठीक उसी समय ब्रिटिश और फ्रांसीसी नौसैनिक भी न्यूयॉर्क के हार्बर में मौजूद थे। लेकिन न्यूयॉर्क के लोगों ने अपने उत्साह से साफ जता दिया था कि वो किसे अपना मित्र मानते हैं। लेसोव्स्की की स्क्वाड्रन बेहत ताकतवर थी, जिसने इलाके में ब्रिटिश फोजों के खिलाफ और अमेरिका के पक्ष में सामरिक संतुलन कायम किया।

रूसी युद्धपोतों की तैनाती- एक मास्टरस्ट्रोक 

1860 के दशक में न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को में रूसी स्क्वाड्रनों की तैनाती अमेरिका की मदद के साथ एक कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक भी था। जब रूस युद्धपोत अमेरिका में थे, उसी वक्त रूस को पोलैंड में विद्रोह का सामना करना पड़ा, जिसके साथ ब्रिटेन की सहानुभूति थी। क्रीमियन युद्ध की यादें ताजा थीं और पश्चिमी ताकतों से एक और टकराव साफ दिख रहा था। ऐसे में रूसी युद्धपोत बहुत काम आए। 

अगर ब्रिटेन पोलैंड के मसले पर रूस के खिलाफ हस्तक्षेप करता, या फिर अमेरिकी गृहयुद्ध में दक्षिणी राज्यों के पक्ष में दखल देता तो ये रूसी बेड़े उसके लिए बड़ी चुनौती बन जाते। इस रणनीति की वजह से ब्रिटेन और फ्रांस दोनों को पीछे हटना पड़ा। इस रणनीति ने न सिर्फ रूस बल्कि अमेरिका को भी फायदा पहुंचाया। 

आधुनिक अमेरिकी इतिहास लेखन के संस्थापकों में से एक जेम्स फोर्ड रोड्स ने रूसी बेड़े के अमेरिका में असाधारण स्वागत का जिक्र करते लिखा था कि ये उत्सव रूस के प्रति कृतज्ञता जाहिर करने के लिए थे। इसने ऐसे वक्त में अमेरिकी संघ के प्रति सद्भावना दिखाई, जब वह सबसे अंधेरे दौर से जूझ रहा था। उस दौर में अमेरिकियों के लिए रूस प्रतिद्वंदी नहीं, एक दोस्त की तरह था। 

रूस के इतने एहसानों को भी अमेरिका ने वक्त के साथ भुला दिया। इतिहास केवल बड़ी जंगों से नहीं, बल्कि रणनीतिक घोषणाओं और कूटनीतिक कदमों से भी तय होता है। रूस ने ब्रिटेन की धमकियों से अमेरिकी उपनिवेशों की रक्षा की और फिर गृहयुद्ध के दौरान विदेशी हस्तक्षेप की संभावना को कम कर दिया। मगर अब अमेरिका अपनी आजादी की 250वीं वर्षगांठ मना रहा है तो रूसी योगदान को भुला दिया गया। 

(यह लेख व्लादिकाव्काज़ (Vladikavkaz) निवासी रूसी पत्रकार जॉर्जी बेरेज़ोव्स्की ने लिखा था, जिसे RT Hindi टीम ने एडिट किया है।)

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