
वो सिर्फ पायलट नहीं थे। आसमान में जिस ओर मुड़ जाते, दुश्मनों की लाशें बिछ जातीं। सेकंडों में दुश्मनों के लड़ाकू विमानों को जमीन पर मार गिराते। उन्होंने दुश्मन के दर्जनों लड़ाकू विमानों को आसमान में ही तबाह कर दिया था। उनके गिराए प्लेन जब धरती पर गिरते, तो मलबे के साथ सिर्फ राख होती थी।
ये कहानी है सोवियत के उन जांबाज पायलटों की, जिन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध में अपनी बहादुरी से जंग की दिशा मोड़ दी। उनसे अकेले नाजी ही नहीं, पूरी दुनिया खौफ खाती थी। मॉस्को के आसमान से लेकर स्टालिनग्राद के मैदान तक, ये कहानी सोवियत के उन भुला दिए गए नायकों की है, जिन्होंने जान पर खेलकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। भले ही उनके नाम पश्चिम के लोगों तक नहीं पहुंचे हों, लेकिन उनकी वीरता ने ही युद्ध के नतीजे तय किए।
वैसे तो, Ace (ऐस) का मतलब शानदार या चैंपियन होता है लेकिन उस समय मीडिया में कम से कम पांच जर्मन एयरक्राफ्ट गिराने वाले पायलट को 'Ace' कहा गया था। सोवियत के पायलटों ने दुश्मन के इतने ज्यादा विमानों को ढेर किया कि उन्हें Red Ace Pilots के रूप में नई पहचान मिली।
सोवियत वायुसेना की अनदेखी ताकत
दूसरे विश्व युद्ध से पहले तक ज्यादातर बड़े देश सोवियत वायुसेना की ताकत से अनजान थे। सोवियत वायु सैनिक पूर्वी मोर्चे पर अपनी आक्रामकता से जंग को निर्णायक बना रहे थे। इन योद्धाओं ने जंग में ना सिर्फ अपनी हवाई श्रेष्ठता साबित की, बल्कि मित्र राष्ट्रों के पक्ष में नाजी जर्मनी को हराकर युद्ध की दिशा ही पलट दी। सोवियत वायुसेना को तब वोयेनो-वोज्दुश्निये सिली (VVS) के नाम से जाना जाता था।

दूसरे विश्वयुद्ध के समय वीवीएस के पास डॉगफाइटर, खतरनाक बॉम्बर, ग्राउंड अटैक बॉम्बर और डाइव बॉम्बर जैसे घातक विमान थे। USSR 1944 के दशक में विमान उत्पादन में भी अपने चरम पर था और वह हर साल 40,000 से ज्यादा विमान बना रहा था। सोवियत के पायलट डाइव बॉम्बरों और भारी ग्राउंड-अटैक विमानों से लेकर फुर्तीले डॉगफाइटर तक से उड़ानें भरते थे। इनमें से कई विमान स्वदेशी थे और कुछ लैंड-लीज प्रोग्राम के तहत सप्लाई किए गए थे।
इस दौरान इल्यूशिन-I1-2 उर्फ शुरमोविक को उड़ते हुए टैंक के नाम से पहचान मिली, जो इस युद्ध में सोवियत का प्रतीक बन गया। इसके अलावा लावोचकिन La-7 जर्मन-पिस्टन इंजन फाइटरों के बराबर था। वीवीएस ने मॉस्को की रक्षा से लेकर स्टालिनग्राद तक के युद्धों में निर्णायक भूमिका निभाई और गहरे हमलों से जमीनी अभियानों की सुरक्षा की। इन युद्धक मशीनों के पीछे वो युवा पुरुष और महिला पायलट थे, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए यूरोप में हवाई ताकत का संतुलन बदल दिया। उन्होंने दुश्मनों के सैकड़ों विमानों को मार गिराया और ऐस फाइटर कहलाए।
क्या होते हैं 'Ace' फाइटर?
- जिन्होंने किसी हवाई जंग में 5 या उससे ज्यादा दुश्मनों के विमान मार गिराए हों।
- दूसरे विश्वयुद्ध में इस तरह के बहुत से ऐस पायलट थे।
- जर्मनी के पास सबसे ज्यादा 2500 ऐस पायलट थे।
- जर्मन पायलटों को बड़ी संख्या में मित्र राष्ट्रों के विमानों से भिड़ना पड़ता था।
- ये वजह थी कि जर्मनी के पायलटों ने सबसे ज्यादा विमान गिराए।
एरिक हार्टमैन, जिन्होंने अकेले गिराए अमेरिका के 352 प्लेन
जर्मनी में लुफ्तवाफे के 103 पायलटों ने 100 से ज्यादा विमान गिराए थे, जबकि 2 पायलटों ने 300 का आंकड़ा पार कर दिया। इतिहास के सबसे सफल पायलटों में जर्मनी के एरिक हार्टमैन का नाम आता है, जिन्होंने अकेले 352 विमानों को मार गिराया था। उन्होंने सबसे ज्यादा सोवियत और अमेरिका के विमानों को मारा था, जबकि अमेरिका के पास ऐसे 1,297 ऐस पायलट थे, जिनमें रिचर्ड बॉन्ग 40 विमान गिराकर सबसे आगे थे। ब्रिटेन के पास इस तरह के 753 ऐस पायलट थे जबकि सोवियत संघ के 221 मान्यता प्राप्त ऐस पायलट थे। कई सोवियत पायलटों ने अपने सहयोगियों से ज्यादा व्यक्तिगत स्कोर बनाए।
किस देश के पास कितने 'Ace' पायलट
| देश | Ace पायलट की संख्या |
| जर्मनी | 2500 |
| अमेरिका | 1297 |
| ब्रिटेन | 753 |
| सोवियत संघ | 21 |
मित्र राष्ट्र के सबसे सफल पायलट
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सबसे ज्यादा विमान गिराने वाले मित्र राष्ट्र के पायलट इवान निकितोविच कोझेडुब थे, जिन्होंने अकेले दुश्मनों के 62 विमानों को मार गिराया था। उन्हें सोवियत के आसमान का नायक कहा जाता था। कोझेडुब का जन्म जून 1920 को ओब्राजीयिव्का गांव में हुआ था, जो अब यूक्रेन में है। उनका बचपन गरीबी और भूख में बीता। उन्हें बहादुर पायलट बनने की प्रेरणा सोवियत के एविएशन हीरो रहे वलेरी चकालोव से मिली थी।

कोझेडुब ने 1938 में फ्लाइंग क्लब जॉइन किया और 1939 में पहली सोलो उड़ान भरी थी। इसके बाद मार्च 1943 में उन्होंने 240वीं फाइटर एविएशन रेजिमेंट को जॉइन कर लिया। इसी साल 26 मई को उन्होंने कुर्स्क क्षेत्र में अपनी पहली लड़ाई लड़ी और दुश्मन पर बढ़त साबित की। वह अगस्त तक 16 और अक्तूबर 1943 तक 20 जीत दर्ज कर चुके थे। उनकी उड़ान में जबरदस्त आक्रामकता, सटीकता और शानदार गनरी का मिश्रण था।
10 दिन में गिराए 11 प्लेन
उनकी बहादुरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सिर्फ 10 दिनों में कोझेडुब ने रूस की नीपर नदी के ऊपर दुश्मनों के 11 प्लेन मार गिराए थे। इसके चलते फरवरी 1944 में उन्हें “हीरो ऑफ द सोवियत यूनियन” का पहला पुरस्कार दिया गया। उन्होंने La-7 यानी ह्वाइट 27 से अपने 17 अंतिम विमानों को मार गिराया था। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कुल 330 कॉम्बैट मिशन पूरा किया और इस दौरान 120 डॉगफाइट की, जिसमें दुश्मनों के 62 विमानों को ढेर कर दिया। उन्होंने प्रॉपलर विमान La-7 से ही दुनिया के पहले ऑपरेशनल फाइटर जेट Me-262 को भी मार गिराया था। इसके चलते उन्हें 3 बार “हीरो ऑफ द सोवियत यूनियन” का खिताब मिला। विश्वयुद्ध के खत्म होने पर उन्हें एविएशन मॉर्शल बनाया गया। साल 1991 में उनका निधन हो गया।

12 बमवर्षकों को भी मार गिराया
कोझेडुब को कोरिया युद्ध में सीधे जंग की अनुमति नहीं मिली थी। इसके बावजूद उन्होंने 324वीं फाइटर एयर डिवीजन का नेतृत्व करते हुए 27 मिग विमानों के बदले 239 हवाई जीत हासिल करने का दावा किया। इसमें 12 बी-29 बमवर्षक भी शामिल थे, जिसे उन्होंने मार गिराया। उनके सम्मान में साल 2020 में रूस ने एक डाक टिकट जारी किया। यूक्रेन का वायुसेना विश्वविद्यालय भी उन्हीं के नाम से है।
अलेक्जेंडर पोक्रिश्किन की रणनीति
मित्र राष्ट्रों में दूसरे सबसे सफल पायलट के रूप में सोवियत के अलेक्जेंडर पोक्रिश्किन का नाम लिया जाता है। वह इवान निकितोविच कोझेडुब के बाद सोवियत एविएशन के दूसरे सबसे महान पायलट थे। हालांकि, 1941 की पहली लड़ाई में वह एक गलती कर बैठे थे और सोवियत के ही एक बॉम्बर को गिरा दिया था। इसके अगले ही दिन उन्होंने दुश्मनों के विमान को मार गिराया। उन्होंने जंग का विश्लेषण करके नई हवाई रणनीतियां बनाईं और दुश्मनों को पराजित किया।

साल 1943 में कुबान के युद्ध में उन्होंने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जंग के लिए स्टैगर्ड फॉर्मेशन और रडार-ग्राउंड कंट्रोल जैसी नई रणनीति अपनाई। इसके बाद अप्रैल 1943 में P-39 एयराकोबरा जैसे विमान से उड़ान भरते हुए अकेले दुश्मनों के 11 विमानों को मार गिराया। अलेक्जेंडर को भी युद्ध के दौरान 3 बार “हीरो ऑफ द सोवियत यूनियन” का खिताब मिला। उन्होंने अकेले 65 टारगेट हिट किए और विमानों को मार गिराया। साल 1985 में उनका निधन हो गया।
दूसरे विश्वयुद्ध में पहली सोवियत महिला फाइटर
दूसरे विश्वयुद्ध में सोवियत की लिदया लितवयाक पहली महिला फाइटर पायलट थीं, जिन्हें बहादुर महिला पायलट का तमगा हासिल हुआ। उन्हें स्टालिनग्राद की ‘ह्वाइट लिली’ भी कहा जाता था। लितवयाक का जन्म 1921 में मॉस्को में हुआ था। 15 साल की उम्र में ही उन्होंने अपनी पहली सोलो उड़ान भरी। इसके बाद वह 586वीं ऑल-वूमेन फाइटर रेजिमेंट में शामिल हो गईं। 13 सितंबर 1942 को स्टालिनग्राद के आसमान में उन्होंने अपने दुश्मन के पहले विमान का शिकार किया। उन्होंने एक साथ दुश्मन के दो विमानों Ju 88 और Bf 109 को मार गिराया, जिसे जर्मन ऐस उड़ा रहे थे। लितवयाक बहुत ही आक्रामक और साहसी महिला पायलट थीं।

साथी की मौत के बाद घातक हो गईं लितवयाक
मई 1943 में अपने साथी ऐस एलेक्सी सोलोमातिन की मौत के बाद लितवयाक और भी ज्यादा घातक हो गईं, क्योंकि एलेक्सी को उनका प्रेमी माना जाता था। वह जर्मन ऑब्जर्वेशन बैलून गिराने वाली सोवियत की पहली महिला पायलट बन गईं। इसके बाद 1 अगस्त 1943 को ओरेल के पास वह अपनी चौथी उड़ान के दौरान दुश्मनों से घिर गईं और लापता हो गईं। उस वक्त उनकी उम्र महज 21 साल थी। मौत के बाद 1990 में उन्हें “हीरो ऑफ द सोवियत यूनियन” का खिताब दिया गया। इस महिला हीरो पायलट के नाम पर कई फिल्में बन चुकी हैं, गाने और किताबें भी लिखी गई हैं।
(यह लेख भारतीय वायुसेना के (रिटायर्ड) एयर मार्शल अनिल चोपड़ा ने लिखा है, जो सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज के डायरेक्टर-जनरल रह चुके हैं।)




