
धरती से 800 किलोमीटर ऊपर, जहां हवा खत्म होती है, रूस एक ऐसा जाल बुन रहा है जो पूरे देश को इंटरनेट से ढक देगा। इसके लिए न जमीन पर टावर लगेंगे, न समुद्र में केबल बिछाए जाएंगे बल्कि सीधे आसमान से सैटेलाइट्स के जरिए सिग्नल भेजा जाएगा। इस इंटरनेट के जाल का नाम है रास्वेत (Rassvet)। रूसी भाषा में इसका मतलब होता है ‘सुबह।’
दुनिया में पहले से ऐसे सैटेलाइट नेटवर्क मौजूद हैं जो धरती की निचली कक्षा से इंटरनेट देते हैं। एलन मस्क का स्टारलिंक इसी तकनीक पर चलता है- हजारों छोटे सैटेलाइट, 450-480 किलोमीटर की ऊंचाई, और दुनिया के करोड़ों लोगों तक तेज इंटरनेट पहुंच जाता है।
लेकिन स्टारलिंक की एक बड़ी खामी है- रूस, चीन, बेलारूस में यह काम नहीं करता। इसे देखते हुए रूस ने अपना खुद का सैटेलाइट इंटरनेट सिस्टम बनाने का फैसला किया है। रूस की एक निजी कंपनी ‘ब्यूरो 1440’ को यह काम सौंपा गया है। इस प्रोजेक्ट का मकसद एक ऐसा सैटेलाइट नेटवर्क बनाना है जो पूरी तरह रूसी हो, जिसे कोई बाहरी ताकत बंद न कर सके और जो रूस के हर कोने तक पहुंचे।

रास्वेत सैटेलाइट नेटवर्क है क्या और काम कैसे करता है?
रूस 2021 से अपना स्वदेशी सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम बनाने पर काम कर रहा है। ब्यूरो 1440 ने 2023 में पहली बार तीन टेस्ट सैटेलाइट लॉन्च किए। 2024 में दूसरा टेस्ट हुआ और मार्च 2026 में पहली बार 16 सैटेलाइट एक साथ अंतरिक्ष में भेजे गए।
19 जुलाई 2026 को रास्वेत का दूसरा बैच भी लॉन्च कर दिया है, जिसमें 16 और सैटेलाइट भेजे गए। इसके साथ अब कुल ऑपरेशनल सैटेलाइट्स की संख्या करीब 32 हो चुकी है।
ये सैटेलाइट बिल्कुल एक 5जी टावर की तरह काम करते हैं, फर्क बस इतना है कि ये टावर जमीन पर नहीं बल्कि 800 किलोमीटर ऊपर आसमान में टंगा है।
रास्वेत सैटेलाइट्स आपस में लेजर कम्युनिकेशन के जरिए जुड़े रहते हैं और 1 जीबीपीएस तक की स्पीड से डेटा भेज सकते हैं। इनकी लेटेंसी 70 मिलीसेकंड है- यानी कमांड दिया और जवाब तुरंत हाजिर।

रास्वेत-3 मॉडल का वजन करीब 370 किलो है, जो पहले लॉन्च किए गए मॉडल्स से काफी भारी है। पूरे प्रोजेक्ट की लागत करीब 7 अरब डॉलर आंकी गई है।
रूस का यह प्रोजेक्ट कितना बड़ा है?
रूस ने अपने इस प्रोजेक्ट के तहत अब तक 32 सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे हैं। 2026 के अंत तक 156 सैटेलाइट कक्षा में होंगे और 2035 तक यह संख्या 900 तक पहुंचाने का टारगेट है।
हालांकि, यहां तक का सफर आसान नहीं रहा। जब पहला बैच लॉन्च हुआ तो उस वक्त स्पेस सेंटर पर ड्रोन हमला करके मिशन रोकने की कोशिश की गई। फिर एक सैटेलाइट में तकनीकी खराबी आई और वो जून 2026 में वायुमंडल में जलकर खाक हो गया। ब्यूरो 1440 का कहना है कि इससे पूरे नेटवर्क पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

क्या सेना भी इसका इस्तेमाल करेगी?
रास्वेत को सिर्फ इंटरनेट तक सीमित नहीं माना जा रहा बल्कि सेना भी इसे इस्तेमाल कर सकेगी।
सैटेलाइट से नियंत्रित होने वाले ड्रोन को इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से रोकना बेहद मुश्किल होता है, क्योंकि सिग्नल सीधे अंतरिक्ष से आता है, तंग और फोकस्ड बीम में। रास्वेत की 5जी तकनीक इसी काम आएगी। रूस ऐसे भारी हमलावर ड्रोन बना रहा है जिन्हें इसी नेटवर्क के जरिए कंट्रोल किया जाएगा।
कई देश स्टारलिंक से इसी तरह का काम कराते हैं- हमलावर ड्रोन्स के बीच तालमेल बिठाना, रियल-टाइम डेटा शेयरिंग करना, जैमिंग से बचाना वगैरा वगैरा। रूस के पास पहले ये सुविधा नहीं थी। लेकिन अब यह कमी पूरी होने जा रही है, रास्वेत इसी कमी का जवाब है।

क्या आम लोग भी कर सकेंगे इस्तेमाल?
रूस इतना विशाल देश है कि साइबेरिया, टुंड्रा और आर्कटिक जैसे इलाकों में फाइबर केबल या मोबाइल टावर लगाना लगभग नामुमकिन है। वहां जमी हुई मिट्टी लगातार पिघल रही है जिससे टावर टिक नहीं पाते। रास्वेत इन्हीं इलाकों की समस्या हल करेगा और वहां के लोगों तक स्पीड इंटरनेट पहुंचा सकेगा।
रास्वेत सैटेलाइट्स को रूस की हाई-स्पीड ट्रेनों से जोड़ने का समझौता भी हो चुका है। मई में ब्यूरो 1440 और रूसी रेलवे ने हाई-स्पीड ट्रेनों में सैटेलाइट इंटरनेट शुरू करने का रोडमैप तैयार किया। यह योजना रूस के 1.05 लाख किलोमीटर लंबे रेल नेटवर्क पर लागू होगी।

इसके अलावा रूस की मोबाइल कंपनियां बीलाइन और मेगाफोन करीब 1,000 मोबाइल बेस स्टेशनों को इस नेटवर्क से जोड़ने की तैयारी कर रही हैं। यहां तक कि भविष्य में सैटेलाइट के जरिए वोटिंग की भी बात चल रही है।
अब सवाल है कि जब दुनिया में पहले से स्टारलिंक मौजूद है, तो रास्वेत अलग क्या करेगा? असली फर्क यहीं से शुरू होता है।
स्टारलिंक से कितना अलग है रूस का रास्वेत?
पश्चिमी मीडिया और रूसी स्पेस एजेंसी दोनों रास्वेत को स्टारलिंक का रूसी जवाब बताते हैं, लेकिन दोनों के डिजाइन अलग है। दोनों के बीच का फर्क समझते हैं-
स्टारलिंक करीब 450-480 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ने वाले हजारों छोटे सैटेलाइट्स का इस्तेमाल करता है। वहीं रास्वेत करीब 800 किलोमीटर की ऊंचाई पर काम करेगा। इससे कम सैटेलाइट में ज्यादा इलाके को कवर किया जा सकता है, लेकिन इंटरनेट में थोड़ी ज्यादा लेटेंसी हो सकती है।
स्टारलिंक अपनी सर्विस दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले और ज्यादा कमाई वाले इलाकों में देता है और इसका फोकस उन्हीं इलाकों में है। रूस, बेलारूस, चीन और अफ्रीका-एशिया के कई हिस्सों में इसकी सेवा उपलब्ध नहीं है। वहीं रास्वेत को रूस के आर्कटिक, साइबेरिया, क्रीमिया और सुदूर पूर्व जैसे इलाकों में लगातार सर्विस देने के लिए बनाया गया है।
स्टारलिंक आम लोगों के लिए बनाया गया है, जबकि रास्वेत का फोकस बड़े उद्योगों, सरकारी एजेंसियों और अहम इन्फ्रास्ट्रक्चर पर रहेगा।
दोनों सिस्टम बिना किसी अन्य डिवाइस के सीधे मोबाइल फोन से भी कनेक्ट हो सकते हैं। हालांकि रास्वेत पूरी तरह नई 5G तकनीक पर आधारित होगा।

रूस के लिए ये प्रोजेक्ट इतना बड़ा क्यों?
रूस का कम्युनिकेशन नेटवर्क काफी हद तक विदेशी सैटेलाइट और समुद्र के नीचे बिछी केबलों पर टिका है। पश्चिमी प्रतिबंधों के दौर में यह एक बड़ी कमजोरी है। रास्वेत इसी कमजोरी को ताकत में बदलने की कोशिश है।
यह प्रोजेक्ट रूस की उस बड़ी योजना का हिस्सा है, जिसके तहत वो अपना सॉफ्टवेयर, अपना सर्च इंजन, अपना पेमेंट सिस्टम और अपना सैटेलाइट नेटवर्क विकसित कर रहा है।
रास्वेत शायद सैटेलाइट की संख्या में स्टारलिंक की बराबरी न कर पाए, लेकिन रूस के लिए उसकी सबसे बड़ी ताकत कुछ और है। उसका मकसद दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट नेटवर्क बनाना नहीं, बल्कि ऐसा नेटवर्क तैयार करना है जो किसी विदेशी कंपनी या सरकार पर निर्भर न हो और जरूरत पड़ने पर देश के हर हिस्से को जोड़कर रख सके।




