इजरायल चुनाव Explained: नेतन्याहू की सबसे बड़ी चुनौती, सरकार बनाने का पेच भी समझिए
इजरायल में आज हो रहे चुनाव में नेतन्याहू की सत्ता दांव पर है। गाजा और ईरान के साथ संघर्ष के अलावा सेना में भर्ती, महंगाई और न्यायपालिका जैसे मुद्दे भी अहम हैं। जानिए टॉप-5 उम्मीदवारों, चुनावी गणित और दुनिया पर इसके संभावित असर की पूरी कहानी।
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इजरायल चुनाव Explained: नेतन्याहू की सबसे बड़ी चुनौती,  सरकार बनाने का पेच भी समझिए
इजरायल में आज वोटिंग।Gettyimages.ru

इजरायल में हो रहा चुनाव सिर्फ यह तय नहीं करेगा कि बेंजामिन नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने रहेंगे या नहीं। यह चुनाव ऐसे वक्त में हो रहा है, जब 7 अक्टूबर 2023 के हमले की सुरक्षा चूक, गाजा और ईरान के साथ संघर्ष, सेना में भर्ती से छूट, न्यायपालिका की शक्तियों और बढ़ती महंगाई को लेकर देश के भीतर बहस चल रही है। चुनाव में इन मुद्दों की अहमियत इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि इनके नतीजे इजरायल की घरेलू राजनीति के साथ पश्चिम एशिया में उसकी आगे की रणनीति को भी प्रभावित कर सकते हैं।

आसान भाषा में समझें इजरायल चुनाव की पूरी ABCD...

  • वामपंथी इलाकों में बंपर वोटिंग से घबराये नेतन्याहू, दक्षिणपंथी वोटरों से कहा-ये इमरजेंसी ऑवर

    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू वामपंथी इलाकों में बंपर वोटिंग से घबरा गए हैं। उन्होंने दक्षिणपंथी मतदाताओं के लिए इसे इमरजेंसी ऑवर बताते हुए, जल्द घरों से निकलने और वोट करने की अपील की है। 

  • इजरायल में बंपर वोटिंग क्या संकेत दे रही?

    इजरायल में दोपहर 12 बजे तक हुई बंपर वोटिंग ने 59 साल के रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया है। यह वोटिंग क्या संकेत दे रही है, इस बारे में रात 10 बजे के बाद आने वाले एग्जिट पोल से कुछ हद तक समझा जा सकेगा।

  • इजरायल में 1981 के बाद पहले 3 घंटे में रिकॉर्ड वोटिंग

    इजरायल में 1981 में हुए चुनाव के बाद शुरुआत के 3 घंटे में सबसे अधिक वोटिंग रिकॉर्ड की गई है। आरंभ के 3 घंटे में 1.2 मिलियन लोगों ने वोट किया। सुबह 7 से 10 बजे तक करीब 16.7 फीसदी वोटिंग हुई। देखें कब कितनी वोटिंग हुई।

  • इजरायल में वोटिंग के बाद क्या होगा?

    इजरायल में आज वोटिंग खत्म होने के बाद एग्जिट पोल जारी होंगे, जिनसे शुरुआती अंदाजा मिलेगा कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं। हालांकि, असली तस्वीर वोटों की गिनती के बाद साफ होगी। इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।

    यहां मतदाता सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। नतीजों के बाद राष्ट्रपति उस नेता को सरकार बनाने का मौका देंगे, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे ज्यादा संभावना होगी। ऐसे में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को मिलने वाली सीटों के साथ-साथ यह भी अहम होगा कि उनके सहयोगी दल कितनी सीटें जीतते हैं और विपक्ष कितना मजबूत गठबंधन बना पाता है।

    विस्तार से पढ़ें- इजरायल में वोटिंग खत्म होने के बाद क्या होता है? 3.25% वाला मैजिक नंबर भी समझिए

  • चुनाव से पहले AI तस्वीर पर क्यों हुआ विवाद?

    चुनाव प्रचार में तकनीक और सोशल मीडिया भी चर्चा का हिस्सा बने। नेतन्याहू ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से बनी परमाणु हमले की काल्पनिक तस्वीर साझा की, जिसके बाद विवाद हुआ। विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट ने उन पर डर की राजनीति करने का आरोप लगाया। यह विवाद दिखाता है कि चुनाव में सुरक्षा के वास्तविक सवालों के साथ-साथ उन्हें मतदाताओं के सामने किस तरह पेश किया जा रहा है, यह भी राजनीतिक बहस का हिस्सा है।

    क्या बदलेगी इजरायल की राजनीति?

    इजरायल का यह चुनाव सिर्फ प्रधानमंत्री चुनने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में 7 अक्टूबर की जवाबदेही, सैन्य सेवा के नियम, न्यायपालिका की भूमिका, महंगाई और देश की सुरक्षा नीति जैसे सवाल हैं। चुनाव के बाद सरकार किसी भी गठबंधन की बने, उसे इन घरेलू चुनौतियों के साथ गाजा, ईरान और फिलिस्तीन से जुड़े क्षेत्रीय तनावों का भी सामना करना होगा।

  • क्या चुनाव के बाद इजरायल की विदेश नीति बदलेगी?

    चुनाव के नतीजों पर सिर्फ इजरायल की घरेलू राजनीति की नजर नहीं है। अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के लिए भी यह अहम है। नेतन्याहू की जीत से ईरान के खिलाफ सख्त रुख और वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के विस्तार की मौजूदा नीति जारी रहने की संभावना पर चर्चा हो रही है। हालांकि, विश्लेषकों के मुताबिक, विपक्षी गठबंधन की सरकार बनने पर भी इजरायल की सुरक्षा नीति के मूल सिद्धांतों में बड़े बदलाव की गुंजाइश सीमित हो सकती है। अंतर यह हो सकता है कि सैन्य कार्रवाई, कूटनीति और फिलिस्तीनियों से जुड़े मुद्दों को किस तरह संभाला जाता है।

    अमेरिका से लेकर खाड़ी देशों तक की नजर

    अमेरिका इजरायल का प्रमुख रणनीतिक और सैन्य साझेदार है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू का समर्थन किया है। दूसरी ओर, सऊदी अरब के साथ इजरायल के संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशें, गाजा की स्थिति और ईरान के साथ टकराव क्षेत्रीय कूटनीति के अहम मुद्दे हैं। इजरायल की अगली सरकार इन मोर्चों पर क्या रुख अपनाती है, इसका असर पश्चिम एशिया में तनाव और सहयोग की संभावनाओं पर पड़ सकता है।

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  • इजरायल में सरकार बनाने का गणित क्या है?

    इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। यहां मतदाता सीधे प्रधानमंत्री को नहीं चुनते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। इसलिए सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के लिए भी सरकार बनाना आसान नहीं होता। अलग-अलग दलों के बीच गठबंधन और समर्थन का गणित तय करता है कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा और सरकार कितनी स्थिर होगी।

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    चुनाव से पहले जारी सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के सत्ताधारी गठबंधन और विपक्षी गुट, दोनों के लिए बहुमत का आंकड़ा हासिल करना मुश्किल बताया गया था। कुछ सर्वेक्षणों में गादी आइजेनकोट की यशार पार्टी को नेतन्याहू की लिकुड पार्टी से आगे दिखाया गया। हालांकि, ये अनुमान थे, अंतिम नतीजे नहीं। इजरायल की गठबंधन आधारित व्यवस्था में छोटी पार्टियों का प्रदर्शन भी सरकार बनाने के समीकरण को बदल सकता है।

    यहां विस्तार से पढ़ें- इजरायल चुनाव का पूरा प्रोसेस यहां समझें

  • इजरायल चुनाव के टॉप-5 चेहरे कौन हैं?

    1. बेंजामिन नेतन्याहू: इजरायल के मौजूदा प्रधानमंत्री और लिकुड पार्टी के नेता। वह अपनी सुरक्षा नीतियों और सैन्य अभियानों को सरकार की उपलब्धि बताते हैं। 

    2. गादी आइजेनकोट: इजरायली सेना के पूर्व प्रमुख और यशार पार्टी के नेता। वह नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों में शामिल हैं। आइजेनकोट सेना में भर्ती से छूट खत्म करने और 7 अक्टूबर के हमले की जवाबदेही तय करने की मांग कर चुके हैं।

    3. नफ्ताली बेनेट: इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री और दक्षिणपंथी नेता। वह पूर्व प्रधानमंत्री याइर लापिड के साथ बेयाचाड गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं। फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन का विरोध करने वाले बेनेट सुरक्षा और सेना में भर्ती के मुद्दों पर नेतन्याहू से अलग रुख भी रखते हैं।

    4. इतमार बेन-ग्विर: इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री और ओत्ज्मा येहुदित पार्टी के नेता। वह कट्टर दक्षिणपंथी राजनीति के लिए जाने जाते हैं। फिलिस्तीनियों को लेकर उनका सख्त रुख और गाजा में यहूदी बस्तियां बसाने का समर्थन चुनावी बहस के अहम पहलू हैं।

    5. मंसूर अब्बास: अरब समुदाय के प्रमुख राजनीतिक चेहरों में शामिल और राम पार्टी के नेता। वह अरब समुदायों में अपराध, कानून-व्यवस्था और स्थानीय समस्याओं पर जोर देते हैं। उनकी पार्टी की भूमिका चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए जरूरी गठबंधन के समीकरणों में अहम हो सकती है।

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  • इजरायल चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा वो नहीं, जो आप समझ रहे हैं

    दुनिया की नजर इजरायल की जंग पर है, लेकिन वहां के मतदाताओं के लिए सिर्फ गाजा और ईरान ही मुद्दे नहीं हैं। सेना में भर्ती से छूट, 7 अक्टूबर के हमले की जवाबदेही, न्यायपालिका में बदलाव और बढ़ती महंगाई भी चुनाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

    • 7 अक्टूबर का हमला भी बड़ा मुद्दा 
    • सेना में भर्ती से छूट पर विवाद
    • न्यायपालिका में बदलाव का मुद्दा भी बाकी
    • महंगाई और रोजमर्रा का खर्च भी चिंता

    नेतन्याहू के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां?

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    लंबे समय से इजरायल की राजनीति के केंद्र में रहे नेतन्याहू के सामने इस बार कई चुनौतियां हैं। उनके समर्थक उन्हें अनुभवी नेता मानते हैं और सुरक्षा के मोर्चे पर उनकी नीतियों का बचाव करते हैं। वहीं, विरोधी 7 अक्टूबर की सुरक्षा चूक और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर सवाल उठाते हैं। 

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